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कोझिकोड में जो हुआ, वो हादसा नहीं, हत्या है!

10 साल पहले की बात है. तारीख थी 22 मई, 2010. एयर इंडिया एक्सप्रेस फ्लाइट 812 ने दुबई से उड़ान भरी. सुबह 6 बजकर 5 मिनट पर कर्नाटक के मैंगलोर एयरपोर्ट पर लैंड करना था. फ्लाइट के कैप्टन और फर्स्ट ऑफिसर, दोनों के लिए मैंगलौर एयरपोर्ट अनजाना नहीं था. कैप्टन ग्लूसिका यहां 17वीं बार लैंड कर रहे थे, तो फर्स्ट ऑफिसर अहलूवालिया को 66 बार मैंगलोर में लैंडिंग का अनुभव था. सब क्लियरेंस मिलने के बाद विमान रनवे पर उतरा. लेकिन रनवे खत्म होने के बाद भी विमान रुक नहीं पाया. विमान रनवे को पार कर गया. रनवे 2,450 मीटर का था. प्लेन रनवे के शुरुआती छोर से 1600 मीटर बाद जमीन पर उतरा. अब रुकने के लिए सिर्फ 850 मीटर की दूरी थी. इतनी दूरी में प्लेन नहीं रुक पाया, ओवरशूट कर गया. मतलब रनवे के पार निकल गया. आगे एक खाई थी, उसी में गिर गया. गिरते ही प्लेन ने आग पकड़ ली. प्लेन में छह क्रू और 160 यात्री सवार थे. इनमें से 158 की मौत हो गई. ये 21वीं सदी में भारत का सबसे बड़ा विमान हादसा था.

जांच कमेटी की रिपोर्ट ने क्या कहा?

जैसा कि अमूमन होता है, हादसे की जांच कमेटियां बनीं, ये पता लगाने के लिए कि गलती पायलट की थी या फिर हादसे की वजह कुछ और थी. ऐसे हादसे दोबारा ना हों, इसको लेकर भी नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने सिविल एविएशन सेफ्टी एडवाइजरी काउसिंल यानी CASAC बनाई. इसमें एक एक्सपर्ट्स शामिल थे. इस कमेटी ने जब देशभर के एयरपोर्ट्स का दौरा किया और जांच पड़ताल की, तो ये सामने आया कि जैसे मैंगलौर में हादसा हुआ था, वैसा तो कई और जगह भी हो सकता है. हमेशा इसकी आशंका बनी रहती है.

कमेटी ने कई एयरपोर्ट्स के रनवे खतरनाक बताए और सुधार की सिफारिशें की. कमेटी को रनवे इतने खतरनाक लगे कि जम्मू और पटना एयरपोर्ट पर बोइंग 737 और एयरबस A320 की आवाजाही तुरंत रोकने की सिफारिश की थी. राज्य सरकारों के राजनीतिक दबाव और नागरिक उड्डयन मंत्रालय की लापरवाही के चलते इन सिफारिशों पर ज्यादा अमल नहीं हुआ.

2012 में एक हादसा टला

कमेटी की इसी लिस्ट में एक नाम कोझिकोड एयरपोर्ट का भी था, जहां बिल्कुल मैंगलोर एयरपोर्ट की तरह ही हादसा होने का डर था. सिफारिशों के बाद साल 2012 में कोझिकोड एयरपोर्ट पर एक विमान हादसे से बाल-बाल बचा. लेकिन हादसा नहीं हुआ, तो सरकार गंभीरता से क्यों लेती. और फिर कैलेंडर में तारीख आती है 7 अगस्त, 2020 की. केरल का वही कोझिकोड एयरपोर्ट, जहां 10 साल पहले से हादसे की आशंका जताई जा रही थी. वहां बिल्कुल मैंगलोर एयरपोर्ट वाले हादसे की तरह ही दुबई से एयर एंडिया एक्सप्रेस का विमान लैंड करने आता है.

शाम साढ़े सात बजे का वक्त. अंधेरा हो गया था और तेज बारिश. पायलट ने लाइट्स और इंट्रमेंट लैंडिंग सिस्टम के सहारे विमान को रनवे पर उतारने की कोशिश की. लेकिन प्लेन रनवे को ओवरशूट कर गया. रनवे खत्म होने के बाद भी नहीं रुका. मैंगलोर की तरह ही खाई में जा गिरा. प्लेन के दो टुकड़े हो गए. लेकिन मैंगलोर की तरह यहां एक बात नहीं हुई. प्लेन में आग नहीं लगी. इसलिए 18 लोगों की ही जान गई, नहीं तो हादसा और बड़ा हो सकता था, क्योंकि विमान में 191 लोग सवार थे.

टेबलटॉप रनवे

अब आप पूछ सकते हैं कि मैंगलोर और कोझिकोड एयरपोर्ट के रनवे में ऐसी क्या समानता है कि अब हुए हादसे की भविष्यवाणी 10 साल पहले ही कर दी गई थी. कोझिकोड और मैंगलोर इंटरनेशनल एयरपोर्ट, दोनों के ही टेबलटॉप रनवे हैं. और ये टेबलटॉप रनवे क्या होते हैं – पहाड़ी को काटकर बनाए गए रनवे. कोझिकोड रनवे 2850 मीटर का है. और मंगलोर रनवे की लंबाई कितनी बताई थी मैंने- 2450 मीटर. लैंडिंग के लिहाज से ये रनवे छोटे हैं. इसलिए CASAC कमेटी ने रनवे की लंबाई बढ़ाने और बड़े प्लेन नहीं उतारने की सिफारिश की थी.

CASAC के सदस्य अरुण राव ने उस वक्त अपनी सिफारिश में लिखा था कि कोझिकोड का रनवे बोइंग 747 और 777, इसके अलावा एयरबस A 330 के लिए पर्याप्त लंबा नहीं है, क्योंकि इन विमानों का आकार बड़ा होता है, तो इन्हें लंबा रनवे चाहिए. कमेटी के अगुवाई कर रहे मोहन रंगनाथन ने भी तब ऐसी ही आशंका जताई थी और उसके बाद भी वो हमेशा कोझिकोड एयरपोर्ट की सेफ्टी इश्यू पर सवाल उठाते रहे हैं. अब वो कह रहे हैं कि ये हादसा नहीं, मर्डर है.

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हादसे के बाद एयर इंडिया का विमान. (फोटो- PTI)

और ऐसा नहीं है कि कोझिकोड एयरपोर्ट को लेकर ये चिंताएं 2020 में नहीं जताई जा रही थी. एक निजी कंपनी के पायलट ने फेसबुक पर पोस्ट में कहा है कि उसने सिक्योरिटी कंसर्न एयरपोर्ट प्रशासन के साथ साझा की थी. एयरपोर्ट की रनवे गाइडेंस लाइटिंस सिस्टम बहुत खराब है. ब्रेक्रिंग कंडिशन भी नियमित रूप से मॉनिटर नहीं होती है. हालांकि ये पोस्ट बाद में डिलीट कर दी गई या फिर शायद करवा दी गई. हमारे यहां सरकारों की मुस्तैदी सिर्फ हादसा होने के बाद कमेटियां बनाने में दिखती है. फिर उन कमेटी की सिफारिशों की फाइलें कहीं खो जाती हैं. कोझिकोड और मैंगलोर के अलावा भी देश में कई टेबलटॉप एयरपोर्ट हैं. टेबलटॉप एयरपोर्ट पर रनवे छोटा होने के कारण गलती की कोई गुंजाइश नहीं होती. अगर रनवे के शुरुआती हिस्से में लैंडिंग नहीं करवाई, तो रनवे ओवरशूट होने का खतरा होता है. इसके अलावा बड़े प्लेन लैंड कराना खतरनाक होता है. लेकिन बहुत ही खतरनाक चीजें सरकार के स्तर पर या नियम लागू करने वालों के स्तर पर नजरअंदाज कर दी जाती हैं.

पटना और जम्मू के ख़तरनाक एयरपोर्ट

और अगर टेबलटॉप एयरपोर्ट के अलावा भी देखें, तो देश में पटना और जम्मू के एयरपोर्ट हैं, जो बहुत खतरनाक माने जाते हैं. CASAC कमेटी ने पटना के लोकनायक जयप्रकाश नारायण एयरपोर्ट पर सबसे ज्यादा चिंताएं जताई थी. नवंबर 2010 में इंटरनेशनल सिविल एविएशन ऑर्गनाइजेशन ने कहा था कि पटना एयरपोर्ट पर रनवे की लंबाई 1954 मीटर है जरूर, लेकिन काम में लेने लायक सिर्फ 1556 मीटर ही है. क्योंकि रनवे के छोर पर कई इमारतें और पेड़ हैं, जिनके चलते प्लेन नीचे आ ही नहीं पाता. तो उसे हवाईअड्डे की हद में आने के बाद एकदम से नीचे आना होता है.

एयरबस A 320-200 को लैंड कराने के लिए कम से कम 2480 मीटर का रनवे चाहिए होता है, जो कि पटना में नहीं है. सेफ्टी कंसर्न की वजह से पटना में डीजीसीए ने बोइंग और एयरबस फ्लाइट्स पर रोक लगा दी थी. लेकिन फिर सीएम नीतीश कुमार ने उस वक्त के नागरिक उड्डयन मंत्री अजित सिंह को चिट्ठी लिख दी. रोक हट गई और फ्लाइट्स फिर चालू. अब पटना में नया टर्मिनल बन रहा है, लेकिन रनवे में खास सुधार नहीं किया जा रहा है. पायलट्स कहते हैं कि गलती की गुंजाइश बिलकुल नहीं है. नज़र हटी, दुर्घटना घटी वाला किस्सा है. जम्मू एयरपोर्ट का भी यही हाल है.

कोझिकोड में इतने बड़े हादसे के बाद जरूरत है कि देश के सभी एयरपोर्ट का सेफ्टी रिव्यू करने की. ताकि अब आगे हमें किसी हादसे का इंतजार ना करना पड़े. और इसकी आड़ में आने वाली राजनीति का मुंह बंद कराना और ज़रूरी है. चाहे वो पिनरई विजयन की सरकार हो, नीतीश कुमार की सरकार हो या फिर मनोज सिन्हा के अंतर्गत आने वाला जम्मू-कश्मीर प्रशासन.


प्लेन हादसे में जान गंवाने वाले पायलटों की ये बातें भावुक करने वाली हैं

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