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क्या देश की अर्थव्यवस्था पहले की तरह सामान्य होने की राह पर है?

कोरोना की वजह से 25 मार्च को पूरे देश में लॉकडाउन लगा. सबकुछ बंद कर दिया गया. अर्थव्यवस्था का पहिया था गया. हालांकि जून के पहले हफ्ते से अर्थव्यवस्था को धीरे-धीरे खोलना शुरू कर दिया गया. इससे कुछ चीजें सामान्य हुईं. कुछ आंकड़े सामने आए हैं. जीएसटी कलेक्शन बढ़ा है. यूपीआई ट्रांजेक्शन में रिकॉर्ड बढ़ोतरी देखने को मिली है. सेंसेक्स में सुधार दिख रहा है. अप्रैल की तुलना में जून में गाड़ियों की बिक्री बढ़ी है. ट्रैक्टरों की बिक्री भी बढ़ी है. ये आकंड़े क्या संकेत दे रहे हैं. क्या अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे ही सही, पटरी पर लौट रही है?

जीएसटी कलेक्शन

गुड्स एंड सर्विस टैक्स. यानी जीएसटी. जून में जीएसटी कलेक्शन 90,917 करोड़ रहा. मई में यह सिर्फ 62,009 करोड़ रुपये था. वहीं अप्रैल में जीएसटी कलेक्शन 32,294 करोड़ रहा. अगर आप पिछले साल इस दौरान हुए जीएसटी कलेक्शन की तुलना करेंगे, तो यह 91 फीसदी है. लेकिन इस साल अप्रैल और मई के मुकाबले इसमें काफी बढ़ोतरी हुई है. साल की पहली तिमाही में जीएसटी कलेक्शन पिछले साल की तुलना में 59 फीसदी रहा. कोरोना काल में पहली बार जीएसटी का डेटा आया है.

सूरतुल अमरचंद मंगलदास एंड कंपनी के पार्टनर रजत बोस ने ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ से कहा,

जून में जीएसटी कलेक्शन में बढ़ोतरी दिखाता है कि अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे रिकवर कर रही है. हालांकि यह भी ध्यान देना होगा कि कई कंपनियों ने मार्च, अप्रैल और मई का जीएसटी जून में दिया है.

कोरोना की वजह से इस वित्त वर्ष में सरकार का राजस्व बुरी तरह प्रभावित हुआ. अप्रैल में जीएसटी कलेक्शन 32,294 करोड़ रुपये रहा था जो पिछले साल की समान अवधि की तुलना में केवल 28 फीसदी था. इस साल मई में यह 62,009 करोड़ रुपये रहा, जो पिछले साल मई में आए कलेक्शन का 62 फीसदी था. हालांकि बड़ी संख्या में करदाताओं ने अपने मई के रिटर्न दाखिल नहीं किए हैं. ये जुलाई में दाखिल होंगे. यानी जुलाई में भी जीएसटी कलेक्शन में बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है.

GST Rate

सरकार की तरफ से जारी आंकड़ों के मुताबिक, जून में जीएसटी संग्रह 90,917 करोड़ रुपये रहा. इसमें केंद्रीय जीएसटी 18,980 करोड़ रुपये, राज्य जीएसटी 23,970 करोड़ रुपये और एकीकृत जीएसटी 40,302 करोड़ रुपये रहा. उपकर (Compensation cess) के रूप में सरकार को जून में 7,665 करोड़ रुपये मिले. केंद्र सरकार ने रेगुलर सेटलमेंट के रूप में 13,325 करोड़ रुपये सीजीएसटी और 11,117 करोड़ रुपये एसजीएसटी के रूप में सेटल किए हैं. इस तरह इस सेटलमेंट के बाद केंद्र को राजस्व के रूप में जून में 32,305 करोड़ रुपये और राज्यों को 35,087 करोड़ रुपये मिले.

UPI ऑल टाइम हाई

यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस यानी UPI. डिजिटल लेन-देन. सरल भाषा में कहें, तो मोबाइल के जरिए पैसे का लेन-देन जैसे पेटीएम, फोनपे, गूगल पे, अमेजन पे और अन्य. नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) के आंकड़ों के मुताबिक, जून में यूपीआई पर लेन-देन 1.34 अरब तक पहुंच गया. मई 2020 में 1.23 अरब का लेन-देन हुआ था. मई के मुकाबले जून में 8.94 प्रतिशत की वृद्धि हुई. इससे पहले अप्रैल में कोरोना वायरस महामारी के कारण लागू लॉकडाउन में यूपीआई लेन-देन घटकर 99.95 करोड़ रह गया था. इस दौरान कुल 1.51 लाख करोड़ रुपये के लेन-देन हुए. अर्थव्यवस्था को खोलने के बाद ऑनलाइन भुगतानों में मई से धीरे-धीरे बढ़ोतरी हुई.

फोन पे और पेटीएम भारत की दो सबसे बड़ी डिजिटल पेमेंट कंपनियां हैं.
फोन पे और पेटीएम भारत की दो सबसे बड़ी डिजिटल पेमेंट कंपनियां हैं.

एनपीसीआई के एमडी और सीईओ दिलीप अस्बे ने ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ से बातचीत में कहा,

एक बार फिर हम फरवरी वाले वॉल्यूम पर पहुंच गए हैं. अप्रैल में तेज गिरावट देखने को मिली थी, लेकिन इसमें धीरे-धीरे सुधार हुआ है. यह आर्थिक गतिविधि में वृद्धि को दर्शाता है.

Bharat Bill Payment System यानी BBPS ऑनलाइन बिल भुगतान प्रणाली है. जून में इसकी लेन-देन की मात्रा 26.6 प्रतिशत बढ़कर 17.64 मिलियन हो गई, जो मई में 16.54 मिलियन थी. BharatPe के फाउंडर और सीईओ अशनीर ग्रोवर ने ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ से बातचीत में कहा,

कोरोना के कारण कई लोग कैश यूज करने से डरते थे. इसलिए यूपीआई डिफॉल्ट पेमेंट का विकल्प बन रहा है. यह केवल कैश यूजर को ही अट्रैक्ट नहीं कर रहा है, बल्कि कार्ड यूजर्स भी यूपीआई का इस्तेमाल कर रहे हैं. UPI पर नंबर बढ़ते रहेंगे, क्योंकि उपभोक्ता के व्यवहार में एक बुनियादी बदलाव आया है.

‘सर्वत्र टेक्नोलॉजी’ के फाउंडर और वाइस चेयरमैन मंदर अगाशे ने ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ से बातचीत में कहा,

यूपीआई ट्रांजेक्शन में जून में रिकॉर्ड बढ़ोतरी देखने को मिली. कोरोना और लॉकडाउन की वजह से इसमें बड़ा बदलाव देखने को मिला. देशभर के व्यापारियों ने डिजिटल पेमेंट के लिए दरवाजे खोल दिए हैं. दैनिक उपयोग की वस्तुओं के भुगतान के लिए लोग ई-पेमेंट की ओर शिफ्ट हो गए हैं. युटिलिटी, मोबाइल, ग्रोसरी की वजह से डिजिटल पेमेंट बढ़ा है.

शेयर मार्केट

लॉकडाउन के दौरान शेयर मार्केट की स्थिति डावांडोल थी. लॉकडाउन होते ही शेयर मार्केट गिर गया था. 23 मार्च को बाजार अपने 52 हफ्तों के निचले स्तर पर चला गया था. हालांकि उसके बाद से धीरे-धीरे शेयर मार्केट ने उठना शुरू किया. आज के दिन, 2 जुलाई तक निफ्टी बढ़ते-बढ़ते 7500 से 10551 के लगभाग पहुंच गया है. वहीं सेंसेक्स 35,843 तक पहुंच गया है. शेयर मार्केट की चीजें अर्थव्यवस्था से जुड़ी होती हैं. जब शेयर मार्केट अच्छा करता है, तो कह सकते हैं कि अर्थव्यवस्था अच्छा कर रही है.

शेयर बाजार लॉकडाउन में धड़ाम हो गया था लेकिन फिर से रिकवरी कर रहा है.
शेयर बाजार लॉकडाउन में धड़ाम हो गया था, लेकिन फिर से रिकवरी कर रहा है.

मनरेगा

मनरेगा के आंकड़ों से पता चलता है कि जून में 43.7 मिलियन यानी 4.37 करोड़ हाउसहोल्ड ने मनरेगा के तहत काम मांगा. यह पिछले सात साल में सबसे ज्यादा है. मई में भी यही देखने को मिला था. मई 2020 में मनरेगा के तहत काम मांगने वाले परिवारों की संख्या से जून में यह 21 प्रतिशत अधिक था. मई 2020 में 36.1 मिलियन परिवारों ने काम की मांग की, जो पिछले सात वर्षों में उस महीने के लिए अधिकतम था. प्रोविजनल डाटा से पता चलता है कि जून 2020 में, MGNREGA ने 382.9 मिलियन पर्सनडेज दिए, जो कि पिछले महीने (मई 2020) की तुलना में लगभग 32 प्रतिशत कम था. मई में योजना के तहत 567.4 मिलियन (56.74 करोड़) पर्सनडेज काम मुहैया कराया गया.

मनरेगा में काम मांगने वालों की संख्या बढ़ गई है. (फोटो-पीटीआई)
मनरेगा में काम मांगने वालों की संख्या बढ़ गई है. (फोटो-पीटीआई)

हालांकि इस आंकड़े को बहुत ही बारीकी से देखने की जरूरत है, क्योंकि यदि काम की मांग बढ़ रही है, तो दिए गए काम में भी वृद्धि होनी चाहिए. मार्च में लॉकडाउन के बाद गांव लौटे मजदूरों की वजह से मनरेगा में काम की डिमांड बढ़ी. मनरेगा में रोजगार बढ़ाने के लिए सरकार ने मई में मनरेगा के बजट को एक लाख करोड़ रुपए कर दिया था. मनरेगा में काम की मांग बढ़ रही है, लेकिन लेकिन केंद्र सरकार ने 100 से ज्यादा काम की गारंटी नहीं दे रही है. 100 दिन से ज्यादा काम बढ़ाने की मांग को लेकर कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन भी हुए हैं.

मॉनसून

इस साल मॉनसून समय से आ गया. मौसम विभाग ने मॉनसून सामान्य रहने का अनुमान लगाया है. बारिश अच्छी होने से खरीफ की फसल अच्छी हो सकती है. देश की आधे से ज्‍यादा फसलों पर इस दौरान होने वाली बारिश का अच्छा असर पड़ता है. फसलों की पैदावार से खाने-पीने की चीजों के दाम तय होते हैं. पैदावार बढ़िया रही, तो खाद्य पदार्थों की कीमतें कम रहेंगी.

‘दी इकनॉमिक टाइम्स’ से बातचीत में बार्कलेज बैंक पीएलसी के वरिष्ठ अर्थशास्त्री राहुल बजोरिया ने कहा था कि सामान्य मॉनसून मंदी से जूझ रहे भारत के लिए मददगार साबित हो सकता है. लेकिन यह जरूरी नहीं कि भारतीय अर्थव्यवस्था में बदलाव लाए. एक अच्छे मॉनसून से खाने-पीने की चीजों के दाम काबू में रहते हैं.

फोटो क्रेडिट: Reuters
फोटो क्रेडिट: Reuters

कृषि उपकरण और इंजीनियरिंग क्षेत्र की कंपनी ‘एस्कॉर्ट्स लिमिटेड’ के ट्रैक्टर की कुल बिक्री जून में 21.1 प्रतिशत बढ़कर 10,851 यूनिट हो गई. एस्कॉर्ट्स ने बताया कि उसने पिछले साल के इसी महीने में 8,960 यूनिट बेची थीं. कंपनी ने बताया की जून में घरेलू ट्रैक्टर की बिक्री 10,623 यूनिट रही, जबकि एक साल पहले की समान अवधि में यह आंकड़ा 8,648 यूनिट था. इसे कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के अच्छा संकेत माना जा रहा है.


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