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कहानी प्रोफेसर जीडी अग्रवाल की, जिन्होंने IIT छोड़कर गंगा के लिए जान दे दी

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आईआईटी का एक प्रोफेसर, जिसे बेस्ट टीचर का अवार्ड मिला, जिसने विदेश में पढ़ाई की और देश में आकर गंगा की सफाई के लिए जुट गया. जिसने नौकरी के बाद संन्यास ले लिया और अपना पूरा जीवन गंगा को समर्पित कर दिया. जिसने मनमोहन सरकार को झुकने पर मजबूर कर दिया, लेकिन उसके आगे मोदी सरकार नहीं झुकी और उसकी मौत हो गई. इस आदमी का नाम था प्रोफेसर जीडी अग्रवाल, जिन्हें दुनिया स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद के नाम से जानती है.

गंगा के लिए आमरण अनशन पर बैठे प्रोफेसर जीडी अग्रवाल की 11 अक्टूबर को मौत हो गई.

गंगा को बचाने के लिए 111 दिनों से अनशन कर रहे प्रोफेसर जीडी अग्रवाल की 11 अक्टूबर 2018 को मौत हो गई. दुनिया उन्हें स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद के नाम से जानती है. 22 जून से ही अनशन पर बैठे प्रोफेसर जीडी अग्रवाल अपनी चार मांगों को लेकर अनशन कर रहे थे. उनकी मांगें थीं-

# केंद्र सरकार गंगा सुरक्षा ऐक्ट 2012 बनाए.

# गंगा पर बन रहे और गंगा पर बनाने के लिए प्रस्तावित सभी जल विद्युत परियोजनाओं पर तुरंत रोक लगाई जाए.

# गंगा में बालू की खुदाई पर पूरी तरह से रोक लगाई जाए.

# गंगा की सुरक्षा के लिए और गंगा से जुड़े मुद्दों को देखने के लिए एक काउंसिल बनाई जाए.

सरकार ने उनकी मांगें नहीं मानी और वो हरिद्वार के मातृ सदन में लगातार अनशन करते रहे. करीब एक महीने पहले ही प्रोफेसर जीडी अग्रवाल ने कह दिया था कि अगर सरकार उनकी मांगे नहीं मानती है, तो वो नवरात्र शुरू होने के साथ ही पानी भी नहीं पिएंगे. सरकार ने बात नहीं मानी और उन्होंने 10 अक्टूबर से ही पानी भी पीना छोड़ दिया. इसके बाद हरिद्वार प्रशासन की नींद खुली और उसने प्रोफेसर जीडी अग्रवाल को मातृ सदन से उठाकर ऋषिकेश के एम्स में भर्ती करवा दिया. 11 अक्टूबर को उनकी तबीयत बिगड़ने लगी. जब तक उन्हें ऋषिकेष से दिल्ली लाया जाता, दोपहर 2 बजे के करीब उनकी मौत हो गई.

प्रोफेसर जीडी अग्रवाल आईआईटी कानपुर में प्रोफेसर रहे हैं.

गंगा के लिए अपनी जान तक देने वाले प्रोफेसर जीडी अग्रवाल या कहें कि स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद की मौत ने विपक्ष को गंगा की सफाई को लेकर एक मुद्दा दे दिया. वहीं सोशल मीडिया पर भी सरकार के खिलाफ तिखी प्रतिक्रिया देखने को मिली और इसकी वजह हैं प्रोफेसर जीडी अग्रवाल.

एक वैज्ञानिक, जिसने गंगा को बचाने के लिए जीवन लगा दिया

प्रोफेसर जीडी अग्रवाल ने बर्कले, कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी से पीएचडी की थी.

पश्चिमी यूपी के मुजफ्फरनगर में जन्मे प्रोफेसर जीडी अग्रवाल आईआईटी रुड़की से इंजीनियरिंग किए हुए थे. हालांकि जब उन्होंने इंजीनियरिंग की थी, तो उस वक्त रुड़की को आईआईटी का दर्जा नहीं मिला था और उसे यूनिवर्सिटी ऑफ रुड़की कहा जाता था. इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद जीडी अग्रवाल ने बतौर डिजाइन इंजीनियर उत्तर प्रदेश के सिंचाई विभाग में अपनी नौकरी शुरू की थी. लेकिन उनपर पर्यावरण बचाने की धुन सवार थी. इसके लिए उन्होंने बर्कले की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया से पर्यावरण इंजीनियरिंग में पीएचडी की डिग्री हासिल की और उसके बाद पर्यावरण को लेकर कई किताबें लिखीं. पीएचडी के बाद उन्होंने सिंचाई विभाग की नौकरी छोड़ दी और कानपुर आईआईटी में पर्यावरण इंजीनियरिंग के प्रोफेसर हो गए. पर्यावरण को बचाने की मुहिम में जुटे प्रोफेसर जीडी अग्रवाल को 1979-80 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने केंद्र की प्रदूषण नियंत्रण ईकाई सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड का पहला सदस्य सचिव नियुक्त किया था.

आईआईटी छोड़ी, कंपनी बनाई और फिर संन्यास ले लिया

प्रोफेसर जीडी अग्रवाल ने 17 साल आईआईटी में पढ़ाया और फिर नौकरी छोड़ दी.

प्रोफेसर जीडी अग्रवाल कानपुर आईआईटी में पढ़ाते रहे, लेकिन इसकी वजह से उनका पर्यावरण बचाने का मकसद पूरा नहीं हो पा रहा था. इसलिए उन्होंने आईआईटी छोड़ दी और आईआईटी कानपुर के कुछ छात्रों की मदद से उन्होंने दिल्ली में एक कंपनी खोल ली, जिसका नाम रखा गया एन्वायरोटेक इन्स्ट्रूमेंट प्राइवेट लिमिटेड. लेकिन उनका दुनिया से मोहभंग हो गया. 11 जून 2011 को गंगा दशहरा था. इसी दिन प्रोफेसर जीडी अग्रवाल ने उत्तराखंड में जोशी मठ में शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती को गुरु मानकर संन्यास ले लिया और उनका नाम हो गया स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद.

जब प्रोफेसर अग्रवाल के सामने सरकार को झुकना पड़ा था

2010 में जब प्रोफेसर जीडी अग्रवाल ने अनशन किया था, तो केंद्र की यूपीए सरकार ने कई प्रोजेक्ट रद कर दिए थे.

संन्यास लेने से पहले और संन्यास लेने के बाद भी प्रोफेसर जीडी अग्रवाल गंगा को बचाने के लिए अनशन करते रहते थे. उनका सबसे पहला अनशन 2008 में हुआ था. इसके बाद वो लगातार अनशन करतेत रहे थे. लेकिन 2010 में उनके अनशन के सामने सरकार को झुकना पड़ा था. यूपीए सरकार ने भागीरथी नदी पर 600 मेगावाट का एक प्रोजेक्ट शुरू किया था, जिसे लोहरी नागपाला प्रोजेक्ट कहा जाता था. प्रोफेसर जीडी अग्रवाल ने इस प्रोजेक्ट के खिलाफ 38 दिनों तक अनशन किया और फिर यूपीए सरकार को झुकना पड़ा. पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने प्रोजेक्ट पर रोक लगाने का आदेश दे दिया.

तीन बार लिखी चिट्ठियां और नहीं मिला कोई जवाब

प्रोफेसर जीडी अग्रवाल ने पीएम मोदी को संबोधित करते हुए तीन पत्र लिखे थे. पहला पत्र उन्होंने 24 फरवरी 2018 को लिखा था. इस चिट्ठी का मजमून था-

प्रोफेसर जीडी अग्रवाल उम्र में पीएम मोदी से 18 साल बड़े हैं. पीएम मोदी ने 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान कहा था कि वो मां गंगा के बेटे हैं, लेकिन चुनाव जीतने के बाद पीएम मोदी कुछ लालची लोगों के समूह में फंस गए और उन लोगों के लिए विलासिता के साधन जुटाने लगे जिसे विकास कहते है. बड़े भाई और गंगा का बेटा होने के नाते प्रोफेसर अग्रवाल ने पीएम मोदी से गंगा से संबंधित कुछ मांगों को पूरा करने क कहा था. 

प्रोफेसर जीडी अग्रवाल ने पीएम मोदी को चार पत्र लिखे थे.
प्रोफेसर जीडी अग्रवाल ने पीएम मोदी को चार पत्र लिखे थे.

इसके बाद दूसरी चिट्ठी उन्होंने हरिद्वार के कनखल से 13 जून 2018 को लिखी थी. इसमें प्रोफेसर जीडी अग्रवाल ने उन्हें अपने पुराने पत्र की याद दिलाते हुए कहा था कि उस पत्र का कोई जवाब नहीं आया है. इसके अलावा उन्होंने एक बार फिर से गंगा सफाई की मांगों को लेकर लिखा था. लेकिन इस पत्र का भी कोई जवाब नहीं आया फिर प्रोफेसर जीडी अग्रवाल ने 22 जून से अनशन शुरू कर दिया. अनशन शुरू करने के बाद भी उन्होंने पांच अगस्त 2018 को पीएम मोदी को तीसरा पत्र लिखा. इस पत्र का आशय था-

पीएम मोदी को गंगा के संबंध में कई पत्र लिखे गए, जिसका जवाब नहीं मिला. उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी गंगा की चिंता करेंगे, इसलिए सबसे साढ़े चार साल इंतजार किया. अपने अनशनों की याद दिलाते हुए प्रोफेसर अग्रवाल ने लिखा था कि उनकी मांगों को मनमोहन सिंह सरकार ने मान लिया था और लोहारी नागपाला जैसे बड़े प्रोजेक्ट रद कर दिए थे, जो 90 फीसदी बन गए थे. इसकी वजह से हजारों करोड़ रुपये का नुकसान भी हुआ था. इसिलए पीएम मोदी गंगा से संबंधित चार मांगों को मान लें, नहीं तो प्रोफेसर अग्रवाल गंगा के लिए उपवास करते हुए जान दे देंगे.

प्रोफेसर जीडी अग्रवाल को देश के कई पर्यावरणविदों का समर्थन था, लेकिन सरकार ने उनकी मांगे नहीं मानीं.

इस चिट्ठी का भी प्रोफेसर जीडी अग्रवाल को कोई जवाब नहीं मिला. इसके बाद उन्होंने चौथी और अपनी आखिरी चिट्ठी अपनी मौत से कुछ ही घंटे पहले लिखी थी. इस चिट्ठी में उन्होंने लिखा था कि हरिद्वार प्रशासन ने उन्हें जबरन मातृ सदन से उठाकर एम्स ऋषिकेश में दाखिल करवा दिया था. उन्होंने लिखा था कि गंगा संरक्षण को लेकर उनकी तपस्या को देखते हुए एम्स के डॉक्टरों ने उनका सहयोग किया है. इस पत्र को लिखने के कुछ ही घंटों के बाद उनकी मौत हो गई.

जब मोदी गुजरात के सीएम थे, तो किया था प्रोफेसर अग्रवाल का सपोर्ट

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2012 में गुजरात के मुख्यमंत्री थे. उस वक्त मार्च 2012 में प्रोफेसर जीडी अग्रवाल गंगा सफाई को लेकर अनशन कर रहे थे. उस वक्त नरेंद्र मोदी ने प्रोफेसर जीडी अग्रवाल की स्वास्थ्य की चिंता जताते हुए कहा था कि उन्हें उम्मीद है कि केंद्र सरकार गंगा को बचाने के लिए ऐक्शन लेगी.

Modi 1st tweet

लेकिन जब प्रोफेसर जीडी अग्रवाल ने पीएम मोदी के कार्यकाल में पत्र लिखा तो चार पत्रों का जवाब तक नहीं आया. जब प्रोफेसर जीडी अग्रवाल की मौत हो गई, तो मौत के करीब छह घंटे बाद पीएम मोदी ने एक ट्वीट किया.

इसमें उन्होंने प्रोफेसर जीडी अग्रवाल को श्रद्धांजलि देते हुए लिखा कि गंगा सफाई के लिए उनके योगदान को हमेशा याद रखा जाएगा. अब गंगा कब साफ होगी, ये तो नहीं पता, लेकिन गंगा की सफाई को लेकर अपना पूरा जीवन कुर्बान करने वाले एक सच्चे पर्यावरणविद को देश ने खो दिया है.


 

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