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राजस्थान के 'ट्रैक्टर सवार किसान' के सहारे गुजरात चुनाव लड़ने निकले हैं शंकर सिंह वाघेला

शंकर सिंह वाघेला. गुजरात राजनीति का एक बुजुर्ग खंभा. छोटा-मोटा नाम नहीं हैं. मुख्यमंत्री रह चुके हैं. इनके जिक्र में मोदी का भी जिक्र निकल आता है. दोस्ती और दुश्मनी का इतना ‘दांत काटे सा रिश्ता’ जो रहा दोनों में. हर बार लगता है, अब ठहर गए. मगर वाघेला हार नहीं मानते. फिर कुछ नया खोज लाते हैं. पहले बीजेपी में थे. निराश हुए, तो कांग्रेस चले गए. वहां भी मनमुताबिक नहीं मिला. वहां से भी निकल गए. अब दोनों से तौबा कर अकेले निकले हैं. अपने बूते गुजरात फतह करने. गुजरात जीतने निकले हैं, मगर सहारा राजस्थान का ले रहे हैं. राजस्थान की मदद से गुजरात जीतने चले हैं.

मोदी और वाघेला का पुराना इतिहास है. पहले दोस्ती, फिर दुश्मनी, फिर दोस्ती. मोदी के साथ उनका रिश्ता एक तरह से उनके करियर के बनने-बिगड़ने की कहानी है.
मोदी और वाघेला का पुराना इतिहास है. पहले दोस्ती, फिर दुश्मनी, फिर दोस्ती. दोनों के बीच उठापटक की लंबी कहानी है. मोदी के साथ उनका रिश्ता एक तरह से उनके करियर के बनने-बिगड़ने की वजह बना.

वाघेला को मिला राजस्थान के ‘ट्रैक्टर सवार किसान’ का आसरा
वाघेला का एक फ्रंट है. जन विकल्प. इसके सहारे ही वाघेला गुजरात विधानसभा को समूचा देखेंगे. मतलब, उनकी पार्टी 182 सीटों से चुनाव लड़ेगी. वाघेला के इस वन-मैन शो का रिश्ता सरहद पार से है. गुजरात की सीमा के पार, राजस्थान से. एक पार्टी है. ऑल इंडिया हिंदुस्तान कांग्रेस. एकदम नवजात समझिए. इसे बने अभी एक साल ही हुआ है. राजस्थान की है. वहीं रजिस्टर्ड हुई. वाघेला इसी का नाम ले रहे हैं. इस पार्टी को चुनाव आयोग से चुनाव चिह्न भी मिल चुका है. ट्रैक्टर चलाता हुआ किसान. ट्रैक्टर पर बैठे इस किसान को अब वाघेला गुजरात ला रहे हैं. उनका ‘जन विकल्प’ मोर्चा इसी पार्टी के चुनाव चिह्न पर इलेक्शन लड़ेगा. ऑल इंडिया हिंदुस्तान कांग्रेस भी राजी है. जन विकल्प को अपना चुनाव चिह्न देने के लिए मान गई है.

मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते हुए शंकर सिंह वाघेला.
मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते हुए शंकर सिंह वाघेला. ये तस्वीर अक्टूबर 1996 की है. 1995 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को पहली बार गुजरात में बहुमत मिला. केशुभाई पटेल CM बनाए गए. इसके बाद वाघेला ने बगावत कर दिया था.

पहली पसंद नहीं, ये तो झटपट का अरेंजमेंट है
वैसे ये वाघेला के मन-मुताबिक इंतजाम नहीं है. चाहते तो थे, अपनी पार्टी का चुनाव चिह्न. उसके लिए देर हो गई है मगर. चुनाव की तारीख का ऐलान भी हो चुका है. सो मजबूरी में उन्होंने ऑल इंडिया हिंदुस्तान कांग्रेस से समझौता किया. उसके बाद ही ये ताजा अरेंजमेंट हुआ है. एक अनिल कुमार शर्मा हैं. उस पार्टी के महासचिव. उन्होंने हामी भर दी. कहा, बिना शर्त वाघेला को समर्थन देंगे.

मुख्यमंत्री बनने के नाम पर ही तो बाहर निकले थे
वाघेला बस चुनाव नहीं लड़ रहे हैं. कुर्सी की भी उम्मीद कर रहे हैं. कहते हैं, पार्टी जीती तो मुख्यमंत्री बनेंगे. आखिरकार इसी सपने को साथ लेकर तो कांग्रेस से बाहर निकले थे. पार्टी उनको CM पद का उम्मीदवार बनाने को राजी नहीं थी. वाघेला को इससे कम कुछ चाहिए नहीं था.  वैसे, जीती हुई पार्टी सरकार बनाती है. उसके लिए तो पहले इलेक्शन लड़ना होता है. जीतना होता है. वाघेला ने कहा क्या है? कि पार्टी को बहुमत मिला, तो मुख्यमंत्री बनने से हिचकिचाएंगे नहीं. :-) :-) :-) अपना फॉर्म्युला भी बता दिया है वाघेला ने. अडानी और अंबानी का नाम लिया. नाम लेकर कहा, इनसे तो पैसा नहीं लेंगे. ठीक है. शायद ‘ट्रैक्टर चलाते किसान’ और अंबानी-अडानी का एकसाथ नाम लेना ‘बांतर’ होगा. वैसे ही जैसे कुछ लोग मछली के साथ गर्म दूध नहीं लेते. कहते हैं, रिऐक्शन हो जाता है कुछ अंदर ही अंदर.

वाघेला ने जब कांग्रेस का साथ छोड़ा, उससे बाद ऐसा लग रहा था कि वो बीजेपी में शामिल हो सकते हैं.
वाघेला ने जब कांग्रेस का साथ छोड़ा, उससे बाद ऐसा लग रहा था कि वो बीजेपी में शामिल हो सकते हैं. ऐसा हुआ नहीं मगर.

चुनाव नया है, लेकिन वादे वही पुराने वाले लेकर आए हैं वाघेला
वाघेला ने अगस्त में कांग्रेस को टाटा-बाय बोला था. उधर कांग्रेस अपने पुराने नेता को खूब ‘बैड माउथ’ कह रही है. बैड माउथ, यानी बुराई. क्या तो नाम रखा है उसने वाघेला का? हां, वोट कटवा. कांग्रेस कह रही है कि वाघेला बीजेपी के एजेंट हैं. वोट काटने के लिए इलेक्शन में खेलने उतरे हैं. कांग्रेस कह रही है. वाघेला का भरोसा मत करना. वैसे, कांग्रेस और किसी को भी रोक ले, वाघेला को खुद पर भरोसा करने से तो नहीं रोक पाएगी. इसी की बदौलत तो वो 77 साल की उम्र में गुजरात जीतने निकले हैं. कह रहे हैं कि जीत गए, तो गरीबों का विकास करेंगे. आरक्षण के बारे में भी कुछ-कुछ बोला है. विधवाओं और बड़े-बूढ़ों को पेंशन भी देने का वादा किया है. देखते हैं, आगे क्या होता है. फिलहाल एक पड़ाव तो पार हुआ वाघेला के लिए. चुनाव तो लड़ ही लेंगे अब शायद. नतीजा क्या होगा, ये तो 18 दिसंबर का सूरज ही बताएगा. बताएंगे तब आपको. किसके हिस्से जीत आई. कौन हारा.


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