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'मुझे विचलित करता है जब आदमी क्रूर हो जाता है': गोविंद नामदेव (Interview)

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हमारे समय के बेहद पावरफुल एक्टर्स में से एक गोविंद नामदेव असल में अपने ख़ूंखार फिल्मी कैरेक्टर्स से बिलकुल उलट हैं. छोटी सी असंवेदनशीलता भी उन्हें दहशत में डाल देती है. स्क्रीन इमेज के उलट वे बहुत शांत मिजाज के हैं. वे मध्यप्रदेश के सागर से आते हैं. वहां 7वीं तक पढ़े और उसके बाद दिल्ली आ गए. ग्रेजुएशन की. नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से एक्टिंग की पढ़ाई की. लंबे समय तक थियेटर किया. फिर 1992 में फिल्मों में आए. ‘सत्या’, ‘सरफरोश’, ‘बैंडिट क्वीन’, ‘प्रेम ग्रंथ’, ‘गर्वः प्राइड एंड ऑनर’, ‘ओह माई गॉड’, ‘कच्चे धागे’ और ‘विरासत’ जैसी फिल्मों में उनके निभाए किरदार न भूले जा सकने वाले हैं.

अभी वे आधा दर्जन फिल्मों में व्यस्त हैं जिनमें से कुछ रिलीज के लिए तैयार हैं. कुछ की शूटिंग चल रही है. इसके अलावा वे युवा आकांक्षियों को एक्टिंग भी पढ़ाते हैं. उनसे ‘दी लल्लनटॉप’ ने बात की.

सागर में रहते थे आप. गांधी जी की ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग’ पढ़ी. कुछ और अनुभव हुए और तय कर लिया कि लाइफ में एक्सीलेंस को पाना है, बस. उसके लिए बहुत मेहनत की. वो अचीव भी किया. अब उस एक्सीलेंस के पार क्या है? खालीपन है? कि अब तो सब पा लिया अब क्या करूं. या क्या है?
जो काम कर रहा हूं और एक्टिंग को लेकर मेरी जो समझ है, वो तो अब आई है. अब नेत्र खुले हैं. अब जो कुछ भी काम हो रहा है, वो अलग लेवल का हो रहा है. हो सकता है एक्टिंग का जो शिक्षक मेरे अंदर है उसकी वजह से मेरी ग्रोथ और ज्यादा हुई है. पहले का भी एक टाइम था जब मैं एक अलग ही फॉर्म में था. लेकिन अभी महसूस करता हूं कि उससे ज्यादा बेहतर ढंग से सोच पा रहा हूं, ज्यादा बेहतर ढंग से एक्ट कर पा रहा हूं, उससे ज्यादा बेहतर करने की स्थिति में अब हूं. अपने अंदर के एक्टर और एक्टिंग की समझ को ज्यादा मैच्योर महसूस कर रहा हूं. वो परफॉर्मेंस में आ भी रहा है. अपने आप को देखकर मैं एनेलाइज़ कर सकता हूं कि पहले क्या था, अभी क्या हूं.

डायरेक्टर फ्रिट्स बेनिविट्ज़ के नाटक 'ओथैलो' में लीड रोल में युवा गोविंद नामदेव.
डायरेक्टर फ्रिट्स बेनिविट्ज़ के नाटक ‘ओथैलो’ में लीड रोल में युवा गोविंद नामदेव.

नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में आप पढ़ते थे तब दौर कैसा था?
हमारे टाइम में परिदृश्य अलग तरह का था. जब हम स्टूडेंट्स थे 75-78 में, तो न टीवी था, न कंप्यूटर न मोबाइल. सब हाथ से करते थे. इतना ज्यादा टाइम था अपने ऊपर काम करने का, मेहनत करने का, किताबें पढ़ने का, पूरी दुनिया को समझने का. तो हम अपने ऊपर ख़ूब काम करते थे, ख़ूब मेहनत करते थे, पढ़ते थे. हमारे पास सिर्फ दो ही रास्ते थे. या तो थियेटर या फिल्म. उसके अलावा तो कुछ स्ट्रीम था ही नहीं. या फिर रेडियो में नौकरी करो.

और थियेटर में भी सिर्फ रेपरटरी में काम करते तो थोड़ा सा फाइनेंशियल सपोर्ट आपके साथ चलता रहता. अगर दिल का काम करना है तो थियेटर में उससे बेहतर कोई काम उस टाइम में होता नहीं था. जब रेपरटरी कंपनी में काम का मौका मिला तो उसी में हमें अपने आप को चमकाना होता था. इतना कि वहां लोग आपको देखे, आपके काम को एप्रीशिएट करें. कुछ और बेहतर अगर एक्टर करता है तो फिर वहां से तैयारी करके फिल्मों में जाए. ये दो ही ऑप्शन थे.

फिल्म 'ओ माई गॉड' में गोविंद नामदेव.
फिल्म ‘ओ माई गॉड’ में गोविंद नामदेव.

आपकी क्या जर्नी रही?
तो हमने अपने ऊपर ख़ूब काम किया. आवाज़ों पर काम किया. स्पीच को लेकर काम किया. एक्टिंग को लेकर इंटरप्रिटेशन, बॉडी लैंगवेज, हर तरह से कैरेक्टराइजेशन करने की कोशिश की , कैरेक्टर की स्किन में कैसे घुसा जाता है. कैसे इमोशंस कन्वे किए जा सकते हैं. कैसे एक वॉयस को एक्सप्रेसिव बनाया जा सकता है. इन सब पर ख़ूब काम किया. रेपरटरी कंपनी इसी मकसद से जॉइन की थी कि उन दिनों में मनोहर सिंह जी, उत्तरा बाओकर जी, सुरेखा सिकरी जी ये ऐसा परफॉर्म करते थे कि हम अवाक रह जाते थे. चमत्कृत हो जाते थे कि माई गॉड! ये लोग ऐसा इस लेवल का परफॉर्मेंस, इत्ता ख़ूबसूरत परफॉर्मेंस कैसे कर लेते हैं!

नाटक 'मत्तविलास' के मंचन के दौरान गोविंद नामदेव और उत्तरा बाओकर.
नाटक ‘मत्तविलास’ के मंचन के दौरान गोविंद नामदेव और उत्तरा बाओकर.

शो के बाद हमें ऐसा लगता था कि वो लोग हमारे कंधे पर हाथ ही रख दें. वरना उनसे हाथ मिलाने की तो हिम्मत थी नहीं हममें. ऐसा लगता था वो हाथ रखकर आशीर्वाद दे दें. मुंह से दो शब्द नहीं फूटते थे कि जाकर उनसे कुछ बोलें, इतना हम अभिभूत थे उनके सामने. हमको लगता था कि अगर एक्टिंग करनी है तो इस लेवल की परफॉर्मेंस करनी चाहिए. इस लेवल का काम करना चाहिए. नहीं कर सकते तो एक्टिंग ही नहीं करनी चाहिए. करियर के तौर पर अपनाने का कोई मतलब ही नहीं है. अगर आपके काम में इम्पैक्ट नहीं है, एक्टिंग के तरीके में इम्पैक्ट नहीं है तो कोई मतलब नहीं.

तो एनएसडी से निकलने के बाद प्रश्न आया कि क्या करें. सतीश कौशिक और हम बात कर रहे थे डिप्लोमा खत्म होने के बाद लास्ट वीक में. ख़ूब गहमा गहमी थी कि कौन क्या करने जा रहा है. डिस्कशंस होते थे. करण राजदान बोलते थे मेरी तो प्रोड्यूसर डायरेक्टर से बात हो गई है. जाते ही शूटिंग शुरू हो जाएगी. मैं हीरो हूं फिल्म का. अनुपम खेर बोलता था मैं भी बंबई आऊंगा. सतीश कौशिक भी बोला कि बंबई जाऊंगा. लेकिन मुझे मन में ऐसा लगता था कि मैं कच्चा हूं अभी. कहां मनोहर सिंह जी जो जैसा परफॉर्म करते थे मैं उनके मुकाबले तो कुछ भी नहीं हूं. तो मैं सोच भी कैसे सकता हूं! तो मुझे इनका लैवल हासिल करने के लिए रेपरटरी में जाना चाहिए.

एनएसडी में साथ पढ़े अनुपम खेर और गोविंद ने बाद में डेविड धवन की 'शोला और शबनम' (1992) में साथ काम किया.
एनएसडी में साथ पढ़े अनुपम खेर और गोविंद ने बाद में डेविड धवन की ‘शोला और शबनम’ (1992) में साथ काम किया.

मैंने पता किया तो वहां किसी को सात साल हो गए थे थियेटर करते-करते, किसी को आठ साल हो गए थे, किसी को छह साल हो गए थे. मुझे लगा कि अगर ये लेवल मुझे भी हासिल करना है तो कम से कम 10 साल तो रेपरटरी कंपनी में काम करना ही चाहिए. तो थियेटर जॉइन किया और मैंने 12 साल रेपरटरी कंपनी के साथ काम किया. 11 साल रेग्युलर आर्टिस्ट के तौर पर और एक साल कैजुअल आर्टिस्ट के तौर पर.

इतना लंबा रेपरटरी का अनुभव कैसा रहा?
ख़ूब सीखा. रिचर्ड शेकनर, फ्रिट्स डेनिविट्ज़, इब्राहीम अल्क़ाज़ी साहब, बीवी कारंत. बड़े-बड़े डायरेक्टर्स के साथ बड़े-बड़े कैरेक्टर्स किए. फ्रिट्स डेनिवट्स जर्मनी से थे, उन्होंने ‘ओथैलो’ डायरेक्ट किया हमारे साथ, मैंने उसमें टाइटल कैरेक्टर किया. फिर रिचर्ड शेकनर जो अमेरिका से थे उन्होंने हमारे साथ ‘द चैरी ऑर्चर्ड’ किया. उसमें मैंने लोपख़िन का मेन कैरेक्टर किया था. बैरी जॉन के साथ प्ले किया.

इब्राहीम अल्काज़ी द्वारा निर्देशित नाटक 'तुग़लक' में गोविंद नामदेव.
इब्राहीम अल्काज़ी द्वारा निर्देशित नाटक ‘तुग़लक’ में गोविंद नामदेव.

इब्राहीम अलकाजी ने ‘तुग़लक’ किया हमारे साथ. बी.वी. कांरत साहब ने शेक्सपीयर का प्ले किया. इसी तरह रामगोपाल बजाज ने ‘सूर्य की अंतिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक’ प्ले किया. इसी प्ले को करने के बाद मैं रेपरटरी का खास एक्टर बन गया. ये प्ले ख़ूब हिट हुआ और मेरा परफॉर्मेंस ख़ूब एप्रीशिएट हुआ. इसे देखने के बाद फिट्स डेनिवेट्स ने मुझे ओथैलो का कैरेक्टर दिया.

बाहर के लोग आते थे, हमें प्ले में देखते थे और फिर कास्ट करते थे. कई बार होता था कि मेरा एक प्ले देखने के बाद कोई दूसरा अपने प्ले में मेन कैरेक्टर दे देता था. तो ख़ूब सीखने का मौका मिला. एम. के. रैना ने ‘अंधा युग’ किया. उसमें मैंने लीड रोल किया जो हमने जर्मनी में शोकेस किया. वहां बर्लाइनर फेस्ट में हमें हिस्सा लेने का मौका मिला जहां पर दुनिया भर के थियेटर ग्रुप्स आते हैं. जानी मानी थियेटर पर्सनैलिटीज़ हिस्सा लेती हैं. वहां हिंदुस्तान को मैंने रेप्रेजेंट किया.

एन. के. रैना द्वारा निर्देशित 'अंधा युग' में गोविंद नामदेव.
एन. के. रैना द्वारा निर्देशित ‘अंधा युग’ में गोविंद नामदेव.

तो बहुत अच्छे मौके मिले. मैंने अपने अंदर के अभिनेता को enrich किया जो उनके साथ काम करते-करते मकसद था मेरा. 11 साल काम करने के बाद जब लगा कि हां अब मैं इतना परिपक्व हो गया हूं कि किसी भी बड़े से बड़े एक्टर के सामने खड़े होकर अपना 100 परसेंट दे सकता हूं तो फिर मैंने रिज़ाइन किया रेपरटरी कंपनी से 1989 में और 1990 में मुंबई चला गया.

फिल्मों में शुरुआत कैसे हुई और स्थापित कैसे हुए?
वहां पर पहली फिल्म मैंने की केतन मेहता की ‘सरदार’ (1993). उसमें सरदार पटेल के सेक्रेटरी का रोल किया. परेश रावल सरदार पटेल बने थे. उसके बाद ‘शोला और शबनम’ (1992) की. उसके बाद ‘बैंडिट क्वीन’ (1994) की. उसकी शूटिंग चल रही थी उसी दौरान आरके बैनर के लोग ‘प्रेम ग्रंथ’ नाम की फिल्म शुरू कर चुके थे. फिल्म की शूटिंग हुए एक साल हो चुका था. लेकिन उन्होंने अपनी फिल्म के लिए विलेन तय नहीं किया था. उनका इरादा था कि कोई नया फेस मिले तो उसे कास्ट करेंगे. उनकी खोज जारी थी. इसी दौरान उनको ध्यान पड़ा कि शेखर कपूर ‘बैंडिट क्वीन’ नाम की कोई फिल्म कर रहे हैं और उसमें एनएसडी के किसी कलाकार ने बड़ा अच्छा काम किया है विलेन का.

तो उन्होंने पता किया. शेखर कपूर से बात की तो उन्होंने कहा, हां ऐसा ही है. तो उन्होंने कुछ क्लिपिंग्स और फोटो वगैरह मंगाए. शेखर ने अरेंज किए. उन लोगों ने देखे और दूसरे दिन मुझे कॉल आ गया. थोड़ी सी बात के बाद उन्होंने मुझे फिल्म में विलेन के लिए फाइनल कर लिया. और जिस हफ्ते ये रिलीज हुई, उसके दूसरे हफ्ते में चार बड़ी फिल्में साइन की मैंने. उस परफॉर्मेंस के बाद जबरदस्त रिस्पॉन्स मिला. उसके बाद मेरा करियर चल पड़ा और अब तक चालू है.

थियेटर में आए बदलावों को कैसे देखते हैं? मैनरिज़्म, एक्टिंग, वैल्यूज़ में क्या अंतर आया है?
अब डिजाइनिंग पर बहुत फोकस आ गया है. कई बार नाटक का थीम उसी में फंस कर रह जाता है. विजुअली बहुत अच्छा लगता है. नए-नए इंटरप्रिटेशन देखने को मिलते हैं. ये हर दशक का अपना बदलाव है जो होता ही है. अब हम उसे नकारें तो ये भी सही नहीं है. हर बार कुछ नया तो आता ही है और नए का स्वागत करना चाहिए. लेकिन ये भी कह सकते हैं कि एक प्ले किस मकसद से लिखा गया है और जो असर दर्शकों पर महसूस करके राइटर ने लिखा है, उस मकसद को आगे रखकर आज के डायरेक्टर्स को अपने नाटक तैयार करने चाहिए.

आजकल के एक्टर्स अपना 100 फीसदी देने के लिए जो तैयारी करते हैं कैरेक्टर बिल्ड करने वाली, उसमें कमी लगती है. डिजाइनिंग और इन सब चीजों में उलझे रहते हैं कि बुनियादी चीजों पर ज्यादा ध्यान नहीं देते. लेकिन धीरे-धीरे फिर से चेंज भी आ रहा है. अभी डिजाइनिंग से हटकर जो टाइम हमारा था उसका महत्व भी समझ आया है. रेपरटरी कंपनी में फिर से वैसे नाटक बनने शुरू गए हैं. बहुत होपफुल हूं मैं कि आने वाला टाइम अच्छा ही रहेगा.

जिन सीमा बिश्वास के साथ गोविंद ने 'बैंडिट क्वीन' में कुएं वाला खौफनाक सीन किया था, उन्हीं के साथ रेपरटरी में उन्होंने 'मशरिकी हूर' जैसा प्ले भी किया था.
जिन सीमा बिश्वास के साथ गोविंद ने ‘बैंडिट क्वीन’ में कुएं वाला खौफनाक सीन किया था, उन्हीं के साथ रेपरटरी में उन्होंने ‘मशरिकी हूर’ जैसा प्ले भी किया था.

जिंदगी में जब भी बहुत निराश होते हैं, चीजें नहीं हो रही होतीं तो क्या करते हैं हौसला बनाए रखने के लिए?
ऐसे पल आए तो मेरे पास तीन ऑप्शन हैं.

जब बहुत ज्यादा परेशानी हो, मेंटल डिप्रेशन आता हो तो हम शिरडी जाते हैं. ये बहुत पर्सनल चीज़ है लेकिन शेयर कर रहा हूं. वहां जाकर हम लोग सब शांत हो जाते हैं. बहुत सी चीजों का जवाब मिल जाता है. ऐसा भी हुआ है बहुत बार कि जिस वजह से बहुत डिप्रेस होकर गए.. जैसे कोई काम हाथ से निकल गया बड़ा तो वहां पहुंचते ही काम वापस आ गया. आप कल्पना नहीं कर सकते हैं लेकिन ऐसा हुआ. वो जगह ऐसी है कि हमको इतनी तसल्ली होती है, इतना आराम पहुंचता है कि क्या बताएं. बच्चियों के साथ जाते हैं, नहीं तो पत्नी के साथ जाते हैं.

दूसरा ये कि कुछ लिखना शुरू कर देता हूं. और अगर कुछ क्षणिक परेशानियां हैं तो फिर हम ख़ूब गाते हैं और ख़ूब गाना सुनते हैं. उससे बहुत तसल्ली हो जाती है. सब टेंशन निकल जाती है. दो-दो तीन-तीन घंटे के लिए गाता हूं. गाना सुनता हूं, फिर गाता हूं. मुझे हिंदुस्तानी क्लासिकल सुनना बहुत पसंद है.

टीवी सीरीज वगैरह आप देखते हैं?
नहीं देख पाता हूं.

पहले विलेन के प्रस्तुतिकरण जैसे होते थे, भयंकर-ख़ौफनाक-लाउड. आज जैसी वेब-सीरीज आ रही हैं या भारत में जैसी इंडिपेंडेंट फिल्में बन रही हैं उनमें विलेन साइलेंट, ठहराव वाले और थोड़ा दबकर प्ले करने वाले भी हैं. क्या इस ज़माने की स्टोरीटेलिंग में खुद को रीइनवेंट करने के इच्छुक हैं?
मुझे लग रहा है और इंतजार भी है कि इस तरह के कुछ काम आएंगे जो पहले कभी नहीं किए मैंने. अगर अभी तक मैंने 75 परसेंट दिया है तो 100 परसेंट दे पाऊंगा. अभी यही महसूस करता हूं. और ओपन हूं इस तरह के किसी भी प्रोजेक्ट के लिए.

फिल्म 'प्रेम ग्रंथ' में रूप सहाय के किरदार में गोविंद और ऋषि कपूर.
फिल्म ‘प्रेम ग्रंथ’ में रूप सहाय के किरदार में गोविंद और ऋषि कपूर.

‘प्रेम ग्रंथ’ में आपने रूप सहाय का रोल किया या ‘बैंडिट क्वीन’ में श्रीराम का. इन किरदारों ने सिनेमाघरों में या वीसीआर वाले दर्शकों को बहुत आतंकित किया. लाखों लोगों पर असर हुआ. इन किरदारों के इस व्यापक और इंटेंस असर का फीडबैक मिलता है?
हां. लोगों ने उन दृश्यों का जिक्र किया है जो उनके दिमाग में अभी तक बसे हैं. उन परफॉर्मेंस के पलों का वो जिक्र करते हैं. ऐसी-ऐसी फिल्मों को याद करते हैं जो नहीं चली लेकिन मेरा परफॉर्मेंस उनको याद थी, किरदार के नाम याद थे. ये जो आपने शब्द इस्तेमाल किया – ‘आतंकित’, ये शब्द इस्तेमाल करके लोगों ने बताया. हाल ही में फेसबुक के लिए लाइव था तो ऐसे-ऐसे कमेंट मिले हैं कि मैं क्या बताऊं. पहले भी ऐसे अनुभव हुए. कभी रेड लाइट में गाड़ी पर किसी की नजर पड़ जाती है तो आते हैं और कहते हैं जो काम आप करते हैं कोई नहीं कर सकता और हमें सभी एक्टर्स में से आप पसंद हैं. ये कमेंट पाते हैं तो दिल को बड़ी राहत मिलती है कि जो मेहनत की उसे स्वीकार किया गया.

ऐसा फीडबैक भी मिला कि ‘बैंडिट क्वीन’ देखने के बाद लगा कि गोली मार देनी चाहिए ऐसे कैरेक्टर को!

आपने जैसे बुरे रोल किए हैं उन्होंने दर्शकों को ख़ौफ में डाला है. रियल लाइफ में आप क्या देखकर बहुत विचलित हो जाते हैं?
मेरा क्या है कि ऐसे किरदार करते-करते sensitivity इतनी बढ़ गई है कि कोई भी गलत करता है तो मैं डिस्टर्ब हो जाता हूं. सबसे ज्यादा जो चीज़ मुझे हमेशा विचलित करती है – आदमी जब brutal हो जाता है. क्रूर हो जाता है. जैसे मैं अपनी बालकनी से नीचे देख रहा हूं कि नीचे सड़क पर कि किसी से बेतहाशा मार-पीट हो रही है. ऐसे कई वीडियो देखें जो वायरल हुए जिनमें बच्चों को पीट रहे हैं. देखकर इतनी दहशत हो जाती है कि कोई आदमी ऐसा कैसे कर सकता है. या कोई टीचर बच्चों को ऐसे कैसे मार सकता है. इतना क्रूर कैसे हो सकता है. ये चीजें बहुत विचलित करती हैं. धोखा देने वाले लोग भी मुझे बहुत असहनीय हैं. ऐसे होता है कि किसी ने धोखा दिया न, तो मैं अपने जीवन से उसका नाम ही काट देता हूं. इतना ज्यादा रिएक्शन होता है.

आपकी आने वाली फिल्में कौन सी हैं और किसे लेकर सबसे ज्यादा एक्साइटेड हैं?
चार फिल्में हैं जो रिलीज के लिए तैयार है. चारों में अलग-अलग टेंपरामेंट है, अलग-अलग रंग के कैरेक्टर हैं. जैसे इनमें से एक फिल्म है ‘कमिंग बैक डार्लिंग’ जो हमने स्विट्जरलैंड में शूट की है. वो दिसंबर में रिलीज होगी. उसको लेकर मैं बहुत उत्साहित हूं. माइनस 18, माइनस 16, माइनस 12 जैसे क्लाइमेट में शूट की है. एक मर्डर मिस्ट्री है जिसे मेरा किरदार सुलझाता है जो कॉप है. एक और फिल्म है – ‘शादी में जरूर आना’, जिसमें मैं बहुत इमोशनल फादर बना हूं. उसमें भी कैरेक्टर में अच्छे रंग हैं. परफॉर्मेंस भी अच्छी निकलकर आई है. (राजकुमार राव इसमें लीड रोल में हैं)

कोई एक फिल्म जो हाल ही में आपको बहुत पसंद आई हो?
‘बरेली की बर्फी’ मुझे बहुत पसंद आई. बहुत पसंद आई. बहुत अच्छे ढंग से इसमें एक-एक कैरेक्टर को इतना अच्छा ट्रीटमेंट दिया गया है. एक-एक एक्टर ने इतना अच्छा काम किया है. डायरेक्टर की समझदारी मालूम पड़ती है. उसकी सेंस ऑफ डिजाइनिंग क्या है पूरी फिल्म को लेकर वो समझ आता है. फिल्म का हर डिपार्टमेंट उसके कंट्रोल में है. चाहे एक्टर का characterization हो. परिधान हों. बाकी प्रॉपर्टीज़ हों. एक सीन को किस तरह से डिवेलप करना है, ये सब इस फिल्म में बहुत कमाल का है.

अपनी बेटी और नातिन के साथ गोविंद नामदेव.
अपनी बेटी और नातिन के साथ गोविंद नामदेव.

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