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योगी आदित्यनाथ का सबसे क्रांतिकारी फैसला, इस पर पूरे देश में अमल होना चाहिए

एक भारतीय नेता. जापान के सरकारी दौरे पर गए. एक दिन सोकर उठे. अखबार पढ़ा. लिखा था, एक बड़े नेता जो बड़े पद पर रहे, उनका निधन हो गया. अपने यहां के नेता जी ये खबर पढ़ सुस्त हो गए. समझ गए कि अब शोक सभा होगी. झंडा झुकेगा और आज कोई सरकारी काम नहीं होगी.

मगर तय समय पर जापान के प्रोटोकॉल अधिकारी उन्हें लेने पहुंच गए. नेता जी चौंके. ये क्या. अधिकारी से पूछा. उन्होंने जो जवाब दिया. वो गौर से पढ़िए. जो मरे वह नेता थे. मजदूरों के. जिंदगी भर जमकर मेहनत करने की वकालत करते रहे. उनकी मौत पर सच्ची श्रद्धांजलि क्या होगी. ये कि आज सभी वर्कर एक घंटा एक्स्ट्रा काम करें.

आइए वापस भारत लौटते हैं. हमारे यहां महापुरुषों के नाम पर छुट्टी करने का चलन है. छुट्टी करो और महापुरुष के नाम पर कुछ सरकारी आयोजन कर फारिग हो जाओ. और छुट्टी किसके नाम पर होगी, ये कैसे तय होगा. वोट से. हम मूर्ख हैं. इसलिए हमने महापुरुषों को जातियों के हिसाब से बांट दिया है. और फिर जिस जाति का जिसे वोट चाहिए, उसे खुश करने के लिए उनके नाम पर छुट्टी कर दी.

जाति. जिसकी सबसे बड़ी खदबदाती लैब रही है यूपी. और इसीलिए यूपी में पिछले 15-20 सालों में अलग अलग जातियों, संप्रदायों को खुश करने के लिए सरकार छुट्टियों का ऐलान करती रही. नतीजतन छुट्टियां हो गईं 42. अब योगी आदित्यनाथ की सरकार ने इनमें से 15 छुट्टी हटा दी हैं. कहा है कि छुट्टी मत करिए, स्कूलों में गोष्ठियां करिए ताकि बच्चों को इनके आदर्श पता चलें. हमने सोचा स्कूल बाद में करेंगे, हम पहले ही आपको बता देते हैं. दो चीजें. ये महापुरुष किस कथित जातीय गणित के तहत छुट्टी लिस्ट में लाए गए थे. और उनका हमारे जीवन में योगदान क्या है.

1. कर्पूरी ठाकुर – 24 जनवरी

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देश के सबसे बड़े गैरकांग्रेसी ओबीसी नेताओं में से एक. चौधरी चरण सिंह की लीग के व्यक्ति. नाई समुदाय से ताल्लुक रखने वाले. विनम्र रहे और हमेशा संघर्ष की राजनीति की. लालू-नीतीश और बिहार की जमीन से आने वाले सभी मौजूदा नेता, जो कभी समाजवादी ब्लॉक में रहे, उनके संपर्क में रहे. आज भी सब खुद को उनका वारिस बताते हैं. कर्पूरी ठाकुर. जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया. अध्यापन किया और फिर राजनीति में आए. दो बार बिहार के मुख्यमंत्री रहे. दिसम्बर 1970 से जून 1971 के बीच पहली बार और 1977 से 1979 के बीच दूसरी बार.

2. महर्षि कश्यप और महाराज गुह – 5 अप्रैल

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वैदिक और रामायण काल के किरदार. मिथकीय. कश्यप वेदों में वर्णित सप्त ऋषियों में से एक. पहला जिक्र ॠग्वेद में एक कवि के रूप में. हिन्दुओं का एक प्रचलित गोत्र भी है कश्यप. निषाद राज गुह रामायण काल के किरदार. जब राम को वनवास हुआ तो श्रृंगवेरपुर के आदिवासियों के यही राजा थे. जब राम को खोजते हुए ननिहाल से लौटे भरत आए, तो निषाद राज को लगा कि भरत राम को परेशान करने आए हैं. और वह ढाल बनकर खड़े हो गए. राम के दो शुरुआती मित्रों में एक. यूपी में निषाद वोट गंगा, यमुना और बेतवी की पट्टी पर निर्णायक हैं. कानपुर देहात से उनकी बसावट शुरू होती है और हमीरपुर, इलाहाबाद होते हुए मिर्जापुर तक कायम रहती है. उनके बीच निषादराज की खूब प्रतिष्ठा है.

3.चेटिचंड- 29 मार्च

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सिंधियों का पर्व. इनकी संख्या कम ही सही, पर राजनीतिक फायदा तो पहुंचायेगी ही. इसीलिए शायद नरेंद्र मोदी ने भी प्रधानमंत्री बनने के साथ ही 2014 में सिंधियों की तारीफ में कसीदे पढ़े थे. वैसे तो सिंधियों की सबसे ज़्यादा संख्या महाराष्ट्र में है, फिर उससे लगे हुए राज्य राजस्थान और गुजरात में भी ये ठीक-ठाक संख्या में हैं लेकिन उत्तर प्रदेश में तो काफी कम है. लेकिन भारत में सिंधिंयों की कुल संख्या लगभग 35 लाख है. खैर हम आपको बता दें कि ये पर्व मनाया क्यों जाता है. दरअसल ये पर्व सिंधियों के देवता झूलेलाल के जन्मोत्सव के दिन मनाया जाता है. इस त्योहार से जुड़ी हुई वैसे तो कई किंवदंतियां हैं. लेकिन खास बात ये है कि सिंधी समुदाय व्यापारिक वर्ग रहा है, सो ये व्यापार के लिए जब जलमार्ग से गुजरते थे तो कई विपदाओं का सामना करना पड़ता था. जैसे समुद्री तूफान, जीव-जंतु, चट्टानें व समुद्री दस्यु गिरोह जो लूटपाट मचा कर व्यापारियों का सारा माल लूट लेते थे. इसलिए इनकी यात्रा के लिए जाते समय ही महिलाएं वरुण देवता की स्तुति करती थीं और तरह-तरह की मन्नतें मांगती थीं. चूंकि भगवान झूलेलाल जल के देवता माने जाते हैं, अत: ये सिंधी लोग के आराध्य देव माने जाते हैं. जब पुरुष वर्ग सकुशल घर लौट आता था तब चेटीचंड को उत्सव के रूप में मनाया जाता था.

4.हज़रत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती अजमेरी गरीब का उर्स 6 रजब- 14 अप्रैल

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ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती सूफी संत थे. सूफी विचारधारा को हिन्दू और मुस्लिमों के बीच एकता का प्रतीक माना जाता है. क्योंकि सूफियों का अन-अल-हक़ और हिन्दुओं का अहं ब्रह्मास्मि एक ही है. भारत में सूफियों की दरगाहों पर न सिर्फ मुसलमान बल्कि हिन्दू भी जाते हैं.

5. चंद्रशेखर –17 अप्रैल

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राजपूतों का बड़ा चेहरा. पहली बार 1962 में राज्यसभा के सदस्य बने. 1977 में पहली बार बलिया से लोकसभा पहुंचे. और तब से लेकर 2004 तक लगातार 8 बार सांसद का चुनाव जीते. सिर्फ 1984 में लोकसभा चुनाव नहीं जीत पाये. 1990 में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने प्रधानमंत्री पद से जब इस्तीफा दिया तो चंद्रशेखर ने समाजवादी जनता पार्टी बनायी और कांग्रेस के सपोर्ट से प्रधानमंत्री बन गये. नवम्बर 1990 से जून 1991 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे. लेकिन कुछ दिनों बाद ही उन पर राजीव गांधी की जासूसी करवाने का आरोप कांग्रेस लगाने लगी जिससे उनके संबंध खराब हो गये. और चंद्रशेखर ने इस्तीफा दे दिया. चंद्रशेखर सोशलिस्ट आंदोलन से भी जुड़े रहे और आचार्य नरेन्द्र देव के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया. इनको युवा तुर्क कहा जाता था. इमरजेंसी के दौरान कांग्रेसी नेता होने के बावजूद इन्हें जेल भेज दिया गया था.

6.परशुराम – 28 अप्रैल

राजा रवि वर्मा रचित परशुराम
राजा रवि वर्मा रचित परशुराम

परशुराम यानी जिनके हाथ में फरसा है. ये एक मिथकीय चरित्र है. परशुराम के पिता ब्राह्मण थे और इनकी मां क्षत्रिय थीं. पिता के कहने पर इन्होंने अपनी मां की हत्या कर दी थी. पिछले 1-2 वर्षों से ब्राह्मण परशुराम को अपना पूज्य मान रहे हैं. कहें तो ब्राह्मण अपनी एकता को एक चेहरा देते हैं परशुराम के रूप में. यूपी में ब्राह्मण करीब 10 प्रतिशत हैं. मायावती 1997 में जब सत्ता में आयीं, तो ब्राह्मणों का इसमें बड़ा रोल था. इस चीज़ को लगातार देखा जा रहा है कि चुनावी समीकरणों में ब्राह्मणों की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता.

7. महाराणा प्रताप – 9 मई

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ऐतिहासिक चरित्र. मेवाड़ के शासक. वैसे तो महाराणा प्रताप राजस्थान के हैं लेकिन पूरे देश के राजपूत या कहें क्षत्रिय इन्हें अपना आदर्श मानते हैं. मान्यता है कि कि महाराणा प्रताप का भाला 80 किलो का था उनकी ऊंचाई साढ़े सात फीट, जूते 5 किलो के और तलवार 25 किलो की थी. अपनी बहादुरी के लिए जाने जाने वाले महाराणा प्रताप ने मुगलों के सामने कभी हार नहीं मानी.

8. जमात-उल-विदा (रमज़ान का अंतिम नमाज़ का दिन)- 23 जून

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वैसे तो रमज़ान के महीने का हर दिन महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके आखिरी जुम्मे के दिन को मुस्लिम कम्युनिटी जमात-उल-विदा मनाती है. इस दिन नमाज़ की आयतें पढ़ी जाती हैं और अल्लाह से दुआ की जाती है कि वह उन्हें जन्नत अता फरमाये. मुसलमान यूपी में करीब 18 प्रतिशत हैं जो राजनीति में बड़ी भूमिका निभाते हैं.

9. विश्वकर्मा पूजा-17 सितम्बर

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पौराणिक रूप से मिथकीय चरित्र. देवताओं के शिल्पी हैं या कहें कि देवताओं के लिए कंस्ट्रक्शन का सारा काम यही करते हैं. गुजरात की द्वारका नगरी को भी इन्होंने ही बनाया. बढ़ई के क्राफ्ट से जुड़े लोगों के देवता माने जाते हैं और वो लोग इनकी पूजा करते हैं. इसके द्वारा निचले तबके के लोगों को जोड़ने की कोशिश की जा रही है.

10. महाराजा अग्रसेन जयंती

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अग्रवाल और अग्रहारि कम्युनिटी के लोग इन्हें अपना पूर्वज मानते हैं. समाजवाद का पहला उदाहरण यहीं से दिखना शुरू होता है. कथाओं में मिलता है कि अपने क्षेत्र में सच्चे समाजवाद की स्थापना हेतु उन्होंने नियम बनाया कि उनके नगर में बाहर से आकर बसने वाले व्यक्ति की सहायता के लिए नगर का प्रत्येक निवासी उसे एक रुपया व एक ईंट देगा, जिससे आसानी से उसके लिए निवास स्थान व व्यापार का प्रबंध हो जाए.

11. महर्षि वाल्मीकि – 5 सितंबर

सोर्स: विकीपीडिया
सोर्स: विकीपीडिया

रामायण युग से जुड़ा एक पौराणिक व मिथकीय चरित्र. आदिकवि के रूप में प्रसिद्ध. संस्कृत में रामायण की रचना की. कहा जाता है कि शुरू में ये डाकू थे, लेकिन नारद ऋषि से मिलने के बाद इनका हृदय परिवर्तन हो गया और मरा-मरा का जाप करते-करते ये संत हो गये. ऐसा दृष्टांत मिलता है कि राम वनवास के समय इनसे मिले थे. कहानी है कि जब सीता ने राम राज्याभिषेक के बाद दुबारा वन प्रयाण किया तो इन्होंने ही शरण दी थी और उनके पुत्र लव और कुश को रामायण की शिक्षा दी. देश में महर्षि वाल्मीकि को एक बड़ा दलित तबका अपना पूज्य या आराध्य मानता है. पिछले साल एक फिल्म द लीजेन्ड ऑफ माइकल मिश्रा में कथित तौर पर वाल्मीकि का अपमान किये जाने को लेकर भारतीय वाल्मीकि धार्मिक संगठन ने विरोध जताया था. पिछले कुछ दिनों से राजनीति में दलितों के वोट में सेंध लगाने की लगातार कवायद चल रही है. फिर चाहे वो बाकी दलितों को जाटव से अलग होने की बात हो, चाहे उन्हें अपने को दलित के बजाय हिन्दू महसूस कराने की बात. वाल्मीकि की छुट्टी इसमें एक बेहतर राजनीतिक प्रयास है.

12. छठ पूजा

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 पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के साथ साथ नेपाल के मधेश क्षेत्र में छठ काफी उत्साह के साथ मनाया जाता है. इसकी खास बात ये है कि इस पर्व में डूबते हुए सूर्य से प्रार्थना करते हुए व्रत का प्रारंभ होता है और सूर्योदय की पूजा के बाद व्रत सम्पूर्ण होता है. लगातार चार दिनों तक चलने वाला ये व्रत काफी कठिन है. इसमें लंबे समय तक पानी में खड़े होकर पूजा की जाती है और पानी भी नहीं पिया जाता है. मान्यता है कि पूरे विधि विधान से पूजा करने पर मन की मुराद पूरी होती है. पूर्वी उत्तर प्रदेश न सिर्फ यूपी की राजनीति में, बल्कि देश की राजनीति में भी काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. इसलिए छठ पर छुट्टी न होने के बड़े असर देखने को मिल सकते हैं. लालू प्रसाद यादव ने तो महाराष्ट्र में भी इसे मुद्दा बनाया था. दिल्ली एमसीडी चुनाव में भी ये मुद्दा था.

13. सरदार वल्लभ पटेल और आचार्य नरेंद्र देव- 31 अक्टूबर

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 लौह पुरुष के नाम से मशहूर सरदार वल्लभ भाई पटेल देश के पहले उप प्रधानमंत्री और गृह मंत्री थे. हैदराबाद, जूनागढ़ और कश्मीर को भारत में मिलाने में इन्होंने काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. हैदराबाद रियासत को ऑपरेशन पोलो के तहत पुलिस एक्शन करके भारत में मिला लिया. इन्हें भारत का बिस्मार्क भी कहा जाता है. आचार्य नरेंद्र देव सोशलिस्ट नेता थे. हिन्दी भाषा के आंदोलन में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी. यूपी में कुर्मी इन्हें अपना नेता मानते हैं. यादवों के बाद कुर्मियों की संख्या यूपी में सबसे ज़्यादा है.

14. ईद-ए-मिलादुन्नवी- 2 दिसम्बर

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ईद-ए-मिलादुन्नवी खुशी और गम दोनों का पर्व है. इस दिन मोहम्मद साहब का जन्म हुआ और कुछ मुस्लिमों का मानना है कि उनकी मृत्यु भी इसी दिन हुई. इसलिए जहां सभी लोग इसे खुशी के रूप में मनाते हैं, वहीं कुछ लोग थोड़ा सा गम में भी रहते हैं.

15. चौधरी चरण सिंह – 23 दिसंबर

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गैर-कांग्रेसी राजनीति का बड़ा नाम. मगर शुरुआत कांग्रेस से की. चंद्रभानु गुप्त के दौर में राजनीतिक सचिव रहे. राममनोहर लोहिया की प्रेरणा से कांग्रेस छोड़ी और सोशलिस्ट पार्टी में आए. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के रहने वाले थे, इसलिए वहां के किसानों के मुद्दों को उठा पहचान बनाई. लोहिया के बाद पूरे यूपी, बिहार, हरियाणा के किसानों के संरक्षक बन उभरे. 1967 में जब कई राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारें बनीं तो यूपी में इसकी अगुवाई चरण सिंह ने की. 1977 में जनता पार्टी की सरकार में उप-प्रधानमंत्री बने. मोरारजी देसाई से मतभेद के बाद कैबिनेट छोड़ी. देसाई सरकार गिरने के बाद कांग्रेस के सपोर्ट से चरण सिंह प्रधानमंत्री बने. मगर कुछ ही महीनों के लिए. संसद में विश्वासमत हासिल करने की नौबत ही नहीं आई. कांग्रेस ने सपोर्ट वापस ले लिया. राजनीति के दो वारिस हुए. एक इनके चेले मुलायम सिंह यादव, दूसरे इनके बेटे अजीत सिंह.

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