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गजराज राव इंटरव्यू (भाग-2): खुद को निराशा से बाहर निकालने का तरीका

घर, परिवार, आशा, निराशा और बतौर एक्टर महत्वाकांक्षा की बातें.

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गांव में पढ़ाई लिखाई हो नहीं रही थी. गजराज स्कूल में बैठते कम थे, भागते ज्यादा थे. एक ये कारण था. दूसरा ये कि उनके पिता की दिल्ली में रेलवे में जॉब लग गई थी. इसलिए परिवार दिल्ली आ गया. यहां वे रेलवे कॉलोनी में रहने लगे. पहले कनॉट प्लेस और फिर मिंटो ब्रिज के पास थॉमसन रोड रेलवे कॉलोनी में रहे. यहां अलग-अलग राज्यों और भाषाओं वाले लोग रहते थे, उसका असर भी उनके व्यक्तित्व पर पड़ा. कॉलेज की पढ़ाई डीयू से की.

इंटरव्यू पार्ट-1 से आगे…

Q9. राजस्थान में कहां से हैं? शायद बहुत छोटे थे तब तक ही वहां रहे.
मैं चार-पांच साल का था शायद तब तक गांव में रहा था. और मुझे कुछ नहीं याद है गांव का. डूंगरपुर जिले से हूं. सागवाड़ा तहसील में. अब मैं तकरीबन हर साल-दो साल में गांव जाता रहा हूं. जुड़ा रहा हूं. पहले आइलैंड जैसे होते थे गांव, जहां पर हम शहर से जाते थे और हमें लगता था कि हम लोग कुछ तीसमारखां हैं, हमें पता है, हमें जानकारी है. पहले गांव में शिक्षा का प्रसार इतना नहीं था. सामाजिक कुरीतियां थीं, भेदभाव बहुत ज्यादा था लेकिन पिछले दसेक साल में चीजें बहुत बदली हैं. बहुत तेजी से. आज जब मैं गया हूं तकरीबन दो-तीन साल पहले गांव तो एक तो इंटरनेट ने बड़ा चमत्कार किया है. मोबाइल ने बड़ा चमत्कार किया है. गांव के युवक, युवतियों को सीधे से शहर के बराबर लाकर खड़ा कर दिया है. खासतौर पर नॉलेज के मामले में. अब शहर का कोई आदमी गांव में जाकर इतरा नहीं सकता है. ये नहीं कह सकता है कि तुमसे ज्यादा जानता है. भले ही गांव वालों के पास सुविधाओं, संसाधनों की कमी होगी. शहरों में लग्जरी मिल जाती है बड़ी आराम से. जैसे बंबई शहर में और दिल्ली में हमें अस्पताल, रेस्टोरेंट या कुछ भी चीज 24 घंटे अवेलेबल होती है. गांव में उसका थोड़ा बहुत कष्ट अभी भी है कि कोई बीमार हुआ तो चार किलोमीटर तहसील जाना है या पांच घंटे लगाकर अहमदाबाद जाना है. वो दिक्कतें निश्चित रूप से हैं.

लेकिन मुझे लगता है कि सामाजिक रूप से बहुत परिवर्तन आया है. जिसके कुछ नुकसान भी हो रहे होंगे, जैसे जब आप इंटरनेट पे हैं तो उसके अंदर बहुत सारा ऐसा मटीरियल भी है जो अच्छा प्रभाव नहीं छोड़ता है. वो भी वहां का युवा देख रहा होगा. मैं पिछली बार गया तो देख रहा था कि सारे के सारे लोग, चाहे बस स्टैंड पर हैं, चौपाल में बैठे हैं, सब के सब मोबाइल पर ही हैं. वॉट्सएप क्रांति हो चुकी है. कुल मिलाकर उसके नेगेटिव इम्पैक्ट हैं, वो शायद कम होंगे धीरे धीरे. लेकिन ये एक बहुत अच्छी बात हुई है कि गांव के इंसान के लिए नॉलेज खुल गया है. उसे पता है कहां क्या हो रहा है. राजनीतिक रूप से, सामजिक रूप से. मेरे रिश्तेदार हैं गांव में. उनसे फोन पर बात हो जाती है. माता-पिता मेरे हर चार-छह महीने में गांव जाते हैं, शादियां अटेंड करते हैं. तो मुझे जानकारियां मिलती रहती हैं.

जैसे एक बड़ी कमाल बात है कि मेरे एक नजदीकी रिश्तेदार की बच्ची है जो पुलिस सेवा में आई है. उसका बहुत क्लियर था कि पुलिस की नौकरी करेगी ही. उसको बड़ा जुनून है और गर्व इस बात का कि पुलिस की नौकरी मिली है लेकिन जो उसके होने वाले पति थे उनको इससे आपत्ति थी. कि भई शादी के बाद आप नौकरी नहीं करोगी. तो उसने वो रिश्ता करने से मना कर दिया और उसके माता पिता ने कोई विरोध नहीं जताया. ये मुझे एक बहुत क्रांतिकारी स्थिति लगी. कि 15-20 साल पहले ऐसा होना असंभव था, राजस्थान के एक छोटे से प्रांत में लड़की कोई फैसला ले ले और उसे स्वीकार कर लिया जाए, डिसीजन तो शायद लेती होंगी उस समय पर लेकिन उसके घर वाले उस चीज को स्वीकार करें और उसके साथ खड़े रहें ऐसा असंभव था. लेकिन अब जो हुआ, ये पिछले साल की खबर है, मैं इससे बड़ा प्रोत्साहित हुआ.

Q10. आप मायड़ (मातृ) भाषा क्या है?
वागड़ी. उसकी लिपि नहीं होती.

Q11. बचपन की डूंगरपुर या आसपास की कोई यादें हैं?
जब हम ननिहाल जाते थे बचपन में, वो बांसवाड़ा में पड़ता था. वहां एक बात जो रोमांचक लगती थी वो ये कि हम लोग ट्रेन से रतलाम आते थे और उसके बाद चार पांच घंटे का बस का सफर होता था मध्यप्रदेश या राजस्थान रोडवेज़ का, फिर हम लोग जब अपने गांव से चार किलोमीटर दूर रस्ते में उतरते थे तो हमारे नाना बैलगाड़ी लेकर हमें लेने आते थे. तो बैलगाड़ी का जो सफर है वो मुझे बड़ा रोमांचित करता था. मतलब मैं साल भर इंतजार करता था उस बैलगाड़ी के सफर का. और फिर वो गांव में घूमना, गाय और गाय के बछड़े और ताजा दूध. एक बार का तो मुझे याद है एक बड़ा सांप मुझे मिल गया था. बड़ी भयानक मैमोरी थी वो. मैं शायद सात-आठ साल का था, खेतों में गया हुआ था. और वहां मैंने सांप देखा. मेरे मामा भी साथ में थे मेरे. और ज्यादातर यादें सुंदर हैं. चूंकि मैंने जैसे बताया कि हम लोग दिल्ली से जाते थे, हमारे पास उपहार होते थे लोगों के लिए ननिहाल में या दादी के लिए, या चाचा और उनके परिवार के लिए और वहां पर चूंकि सीमित थी चीजें, जानकारियां, तो हम बड़ा इतराते थे ये मुझे याद है. कि लोग बड़े एकटक देखते थे हमको, जैसे हम कोई अजूबा हों. फिर पिताजी बोलते थे कि कुछ पोयम वोयम सुना दो. फिर वो बा बा ब्लैकशीप सुनाते थे. तो ऐसा लगता था कि जो बच्चे थे या गांव के बड़े बुजुर्ग थे तो उनके लिए बड़ा कौतुक था कि इनको अंग्रेजी बोलनी आती है. अब ये चीजें बदल गई हैं और अच्छे के लिए. गांव में युवक डॉक्टर हो रहे हैं. अलग अलग काम करते हैं. दिल्ली में काम कर रहे हैं. बंबई में काम कर रहे हैं. दुनिया के अलग अलग देशों में काम करते हैं. हमारे परिचित ऑस्ट्रेलिया में हैं, कैनेडा में हैं.

Q12. पेरेंटिंग को लेकर आपकी अप्रोच क्या रही है?
हम लोगों ने सीखा धीरे धीरे. बड़ा बेटा मेरा 21 साल का है और छोटा बेटा 10 साल का. उनके साथ रहते हुए ही सीखा हमने कि – जो आप चाहते हैं कि वो ना करे, वो आप न करें. समझ रहे हैं? पहली चीज. कि आप अगर चाहते हैं कि बच्चा ड्रिंक ना करे, तो आप उसके सामने ड्रिंक ना करें. कम से कम जब तक कि वो एक समझदार उम्र में न चला जाए. 18-20 साल का न हो जाए. जैसे हमारे घर में कभी गैदरिंग हुई तो उसके अंदर हम इस बात का बड़ा प्रिकॉशन लेते थे कि उसके सामने ऐसी दुनिया ना क्रिएट की जाए. ऐसी दुनिया ना क्रिएट करें जहां औरतें एक तरफ बैठें और पुरुष एक तरफ बैठें. जो हमारी मित्र मंडली आती है वो सब लोग एक साथ ही बैठकर बातें करते हैं, गप्पें मारते हैं. ये एक चीज है. और जैसे टीवी, अगर आप चाहते हैं कि वो टीवी न देखे तो आपको राशनिंग करनी होगी अपने टीवी देखने पर भी. कई मां-बाप होते हैं जिनको लगता है कि स्मार्टफोन या आईपैड बच्चों को थमा दो और संभाल लेगा अपने आप, वो बहुत ही दर्दनाक सिचुएशन है. ऐसा नहीं होना चाहिए कि बच्चे को भले ही खाना खिलाने की वजह से या किसी भी वजह से टीवी या उसकी आदत डलवाते हैं तो वो अफीम का काम करती है. तो फिर सिर्फ और सिर्फ उसे टीवी की इंस्ट्रक्शन समझ में आती है. जैसे आप एक डॉगी को, कुत्ते को ट्रेन करते हैं, उसको कुछ खिलाने के लिए, जानवरों को ट्रेन करते हैं, तो बच्चा वैसा हो जाता है. वही कोशिश करनी चाहिए कि आप जहां तक हो सके उससे बचें. बच्चे को स्मार्टफोन की आदत न डलवाएं, आईपैड की आदत न डलवाएं. वो फॉलो करता है. बच्चा वही सब करता है जो आप करते हैं. अवचेतन रूप से (subconsciously) वही सब सीख रहा होता है. कैसे आप अपनी पत्नी से बात कर रहे हैं, कैसे आप अपने माता-पिता से बात कर रहे हैं, वो सब बच्चा देख रहा होता है. सबकॉन्शियसली उसके दिमाग में चल रहा होता है. और ये सब चीजें हमने गलतियां कर कर के ही सीखा है, ऐसा नहीं है कि हम लोग बड़े गुणी लोग हैं, महान लोग हैं. हमने एक बार रियलाइज़ किया कि मेरा बड़ा बेटा जो है वो सीरियल के डायलॉग बोलने लग गया कि – “मेरे आंख में आंसू गरम हो रहे हैं”. ऐसे डायलॉग बोलने लग गया वो. मुझे लगा कि ये भयानक है. फिर रोका गया वो.

Q13. बच्चों का क्या इरादा है आगे पढ़ाई के बाद?
जो बड़ा बेटा है वो अभी ग्राफिक डिजाइनिंग का कोर्स कर रहा है, तो देखिए वो कहां ले जाती है उसे.

Q14. फिल्मों की रुचि है उनमें?
हां, देखता है न. अभी पिछले कुछ समय से वो जितनी पुरानी फिल्म है उनको ‘मि. नटवरलाल’ टाइप की वो सब रीविजिट कर रहा है. उसने देखी नहीं है ‘अमर अकबर एंथनी’ और वो सब. क्योंकि उसने आर्ट से जुड़ी चीजें ली हैं कि उस समय का आर्ट क्या था, डिजाइन क्या था, कलर क्या थे, उस सब में उसको रुचि आती है, फॉन्ट्स कैसे थे, फिल्म के टाइटल कैसे होते थे. उसमें उसकी रुचि जगी है. वो बीच बीच में बताता है कि मैंने ये फिल्म देखी और वो देखी.

Q15. छोटे बच्चे का रुझान किस दिशा में है?
वो फोर्थ ग्रेड में है. पढ़ाकू है. ग्रीक माइथोलॉजी से संबंधित नॉवेल होते हैं वो पढ़ने का शौक है उसे. हैरी पॉटर और पर्सी जैक्सन, वो बहुत रिपीट पढ़ता है. वो कहीं पर भी किताब लेकर बैठ सकता है. किसी भी शोरगुल वाली जगह पर. ये एक अच्छी चीज है. उसको चेस खेलना पसंद है. चेस खेलता है हफ्ते में दो-तीन बार. मुझे हारना पड़ता है उससे.

Q16. क्या आप लाइफ में कभी निराश होते हैं?
बिलकुल होता है. हफ्ते में दो बार होता हूं.

Q17. सबसे बुरे और निराशा के पलों से खुद को बाहर कैसे निकालते हैं
एक विदेशी मोटिवेशनल स्पीकर है निक वुजिक, उनके हाथ और पांव दोनों नहीं हैं. उनकी कही हुई बातें मेरे आस पास रहती हैं हमेशा. उसमें से एक कि – “Some injuries heal more quickly if you keep moving.” तो जो मूवमेंट है न, वो बहुत जरूरी है. कि जहां पर भी आप दुख के साथ बैठ जाओगे न.. दुख आपकी गोद में बैठ गया तो आपका भार बढ़ जाता है. दुख को अपनी गोद में बैठने मत दो. दुख भले ही आपके साथ चले, उसमें प्रॉब्लम नहीं है. क्योंकि जादू या करिश्मा कभी नहीं होता जीवन में कि दुख या इमोशन को डिलीट कर दो जीवन से, वो पॉसिबल नहीं है. वो रहेगा. समय के साथ ही दुख जाएगा. चाहे वो एक दिन हो, दो दिन हो, हफ्ता हो. जैसे मुझे स्पॉन्डलाइटिस है, तो उससे कई बार लोवर बैक में या नेक में दर्द रहता है. तो मैं साल भर पहले तक मायूस हो जाता था. वो टेलीशॉपिंग वाला हो जाता था कि (उच्चारण के साथ) मैं क्या करूं मुझे समझ में नहीं आ रहा था, मेरा जीवन रुक सा गया था. तो फिर मेरे एक अज़ीज़ दोस्त हैं, उन्होंने बड़ी कमाल की, पते की बात बताई. उन्होंने बताया कि ‘जो तेरा दर्द है, वो तेरे उसके बारे में सोचने से कम नहीं हो रहा, वो डबल हो रहा है. तो तू क्या चाहता है. तू डबल दर्द के साथ जीना चाहता है’. कई बार जो दोस्त होते हैं आपके आस पास, मिरर होते हैं, वो भी बड़ी हेल्प करते हैं. पिछले कुछ 7-8 साल से मेरा ये है कि स्पॉन्डलाइटिस को उसी की तरह ट्रीट करना चाहिए. फीजियोथैरेपी चलती है, स्विमिंग चलती है. बीच बीच में दर्द होता है तो एक आध दिन रेस्ट कर लिया. वो अब मुझे पसंद ही नहीं है कि कोई मुझे उसके बारे में सलाह दे. मैं खाली जब अपने डायरेक्टर्स से मिलता हूं पहली बार, तो उनको जरूर बताता हूं कि भई मेरे है न ये ये चीजें हैं, प्रॉब्लम हैं, ये कहीं आपके लिए प्रॉब्लम न बनें. जैसे अमित (डायरेक्टर अमित रविंदरनाथ शर्मा, बधाई हो) को मैंने बताया कि मैं डांस नहीं कर पाऊंगा. तेज भाग नहीं पाऊंगा. तो उसने उस चीज को स्वीकार किया, बोला, नहीं गजराज जी हम इसका कुछ कर लेंगे. मेरे डिस्कम्फर्ट की वजह से किसी का नुकसान नहीं होना चाहिए.

Q18. न्यूज़ में पढ़ते हैं, कहीं हिला देने वाली घटनाएं होती हैं, आपने जैसे कहा हर जगह ऑब्जर्व करते हैं तो इन्हें लेकर पहला रिएक्शन क्या होता है? खुद को डूबने देते हैं उस इमोशन में या आगे बढ़ जाते हैं जल्दी से?
मैं बहुत इमोशनल हो जाता हूं. ऐसी किसी भी तरह की घटना, दुर्घटना से मुझे बड़ी पीड़ा होती है. तो कोशिश करता हूं उससे जितनी जल्दी उबर सकूं, लेकिन हो जाता है.

Q19. आपको याद हो कि ज़ू में शेर के बाड़े में एक आदमी गिर गया था सफेद बाघ के सामने और वीडियो वायरल हो गया था, आप देखते हैं कि कुछ क्षणों की दूरी पर दो जीव हैं और एक-दूसरे को मारने वाला है. आप इमैजिन करें कि अगर उस जगह पर आप हैं जहां वो है तो आप धम्म से डूब जाते हो, वो इमोशन पकड़ लेता है आपको. या दूसरी घटनाएं हैं, जैसे वैचारिक तौर पर कुछ हो रहा है जो बहुत गलत है और सभ्यता को बहुत गलत दिशा में ले जा रहा है. आप बेबस हो जाते हैं और मन भी उचट जाता है. इस मनस्थिति में क्या करते हैं?
अभी क्या होता है कि मुझे घबराहट (anxiety) बहुत ज्यादा हो जाती है. तो मैं उससे फिर दूर चला जाता हूं. मेरा बस नहीं है उस (घटना/परिस्थिति) पर. कोई नियंत्रण नहीं है. कुछ साल पहले बहुत होता था जब मैं थियेटर करता था कि मैं अपने को रिलेट करता था उससे, अब शायद उम्र का तकाजा है. 40 प्लस होने के बाद आपको चीजें और दुनिया अलग तरह से नजर आती हैं. आपको लगता है कि ये सिर्फ हमारे देश में या हमारे समाज में नहीं है इस तरह की त्रुटियां. पूरी दुनिया में है. अलग अलग इरा में है.

Q20. आपकी एम्बीशन क्या है बतौर एक्टर, लाइफ में? कि मरने से पहले मुझे ये करना है.
मुझे कुछ दस-बारह डायरेक्टर्स के साथ काम करना है. मीरा नायर के साथ काम करना है, मुझे गुरिंदर चड्ढा के साथ काम करना है, मनोज नाइट श्यामलन के साथ काम करना है, शेखर कपूर के साथ दोबारा काम करना है, शुजीत सरकार की फिल्म में बड़ा रोल करना है, इम्तियाज अली के साथ काम करना है. बहुत सारे लोग तो हैं जो मेरे साथ परिचित हैं थियेटर के टाइम से. मुझे समझ नहीं आता कि मैं इनको क्या कन्वे करूं कि यार मुझे काम दो, मुझे रोल दो. इसके अलावा मैं एक स्क्रिप्ट पर काम कर रहा हूं. मैं चाहता हूं मैं निर्देशन करूं एक फिल्म का. इतने सारे विज्ञापनों का मेरे पास अनुभव है. और मुझे लगता है कि मैं एक अच्छी फिल्म बनाऊंगा जब भी बनाऊंगा.

Q21. क्योंकि विज्ञापन में ह्यूमन स्टोरीज सेंट्रल होती हैं हमेशा, तो वो कहने में आपको अनुभव है. जैसे शुजीत हैं या नितेश हैं या प्रदीप सरकार हैं, ये एड वर्ल्ड से ही आए हैं इसलिए शायद आपको बतौर डायरेक्टर पहली फिल्म को लेकर चिंता नहीं होगी?
थोड़ा सा संकोच ये होता है कि इसमें खर्चा बहुत ज्यादा है. कोई भरोसा करके आप पर पैसा लगाएगा फिल्म के अंदर तो.. क्योंकि मेरे पास ऑफर आते रहते हैं, पिछले कुछ बरसों से, अलग अलग टाइम पर कि मैं जब चाहूं फिल्म शुरू कर सकता हूं. लेकिन मुझे कहानी की सोच है. जैसे कहानी पर कभी काम शुरू किया तो दिख गया कि यार ये तो साउथ की इस फिल्म जैसी है या ऐसी तो किसी ने बना ली है. कॉन्टेंट भी कम हो गया है. राइटर्स कम हो गए हैं. फिलहाल एक स्क्रिप्ट पर काम कर रहा हूं तो होपफुली वो शायद अलग सी होगी क्योंकि मेरा ये है कि एक बार स्क्रिप्ट कंट्रोल में आ गई न, जहां पर मुझे लग गया कि स्क्रिप्ट में मजा है, तो मैं दो-ढाई महीने एंजॉय करूंगा शूटिंग के और उस सफर पर निकल पड़ूंगा. मेरा खाली एक ही रोड़ा है कि वो एक बार हो जाए. मैं होमवर्क के बिना नहीं जाना चाहता.

Q22. शुरुआती जानकारी कब देंगे फिल्म की?
चार-छह महीने में.

Q23. कास्टिंग वगैरह कुछ नहीं किया अभी..?
मेरे बहुत सारे परिचित हैं जो कि अच्छे एक्टर्स हैं, जिनको अगर ढंग की स्क्रिप्ट सुनाऊं तो मेरे साथ काम करने के लिए राजी होंगे. प्रोड्यूसर्स हैं, स्टूडियोज़ हैं जो मुझे सहारा देना चाहते हैं तो अब खाली स्क्रिप्ट पर अटकी हुई है बात. जैसे ही हो जाएगी तो हम बात आगे बढ़ाएंगे.

Q24. जॉनर क्या होगा?
जो सब्जेक्ट अभी मैं कर रहा हूं वो ब्लैक कॉमेडी है. वो नजदीक है थोड़ा मेरी सोच के. मुझे ह्यूमर अच्छा लगता है. सारकेज़्म अच्छा लगता है.

Q25. महीने में कितनी फिल्में और वेब सीरीज देखते हैं?
समझ लीजिए कि महीने में कुछ दस-बारह एपिसोड देख लेता हूं और एक-दो फिल्में देख लेता हूं. इतना समय निकाल पाता हूं.

Q26. किसी प्रमुख वेब सीरीज में एक्टिंग का ऑफर आया है?
मुझे ‘सेक्रेड गेम्स’ (सीजन वन) में किसी रोल के लिए अप्रोच किया गया था लेकिन उस वक्त मैं ‘बधाई हो’ में बिजी था तो नहीं कर पाया.

Q27. पसंदीदा वेब सीरीज कौन सी है आपकी?
अगर हिंदुस्तानी दायरे में कहें तो ‘सेक्रेड गेम्स’ बहुत ही अच्छी वेब सीरीज है. उसने मापदंड बहुत ऊंचे कर दिए हैं. विदेशी में बोलें तो एक है, ‘गेम ऑफ थ्रोन्स’ वो मुझे बहुत अच्छी लगती है और ‘हाउस ऑफ कार्ड्स’ बहुत कमाल का है. उसका जो ड्रामा और पूरा जो कास्टिंग था वो बहुत अच्छा था सीजन वन का.

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गजराज राव इंटरव्यू Part-1: वो एक दिन जिसने जिंदगी बदल दी
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गजराज राव इंटरव्यू Part-4: एक्टिंग मास्टरक्लास – अभिनेताओं के लिए सबक
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