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मोदी सरकार के खास रहे अफसर ने 'विकास' दर की पोल खोलकर रख दी

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देश की तरक्की की असल रफ्तार क्या है? इस पर बहुत दिनों से विवाद है. विवाद के पीछे है GDP के आंकड़ों का झोल. सरकार जीडीपी के आंकड़े कुछ बताती है. जानकार लोग इन आंकड़ों का तियां-पांचा कर देते हैं. इस बार सरकारी आंकड़ों पर सवाल उठाए हैं अरविंद सुब्रहमण्यन ने. अब ये अरविंद सुब्रमण्यन कौन हैं? तो जान लीजिए ये आर्थिक जगत के बड़े धुऱंधर आदमी हैं. सितंबर 2014 से जून 2018 तक नरेंद्र मोदी सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार रह चुके हैं. अरविंद सुब्रमण्यन ने कहा है कि देश उतनी स्पीड से आगे नहीं बढ़ रहा है, जितना दावा सरकार कर रही है.

क्या कहता है अरविंद सुब्रमण्यन का रिसर्च?
अरविंद सुब्रमण्यन ने एक रिसर्च किया है. अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक ये रिसर्च पेपर अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में प्रकाशित हुआ है. इसमें कहा गया है कि साल 2011-12 और 2016-17 के दौरान देश की तरक्की की रफ्तार सिर्फ साढ़े चार फीसदी थी. इस दौरान आधिकारिक आंकड़ों में विकास दर 7 फीसदी के आस-पास बताई गई थी.

इस रिसर्च का मतलब क्या है?
इस रिसर्च का सीधा-सीधा मतलब ये है कि सरकार ने विकास दर के आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया. ऐसा मनमोहन सिंह की सरकार ने भी किया. और फिर बाद में नरेंद्र मोदी सरकार ने भी देश के सामने सही आंकड़े नहीं आने दिए.

कैसे हुई ये गड़बड़ी?
# अरविंद सुब्रमण्यन के रिसर्च पेपर के मुताबिक जीडीपी में गड़बड़ी देश में हुए कुल उत्पादन के गलत आकलन की वजह से हुई. फैक्ट्रियों या खेतों आदि में हो रहे उत्पादन को अर्थशास्त्र की भाषा में मैन्युफैक्चरिंग कहते हैं. अब इसमें गड़बड़ी क्या हुई. इसे भी समझ लीजिए.

# साल 2011 से पहले जीडीपी के आकलन का तरीका थोड़ा सख्त था. तब प्रोडक्शन, प्रोडक्ट, IIP यानी औद्योगिक उत्पादन सूचकांक और एक्सपोर्ट के बीच संबंध गहराई से देखा जाता था. बाद में ये सिलसिला टूट गया.

# और आसान भाषा में कहें तो साल 2011 से पहले जीडीपी आकलन के दौरान ये भी देखा जाता था कि फैक्ट्रियों में कितना उत्पादन हुआ? क्या- क्या सामान बनाया गया? और जीडीपी का औद्योगिक उत्पादन का सूचकांक कितना रहा? इन तीनों का आकलन प्रोडक्ट के एक्सपोर्ट के आधार पर भी होता था. बाद के सालों में साल दर साल ये कम होता गया. औद्योगिक उत्पादन सूचकांक से ये पता चलता है कि देश में उत्पादन का काम कैसा चल रहा है.

# अरविंद सुब्रमण्यन के रिसर्च के मुताबिक GDP की तरक्की का पता लगाने के लिए 17 अहम प्वाइंट होते हैं. मगर MCA-21 डाटा बेस में इन बिंदुओं को शामिल ही नहीं किया गया. देश की विकास दर पता लगाने में MCA-21 डाटाबेस का रोल भी अहम होता है.

ये MCA-21 क्या बला है?
एमसीए-21 कंपनी मामलों के मंत्रालय यानी मिनिस्ट्री ऑफ कॉरपोरेट अफेयर्स MCA की ओर से तैयार किया गया कंपनियों का डेटा है. मंत्रालय कंपनियों का रियल टाइम डेटा रखता है. कंपनियों का ये ब्योरा भी रहता है कि कंपनियां काम कर रही हैं या नहीं.

कितना भरोसेमंद है MCA-21 डेटा?
एमसीए-21 डेटा को लेकर भी लगातार सवाल उठते रहे हैं. बीते दिनों NSSO यानी नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस ने एमसीए-21 में लिस्टेड 36 फीसदी कंपनियों को लापता बताया था. इसमें से कुछ कंपनियों की कैटेगरी भी गलत पाई गई थी. हालांकि NSSO की इन आपत्तियों को कंपनी मामलों के मंत्रालय ने खारिज कर दिया था. इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट में MCA ने दावा किया है कि कंपनियों की जानकारी एकदम सही है. और जीडीपी के आकलन में इस डेटा की वजह से कोई गड़बड़ी की आशंका बेकार है.

अब जीडीपी भी समझ लीजिए ये क्या है?
जीडीपी यानी ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट. हिंदी में इसे कहते हैं सकल घरेलू उत्पाद. इसके एक-एक शब्द पर ज़रा गौर करें. मतलब अपने आप साफ हो जाएगा. सकल का मतलब सभी. घरेलू माने घर संबंधी. यहां घर का आशय देश से है. उत्पाद का मतलब है उत्पादन. कुल मिलाकर अर्थ हुआ देश में हो रहा उत्पादन. ये उत्पादन कहां होता है? कारखानों और खेतों में. कुछ साल पहले इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंकिंग और कंप्यूटर जैसी अलग-अलग सेवाओं यानी सर्विस सेक्टर को भी जोड़ दिया गया. इस तरह उत्पादन और सेवा क्षेत्र की तरक्की या गिरावट जीडीपी के आंकड़ों में रिफलेक्ट होती है. ये आंकड़े तीन महीने में और साल भर में जारी किए जाते हैं. आसान भाषा में कहें तो अगर जीडीपी आंकड़ा बढ़ा है, तो देश की माली हालत अच्छी है. और गिरा है तो हालत पतली है.

कैसे किया जाता है जीडीपी का आकलन?
जीडीपी को दो तरह से पेश किया जाता है. पहला कांस्टेंट प्राइस और दूसरा करेंट प्राइस. कांस्टेंट प्राइस में एक आधार वर्ष को बेस बना लेते हैं. फिर उसके मुताबिक उत्पादन के मूल्य में बढ़त या गिरावट देखते हैं. मान लिया-आधार वर्ष 2011 है. तो जीडीपी की दर और उत्पादन का मूल्य साल 2011 के उत्पादन की कीमत के आधार पर देखा जाएगा. करेंट प्राइस के तहत उत्पादन मूल्य में महंगाई दर भी शामिल होती है. साल 2015 की जनवरी में सीएसओ यानी केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने इसमें बदलाव कर दिया था. उसने जीडीपी आकलन का 2004-05 का पुराना आधार वर्ष खत्म करके साल 2011-12 को नया बेस ईयर बना दिया. ध्यान रखें मनमोहन सरकार के दौर में जीडीपी के आकलन के लिए आधार वर्ष 2004-05 था. इसे मोदी सरकार के समय 2015 में बदला गया.

10 पवाइंट में समझें जीडीपी के आंकड़ों पर लगातार घमासान क्यों?

1- नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस NSSO ने जीडीपी के आंकड़ों पर सवाल खड़े किए हैं.
2-मिंट की रिपोर्ट के मुताबिक NSSO ने जुलाई 2016 से जून 2017 तक एक स्‍टडी की है.
3-इस स्‍टडी में पाया गया कि मिनिस्ट्री ऑफ कॉरपोरेट अफेयर्स के MCA-21 डेटाबेस की 36 फीसदी कंपनियों का कोई अता-पता नहीं है.
4-MCA-21 डेटाबेस की कंपनियां वो हैं, जिनका उपयोग जीडीपी की गणना के लिए किया जाता है.
5- कंपनी मामलों के मंत्रालय ने इन गुमनाम कंपनियों को ‘सक्रिय कंपनी’ की कैटेगरी में रखा था. इस कैटेगरी में वही कंपनियां रखी जाती हैं, जिन्होंने बीते 3 साल में एक बार रिटर्न दाखिल किया हो.
6- साल 2015 में नरेंद्र मोदी की सरकार ने GDP का बेस ईयर संशोधित किया था.
7-बेस ईयर को 2004-2005 से बढ़ाकर 2011-2012 कर दिया गया था. फिर साल 2011-2012 को आधार बनाकर GDP के नए आंकड़े पेश किए गए.
8- संशोधित आंकड़ों के बाद UPA सरकार के दौरान ग्रोथ अनुमान में बड़ी गिरावट दिखाई गई थी.
9-शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक UPA सरकार के दौरान GDP की ग्रोथ रेट 10.26 फीसदी थी. जबकि नए आंकड़ों के हिसाब से इसे सिर्फ 8.5 फीसदी बताया गया.
10– रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने भी भारत की 7 फीसदी आर्थिक विकास दर के आंकड़े पर संदेह जताया था.

# अब अरविंद सुब्रमण्यन ने देश के आर्थिक विकास के लिए बनाई जाने वाली नीतियों पर भी सवाल उठाए हैं. उनके मुताबिक, ‘भारतीय नीतियों की गाड़ी एक ऐसे स्पीडोमीटर के साथ आगे बढ़ाई जा रही है, जो न सिर्फ गलत है बल्कि टूटा हुआ है.’

# अरविंद सुब्रमण्यन ने पिछले साल एक बयान में नोटबंदी को भी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा झटका बताया था. पीएम नरेंद्र मोदी ने जिस वक्त नोटबंदी का ऐलान किया था, तब अरविंद सुब्रमण्यन ही देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार थे.


वीडियोः रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने जीडीपी के आंकड़ों पर सवाल खड़े किए

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