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बाराबंकी में विवादित स्थल गिराने का पूरा मामला, जिसने UP में बवंडर मचा रखा है

‘जनवरी, 2011 के बाद सार्वजनिक मार्गों पर बने सभी धार्मिक ढांचों को हटाया जाएगा और संबंधित जिला मैजिस्ट्रेट की ओर से दो महीने के भीतर राज्य सरकार को रिपोर्ट सौंपनी होगी. जो धार्मिक ढांचे इससे पहले बनाए गए हैं, उनको किसी निजी भूखंड पर स्थानांतरित किया जाएगा या फिर छह महीने के भीतर हटाया जाएगा.’

ये एक आदेश है. जिसे इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच के जस्टिस सुधीर अग्रवाल और जस्टिस राकेश श्रीवास्तव ने जारी किया. तारीख थी 3 जून 2016. आदेश लखनऊ के मोहल्ला डौडा खेड़ा में सरकारी जमीन पर मंदिर बनाकर कथित तौर पर अतिक्रमण किए जाने के खिलाफ 19 स्थानीय लोगों की दायर याचिका पर आया था.

#कट टू 25 फरवरी 2021.

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने अपने इसी पुराने आदेश पर योगी आदित्यनाथ सरकार से जवाब मांगा. कि इस आदेश पर क्या कार्रवाई हुई. कोर्ट ने जवाब के लिए सरकार को 17 मार्च तक का समय दिया.

Lucknow High Court
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने दिया था अवैध धार्मिक स्थलों पर कार्रवाई के आदेश.

अब बारी थी योगी सरकार की. इसने 11 मार्च को एक आदेश जारी किया. सभी मंडलायुक्तों और जिलाधिकारियों को निर्देश दिया कि धार्मिक स्थलों के नाम पर किए गए अतिक्रमण हटाए जाएं. 14 मार्च तक जवाब देकर बताएं कि कितनों पर कार्रवाई हुई.

ये आदेश था कि जिलों में प्रशासन एक्टिव हो गया. लखनऊ से 67 किलोमीटर आगे बाराबंकी की रामसनेहीघाट तहसील पड़ती है. यहां भी एक विवादित स्थल पर कार्रवाई शुरू हुई. इस विवादित स्थल को बाराबंकी में कुछ लोग ‘ग़रीब नवाज़ मस्जिद’ या ‘तहसील वाली मस्जिद’ बोलते हैं.

17 मई को खबर आई कि इस विवादित स्थल को जिला प्रशासन ने अपनी निगरानी में गिरा दिया है. पर कहानी ना यहां शुरू होती है ना खत्म. कहानी की कई परतें इन दो तारीखों 11 मार्च और 17 मई के बीच में छिपी हैं. जो हम इस रिपोर्ट में आपको बताने की कोशिश करेंगे.

पहली जरूरी तारीख

11 मार्च के बाद आती है पहली जरूरी तारीख 15 मार्च. इस दिन रामसनेहीघाट के तहसीलदार दया शंकर त्रिपाठी ने जॉइंट मैजिस्ट्रेट दिव्यांशु पटेल के निर्देश पर नोटिस जारी कर विवादित स्थल में रह रहे जिम्मेदार लोगों से जवाब मांगा. विवादित स्थल के कागज मांगे. कि आखिर कैसे ये स्थल तहसील की जमीन पर बना है. जवाब देने के लिए तीन दिन का वक्त दिया गया.

16 मार्च को पुलिस मौके पर जांच पड़ताल के लिए पहुंची. पुलिस ने यहां रह रहे लोगों से उनकी आईडी मांगी जो वो दे ना पाए. अगले दिन ये लोग भाग निकले. जॉइंट मैजिस्ट्रेट ने इसकी जानकारी मिलने पर उन लोगों को ढूंढने और मुकदमा दर्ज करने के आदेश दिए. इसके साथ ही विवादित स्थल को सील कर दिया.

प्रशासन अब इस कार्रवाई के साथ ही अपने नोटिस के जवाब का इंतजार कर रहा था. जवाब तो नहीं आया. एक आदेश जरूर आया. इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच से. जहां विवादित स्थल का मसला लेकर दूसरा पक्ष पहुंच गया था. कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया कि विवादित स्थल को लेकर दिया गया नोटिस हाईकोर्ट के 2016 के आदेश की अवहेलना है. बताया गया कि ये आदेश 1 जनवरी 2011 के बाद बने स्थलों के लिए था. जबकि उनका स्थल पुराना है. और इस नोटिस का मकसद उनके स्थल को गिराना है.

इस पर कोर्ट के सामने सरकारी पक्ष रखते हुए बताया गया कि 18 मार्च को रामसनेहीघाट एसडीएम की तरफ से मोहम्मद नसीम (जोकि इस मामले में वादी हैं) को नोटिस भेजा गया था. जिसमें इस विवादित स्थल के मालिकाना हक के कागजात मांगे गए थे नाकि उसका मकसद इसको गिराने की चेतावनी देना था.

कोर्ट को ये भी बताया गया कि ये नोटिस रेवेन्यू इंस्पेक्टर से ये जानकारी मिलने के बाद भेजा गया कि उक्त स्थल सरकारी जमीन पर बना है.
सरकारी पक्ष की तरफ से ये भी सवाल उठाया गया कि जिन कागजातों के लिए नोटिस भेजा गया, उन कागजों का जिक्र मस्जिद की वक्फ कमेटी की तरफ से इस याचिका में भी नहीं किया गया.

तो हाईकोर्ट ने क्या कहा?

आसान भाषा में कहें तो हाई कोर्ट ने ये माना कि नोटिस सिर्फ विवादित स्थल के कागज मांगने, इसका मालिकाना हक साबित करने के लिए मांगे गए. नाकि इसे गिराने के लिए. कोर्ट ने इसके बाद अपने आदेश में विवादित स्थल के पक्षकारों को थोड़ी राहत देते हुए 3 दिन की बजाए अपने कागज सौंपने के लिए 15 दिन का वक्त दे दिया. साथ ही जिला प्रशासन से इन पक्षकारों को राजस्व के जो कागज चाहिए हों, वो उपलब्ध कराने को कहा. और फिर इनके जवाब के आधार पर कार्रवाई करने का आदेश दिया.

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हाई कोर्ट के आदेश में विवादित स्थल के पक्षकारों को 15 दिन का समय दिया गया कागज दिखाने के लिए.

तो हाई कोर्ट से निकलकर अब पक्षकारों को अपने कागज सौंपने थे. ये साबित करना था कि विवादित स्थल सरकारी जमीन पर नहीं बना बल्कि उनका है.

अगले ही दिन 19 मार्च को एक और घटना हुई. शुक्रवार शाम को यहां विवादित स्थल पर भारी भीड़ जुटी और तहसील परिसर पर पथराव कर दिया. घटना को कंट्रोल करने के लिए डीएम और एसपी मौके पर पहुंचे. भारी पुलिस बल के साथ. पीएसी भी बुलाई गई. पथराव कर रहे लोगों को रबड़ की गोलियां और आंसू गैस के गोले मारकर भगाया गया. घटना में कुछ पुलिस कर्मी घायल भी हुए. घटना पर कार्रवाई करते हुए रामसनेहीघाट कोतवाली पुलिस ने 150 लोगों पर मुकदमा दर्ज कर 39 लोगों को जेल भेजा. मुख्य आरोपी सोनू बीडीसी पर रासुका की कार्रवाई की गई, जिसे कोर्ट ने भी मंजूरी दे दी है.

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स्थानीय अखबार में 19 मार्च की हिंसा की खबरें छपीं.

कागज सौंपने की तारीख

अब तारीख आई 31 मार्च. ये आखिरी दिन था विवादित स्थल के पक्षकारों को अपने कागज सौंपने का. मगर प्रशासन के पास एक भी कागज नहीं पहुंचा. तो क्या कागज नहीं पहुंचे. जी नहीं. पहुंचे. एक अप्रैल को. मालिकाना हक साबित करने के लिए विवादित स्थल का बिजली कनेक्शन के कागज और वक्फ में इस स्थल के रजिस्ट्रेशन के कागज सौंपे गए.

तो अब बारी थी कागजों की जांच की. पहले बिजली के बिल की बात करते हैं. इसकी जांच बिजली विभाग को सौंपी गई. जांच में पाया गया कि उक्त स्थल से बिजली का मीटर ही गायब है और मीटर बायपास कर माने बिजली चोरी की जा रही थी. इस पर बिजली विभाग ने विवादित स्थल के जिम्मेदारों पर मुकदमा दर्ज करवा दिया. ये भी बताया गया कि बिजली के बिल का संबंध विवादित परिसर के मालिकाना हक से नहीं है. इसे कोर्ट में आधार नहीं बनाया जा सकता.

वक्फ के कागज पर आते हैं अब. इसकी जांच सौंपी गई जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी (सहायक सर्वे आयुक्ट वक्फ) को. इस जांच में पाया गया कि उप्र सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड में इस स्थल का रजिस्ट्रेशन मात्र वक्फ बोर्ड के निरीक्षक की रिपोर्ट के आधार पर कर लिया गया. विवादित स्थल के रजिस्ट्रेशन के लिए राजस्व विभाग या जिला प्रशासन से कोई रिपोर्ट नहीं मांगी गई.

इस तरह से 1 अप्रैल को आए प्रत्यावेदन का निस्तारण जॉइंट मजिस्ट्रेट ने 2 अप्रैल को कर दिया. मामले में बाराबंकी डीएम ने भी वक़्फ़ बोर्ड में गलत तरीके से 5 जनवरी 2019 को विवादित स्थल का रजिस्ट्रेशन करवाने के लिए इसकी कमेटी पर मुकदमा दर्ज करवाया. इसमें कमेटी में शामिल सातों लोगों के नाम हैं. डीएम ने सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को भी पत्र लिख इस विवादित स्थल को अपने रिकॉर्ड से डिलीट करने की सिफारिश की है.

Fir 1

Fir 2
डीएम बाराबंकी ने वक्फ में गलत तरह से रजिस्ट्रेशन के मामले में विवादित स्थल की वक्फ कमिटी पर एफआईआर करवाई है.

यही नहीं 21 मई को उत्तर प्रदेश सरकार ने भी विवादित स्थल का नाम गलत तरीके से रजिस्टर करने के मामले में उप्र सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को पत्र लिखा है. इसमें रिकॉर्ड में नाम गलत तरीके से चढ़ाने के लिए जिम्मेदार व्यक्ति पर कार्रवाई करने के लिए कहा गया है. साथ ही कार्रवाई की रिपोर्ट मांगी गई है. सरकार ने मामले की जांच के लिए एक कमिटी का भी गठन कर दिया है.

Gov Waqf
योगी सरकार की तरफ से वक्फ को नोटिस भेजा गया है.
Waqf Janch Yogi Gov
योगी सरकार ने वक्फ में रजिस्ट्रेशन में गड़बड़ी के मामले में जांच कमिटी भी बना दी है.

राजस्व रिकॉर्ड्स में विवादित स्थल की भूमि खेल का मैदान

इनके अलावा जॉइंट मैजिस्ट्रेट ने विवादित स्थल वाली जमीन की सरकारी कागजों में भी जांच करवाई. इसमें इसे रामसनेहीघाट तहसील का हिस्सा बताया गया. विवादित स्थल वाली जमीन राजस्व विभाग के रिकॉर्ड में खेल के मैदान के रूप में दर्ज है. विवादित स्थल की तरफ से मुश्ताक अली ने कागज के रूप में पुरानी गाटा संख्या 558 का जिक्र किया है. जिसका नया नंबर 778 क व 778 ख के रूप में दर्ज है. 778क माने खेल का मैदान और 778ख माने ग्रामीण बालिका विद्यालय. जानकारों ने बताया कि खेल के मैदान का चिह्न और मस्जिद का चिह्न मिलता जुलता है. तो उसे लेकर इस पर दावा किया गया जोकि सही नहीं है.

अब जॉइंट मैजिस्ट्रेट दिव्यांशु पटेल ने 19 मार्च की हिंसा के बाद कोतवाली रामसनेहीघाट द्वारा शांति भंग की प्रबल आशंका की रिपोर्ट के आधार पर इस प्रकरण में सीआरपीसी 133 के अंतर्गत सुनवाई शुरू की. फिर 12 अप्रैल को फैसला सुनाया, जिसमें इस स्थल को तहसील की जमीन पर अवैध कब्जा ठहराया गया. साथ ही विवादित स्थल के पक्षकारों को 35 दिनों का वक्त दिया. इस फैसले को चैलेंज करने के लिए. ऊपरी अदालतों में. नियम के मुताबिक आप एक महीने के अंदर ऊपरी अदालत में अपील कर सकते हैं. मगर ऐसा नहीं किया गया.
प्रशासन ने इसे देखते हुए 17 मई को इस विवादित स्थल को गिरवाकर इसे अपने कब्जे में ले लिया.

विवादित स्थल के गिरते ही विवाद बढ़ गया. यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादव से लेकर असदउद्दीन ओवैसी ने इसको गिराने को लेकर योगी आदित्यनाथ सरकार को निशाने पर लिया. और ये बयानबाजी अब तक जारी है. सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की तरफ से.

वक्फ बोर्ड ने माना- गलती से दो बार हुआ रजिस्ट्रेशन

हमने पूरे मसले पर उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड के अध्यक्ष ज़फ़र अहमद फ़ारूक़ी से बात की. वो इस कार्रवाई को जल्दी में लिया गया फैसला बताते हैं. विवादित स्थल को गिराना सीधे तौर पर हाई कोर्ट के आदेश की अवहेलना बताते हैं और इसे जल्द ही हाई कोर्ट में चुनौती देने की बात कहते हैं.

हमने उनसे कुछ सवाल पूछे. उनके जवाब भी आपको बता देते हैं. हमने पूछा कि आपने बाराबंकी प्रशासन के सवाल के जवाब में इसे 2019 में रजिस्टर्ड बताया. अब आप इसको 1968 का रजिस्टर्ड बता रहे हैं. ऐसा क्यों?

तो वो कहते हैं – मस्जिद वक़्फ़ बोर्ड में 1968 की रजिस्टर्ड है. 2019 में गलती से ये री-रजिस्टर हो गई. प्रशासन ने हमसे 2019 वाले कागज की जानकारी मांगी तो वो हमने सौंप दी. गलती ये हुई कि 2019 वाले रजिस्ट्रेशन में इसका नाम चेंज हो गया. पहले ये तहसील वाली मस्जिद थी. 2019 में इसका नाम मस्जिद गरीब नवाज कर दिया गया. वो चेक करने में गलती हुई है. जो लोग नया रजिस्ट्रेशन करवाने आए थे, उनको भी पुराने रजिस्ट्रेशन की जानकारी नहीं थी.

हमने उनसे ये भी पूछा कि ये गलती हुई, एक ही जगह का दो बार रजिस्ट्रेशन हो गया. तो आखिर वक़्फ़ बोर्ड में कोई प्रॉपर्टी कैसे रजिस्टर होती है? तो उन्होंने बताया- रजिस्ट्रेशन के लिए अगर कोई प्रॉपर्टी है तो उसकी रजिस्टर्ड डीड देखते हैं. कोई कब्रिस्तान है तो पता करते हैं कि ये राजस्व के रिकॉर्ड में है कि नहीं. मस्जिदों की जनरली राजस्व के रिकॉर्ड्स में एंट्री नहीं होती है तो मौके पर भेजके उसका फिजिकल वैरिफिकेशन करवाते हैं. चेक करवाते हैं कि मस्जिद चल रही है या नहीं. कितनी पुरानी है. और इसी तरह बाय यूसेज उसे सही मानकर रजिस्ट्रेशन कर लिया जाता है.

जफर आगे कहते हैं कि इस मामले में कागजों से ज्यादा जरूरी फैक्ट ये है कि वहां मस्जिद थी या नहीं. जिसको प्रशासन कह रहा है कि नहीं थी. मस्जिद का 1959 का बिजली का कनेक्शन है. खुद बिजली विभाग इस बात को मानता है.

हमने उनसे कहा प्रशासन तो कह रहा है कि चकबंदी या कागजों में मस्जिद नहीं है. तो जफर का कहना था कि 50 पर्सेंट से ज्यादा मस्जिदें राजस्व अभिलेखों में चढ़ी नहीं होती हैं.

हमने पूछा कि फिर ये कैसे इस्टैब्लिश होगा कि ये मस्जिद थी या नहीं. तो उनका जवाब था कि ये लोकल एविडेंस के आधार पर होगा. हमारे पास जो कागज हैं, उनके आधार पर होगा. लोग झूठ थोड़ी ना बोल रहे होंगे. वो फिर बिजली का बिल, 1968 के वक्फ रजिस्ट्रेशन का जिक्र करते हैं. हालांकि प्रशासन का कहना है कि बिजली का कनेक्शन किसी आदमी के नाम पर है नाकि मस्जिद के नाम पर.

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विवादित स्थल की पहले की तस्वीर.

हमने जब उनसे पूछा कि मस्जिद तो वक्फ यानी दान की जमीन पर बनती है तो इसके कागजात होंगे आपके पास क्योंकि राजस्व के रिकॉर्ड में तो ये खेल का मैदान है. तो उनका कहना था कि ये जमीन पहले तो जमींदारों की थी. सरकार के पास तो बाद में आई. मस्जिद इससे पहले की है. तो अब ये मामला कोर्ट में ही प्रूव किया जाएगा.

जफर ये भी कहते हैं कि प्रशासन या तो मानें कि ये मस्जिद थी या नहीं. अगर नहीं थी तो प्रशासन ने हाईकोर्ट का वो ऑर्डर क्यों कोट किया है जिसमें धार्मिक स्थलों पर आदेश दिया गया है. हमने उनसे पूछा कि जब जॉइंट मैजिस्ट्रेट ने 12 अप्रैल को आदेश दे दिया कि ये अवैध निर्माण है तो दूसरा पक्ष ऊपरी अदालत क्यों नहीं गया. तो उनका आरोप था कि इस आदेश की जानकारी उन लोगों को दी ही नहीं गई. उनको जानकारी तब मिली जब विवादित स्थल गिरा दिया गया. उनका ये भी कहना है कि प्रदेश में लॉकडाउन लगा हुआ था. हाईकोर्ट ने भी कह रखा था कि डिमोलिशन के मामलों पर तेजी ना दिखाएं. तो क्या जल्दी थी इसे गिराने की.

बाराबंकी प्रशासन का क्या कहना है?

डीएम बाराबंकी आदर्श सिंह से हमने बात की. हमने उनसे सबसे पहले वक्फ रजिस्ट्रेशन पर ही जानकारी मांगी. कि क्या वक़्फ़ में किसी स्थल को रजिस्टर करते वक्त डीएम या प्रशासन से रिपोर्ट मांगना जरूरी होता है.

जवाब में वे कहते हैं मामले में जिला अल्पसंख्यक अधिकारी जोकि सहायक सर्वे आयुक्त वक्फ भी होते हैं. उनसे हमने जांच करवाई थी, जिसमें गड़बड़ियां मिली थीं. फिर जिलाधिकारी अपर सर्वे आयुक्त वक्फ पदेन होता है. तो ऐसी सभी मामलों में अपर सर्वे आयुक्त वक्फ और सहायक सर्वे आयुक्त से रिपोर्ट मांगी जाती है. मगर इस मामले में रिपोर्ट नहीं मांगी गई.

उनका कहना था कि ये जो निर्माण था वो सरकारी संपत्ति पर था, बल्कि तहसील परिसर के अंदर था. तो ऐसे में अवैध निर्माण के लिए अगर कोई रजिस्ट्रेशन करवाने पहुंचा तो डीएम या एसडीएम या जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी से रिपोर्ट क्यों नहीं मांगी गई.

वे कहते हैं नॉर्मली प्राइवेट प्रॉपर्टी के रजिस्ट्रेशन तक में हमसे रिपोर्ट मांगी जाती है. मगर यहां ऐसा नहीं किया गया. डीएम खुद पदेन अपर सर्वे आयुक्त होता है. हमें ही सर्वे करना होता है. तो 2019 में इसको रजिस्टर करते वक्त हमसे क्यों नहीं जानकारी मांगी गई.

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विवादित स्थल को गिराने के बाद की तस्वीर.

डीएम मामले की वक्फ को जानकारी नहीं देने की बात पर कहते हैं कि हमने 5 अप्रैल को ही पत्र भेज दिया था कि इस मामले में हाईकोर्ट ऑर्डर के आधार पर एसडीएम रामसनेहीघाट के द्वारा प्रत्यावेदन निस्तारित किया गया है. और इसमें वक्फ के रजिस्ट्रेशन में गड़बड़ियां पाई गईं हैं. ये उनके संज्ञान में डाल दिया गया था. मगर वहां से कोई जवाब नहीं आया.

डीएम वक्फ की धारा 36 का भी जिक्र करते हैं जिसमें किसी भी रजिस्ट्रेशन से पहले समस्त संबंधित तथ्यों की जांच एवं संबंधित पक्षकारों की सुनवाई का प्रावधान है. डीएम कहते हैं कि जब हर मामले में ये रिपोर्ट ली जाती है, तो इसमें जब ये भवन तहसील परिसर के अंदर सरकारी संपत्ति पर था तो इसकी जानकारी क्यों नहीं ली गई?

डीएम ये भी कहते हैं कि वक़्फ़ रजिस्ट्रेशन के वक्त बाकायदा रजिस्ट्रेशन नंबर के साथ गाटा नंबर होता है. खतौनी का जिक्र होता है. रकबे का जिक्र होता है. इसमें किसी चीज का जिक्र नहीं था.

ये मस्जिद थी या नहीं, इस पर वे कहते हैं कि मस्जिद का एक स्वरूप होता है. उसमें गुंबद आदि होता है. ये एक आवासीय परिसर सा था, जिसमें कुछ लोग अवैध रूप से धार्मिक गतिविधियां संचालित करते थे. यहीं रहते भी थे. तो ये साफ तौर पर सरकारी संपत्ति पर अवैध निर्माण था. जिस पर नियमों के तहत कार्रवाई की गई.

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