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नौकरी, पैसा, लॉकडाउन, महंगाई: सबके जीवाश्म इस तिमाही के GDP के आंकड़ों के तले दबे मिलेंगे

31 अगस्त, 2020 को GDP के आंकड़े आए हैं. वित्त वर्ष 2020-21 की पहली तिमाही के. मतलब अप्रैल-मई-जून के. और आंकड़े डराने वाले हैं.

-(23.90).

जी. ऋण तेइस दशमलव नौ शून्य प्रतिशत.

# निर्माण क्षेत्र की गिरावट बड़ी थी. 50.3 प्रतिशत की. या -50.3 प्रतिशत की ग्रोथ.

# माइनिंग सेक्टर ने -23.3 प्रतिशत की ग्रोथ दिखाई. या यूं कहें 23.3 प्रतिशत की गिरावट.

# पावर सेक्टर में ये गिरावट 7 प्रतिशत रही.

# एक अच्छी ख़बर एग्रीक्लचर सेक्टर से रही. जिसकी ग्रोथ, पिछली तिमाही की 3 प्रतिशत से बढ़कर, अबकी 3.4 प्रतिशत हो गई है.

# बीते 40 साल में पहली बार किसी क्वार्टर में GDP नेगेटिव आई है. और ये गिरावट इसलिए ऐतिहासिक है क्यूंकि ज्ञात इतिहास में इतनी बड़ी गिरावट पहली बार आई है.

तुलना के लिए पिछले आंकड़े ये रहे-

# इससे ठीक पहले की यानी 2019-20 की चौथी तिमाही में जीडीपी रही थी 3.1 प्रतिशत.

# पिछले साल, यानी 2019-20 की वार्षिक जीडीपी रही थी 4.2 प्रतिशत.

# पिछले साल की पहली तिमाही में जीडीपी रही थी 5.2 प्रतिशत.

ऊपर बताई गईं पिछले साल की तीनों GDP अपने आप में बहुत कम मानी गईं. तो इस हिसाब से लगाइए कि इस साल, इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही के GDP को क्या कहा जाए?

# क्या होती है जीडीपी?

जीडीपी को हिंदी में कहते हैं सकल घरेलू उत्पाद. सकल का मतलब सभी. घरेलू माने घर संबंधी. यहां घर का आशय देश है. उत्पाद का मतलब है उत्पादन. प्रोडक्शन. कुल मिलाकर देश में हो रहा हर तरह का उत्पादन. उत्पादन कहां होता है? कारखानों में, खेतों में. कुछ साल पहले इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंकिंग और कंप्यूटर जैसी अलग-अलग सेवाओं यानी सर्विस सेक्टर को भी जोड़ दिया गया. इस तरह उत्पादन और सेवा क्षेत्र की तरक्की या गिरावट का जो आंकड़ा होता है, उसे जीडीपी कहते हैं.

Gdp July September 700
2019 की जुलाई -सितम्बर में जीडीपी 4.5 फीसद तक गिर गई थी. (फ़ाइल फ़ोटो: इंडिया टुडे)

# और आसान तरीके से जानिए-

मान लीजिए किसी खेत में एक पेड़ है. पेड़ है, तो बस छाया देता है. पेड़ आम का है, फल देता है तो किसान आम बेचकर पैसे कमाता है. ये पैसा किसान के खाते में जाता है, इसलिए पैसा देश का भी है. अब इस पेड़ को काट दिया जाता है. काटने के बाद पेड़ से जो लकड़ी निकलती है, उसका फर्नीचर बनता है. फर्नीचर का पैसा बनाने वाले के पास जाता है, यह पैसा भी देश का है. अब इस फर्नीचर को बेचने के लिए कोई दुकानवाला खरीदता है. दुकान वाले से कोई आम आदमी खरीद लेता है. आम आदमी पैसा खर्च करता है और दुकानदार के पास पैसा आ जाता है. खड़े पेड़ के कटने के बाद से कुर्सी-मेज बन जाती है, जिसे कोई खरीद लेता है. इसे खरीदने में पैसे खर्च होते हैं. इस पूरी प्रक्रिया में जो पैसा बनता है, वही जीडीपी है.

और हां, इस दौरान केवल प्रोडक्ट ही नहीं सर्विस से होने वाली कमाई को भी जोड़ा जाना चाहिए. जैसे अगर कुर्सी मेज़ को दुकानदार से किसी के घर तक पहुंचाया गया, तो जो गाड़ी या मज़दूर का किराया या मज़दूरी लगी, उसे भी टोटल कमाई में जोड़ा जाएगा.

# इसकी नपाई कैसे होती है?

सबसे पहले तय होता है बेस ईयर. यानी आधार वर्ष. एक आधार वर्ष में देश का जो उत्पादन था, वो इस साल की तुलना में कितना घटा-बढ़ा है? इस घटाव-बढ़ाव में का जो रेट होता है, उसे ही जीडीपी कहते हैं. गर उत्पादन बढ़ा है तो जीडीपी बढ़ी है. अगर तुलनात्मक रूप से उत्पादन घटा है तो जीडीपी में कमी आई है. इसे कॉन्स्ट्रैंट प्राइस कहते हैं, जिसके आधार पर जीडीपी तय की जाती है. यानी कि कीमत स्थिर रहती है. इसके अलावा एक और तरीका भी है. इसे करेंट प्राइस कहते हैं. चूंकि हर साल उत्पादन और अन्य चीजों की कीमतें घटती-बढ़ती रहती हैं, इसलिए इस तरीके को भी जीडीपी नापने के काम में लाया जाता है, जिसमें महंगाई दर भी शामिल होती है. हालांकि अपने देश में अभी करेंट प्राइस पर जीडीपी नहीं नापी जाती है. लेकिन इसकी मांग लंबे वक्त से हो रही है. केंद्र सरकार ने देश को जो पांच ट्रिलियन इकनॉमी बनाने की बात कही है, उसके लिए करेंट प्राइस को ही आधार बनाया गया है. जीडीपी का आंकलन देश की सीमाओं के अंदर होता है. यानी गणना उसी आंकड़े पर होगी, जिसका उत्पादन अपने देश में हुआ हो. इसमें सेवाएं भी शामिल हैं. मतलब बाहर से आयातित चीज़ों का जीडीपी में कोई बड़ा हाथ नहीं है.

जब आम के आम और गुठलियों के भी दाम लगा लिए जाएं तो समझो जीडीपी की गणना हो गई. (गेट्टी इमेजेस)
जब आम के आम और गुठलियों के भी दाम लगा लिए जाएं तो समझो जीडीपी की गणना हो गई. (गेट्टी इमेजेस)

जीडीपी की गणना हर तिमाही होती है. जिम्मेदारी मिनिस्ट्री ऑफ स्टेटिस्टिक्स ऐंड प्रोग्राम इम्प्लीमेंटेशन के तहत आने वाले सेंट्रल स्टेटिस्टिक्स ऑफिस की. यानी हर तीन महीने में देखा जाता है कि देश का कुल उत्पादन पिछली तिमाही की तुलना में कितना कम या ज्यादा है. भारत में कृषि, उद्योग और सेवा तीन अहम हिस्से हैं, जिनके आधार पर जीडीपी तय की जाती है. इसके लिए देश में जितना भी प्रोडक्शन होता है, जितना भी व्यक्तिगत उपभोग होता है, व्यवसाय में जितना निवेश होता है और सरकार देश के अंदर जितने पैसे खर्च करती है उसे जोड़ दिया जाता है. इसके अलावा कुल निर्यात (विदेश के लिए जो चीजें बेची गईं है) में से कुल आयात (विदेश से जो चीजें अपने देश के लिए मंगाई गई हैं) को घटा दिया जाता है. जो आंकड़ा सामने आता है, उसे भी ऊपर किए गए खर्च में जोड़ दिया जाता है. यही हमारे देश की जीडीपी है.

# जीडीपी क्यों ज़रूरी है?

जीडीपी किसी देश के आर्थिक विकास का सबसे बड़ा पैमाना है. अधिक जीडीपी का मतलब है कि देश की आर्थिक बढ़ोतरी हो रही है. अगर जीडीपी बढ़ती है तो इसका मतलब है कि अर्थव्यवस्था ज्यादा रोजगार पैदा कर रही है. इसका ये भी मतलब है कि लोगों का जीवन स्तर भी आर्थिक तौर पर समृद्ध हो रहा है. इससे ये भी पता चलता है कि कौन से क्षेत्र में विकास हो रहा है और कौन का क्षेत्र आर्थिक तौर पर पिछड़ रहा है.

और GDP के नवीनतम आंकड़े अगर संख्या के बदले शब्दों में बताने हों तो-

देश की वाट लगेली है मामू!

 

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