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नेहरू को नेता बनाने की बात पर लंदन के क्लब में क्या हंगामा हुआ था?

आज है 2 अगस्त और आज की तारीख़ का संबंध है भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक महत्वपूर्ण चरण से. आज ही के दिन ब्रिटिश हुकूमत ने ‘भारत सरकार अधिनियम, 1935’ पास किया था. 

क़िस्से की शुरुआत करते हैं 1928 से. उन दिनों भारत में स्वतंत्रता आंदोलन अपने चरम पर था. प्रथम विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन आर्थिक डिप्रेशन से गुजर रहा था. और तब ब्रिटेन में जॉर्ज पंचम का राज था. केंद्र में प्रधानमंत्री थे रैमजे मैकडॉनल्ड.

भारत, जैसा कि उस समय कहा जाता था, इंग्लैंड के ताज में कोहिनूर हीरे की तरह था. वो किसी भी तरीक़े से भारत को अपने हाथ से निकलने नहीं देना चाहता था. एक तरफ़ तो उसने अपने अधीन देश, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा को डोमिनियन स्टेटस दे रखा था. लेकिन भारत को लेकर उसकी कोई ऐसी मंशा नहीं थी. भारत में उस वक्त दो आवाज़ें प्रमुख थीं. कुछ संगठन डोमिनियन स्टेटस की मांग कर रहे थे. और कुछ पूर्ण स्वराज को लेकर अड़े थे. हैरान कर देने वाली बात ये थी कि इस मामले में जवाहर लाल नेहरू और महात्मा गांधी में भी मतभेद था. नेहरू और नेताजी सुभाषचंद्र बोस जहां पूर्ण स्वराज की मांग पर अड़े थे, वहीं महात्मा गांधी का मानना था कि पूर्ण स्वराज का कोई मतलब नहीं अगर अंग्रेज उसे ना मानें. इस मामले में वो प्रैग्मैटिक या कहें कि यथार्थवादी सोच के थे.

साइमन कमीशन 

इसी साल यानी 1927 में अंग्रेजों द्वारा साइमन कमीशन का गठन किया गया. ये आयोग सात ब्रिटिश सांसदों का समूह था, जिसका गठन भारत में संविधान सुधारों के अध्ययन के लिये किया गया था. इस काम के लिए साइमन कमीशन भारत आया. और वापस इंग्लैंड जाकर उन्होंने भारत की प्रशासनिक व्यवस्था के लिए कुछ सुधार सुझाए. इसमें भारत में केंद्रीय शासन की व्यवस्था और प्रांतों के लिए वायसराय और गवर्नर को विशेष शक्तियां देने का सुझाव था. 

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सविनय अवज्ञा आंदोलन (तस्वीर: Getty)

अंग्रेजों का तर्क था कि भारत स्वयं शासन करने के काबिल नहीं है. साइमन कमीशन में भारत का कोई प्रतिनिधि भी शामिल नहीं था. इसके विरोध में नेहरू की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया गया ताकि एक रिपोर्ट तैयार की जा सके. जिससे ये स्पष्ट हो जाए कि भारत स्वयं शासन का कार्यभार सम्भालने में सक्षम है. लेकिन अंग्रेज सरकार ने इस रिपोर्ट को नकार दिया. 

अब बारी थी पूर्ण स्वराज की. 19 दिसम्बर, 1929 को लाहौर में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन रखा गया. इस अधिवेशन की अध्यक्षता मोतीलाल नेहरू कर रहे थे. अधिवेशन में पूर्ण स्वराज का घोषणापत्र तैयार कर उसे सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया. प्रस्ताव में यह भी शामिल था कि अगर 1930 तक भारत को संप्रभुता नहीं प्रदान की गई तो भारत खुद को स्वतंत्र घोषित कर देगा. 

1929 में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रैमजे मैकडॉनल्ड ने भारत के गवर्नर-जनरल लार्ड इर्विन को इंग्लैण्ड बुलाया ताकि भारत की स्थिति की लेकर विचार विमर्श किया जा सके. इंग्लैण्ड से लौटकर लार्ड इर्विन ने 31 अक्टूबर, 1929 को घोषणा की. इसमें बताया गया कि भारत को डोमिनियन स्टेटस का दर्जा दिया जाएगा. लेकिन ऐसा कब किया जाएगा, इसका कोई ज़िक्र नहीं था. इर्विन ने यह भी कहा कि साइमन कमीशन की रिपोर्ट पर विचार करने के लिए ब्रिटिश सरकार एक गोलमेज़ सम्मेलन बुलायेगी. इसे लेकर दिसंबर, 1929 में महात्मा गांधी ने लॉर्ड इरविन से भेंट की, किन्तु इस वार्ता का कोई परिणाम नहीं निकला. 

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नमक सत्याग्रह (तस्वीर: Getty)

1930 में साइमन कमीशन की रिपोर्ट पब्लिश हुई. जिसके विरोध में महात्मा गांधी ने डांडी मार्च कर सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत कर दी. प्रथम गोलमेज़ सम्मेलन में कांग्रेस शामिल ही नहीं हुई. इर्विन चाहते थे कि कैसे भी करके दूसरे गोलमेज़ सम्मेलन में कांग्रेस को शामिल किया जाए. बहुत कोशिश के बाद गांधी इस सम्मलेन में शामिल होने को राजी हुए. और 1931 में वह द्वितीय गोलमेज़ सम्मेलन में शामिल होने के लिए इंग्लैंड चले गए.

गांधी इन लंदन 

लंदन के दौरे पर महात्मा गांधी ने जॉर्ज पंचम से मुलाक़ात की. मुलाक़ात के बाद जब पत्रकारों ने उनसे पूछा कि वो केवल एक धोती में राजा से मिलने कैसे जा सकते हैं. तो महात्मा गांधी ने जवाब दिया,

‘मेरे हिस्से के कपड़े भी राजा ने ही पहन रखे थे’. 

जैसा कि हमने पहले आपको बताया था, उन दिनों ब्रिटेन आर्थिक डिप्रेशन के दौर से गुज़र रहा था. वर्कर स्ट्राइक पर थे और सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे थे. महात्मा गांधी ने इन वर्कर्स से भी मुलाक़ात की. इस मुलाक़ात पर टाइम पत्रिका ने आर्थिक स्थिति को लेकर चुटकी लेते हुए कहा,

‘महात्मा के आने से और कुछ हुआ हो ना हुआ हो, लंदन में बकरी के दूध के दाम ज़रूर बढ़ गए हैं.’

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बकरियों के साथ महात्मा गांधी (फ़ाइल तस्वीर: wikimedia)

दरअसल उन दिनों जानवरों के साथ होने वाली हिंसा के विरोध में महात्मा गांधी ने दूध का त्याग कर रखा था. अनशन और सत्याग्रह के कारण वो पहले ही बहुत दुबले हो चुके थे. उनकी पत्नी कस्तूरबा और डॉक्टरों ने उनकी सेहत का हवाला दिया तो बड़ी मुश्किल से वह बकरी का दूध पीने को राज़ी हुए. इसी कारण इंग्लैंड दौरे पर गांधी अपने साथ दो बकरियां भी लेकर गए थे. इस बात का पता जब सरोजिनी नायडू को लगा तो उन्होंने कहा, 

‘गांधी जी को ग़रीबी में रखना बहुत महंगा पड़ रहा है.’

गांधी इस दौरे पर बर्नार्ड शॉ और चार्ली चैपलिन से भी मिले जिसे लेकर एक किस्सा बहुत मशहूर है. हुआ यूं कि एक दिन बर्नार्ड जब लंदन के क्लब में बैठे थे तो उन्हें सामने वाली टेबल पर कुछ लोग चर्चा करते हुए दिखे. उनमें से एक व्यक्ति बोला, 

‘गांधी अब बूढ़े हो चले हैं. लीडरशिप नेहरू को सौंप देनी चाहिए.’

बर्नार्ड उस समय सिगरेट पी रहे थे. वो उन लोगों के पास गए और कहा,

‘लीडरशिप कोई सिगरेट नहीं कि एक कश भरा और आगे पास कर दी. लीडरशिप दी नहीं जाती बल्कि कमाई जाती है ‘

ख़ैर वापस घटनाक्रम पर लौटते हैं, 

17 फरवरी 1931 को इर्विन और महात्मा गांधी के बीच बातचीत की शुरुआत हुई. इसके बाद 5 मार्च, 1931 को दोनों के बीच समझौता हुआ. जिसे हम गांधी-इर्विन पैक्ट के नाम से जानते हैं. इस समझौते से तय हुआ कि भारत में उन कैदियों को छोड़ दिया जाएगा जो अहिंसक संघर्ष में शामिल थे.  इसके बाद 1932 में एक और गोलमेज़ सम्मेलन हुआ. कांग्रेस ने उसे भी बॉयकॉट किया.

चर्चिल इफ़ेक्ट 

1935 में जब प्रधानमंत्री रैमजे मैकडॉनल्ड बीमार पड़े तो स्टैनली बाल्डविन प्रधानमंत्री बन गये. वह कंज़रवेटिव पार्टी के लीडर हुआ करते थे. 

प्रशासनिक सुधारों वाले बिल पर भारत में कोई सहमति नहीं बन पा रही थी. बाल्डविन ने सोचा कि अपने अधिकारों को जाहिर करने का ये अच्छा मौका है. तय हुआ कि बिल संसद में पेश किया जाएगा. उस दौरान विंस्टन चर्चिल भी कंज़रवेटिव पार्टी के मेंबर हुआ करते थे. लेकिन वह भारत को ज़्यादा अधिकार देने के सख़्त ख़िलाफ़ थे. चर्चिल ने इसे होम रूल का नाम देते हुए कहा,

‘हमें खुद से एक सवाल पूछना चाहिए. यूरोप में चिंता के बादल घिर रहे हैं. ऐसे में भारत को स्वायत्तता देकर हम अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारेंगे. हालात पहले ही ऐसे हैं कि लंदन में कपास के व्यापारी सड़कों पर आ गए हैं. अगर हमने भारत को अपने हाथों से जाने दिया तो आधा ब्रिटेन सड़कों पर होगा.’

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विंस्टन चर्चिल (तस्वीर: Getty)

उन्होंने आगे कहा,

‘हम भारत में कोई एलियन शक्ति नहीं हैं. भारत पर बहुत से शासकों ने राज किया है और हम उसी कड़ी का एक हिस्सा हैं. हम अकेले ऐसे हैं जिन्होंने भारत के लोगों के भले के लिए काम किया है. होम रूल का मतलब होगा कि हम उनकी गॉर्डियनशिप उनसे छीन रहे हैं’

चर्चिल सोच रहे थे कि भारत को डोमिनियन स्टेटस दिया गया तो आजादी की आग और भड़क जाएगी. उन्होंने सुनिश्चित करवाया कि बिल में डोमिनियन स्टेटस को लेकर कुछ भी साफ़ -साफ़ न जोड़ा जाए. चर्चिल के विरोध का कारण यह भी था कि वो महात्मा गांधी से नफरत किया करते थे. वो उन्हें ‘मिडिल टेम्पल का आधा नंगा वकील’ कहकर बुलाया करता था. 

इसके बाद चर्चिल और कंजर्वेटिव्स के मनचाहे प्रावधानों को बिल में जोड़ा गया. और सेंट्रल लेजिस्लेटिव कमिटी ने बिल को पास कर दिया. आज ही के दिन यानि 2 अगस्त 1935 को इस बिल को रॉयल स्वीकृति मिली और ये क़ानून में तब्दील हो गया. जिसे हम भारत सरकार अधिनियम 1935 के नाम से जानते हैं. 


वीडियो देखें- भारत-श्रीलंका शांति समझौता और LTTE की कहानी

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