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सरकार ने कंस्ट्रक्शन की मंज़ूरी तो दे दी, लेकिन इससे जुड़े लोग किन परेशानियों से जूझ रहे हैं?

कोरोना वायरस के चलते लॉकडाउन लगा. इसके साथ ही लागू हुए कई नियम कायदे. बाहर जाना छूट गया. काम धंधे बंद हो गए. लेकिन अर्थव्यवस्था के चक्के चलाने हैं तो काम तो करना होगा. इसलिए 15 अप्रैल को जब दोबारा लॉकडाउन आगे बढ़ा तो कुछ ढील भी दी गई. इन्हीं में से एक था कंस्ट्रक्शन का काम. यानी सड़क, मकान, दुकान, पुल बनाने का काम शुरू करने की छूट.

छूट मिलने के बाद जमीन पर क्या हुआ? क्या फिर से लोहे के सरियों को पीटने, ड्रिलिंग मशीनों के घरघराने की आवाजें आने लगी है? क्या सीमेंट को बजरी में मिलाने को फावड़े, ईंट को ईंट और पत्थर पर पत्थर रखने को हाथ चलने लगे? इन सब के बारे में जानने को The Lallantop ने बात की मजदूरों से, कारीगरों से, लेबर कॉन्ट्रैक्टरों से. इन सबसे ये सवाल पूछे-

# क्या कंस्ट्रक्शन का काम शुरू हो गया है?

# क्या पर्याप्त मज़दूर हैं?

# क्या कच्चा माल आ रहा है?

मजदूर काम पर आ रहे हैं?

किस तरह की समस्याएं आ रही हैं?

लॉकडाउन की गाइडलाइंस का पालन कैसे हो रहा है?

मज़दूरी में कोई कमीबेशी हुई है?

पहले जान लेते हैं सरकार ने छूट देते हुए क्या कहा था-

गृह मंत्रालय ने 15 अप्रैल को आदेश जारी किया था. इसमें कहा था कि सड़कों, सिंचाई योजनाओं, बिल्डिग और सभी तरह के औद्योगिक प्रोजेक्ट शुरू किए जा सकते हैं. कंस्ट्रक्शन उन्हीं जगहों पर शुरू होगा, जहां पर मजदूर मौके पर ही रहते हैं. यानी बाहर से नहीं आते हैं. काम के दौरान सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान रखना होगा. मजदूरों और कारीगरों सभी को मास्क पहनना जरूरी होगा.

इस दौरान सामने आया कि सबकी अपनी समस्याएं है. मजदूरों में डर है. कंस्ट्रक्शन ठेकेदार मजदूरों के घर जाने को लेकर चिंतित हैं.

सरकार ने काम की छूट दी, अब खुद ही लेबर को भेजने में लगी है

नाम: अमित जैन
पेशा: बिल्डिंग कॉन्ट्रैक्टर
जगह: (जयपुर) राजस्थान

अमित ने कहा कि छिटपुट काम शुरू किया है. जो पुराना मटेरियल पड़ा था. शुरू में उसी से ही काम किया. लेकिन उसके खत्म होने पर दिक्कत आई. सरकार ने रोड़ी बनाने वाली क्रशर को मंजूरी नही दी. इस वजह से रोड़ी और बजरी दोनों नहीं आ रही. सीमेंट की फैक्टरियां पहले बंद थी. लेकिन अब खुल चुकी है. इसीलिए सीमेंट की कमी नहीं है. रही बात सोशल डिस्टेंसिंग की तो वह तो मैनेज हो जाता है. गर्मियां है. ऐसे में मजदूर-कारीगर धूप से बचने को गमछे रखते हैं. इसके अलावा कारीगर और मजदूर वैसे भी दूरी बनाकर ही रखते हैं. अमित की शिकायत है कि सरकार काम शुरू करने को कह चुकी है. लेकिन दूसरी तरफ मजदूरों को घर भी भेज रही है. वे कहते हैं,

सरकार खुद ही परेशानी खड़ी कर रही है. लेबर को घर भेज रही है. ऐसे में जो लोग काम करना चाहते थे या कर रहे थे, वे भी घर जाना चाहते हैं. अभी काम का समय होता है. लेकिन अगर लेबर एक बार घर चला गया तो 3-4 महीने तक नहीं आएगा. इसके बाद मानसून आ जाएगा. फिर मजदूर गांवों में खेती-बाड़ी में लग जाते हैं. ऐसे में काम कैसे होगा.

अमित का कहना है कि यूपी-बिहार से सबसे ज्यादा मजदूर हैं. उनके जाने से काफी फर्क पड़ेगा. स्थानीय लेबर है. लेकिन वो काफी नहीं.

लखनऊ में एक कंस्ट्रक्शन साइट पर काम में जुटे मजदूर नजर आ रहे हैं. (Photo: PTI)
लखनऊ में एक कंस्ट्रक्शन साइट पर काम में जुटे मजदूर नजर आ रहे हैं. (Photo: PTI)

पता नहीं घर ले जाने वाली ट्रेन कब आएगी

नाम: मुकेश
पेशा: मजदूर
जगह: गुलबर्गा (कर्नाटक)

मुकेश यूपी के हरदोई के रहने वाले हैं. उन्होंने कहा कि लॉकडाउन से 2-4 दिन पहले ही घर से गुलबर्गा के लिए निकले थे. पहुंचते ही लॉकडाउन हो गया. तब से कोई काम नहीं मिला. हालांकि, उन्होंने बताया कि खाना ठेकेदार दे रहे हैं. शुरू में तो खर्च भी वही उठा रहे थे. लेकिन लॉकडाउन दोबारा आगे बढ़ा तो ठेकेदार ने कहा कि अब खाने के पैसे काटे जाएंगे. और कोई चारा भी नहीं है. उन्होंने कहा-

साथ में 20 लोग और रहते हैं. लेकिन काम शुरू नहीं हुआ है. पुलिसवाले मना कर देते हैं. अब घर जाने के लिए रजिस्ट्रेशन कराया है. पता नहीं घर ले जाने वाली ट्रेन कब आएगी.

मुकेश ने बताया कि काम पर आने से पहले घरवालों ने रोका था. कहा था कि कुछ दिन रुक जाओ. फिर जाना. अब लग रहा है कि रुक जाता तो ठीक रहता.

केरल के कोझिकोड से घरों को लौटते मजदूर. (Photo: PTI)
केरल के कोझिकोड से घरों को लौटते मजदूर. (Photo: PTI)

बता दें कि कर्नाटक सरकार ने अपने यहां से ट्रेनों के जाने पर रोक लगा दी है. यह फैसला बिल्डरों और कंस्ट्रक्शन कंपनियों से बात के बाद लिया गया. हालांकि मजदूरों में इससे निराशा है. वे किसी भी तरह घर जाना चाहते हैं.

पत्थर ही नहीं मिल रहे तो मकान कैसे बनाए

नाम: सत्तार
पेशा: कारीगर
जगह: नागौर (राजस्थान)

सत्तार 20 साल से मकान कारीगर का काम कर रहे हैं. वे कहते हैं कि डेढ़ महीने से काम बंद है. लॉकडाउन लगने से पहले जो काम शुरू किए थे. वे भी पूरे नहीं हुए. अब फिर से काम शुरू किया है. लेकिन नया माल नहीं मिल रहा. सीमेंट पहले से महंगी आ रही है. पहले एक कट्टा 350 रुपये का आ रहा था. अब उसी कट्टे के 400 रुपये तक लिए जा रहे हैं. उन्होंने कहा-

घर बनाने में पत्थर का इस्तेमाल होता है. लेकिन अभी पत्थर नहीं आ रहे. खानें बंद पड़ी है. साथ ही ट्रैक्टर भी नहीं चल रहे. अब पत्थर नहीं आएंगे तो काम कैसे हो?

उन्होंने आगे कहा कि मजदूरी तो जितनी पहले थी, उतनी ही है. वैसे काम है ही कहां जो पैसे बढ़ेंगे.

हैदराबाद में ईंट भट्टे पर काम करती एक महिला. (Photo:AP)
हैदराबाद में ईंट भट्टे पर काम करती एक महिला. (Photo:AP)

सरकार के पास बहुत काम है, उसकी भी एक सीमा है

नाम: विशाल शर्मा
पेशा: कॉन्ट्रैक्टर
जगह: इंदौर (मध्य प्रदेश)

विशाल के कई प्रोजेक्ट चल रहे हैं. इनमें बड़वानी में सड़क और अंजड़ में बांध से जुड़ा काम है. वे कहते हैं कि उनका काम फरवरी से जून तक होता है. होली के बाद से रफ्तार पकड़ता है. लेकिन अबकी बार ऐसा नहीं है. मजदूर तो मौजूद हैं. वे काम भी कर रहे हैं. लेकिन अधिकारी होली पर घर गए थे. वे वापस आ ही नहीं पा रहे. उनके पास बन नहीं रहे हैं. कोई सीधी में रहता हैं तो कोई रीवा में. इसके अलावा मशीनरी से जुड़ी दिक्कतें हैं. उन्होंने कहा,

बड़ी मशीनों में ब्रेकडाउन होता रहता है. अब मान लीजिए उसका कोई छोटा सा पुर्जा भी खराब हो गया. तो उसे ठीक करने वाला मिस्त्री कहां से आएगा. वह तो दूसरी जगह रहता है. हालात सामान्य थे तब तो उसे बुलाया जा सकता था. लेकिन अभी यह कैसे होगा. यह ठीक ऐसे ही है कि आपको आटा, पानी दे दिया. लेकिन रसोई गैस नहीं दी. तो रोटी बनेगी कैसे? कोई भी काम को करने का एक सिस्टम होता है. वह अभी नहीं है. मशीनों को चलाने वाले ऑपरेटर बाहर से आते हैं. वे भी अभी नहीं हैं.

विशाल ने आगे कहा कि जून के बाद बारिश शुरू हो जाएगी. तो बड़े काम ठहर जाते हैं. वे सरकार की मजबूरी भी समझते हैं. सरकार काम कर रही है. उसकी भी एक सीमा है. प्रशासन के पास भी बहुत काम है.

असम में ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे में काम में जुटे हुए मजदूर. (Photo: PTI)
असम में ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे में काम में जुटे हुए मजदूर. (Photo: PTI)

इसी तरह बीकानेर में भारतमाला प्रोजेक्ट से जुड़ी एक कंस्ट्रक्शन कंपनी के स्टोर मैनेजर नरेश मंडोलिया से भी बात हुई. उन्होंने कहा कि सरकारी प्रोजेक्ट है. इसलिए रॉ मटेरियल की कमी नहीं. मजदूर ज्यादातर बाहर के हैं. अभी तक तो काम कर रहे थे. लेकिन जब से उन्हें पता चला है कि सरकार मजदूरों को घर भेज रही है, तब से वे भी घर जाने की मांग कर रहे हैं. उन्होंने यह भी कहा कि काम अभी रफ्तार में नहीं. 40-45 ठेकेदारों में से केवल 4-5 ही काम शुरू कर पाए हैं.

लॉकडाउन से पहले का पैसा अभी तक नहीं आया

नाम: अभिषेक गंगवाल
पेशा: रॉ मटीरियल, हार्डवेयर सप्लायर
जगह: जयपुर

अभिषेक कंस्ट्रक्शन से जुड़ा कच्चा माल मुहैया कराते हैं. उन्होंने कहा कि 21 मार्च के बाद से किसी तरह का ऑर्डर नहीं आया है. हर साल इस समय कारोबार जोर पर रहता है. लेकिन इस साल सब मंदा है. लॉकडाउन से पहले भी सुस्ती थी. और कोरोना आने के बाद तो रही-सही कसर भी पूरी हो गई. जो सामान दिया था, उसका पैसा नहीं आ रहा है. पैसे मांगने पर एक ही जवाब आता है कि लॉकडाउन के बाद देंगे. उन्होंने कहा,

14 मार्च को गुजरात से सामान मंगाया था. वह 17 मार्च को ट्रांसपोर्ट में लगा. लेकिन अभी तक पहुंचा नहीं है. 3 मई तक ट्रांसपोर्ट पर रोक लगी हुई थी. अब इसमें ढील मिली है. लेकिन सामान लाने के लिए खुद से टैंपो भेजने को कहा जा रहा है. टैंपो को सरकार ने मंजूरी दी नहीं. और टैंपो मिल भी नहीं रहे हैं.

वे आगे कहते हैं कि सरकार ने दुकान खोलने की परमिशन दे दी है. लेकिन पुलिस वाले खोलने नहीं देते. वे सख्ती करते हैं.

काम की परमिशन मिलना ही मुश्किल काम

नाम: सुधीर तिवारी
पेशा: ठेकेदार
जगह: द्वारका (दिल्ली

सुधीर तिवारी का गुड़गांव में काम है. पहले लॉकडाउन की वजह से काम रुक गया. केंद्र सरकार ने छूट दी तो हरियाणा सरकार ने दिल्ली गुड़गांव बॉर्डर सील कर दी. तो आना-जाना ही अपने आप में एक चैलेंज बन गया है. 10 से ज्यादा लेबर एक जगह काम करते हैं तो परमिशन लेनी होती है. अब इसमें थोड़ी सी भी गलती होने पर अनुमति मिलनी मुश्किल हो जाती है. वे कहते हैं,

काम करते वक्त ईंट पकड़ाने वाले मजदूर पास-पास में आ जाते हैं. अगर परमिशन देने वाले अधिकारी को यह दिख गया तो वह जुर्माना लगा सकता है. इसके अलावा मजदूरों ने घर जाने की तैयारी कर रखी है. वे गए तो कुछ महीने तो आने से रहे.

उनका कहना है कि नया कच्चा माल तो अभी आ नहीं रहा. लेकिन जानकारी में आया है कि कुछ सामानों की रेट बढ़ गई है.

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