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गजराज राव इंटरव्यू (भाग-3): कोई रोल करते हुए एक्टर के सरोकार क्या होते हैं?

नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने 'ठाकरे' जैसी हिंदुत्ववादी प्रोपोगैंडा फिल्म करते हुए क्या अपने बुनियादी कलाधर्म का पालन किया?

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Q28. आप मध्य प्रदेश और राजस्थान के जिस अंचल से हैं, क्या ये उसका असर था कि ‘बैंडिट क्वीन’ में अशोक के किरदार में जैसे बोलते हैं, बिहेव करते हैं, वो ठीक वहीं का लग पाया?
बिलकुल, बिलकुल. आपने सही कहा. उसका मुझे बड़ा फायदा हुआ. इनफैक्ट एक बड़ी अच्छी बात हुई थी कि ‘बैंडिट क्वीन’ में एक सीन था जहां पहली बार पंचायत लगती है. उसमें हम धौलपुर में शूटिंग कर रहे थे. तीन-चार घंटे के बाद सारी लाइट और सेटिंग हो गई. उसमें सीन में सेटअप ये था कि घर के बाहर एक तरफ बड़ी जात के लोग बैठेंगे और एक तरफ छोटी जात के लोग बैठेंगे. थोड़ा सा ऊपर करके भी एक जगह थी, अगर वो घर आपको याद हो.. ऊंचाई पर बना हुआ था. शेखर जी का मैं बड़ा प्रिय था उस समय. उन्हें जानकारी थी कि मैं थियेटर करता हूं. उनको ये भी मालूम था कि मैं राजस्थान से हूं. तो ऐसे ही बात बात में उन्होंने पूछ लिया कंधे पर हाथ रखकर कि यार ये ऐसे ही बैठते हैं न गांव में? उन्होंने इसमें उस ईगो को आड़े नहीं आने दिया कि नहीं, मैं डायरेक्टर हूं, मुझे पता है मैं क्या कर रहा हूं.

मैंने कहा कि सर मैं गांव जाता रहा हूं और मेरी जितनी समझ है, जो आदिवासी बहुल एरिया है, जो देखा है मैंने, वो इस तरह से नहीं होता है. वो एक लेवल पर कभी भी नहीं बैठते. बड़ी जाति के हैं वो अलग बैठते हैं और छोटी जाति के जो हैं वो थोड़ा नीचे बैठेंगे इस सेटअप में. ये मेरा बोलना था कि उन्होंने तिग्मांशु को बुलाया जो उनके असिस्टेंट थे, जो अभी एक नामचीन निर्देशक हो गए हैं. उनको बुलाया कि गजराज ऐसा बोल रहा है. और तुरंत से वो सेटअप चेंज हुआ. फिर से दो-तीन घंटे की लाइटिंग हुई और जैसा मैंने बोला था वैसा उन्होंने करवा दिया. और मैंने बताया कि जो बड़ी जात की चप्पलें हैं वो एक तरफ ढेर होंगी और जो छोटी जात की चप्पलें हैं वो एक तरफ ढेर में पड़ी होंगी.

'बैंडिट क्वीन' (1994) का वो पंचायत वाला दृश्य.
‘बैंडिट क्वीन’ (1994) का वो पंचायत वाला दृश्य.

Q29. वो जो सीन था जिसमें आपका किरदार फूलन को छेड़ता है, पंचायत लगती है और पूछा जाता है कि भई ये क्या कर रही थी तो आप, आपके दोस्त और दूर के रिश्ते के भाई, वो फिर बातों को वहां तक लाते हैं कि ये बोल रही थी कि इसको बड़ी चुल्ल उठ रही है. उस सीन को देखते हुए दर्शक के तौर पर हमारा दिमाग सुन्न सा हो जाता है. एक कठोर ज़ोन में चला जाता है कि ऐसी निर्दयता से बात कर रहे हैं, और इस औरत को बर्बाद कर रहे हैं ये लड़के. एक तरफ हम ऐसे इसको रिसीव कर रहे हैं, लेकिन जब आप और दूसरे एक्टर्स उस सीन को कर रहे थे तो एक प्रक्रिया में कर रहे थे. अशोक के मन और व्यक्तित्व के भीतर होते हुए या उसे निभाते हुए, क्या आप बुरा महसूस कर रहे थे फूलन के पात्र के लिए? क्योंकि आप लोगों के पात्र तो खुश थे वो करते हुए.
अच्छे अभिनेता की पहचान होती है कि अपने पात्र को वो आत्मसात कर ले. क्योंकि मैं रंगमंच से जुड़ा रहा हूं और एक्ट वन ग्रुप में थियेटर करता था तो उसकी वजह से एक समझ जो आई बहुत अच्छे से कि अगर आप .. जैसे मैंने ‘बैंडिट क्वीन’ के अलावा ‘भंवर’ के बहुत से एपिसोड्स किए जिसके अंदर ज्यादातर नेटेगिव पात्र होते थे तो मेरी उसमें कोशिश ये होती थी कि ये जो पात्र है वो बहुत गलीज़ और घटिया ही दिखें. वो किसी के लिए प्रेरणा न बने. वो ग्लैमरस न बन जाए कहीं पर.

जब हम लोग कर रहे थे (बैंडिट क्वीन) तो मेरे साथी अभिनेता थे हेमंत पांडे और एक लखनऊ के एक्टर थे. इतनी ग्रैविटी थी माहौल में. हम लोग उस हॉट बैल्ट में ही शूट कर रहे थे धौलपुर की. जिस इलाके में फूलन देवी थीं. उस माहौल में सेट पर मान सिंह थे. उनसे मुलाकात हुई थी. तो हम लोगों को समझ थी कि किस पात्र को लेकर हम लोग कर रहे हैं. और उसके साथ क्या बीती है. उन सारे सरोकारों को साथ में रखकर ही अभिनय हो रहा था. ऐसा नहीं था कि खिलंदड़पन में .. और चलो कुछ काम मिला है कर लेते हैं इससे कुछ रोजगार मिलेगा. ये वो नहीं था. हमें इस बात की समझ थी.

मुझे याद है बहुत अच्छे से क्योंकि वो पहला प्रोजेक्ट था जिसके अंदर मेरा कॉन्ट्रैक्ट बना था. बीबीसी4 का वो प्रोजेक्ट था और उन्होंने कॉन्ट्रैक्ट बनाया था. मेडिकल हुआ था. उस सब्जेक्ट की गंभीरता से मैं वाकिफ था. जैसे फूलन को छेड़ने वाला सीन था, जब हम लोग कर रहे थे तो मेरे लिए बड़ा तकलीफदेह (discomforting) था. क्योंकि एक तो सीमा बिस्वास सीनियर हैं मेरी थियेटर में, उनको जानता रहा हूं, उनके प्लेज़ देखे हैं मैंने. मैं बहुत ज्यादा उद्वेलित था. बहुत ज्यादा नर्वस था. सीमा जी ने मुझे बहुत संबल दिया, साथ दिया. बोला कि ये पूरी घटना जो है वो हुई है एक औरत के साथ. ऐसा सब कुछ बीता है उसे हम डिपिक्ट कर रहे हैं. मेरी समझ से पूरे प्रोसेस में गंभीरता रही है मेरे तौर पर और जो पूरी टीम थी उसमें.

Q30. आपने कहा कि जब कर रहे थे तो मन में ये नहीं था कि सिर्फ रोजगार के लिए कर रहे हैं. एक इंटरव्यू में भी आपने कहा है कि ‘आमिर’ के बाद आपको बहुत से वैसे ही रोल मिले जिसमें एक खास समुदाय का बुरा चित्रण करना था और आपने कहा कि मैं इन भूमिकाओं को नहीं कर सकता क्योंकि मेरी एक जिम्मेदारी बनती है. ये वही समय है जिसमें.. जैसे हम ‘ठाकरे’ देखें, नवाज ने उसमें काम किया है. उनसे एक इंटरव्यू में पूछा गया कि मैसेजिंग को लेकर क्या? तो उन्होंने कहा कि ‘मैं एक आर्टिस्ट हूं और बड़े स्ट्रगल से यहां तक पहुंचा हूं तो मेरे को बाकी चीज से कोई मतलब नहीं है कि क्या है, मैं तो बस एक आर्टिस्ट हूं और मुझे मेरा आर्ट दिखाना है और ठाकरे जैसा कैरेक्टर मिस नहीं किया जा सकता है.’ हालांकि उनके ये सब कहने के इतर एक एक्टर से ये न्यूनतम अपेक्षा तो रखी ही जाती है कि चाहे कितना ही नृशंस रोल करे, ये ध्यान रखे कि उसका कैरेक्टर मैसेज क्या दे रहा है. उनका पात्र फिल्म में मुसलमानों को मारने की बात कर रहा है खुलेआम. उग्र होने की बात कर रहा है. वो सारे क्षेत्रीय लोगों के प्रति वैमनस्य पैदा कर रहा है. लेकिन अंत में इन चीजों की आलोचना नहीं की जाती बल्कि हीरोइक अंदाज में कहानी टू बी कंटिन्यूड़ रहती है. ये फिल्म इंडियन सिनेमा के, और भारतीय लोकतांत्रिक मूल्यों के मुंह पर ऐसी चोट है कि आपके पैरों के नीचे से जमीन हिल जाती है. आप सरोकार की बात कर रहे थे उससे पहले तक मैं ये सोच रहा था कि क्या ये कह देना काफी है कि मैं तो आर्टिस्ट हूं और मुझे बाकी चीजों (आपके मैसेज की राजनीति) से कोई मतलब नहीं?
मुझे लगता है कि आप किस माहौल में रह रहे हैं, आप किस शहर में रह रहे हैं, उस पर बहुत कुछ निर्भर करता है. ये सिर्फ कलाकारों पर ही नहीं है, अभिनेताओं पर ही नहीं है. जैसे इलेक्शन होते हैं. ऐसा बताया जाता है कि इलेक्शन टाइम पर रोडवेज़ की बसों या प्राइवेट बसों या जो शोरूम होते हैं कार के, उनसे कह दिया जाता है कि आपको ये गाड़ियां देनी हैं. अब गाड़ी के शोरूम का जो मालिक है उसकी राजनीतिक समझ या सरोकार जो भी हों, उसको उस समय अपना सरवाइवल देखना है. अपना बिजनेस देखना है, मुझे ऐसा लगता है. वो वहां पर ये नहीं बोल पाता कि मैं आपकी राजनीतिक समझ से अग्री नहीं करता हूं इसलिए मैं आपको गाड़ी नहीं दूंगा. उसका शोरूम तोड़ दिया जाएगा और जला दिया जाएगा. कलाकार ऐसे चक्र में बहुत दोयम स्थिति पर होता है.

अब तो स्थितियां बदल गई हैं, पहले जैसे अंडरवर्ल्ड हुआ करता था तो उस समय उनके यहां पर जो बर्थडे हुआ करते थे, किसी तरह का गणपति पूजन हुआ करता था, बड़े कलाकारों को जाना पड़ता था उसमें. वो मना नहीं कर सकते थे. उसमें उस कलाकार पर आप आक्षेप लगाएंगे कि भई ये तू गलत कर रहा है वो मेरी समझ से ठीक नहीं है. क्योंकि वो उसके बस में नहीं है. क्योंकि फाइनली जाकर फिल्म बन रही है और सेंसर बोर्ड उसको अप्रूव कर रहा है. इसमें कोई बड़े स्तर पर पर्सनैलिटी है और उसका प्रभामंडल और प्रभाव इतना अधिक है.. कि जैसे राजस्थान में हुआ था ‘पद्मावत’ को लेकर जो बात हुई थी. अब संजय लीला भंसाली को वहां पर शूटिंग बंद करनी ही पड़ी. वो भगा दिए गए वहां से. अगर आपने क्लिप्स देखें हों तो उनको थप्पड़ भी पड़े थे. लेकिन मुझे नहीं लगता कि संजय लीला भंसाली ने कोई विरोध किया या शिकायत की, कोई एफआईआर हुई, कुछ भी नहीं हुआ उसके अंदर.

Q31. जाहिर कारण ये है कि इस फिल्म का प्रोड्यूसर-राइटर बंबई में जिस कलाकार पर अंगुली रख दे और कहे कि तुम ठाकरे का रोल करोगे तो उसको करना ही पड़ेगा.
मेरा ऐसा मानना है कि बर्थडे में किसी को बुलाने में और एक फीचर फिल्म जिसके अंदर 100-200 दिन आपको देने होते हैं, 3 महीने देने होते हैं, उसमें बड़ा अंतर होता है. मेरी ये ज़ाती समझ है कि ऐसा कोई नहीं कर सकता कि किसी एक्टर को बोला कि तुम्हे करना है और उसने आंख बंद करके कर लिया.

Q32. एक्टर का स्वार्थ भी हो सकता है कि मेरे को 40 बरस इस शहर में काम करना है, तो क्यों न एक रिश्ता बना लूं इन लोगों से. एक फिल्म ही तो करनी है, फिर जिंदगी भर का ताकतवर कनेक्शन हो जाएगा. क्योंकि इसी पार्टी शिव सेना ने 2016 में नवाज के रामलीला में काम करने का विरोध किया था कि आप मुसलमान हो, आप कैसे रामलीला में काम कर सकते हो.
पर मैं इसको अलग तरीके से देखता हूं. शिवसेना का या जो भी इनका काम करने का तरीका रहा होगा लेकिन ये अपने आप में एक बड़ी क्रांतिकारी चीज है. आप बाला साहब ठाकरे के लिए एक पात्र का चयन कर रहे हैं तो वो उनके भी कहीं पर सोच समझ में कोई चेंज आया है, परिवर्तन आया है कि एक नॉन (गैर-मराठी/मुसलमान)..

Q33. नहीं, मुझे ऐसा लगता नहीं है. फिल्म इंडस्ट्री से इनका रिश्ता तो हमेशा रहा ही है. चाहे बाल ठाकरे हों या राज हों वो फिल्म इंडस्ट्री में दोस्तियां रखते आए हैं. देखने वाली बात ये है कि फिल्म में एक मुसलमान एक्टर से ही उसी के समुदाय के लिए क्या कहलवाया गया है और बिना किसी सही कनक्लूजन के, बिना किसी सही हस्तक्षेप के. खुल्ले आम यही कहा गया कि इनको तो मारना ही चाहिए और ये हिंदु राष्ट्र है. फिल्म का निष्कर्ष भी यही है. और किसी डर में रोल किया होता तो नवाज बाद में भी ट्वीट कर-करके ये नहीं बोल रहे होते कि मेरी फिल्म हिट हो गई, मैं बड़ा खुश हूं, प्राउड हूं.
लेकिन मुझे डाउट है कि ये चीज मजबूरी में हो सकती हैं. जो निर्माता-निर्देशक हैं उनको भी मालूम है कि किसी से आपको अभिनय करवाना है तो उससे जबरदस्ती आप दो महीने एक्टिंग नहीं करवा सकते. आप एंट्री किसी फिल्म में दिलवा सकते हो, प्रमोशन करवा सकते हो लेकिन दो महीने, तीन महीने की शूटिंग और साल भर में प्रोजेक्ट पूरा होना ये किसी की बांह मरोड़कर नहीं करवाया जा सकता. मैं इसमें बिलीव करता हूं. कहीं न कहीं नवाज को ये चैलेंजिंग लगा होगा कि ये इतना क्रिटिकल पात्र है जिसकी एक तरह की सोच समझ रही और उस पात्र के लिए उनको मौका मिल रहा है.

'ठाकरे' के दो दृश्यों में नवाज.
‘ठाकरे’ के दो दृश्यों में नवाज.

Q34. मुझे ये उस एक्स्ट्रीम में लगता है जैसे निर्भया वाला मामला हुआ था जिस पर अब वेब सीरीज बन रही है, उसमें आप रेपिस्ट का रोल इसलिए करें कि वैसी यूनीक मनोस्थिति एक्टर के लिए लालचभरी है. लेकिन इस प्रोजेक्ट के अंत में उस रेपिस्ट की मनोस्थिति दिखाने के साथ, अंत में जस्टिफाई करने की कोशिश की जाए कि उसने जो किया वो सही किया. आर्ट की आड़ में ‘ठाकरे’ करना कुछ ऐसा ही है. एक डर है. यहां तक कि आलोचकों और फिल्म समीक्षकों में भी एक किस्म का संयम (restraint)  दिखा है, वो बोलने से बचे हैं. रिव्यूज़ में उन्होंने कड़े शब्द नहीं यूज़ किए हैं. बाल ठाकरे की जब मौत हुई थी तो शहर बंद करने को लेकर एक लड़की ने फेसबुक पर सवाल किया था और दूसरी लड़की ने उसे लाइक किया था, तो दोनों लड़कियों को जेल में डाल दिया था.
लेकिन ये सेम चीज सिर्फ महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है. आप पंजाब ले लीजिए. साउथ में चले जाइए. जयललिता या अन्नादुरई के बारे में आप कुछ लिख दीजिए, कुछ बोल दीजिए. ये खाली महाराष्ट्र या बंबई तक सीमित नहीं है. और इस सबमें एक कलाकार जो है वो सबसे छोटी सीढ़ी पर है, सबसे छोटी यूनिट है. सबसे छोटा बिंदु है. और सबसे कमजोर होता है वो. चाहे वो राइटर हो, म्यूजिशियन हो, पेंटर हो.. उनको बहुत सारी चीजों को बर्दाश्त भी करना पड़ता है. और संभालकर भी चलना पड़ता है.

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गजराज राव इंटरव्यू Part-1: वो एक दिन जिसने जिंदगी बदल दी
गजराज राव इंटरव्यू Part-2: खुद को निराशा से बाहर निकालने का तरीका
गजराज राव इंटरव्यू Part-4: एक्टिंग मास्टरक्लास – अभिनेताओं के लिए सबक
गजराज राव इंटरव्यू Part-5: अपने किरदारों को कैसे अप्रोच करते हैं?

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