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'बॉयकॉट चाइना' को भारतीय उद्योगों के नज़रिए से देखने पर आंखें खुली की खुली रह गईं

आप अगर ये रिकॉर्डिंग कर रहे हैं तो आप दस साल बाद सुनिएगा इस रिकॉर्डिंग को. हमारी 90% इंडस्ट्रीज़ चाइना को रिप्लेस कर चुकी होंगी. ये एवलूशन का लॉजिकल नेक्स्ट स्टेप है. आप देखिए न, अमेरिका में पहले प्रोडक्शन होता था. जर्मनी की बहुत बढ़िया मेन्यूफेक्चरिंग होती थी. यूरोपियन देशों की होती थी. स्विस घड़ियां हो गईं. तो ये सब शिफ़्ट होती आई हैं न? कॉलनीज़ थीं, फ़ैक्टरी उनकी होती थी, रॉ मटेरीयल हमसे चाहिए होता था. आज वो लोग कंज़्यूमर बन गए हैं. अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी कंज़्यूमर मार्केट है. तो टाइम शिफ़्ट होता है. तो इंडिया का समय आने वाल है. हमें सही समय में सही जगह पर होने की ज़रूरत है.

– राजीव बत्रा (प्रेज़िडेंट, साइकिल मार्केट, चांदनी चौक)


इंडिया टुडे ग्रुप की अर्थ जगत से जुड़ी वेबसाइट, ‘बिज़नेस टुडे’ की एक ख़बर पर ध्यान दीजिए. हेडिंग है- MSMEs (सूक्ष्म, छोटे और मझौले उद्योगों) का कहना है कि चाइना का बॉयकॉट मत कीजिए, इससे कच्चे माल के दाम में 40 प्रतिशत तक की वृद्धि हो जाएगी.

ख़बर में बताया गया है कि इन कंपनियों का लॉकडाउन और कोविड के चलते पहले से सर्वाइव करना मुश्किल हो रहा है फिर बॉयकॉट चाइना से तो ‘करेला वो भी नीम चढ़ा’ वाली स्थिति हो जाएगी. MSMEs को ये चिंता तब से सताने लगी है, जबसे सरकार ने 300 ऐसे आइटम्स को चिन्हित किया है जिनपर इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ाए जाने की बात चल रही है.

कोलकाता में यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ता चीन का बायकॉट कर रहे. तस्वीर साभार- PTI
कोलकाता में यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ता चीन का बायकॉट कर रहे. तस्वीर साभार- PTI

‘बिज़नेस टुडे’ की इस स्टोरी में MSMEs के हवाले से ये भी कहा गया है कि अच्छा तो ये होता कि सरकार प्लानिंग के स्तर पर MSMEs को सहारा दे जिससे लंबी अवधि में MSMEs आत्मनिर्भर हो सकें.

हमने इस ‘बॉयकॉट चाइना’, ‘आत्मनिर्भर भारत’, ‘सरकारी हैंड-होल्डिंग’ और ‘इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ाने’ जैसे मुद्दों को उद्योगपतियों के नज़रिए से देखने की कोशिश की. और हमने इंडस्ट्री के जानकारों, अर्थ जगत के दिग्गजों से बात करके पूरा मामला, इसका असर, आगे की राह और इसका हल जानने की कोशिश की. और अपनी रिसर्च केवल MSMEs से, सभी तरह के भारतीय उद्योगों पर विकेंद्रित कर दी. आइए 360 डिग्री अध्ययन करते हैं इस ‘बॉयकॉट चाइना’ थ्रेट/ऑपरट्यूनिटी का.

कोरोना की दवाई की सांकेतिक तस्वीर. असली नहीं. साभार- PTI
कोरोना की दवाई की सांकेतिक तस्वीर. असली नहीं. साभार- PTI

# ‘बॉयकॉट चाइना’, थ्रेट नहीं ऑपरट्यूनिटी-

‘बॉयकॉट चाइना’ के समर्थन में खड़े अखिल भारतीय व्यापारी परिसंघ (Confederation of All India Traders) के नेशनल सेक्रेटेरी जनरल, प्रवीण खंडेलवाल, इसे एक डरावनी स्थिति नहीं, अवसर मानते हैं-

प्रवीण खंडेलवाल
प्रवीण खंडेलवाल

भारतीय उद्योगों को लाभ मिलेगा. पूरे वर्ष में सवा पांच लाख करोड़ रूपये का सामान हम चाइना से आयात करते हैं. जिसमें से दो से ढाई लाख करोड़ रूपये का सामान ऐसा है जो हिदुस्तान के अंदर बड़ी आसानी से बन सकता है. और अभी बन भी रहा है. लेकिन, क्यूंकि चाइना सन 2000 से एक ध्येय में रहा है कि किसी भी तरह से उसने भारत के व्यापार पर क़ब्ज़ा करना है, इस कारण से वो बहुत सस्ते में हिंदुस्तान में चीज़ें भेज रहा है. और एक तरीक़े से उनसे हिंदुस्तान के बाज़ार को क़ब्ज़ा भी कर लिया है. अब जब हम चीनी सामान के बॉयकॉट की बात करते हैं, तो हमारे जो लघु उद्योग हैं, या हमारे जो मझौले और बड़े उद्योग हैं उनको अवसर मिलेगा कि वो ज़्यादा से ज़्यादा मात्रा में माल बना सकते हैं और वो माल उनका हिंदुस्तान के अंदर कंज़्यूम हो जाएगा, और अन्य देशों में भी उसका एक्सपोर्ट हो सकेगा.

‘SME (छोटे और मध्यम उद्योग) चेंबर’ के फ़ाउंडर और प्रेज़िडेंट चंद्रकांत सालुंखे बताते हैं-

चंद्रकांत सालुंखे
चंद्रकांत सालुंखे

ग्लोबल मार्केट में आज कोविड 19 की वजह से जो चाइना को लेकर नाराज़गी है सभी देशों में, जो उनके ऊपर से विश्वास उठा है, इसका ‘अब’ हमारे MSME सेक्टर्स को बहुत बड़ा फ़ायदा मिल सकता है. तो हमें एक प्रॉपर सिस्टम के साथ ‘इंटरनेशनल’ होने की ज़रूरत है. आज की तारीख़ में नॉर्थ अमेरिका, साउथ अमेरिका, यूरोप में हम लोग बहुत बड़े पैमाने पर मार्केट कैप्चर कर सकते हैं.

# हम कर सकते हैं-

भारत के भविष्य को उम्मीद से देखते हुए प्रवीण खंडेलवाल कहते हैं-

कोविड से पहले हिंदुस्तान में वेंटिलेटर, पीपीई किट, मास्क ये सब बनाने की क्षमता नाम मात्र की थी. लेकिन देश के सामने चुनौती आई तो आज दो-ढाई महीने के भीतर ही देश न केवल इन आइटम्स में आत्मनिर्भर हो गया बल्कि अन्य देशों को भी एक्सपोर्ट करने लग गया है. तो अगर दो महीने की चुनौती को स्वीकार करके, इतनी बड़ी मात्रा में चीज़ें बना सकते हैं, तो फिर ऐसा कौनसा काम है जिसको हम नहीं कर सकते. क्यूंकि सरकार की इच्छाशक्ति थी कि हमें ये बनाना है तो सरकार ने उसके रास्ते ढूंढे लोगों को फ़ेसिलिटेट किया लोगों को ने आगे बढ़-बढ़ के बनाया. और आज ऐसे माहौल में जब पूरा देश चाइना के ख़िलाफ़ एक होकर मज़बूती से खड़ा है और जिस प्रकार का आवेश और ग़ुस्सा लोगों में है, तो ऐसा कोई काम नहीं है जिसे हम हिंदुस्तान में कम समय में नहीं कर सकते.

सरकार भी अब ये बात को समझ गई है कि चीन पर हमारी जो निर्भरता है उसे कम करना है. इसलिए ही पीएम मोदी ने लोकल पर वोकल और आत्मनिर्भर भारत कहा है. तो इनडाइरेक्टली उन्होंने ये संदेश दे दिया देश को कि चीन का तो हमें सामना करना ही है, और भी जो देश हैं, हमें निर्भरता किसी देश पर नहीं बनानी है. तो सरकार की इच्छाशक्ति प्रधानमंत्री के इस बयान से साफ़ दिखाई पड़ती है. जहां तक व्यापार और उद्योग का सवाल है हम लोग भी पूरी तरीक़े से तैयार हैं, मुझे लगता है कि कोविड जैसे ही थोड़ा बहुत आगे पीछे होगा निश्चित रूप से सरकार, व्यापारी और उद्योगपति ये तीनों मिलकर बैठेंगे, बातचीत करेंगे और एक स्ट्रेटेजी बनाएंगे जिसके तहत हम चाइना को टार्गेट करके, चाइना के विकल्प हम हिंदुस्तान के अंदर बनाएंगे. और ये ताक़त पूरे विश्व में चाइना के अलावा केवल हिंदुस्तान के पास है. क्यूंकि जैसे चाइना में लेबर सस्ता है, हमारे यहां भी लेबर सस्ता है. और हमारे पास तो टेक्नॉलजी है, वो चाइना के पास भी नहीं है, क्यूंकि हमारे जो टेक्नॉलजी वाले लोग हैं. सिर्फ़ हमें सबको एक साथ जोड़ करके काम को आगे बढ़ाना है. वर्तमान स्थिति भारतीय उद्योगों के लिए ‘थ्रेट’ कम और ‘ऑपरट्यूनिटी’ ज़्यादा है. हम कर सकते हैं और हमने ऐसा करके पहले भी दिखाया है. आज जब हम इतनी बड़ी टेक्नॉलजी विकसित कर सकते हैं कि हम ख़ुद अपना यान भेज सकें, चांद पर मंगल पर तो फिर आप मुझे बताइए टेक्नॉलजी में क्या रह जाता है. ज़रूरत है दृढ़ इच्छा शक्ति की.

भोपाल में मास्क पहन कर चीन का बहिष्कार करता सद्भावना मंच का कर्यकरता. तस्वीर साभार-PTI
भोपाल में मास्क पहन कर चीन का बहिष्कार करता सद्भावना मंच का कर्यकरता. तस्वीर साभार-PTI

राजीव बत्रा के पास इस मामले में अपना एक निजी अनुभव है. राजीव साइकिल मार्केट, चांदनी चौक के प्रेज़िडेंट हैं और इनका टॉइज़ का भी काम है. राजीव बत्रा ट्रेडिंग भी करते हैं, मेन्यूफेक्चरिंग भी करते हैं और पेन इंडिया सप्लाई भी करते हैं. अपने अनुभव को दी लल्लनटॉप के साथ शेयर करते हुए वो बताते हैं-

राजीव बत्रा
राजीव बत्रा

चाइना जो फ़िनिशड गुड्स सस्ते बना पा रहा है, ये कोई रॉकेट साइंस नहीं है. हम लोग भी कर सकते हैं. हमारी जितनी पॉपुलेशन है उसके हिसाब से हम इकॉनमी ऑफ़ स्केल एचीव कर सकते हैं. तो कॉस्टिंग वहां पर बैलेन्स हो सकती है. सवाल ये है कि हम लोगों ने सोचा नहीं कि ये संभव है. मगर कई लोगों ने हमारे टॉय ट्रेड में ऐसा किया है. चाइना के प्रोडक्ट्स आते थे जो 10-15 साल पहले, उसको स्टडी करने के बाद वो यहां पर डिवेलप करके बेचे हैं और वो पूरी की पूरी कैटेगरीज़ अब चाइना से नहीं आती हैं.

हम लोग फ़िनिशड प्रोडक्ट इंपोर्ट करते थे चाइना से. आज भी काफ़ी होता है. 2006 में हमें यीवू (चाइना) की फुतियान मार्केट में एक प्रोडक्ट दिखा, बड़ा अच्छा लगा. हमने सोचा, यार ये हम लोग क्यूं नहीं बना सकते? इसमें क्या चीज़ डालते हैं जो इनका माल इतना सुंदर बनता है. हमारा क्यूं नहीं बनता? हम क्यूं नहीं बना सकते? बस फिर हम उसकी गहराई में घुसे, तो हमें पता चला कुछ ख़ास नहीं था. ख़ाली जो प्लांट और मशीनरी, मोल्ड्स वग़ैरह इस्तेमाल कर रहे थे चीनी, वो अच्छी क्वालिटी के थे. हमने उन मोल्ड्स को इंपोर्ट कर लिया. फिर हुआ कि मोल्ड्स हम इंडिया में डिवेलप क्यूं नहीं कर सकते?

मतलब आपको मेन्यूफेक्चरिंग की हर ब्रांच में डिटेल में जाना पड़ा. आप उसमें घुसेंगे, आपको उसका सॉलूशन मिलेगा. और उसका हमने तोड़ निकाला, हमने अपनी कॉस्टिंग नीचे की. अब उस लाइन का करोड़ों का माल, हम बनाते हैं. वो चाइना से आना बंद हो चुका है. और ऐसा ही, बाक़ी जो हमारे मेन्यूफेक्चरर दोस्त हैं, वो लोग भी फ़ाइट करके इसको कर सकते हैं.

# ‘बॉयकॉट चाइना’ न सही राह, न आसान राह-

अजीत कलसी. आगरा बेस्ड शू मेकिंग कंपनी ‘मेट्रो एंड मेट्रो’ के मैनेजिंग डाइरेक्टर हैं. वो मानते हैं कि वर्तमान परिदृश्य में हम चीन का बहिष्कार नहीं कर सकते. वो पॉईंटर्स में अपनी बात रखते हैं-

अजीत के.
अजीत के.

# पिछले एक दशक से दुनिया भर की ‘स्टेट ऑफ़ दी आर्ट’ टेक्नॉलजी चाइना पहुंची है, जो चीन को ‘स्टेट ऑफ़ दी आर्ट’ टेक्नॉलजी का हब बनाती है. दूसरी तरफ़ भारत अब भी विकासशील बना हुआ है जहां अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी इतनी आगे नहीं बढ़ पाई है. चीन के उत्पादों पर प्रतिबंध लगाने से पहले सरकार को भारत को नवीनतम प्रौद्योगिकी हब के रूप में विकसित करने के लिए अच्छी व्यवस्था करनी होगी.

# ठीक इस वक़्त कई भारतीय कंपनियों को ऐसे बहुत से प्रोडक्शन और एक्सपोर्ट के ऑर्डर्स पूरे करने हैं जिनके उत्पादन में चीनी कच्चा माल लगना है. अगर चीनी माल पर तुरंत प्रतिबंध लगा दिया जाए या इनकी इंपोर्ट ड्यूटी तुरंत बढ़ा दी जाएगी तो इससे भारतीय कंपनियों के कई ऑर्डर्स कैन्सल हो जाएंगे. या तो कच्चे माल के बढ़े हुए दामों के चलते या कच्चे माल की कमी के चलते.

# वर्तमान परिदृश्य में भारतीय कंपनियां इस हालत में नहीं हैं कि वो निवेश कर सकें या चीनी कच्चे सामान का देसी विकल्प तैयार करने में लगने वाली लागत को अवशोषित कर सकें. साथ ही भारतीय कारखानों का बुनियादी ढांचा भी ऐसा नहीं है कि वहां चीनी उत्पादों का, चीनी कच्चे मालों का विकल्प तैयार किया जा सके.

इंडिया टुडे हिंदी के एडिटर, अंशुमन तिवारी भी कुछ ऐसी ही बात करते हैं, और मानते हैं कि-

अंशुमन तिवारी
अंशुमन तिवारी

इंडिया की डिपेंडेंस चाइना के ऊपर बहुत है. अगर आप बड़ी चीज़ों को छोड़ दें, बड़े प्रोजेक्ट इंवेस्टमें को छोड़ दें, केवल छोटी चीज़ों की बात कर लें, ऐसी चीज़ें जो लो टेक्नॉलजी प्रोडक्ट हैं लो कॉस्ट प्रोडक्ट हैं, उनमें तक चाइना पर निर्भरता बहुत गहरी है. जैसे आप जिस सेनेटाईज़र का इस्तेमाल कर रहे हैं उसके स्प्रे के कंपोनेंट्स तक को लेकर हम चाइना पर डिपेंडेंट हैं. इस लेवल तक की डिपेंडेंसी है. जो बॉल पेन भारत में बनती है उसकी टिप्स के लिए चाइना पर निर्भर हैं. तो भारत की MSMS इंडस्ट्री अगर कह रही है कि चाइना का बॉयकॉट न किया जाए तो उसके पीछे सबसे बड़ी वजह है, एक तो ये कि अभी वो मंदी से बाहर निकले हैं. बाज़ार में जो भी मांग है उसके लिए उन्हें कच्चे माल की या तैयार माल की सप्लाई चाहिए, जिससे वो अपने बिज़नेस का घाटा भर सकें और आगे काम कर सकें.

दूसरी चीज़ ये है कि भारत में उन चीज़ों के लिए कोई कैपिसिटीज़ नहीं है, उन चीज़ों के लिए कोई सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, जिनके ज़रिए वो कच्चे माल की सप्लाई ले सकें. और यदि भारत में कोई सुविधा बनेगी भी, तो इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि ये सामान उतना ही सस्ता होगा, जितना सस्ता सामान चीन से आता है. भारतीय बाज़ार में जो खपत के लेवल के ऊपर जिन चीज़ों का इस्तेमाल होता है, चाहे वो गिफ़्ट आइटम्स हों, चाहे वो सस्ते इलेक्ट्रॉनिक गुड्स हों चाहे वो प्लास्टिक की एक्सेसरीज़ हों, चाहे वो लाइट्स हों, चाहे वो फ़र्निचर हों, स्टेशनरी हों, घर के बर्तन हों, इन सारी चीज़ों में चाइना इसलिए इम्पोर्टेंट रोल प्ले करता है क्यूंकि चाइना बहुत कॉस्ट इफ़ेक्टिव है. चाइना बहुत सस्ता है. और उसके सस्ते होने का लाभ भारतीय इंडस्ट्रियलिस्ट को कच्चे माल के तौर पर भी मिलता है और जो भारत के ट्रेडर हैं, उन्हें विक्रेताओं के तौर पर भी मिलता है.

# सबकुछ बैन करने की बात नहीं-

‘बैन’ या ‘मुक्त व्यापार’? प्रवीण खंडेलवाल एक बीच की राह प्रस्तुत करते हैं-

हमने चाइना से इंपोर्ट होने वाली चीज़ों का पूरी तरीक़े से अध्ययन किया, और अध्ययन करने के बाद ये समझ में आया कि चाइना से 4 तरीक़े का इंपोर्ट होता है. ‘तैयार माल’, ‘कच्चा माल’, ‘स्पेयर पार्ट्स’ और ‘टेक्नॉलजी और टेक्नॉलजी रिलेटेड गुड्स’. हमने अपने अभियान के लिए अभी फ़िलहाल फ़िनिशड गुड्स जो आते हैं चाइना से, जो कि हिंदुस्तान में भी पहले से ही बन रहे हैं, ऐसे 3,000 आइटम्स को हमने आइडेंटीफ़ाई किया है. और पहले चरण में हम अभी बहिष्कार की बात केवल उसके लिए कर रहे हैं. हम अभी रॉ मटेरीयल का बहिष्कार नहीं कर रहे. हम स्पेयर पार्ट्स या टेक्नॉलजी के इंपोर्ट का बहिष्कार नहीं कर रहे. क्यूंकि बहिष्कार उसका हो सकता है, जिसका विकल्प हिंदुस्तान में उपलब्ध हो. इसलिए हमने फ़िनिशड गुड्स भी केवल वो कंसिडर किए हैं, जो हिंदुस्तान में पहले से बन रहे हैं. और उसका हमने टार्गेट रखा है कि दिसम्बर 2021 तक, हम चाइना से होने वाले इंपोर्ट को एक लाख करोड़ रुपए तक कम कर लेंगे. ये एक लाख करोड़ रुपया भारत की अर्थव्यवस्था में लगेगा. भारत के बाज़ार में आएगा. इसलिए वो हमारे व्यापार और उद्योग के लिए बहुत लाभकारी होगा.

इस बात का राजीव बत्रा समर्थन करते हैं. राजीव बताते हैं-

जो 3,000 प्रोडक्ट्स और 500 कैटेगरीज़ प्रवीण जी ने बताई हैं, फ़िनिश्ड गुड्स की. तो कैटेगरी वाईज़ हर एक की डिटेल में घुसना पड़ेगा. जो भी उस कैटेगरी के प्रोडक्ट हैं, वो कंसंट्रेट करें कि हम अपनी कॉस्टिंग कैसे कम कर सकते हैं. जैसे टॉय ट्रेड वाले टॉय में कंसंट्रेट करें. ऐसे कपड़े वाले, अपने उसमें करेंगे कि भई चाइना का कपड़ा जो आ रहा है, उससे कैसे निपटा जाए. जैसे फ़र टॉयज़ बनते हैं. पहले यहां कैंची से काटे जाते थे. मगर आज उसमें आप अगर कम्प्यूटर का सॉफ़्टवेयर डाल दें, वो आपको डिज़ाइन करके बता देगा कि ये इस इस तरीक़े से काटा जाएगा. इसमें वेस्टेज भी कम होगी और सुंदरता भी बढ़ेगी. तो पैसा खर्च करके एक बार वो चीज़ आप लगा लेंगे तो आपकी कॉस्टिंग भी कम होगी, क्वालिटी भी बढ़ जाएगी और लॉन्ग टर्म के लिए आप इंटरनेशनली कंपटिटिव हो जाएंगे. यही दिमाग़ लगाना है कि कैसे हमने अपनी क्वालिटी को इंटरनेशनल लेवल पर लेकर आना है. और अगर शुरू में कॉस्टिंग ज़्यादा भी आती है इससे, तो उसमें सरकार की हैंड-होल्डिंग चाहिए होती है.

लेकिन अंशुमन की इसपर अलहदा राय है –

सरकार चाहे तो इन 3,000 चीज़ों को नेगेटिव लिस्ट में डाल सकती है. लेकिन क्या हम एफ़ोर्ड कर पाएंगे इन चीज़ों को नेगेटिव लिस्ट में डालना? इसके अलावा बाज़ार में इन चीज़ों की जो कमी होगी, वो हम एफ़ोर्ड कर पाएंगे? अभी केवल वुहान में कोरोना वायरस के असर के कारण भारतीय बाज़ार में बहुत सारी प्रोडक्ट्स की शॉर्टेज़ हो गई थी, और क़ीमतें बढ़ गईं. तो ये व्यवहारिक रूप से कहां तक सम्भव है. चाइना के डैमेज से ज़्यादा हमारा अपना डैमेज है इसमें. हमारे उपभोक्ताओं के लिए महंगाई होगी. हमारे उपभोक्ताओं को अच्छी चीज़ें नहीं मिलेंगी. हमारे पास मोबाइल के कंपोनेंट्स अवेलेबल नहीं होंगे. हमारे पास अच्छी चीज़ें उपलब्ध नहीं होंगी तो ये भी तो समझना ज़रूरी है न?

दिल्ली के एक अस्पताल में कोरोना के सैंपल के साथ डॉक्टर्स. तस्वीर साभार-PTI
दिल्ली के एक अस्पताल में कोरोना के सैंपल के साथ डॉक्टर्स. तस्वीर साभार-PTI

# हैंड-होल्डिंग-

हैंड-होल्डिंग मतलब जैसा बच्चों को माता पिता ऊंगली पकड़ के चलना सिखाते हैं, वैसी ही कुछ उम्मीद उद्योगपति भी भारत सरकार से रखते हैं. ज़्यादा नहीं तो थोड़ी बहुत. हैंड-होल्डिंग के बारे में ‘SME (छोटे और मध्यम उद्योग) चेंबर’ के फ़ाउंडर और प्रेज़िडेंट चंद्रकांत सालुंखे बहुत विस्तार से बताते हैं-

अगर इंडिया को मेन्यूफेक्चरिंग हब बनाना है तो इसके लिए, बहुत सारी सुविधाएं उपलब्ध करने की ज़रूरत है. स्टेट लेवल की और नेशनल लेवल की.

वर्तमान में, प्रधानमंत्री ने पहले ही घोषणा की है कि हम SME सेक्टर को आत्मनिर्भर बनाना चाहते हैं. लेकिन पॉईंट ये है कि हमें प्लानिंग की बहुत ज़रूरत है. बहुत सारी चीज़ें हैं. जैसे लैंड आसानी से उपलब्ध होना. लैंड कॉस्ट कम होना. इलेक्ट्रिसिटी चार्जेज़ कम होना. इलेक्ट्रिसिटी कनेक्शन तुरंत मिलना. स्किल मैन पावर आसानी से उपलब्ध होना. स्किल मैन पावर के लिए भी सरकार की कुछ सुविधाएं होनी चाहिए. जिसमें देश के किसी भी कोने में लेबल उपलब्ध हो. रॉ मटेरियल के सप्लाई चैन में कोई दिक्कत न हो. और सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि आज हमारे SME सेक्टर्स को, इंडस्ट्रीज़ को, बैंक से पैसा नहीं मिलता है. फ़ंडिंग नहीं मिल रही है. आज अगर साढ़े छह करोड़ MSME हैं इंडिया में, तो उसमें से ख़ाली 45 लाख MSME बैंकिंग सेक्टर से फ़ायदा ले रहे हैं. बाक़ी पांच करोड़ नब्बे लाख के क़रीब क्यूं नहीं ले रहे हैं?

एक और ज़रूरी बात, मेन्यूफेक्चरिंग में जो मिडियम साइज़ इंडस्ट्रीज़ हैं, उन्हें इम्पावर करने की ज़रूरत है. जो कि अच्छी क्वालिटी के प्रोडक्ट बना सकती हैं. और अच्छी क्वांटिटी में बना सकती हैं. जिसकी लोकल और इंटरनेशनल मार्केट में सप्लाई के लिए हम आगे बढ़ सकते हैं.

ये सब सुविधा अगर सरकार देती है तो ‘ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस’ के पायदान में भी हम ऊपर की ओर जाते हैं. सेंट्रल के नियम अलग हैं, और राज्यों के अलग हैं. आज अगर महाराष्ट्र की बात हो तो महाराष्ट्र ‘ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस’ में आठवें नम्बर पर है. मतलब MSME के लिए पूरे राष्ट्र की एक ही पॉलिसी होनी चाहिए. बैंकिंग सेक्टर में भी हमें आसानी से फ़ंडिंग मिलनी चाहिए. ‘वन फ़ॉर्म, वन सिस्टम, वन कंप्लाएंसेज़’ होना चाहिए. हर बैंक के कंसीड्रेशन का सिस्टम अलग है. चार्जेस अलग-अलग हैं. उनके (बैंक के) पास कोई ऐसा सिस्टम नहीं है कि वन पॉईंट ऑफ़ कॉन्टैक्ट में काम हो जाए.

मिनस्ट्री ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री को बहुत बड़े पैमाने पर काम करने की ज़रूरत है. सप्लाई चैन मैनजमेंट को सिस्टमेटिक करना होगा.

सरकार की इंसेंटिव स्कीम्स हैं उसको थोड़ा सा बदलना होगा. उसमें वैल्यू एडिशन देना होगा. और मार्केटिंग, प्रमोशन, ब्रांडिंग के लिए हमें बहुत बड़े पैमाने पर काम करने की ज़रूरत है.

टेक्नॉलजी. एफ़ोर्डेबल और पेटेंटेड टेक्नॉलजी की भी MSME को बहुत सख़्त ज़रूरत है.

क्वालिटी. प्रॉडक्टिविटी और कॉस्ट. इन तीनों पर अगर हम ध्यान देते हैं तो मुझे लगता है चाइना को कंपीट करने में इंडिया को कोई दिक्कत नहीं आएगी.

राजीव बत्रा बताते हैं-

मतलब कई बार अगर घरेलू प्रोडक्ट्स की कॉस्टिंग, आयतित माल से ज़्यादा भी आती है तो या तो इम्पोर्टेड माल का टैरिफ़ बढ़ जाए, या ड्यूटी बढ़ जाए. या सरकार सुनिश्चित करे कि जो टैरिफ़ वग़ैरह लगे हुए हैं, उनका वॉयलेशन करते हैं लोगबाग, अनैतिक तरीक़े से, वो रुके. अंडर-इनवॉइसिंग से या कंट्री ऑफ़ ऑरिजिन छुपा के कि भई! चाइना का नहीं है, दूसरे देश से आ रहा है, ये होना बंद किया जाए. जो नेक्सस होता है एक तरीक़े से कस्टम ऑफ़िशल्स का बिज़नेसमैन का और जो बीच में दलाल होते हैं इन सब का नेक्सस टूटना चाहिए. जैसे इनकम टैक्स में आज आपकी रिटर्न दिल्ली से है और देख चेन्नई का ऑफ़िसर रहा है तो पारदर्शिता आ रही है न. इसी तरह से जो एसेसिंग ऑफिसर्स हैं, वो भी कोई भी हो सकता है. कंप्यूटर से लीजिए आप. रेंडमली. बेमानी का नेक्सस तोड़ देने से ही काफ़ी फ़र्क़ बाद जाता है. तो चाइना का माल अपने आप महंगा हो जाएगा, उन ड्यूटीज़ से जो पहले से ही इन-फ़ोर्सड हैं. तो आपको एक लेवल प्लेइंग फ़ील्ड मिल जाएगी. जो आज नहीं है आपके पास.

प्रवीण खंडेलवाल इस हैंड-होल्डिंग विषय में कहते हैं-

सरकार को एक ऐसी नीति बनाने की आवश्यकता होगी, जिसमें ख़ास तौर पर उन कंपनियों को सरकार हर तरीक़े से मदद दे, जो चीनी सामान का ऑल्टर्नेट बना रही हैं.

हमारा ये कहना है कि हर ज़िले के ग्रामीण इलाक़ों में सरकार 50 एकड़ की ज़मीन को स्पेशल इंडस्ट्रियल ज़ोन बना दे और उसमें ‘वन विंडो सर्विस’ दे दे. सिंगल विंडो अप्रूवल हो जाए. उसी 50 एकड़ में सरकार आरएनडी (रिसर्च एंड डिवेलपमेंट) की सुविधा भी रखे. टेस्टिंग लेब भी वहां पर बना दे. तो जो लोग वहां पर इंडस्ट्री लगाएंगे उनको काफ़ी मोटिवेशन मिलेगा. और जहां-जहां पर उन्हें सरकारी छूट की आवश्यकता है, वो भी उन्हें मिले, क्यूंकि चाइना में जितना भी उद्योग है उसे सरकार 100 प्रतिशत पेट्रोनाइज़ (संरक्षित) करती है. और कोई व्यक्ति या संस्थान नुक़सान में जाता है तो सरकार उसके नुक़सान की भरपाई करती है. हम इस बात को समझते हैं कि भारत में ये भरपाई तो नहीं हो सकती लेकिन टैक्स में या या अन्य पॉलिसीज़ में सरकार यदि एडवाटेंज देती है, तो बड़ी संख्या में लोग हिंदुस्तान में उद्योग लगाने को तैयार हैं.

चाइना के सामान का बॉयकॉट होने से जो डिमांड बढ़ेगी, उसकी सप्लाई के लिए हम इंडिया में फैक्टरियां लगा सकते हैं, सामान प्रोड्यूस कर सकते हैं.

धर्मशाला में चीन का विरोध करते लोग. तस्वीर साभार- PTI
धर्मशाला में चीन का विरोध करते लोग. तस्वीर साभार- PTI

# धीरे-धीरे, रे मना-

बैन को लेकर इतनी जल्दी में नहीं रहना चाहिए. ऐसा कई विशेषज्ञों का मानना है. राजीव बत्रा बताते हैं-

तुरंत कोई भी चीज़ नहीं होती, उसके लिए सबसे पहले तो माइंड स्ट्रॉन्ग होना पड़ता है. कि आपको कॉन्फ़िडेन्स लाना पड़ेगा कि हां हम कर सकते हैं. हमको भी शुरू में डर भी लगा था यार. इतना पैसा लगा रहे हैं और जो चीज़ बनाएंगे, क्या पता न चले? तो रिस्क तो बिज़नेस में खेलना पड़ता है. आज हमारी कंपनी अपनी लाइन की टॉप कंपनियों में इंडिया में आती है. तो ऐसा नहीं है कि रिस्क लेने से आपको कामयाबी नहीं मिलती. और यही मैं हर इंडियन मेन्यूफेक्चरर को बोलना चाहूंगा कि जो आपकी लाइन का चाइना का माल इंपोर्ट होता है उसे यहां डिवेलप करने की कोशिश कीजिए. मगर क्वालिटी को आपको इंटरनेशनल लेवल पर लाना पड़ेगा. एक ही सोच होनी चाहिए.

चंद्रकांत सालुंखे कहते हैं-

पहले हमें मज़बूत तो करो, फिर हम फ़ाइट कर सकते हैं. अभी क्या है माल सप्लाई नहीं रहेगा, अपनी इंडस्ट्री बंद पड़ेगी. चाइना हो, साउथ कोरिया हो, जापान हो, 40% – 30% रेट ज़्यादा लगेगा. तो वो परवडेगा नहीं (तो वो हम अफोर्ड नहीं कर सकते). आज की डेट में मोबाइल फ़ोन मिलना बड़ा मुश्किल हो गया है. इलेक्ट्रॉनिक आइटम्स मिलना मुश्किल हो गया है. इंडस्ट्री बंद हो जाएगी अगर ऐसा हो जाएगा तो.

बैन लगाने से बेहतर है कि पहले हम आत्मनिर्भर बनें. पहले हम, हमारी कैपिसिटी बनाएं. अपनी इंडस्ट्री को पहले सक्षम करें. जैसे ‘ऐप्स’ हैं. इनको बैन ठीक है. क्यूंकि उसकी वजह से अपना डेटा जा रहा है. उसकी वजह से हमारा पैसा जा रहा है. लेकिन जो इंडस्ट्रियल प्रोडक्ट्स हैं, इलेक्ट्रॉनिक और इलेक्ट्रिकल आइटम्स हैं, इसके ऊपर अभी बैन लगाने या ड्यूटी बढ़ाने से कोई फ़ायदा नहीं. हमारा नुक़सान होगा, हमारा काम काज बंद हो जाएगा. और इसकी वजह से हमारे द्वारा अन्य देशों को किया जाने वाला निर्यात प्रभावित होगा.

मेरी राय ये है कि जो कुछ भी अभी चाइना के साथ चल रहा है, बॉर्डर डिस्प्यूट, ट्रेड डिस्प्यूट इसे सरकार ने डिप्लोमेटिकली सॉर्ट आउट करके अगले 2-3 साल तक इसको ठंडा करना चाहिए. और उस दौरान हमें आत्मनिर्भर होने की तरफ़ काम करना चाहिए.

हालांकि अंशुमन तिवारी कहते हैं-

अगर सरकार चाहेगी भी तो भी 2-3 साल नहीं 10 साल तक का समय लगेगा. इतनी जल्दी आप भारत में इतनी बड़ी कैपेसिटी कैसे क्रिएट कर लेंगे जो कैपेसिटीज़ पहले से दुनिया में तैयार हैं. सरकार अपने पास से तो कैपेसिटी नहीं बना सकती, उसे तो प्राइवेट कंपनी से कहना पड़ेगा. कोई प्राइवेट कंपनी भारत में प्लास्टिक के डिब्बे बनाने का प्लांट क्यूं लगाएगी? लगाएगी भी तो वो धीमे-धीमे बाज़ार का एसेसमेंट करेगी. कितने कॉस्ट इफ़ेक्टिव ढंग से वो मार्केट में माल बेच सकती है. इसपर निर्भर करेगा. और अगर चीन से आने वाल सस्ता माल तो फिर वो भारत में प्रोडक्शन क्यूं शुरू करेगी? सारी चीज़ें पॉलिसी लेवल पर हैं. और अभी हम क्या देख रहें हैं कि सरकार पॉलिसी लेवल पर चाइना को लेकर बिलकुल स्पष्ट नहीं है. सरकार ने कहीं भी ये नहीं कहा कि वो चीन के इंपोर्ट्स रोकना चाहती है. कहीं नहीं कहा कि चीनी कंपनियों के कॉन्ट्रैक्ट रद्द करना चाहती है. ये सारा का सारा ऐसा एक आंदोलन है जो कुछ लोग सिर्फ़ ख़ास क़िस्म की लोकप्रियता के लिए चला रहे हैं, जिसके पीछे कोई पॉलिसी बैकिंग नहीं है. जबकी जो सामान भारतीय बाज़ार में बिक रहा है या जिसे जलाने तोड़ने और ख़त्म करने की कोशिशें की जा रही है, वो सामान बाक़यदा लीगल चैनल से आयात होकर आया है. और जिस व्यापारी ने उसे ख़रीदा है, उसने उसमें ड्यूटी पे की है. उसकी पूंजी उसमें लगी हुई है. उसका जो नुक़सान होगा लोगों को सामान ख़रीदने से रोकने में या उसकी दुकान पर हमला हो जाने में, उसकी भरपाई कौन करेगा?

दिल्ली में कोरोना टेस्टिंग के दौरान उतारी गई तस्वीर. साभार -PTI
दिल्ली में कोरोना टेस्टिंग के दौरान उतारी गई तस्वीर. साभार -PTI

# सॉल्यूशन क्या है-

राजीव बत्रा के पास लॉन्ग टर्म और शॉर्ट टर्म दोनों ही प्रकार के सॉल्यूशन हैं. शॉर्ट टर्म सॉल्यूशन देते हुए वो चाइना की पोल खोलते चलते हैं-

अगर लॉन्ग टर्म में हमें कायमब होना है तो क्वालिटी सुधार में तन, मन, धन लगाना होगा. इमिडिएट सॉल्यूशन ये है कि अगर ये लगा कि उसे नुक़सान हो सकता है तो वो नेगोशिएटिंग टेबल पर आ कर द्विपक्षीय वार्ता के लिए तैयार हो जाएगा, क्यूंकि वो प्रेशर में है सब जगह से. उसने सारे पत्ते एक साथ खेल दिए हैं. उन्होंने हर आदमी को दुश्मन बना लिया है पूरी दुनिया में. और इतनों को एक साथ दुश्मन बनाकर चलना इतना आसान नहीं है. उसके दोस्त कितने हैं? आसपास सभी पड़ौसी देशों से उसके कॉन्फ़्लिक्ट हैं. ऑस्ट्रेलिया तक उनसे ख़ुश नहीं है. वो हैकिंग का आरोप लगा रहे हैं. जब इतने सारे लोग नाखुश हैं चाइना से, कुछ तो कमी होगी चाइना में. और चूंकि वहां पर लोकतंत्र नहीं है, चाइना को ख़तरा ही अपने लोगों से है. उनके अपने लोग न उठकर, जैसे टियानमैन स्क्वेर में हो गया था, क्रांति कर दें. इसलिए उन्होंने डंडे से कंट्रोल किया हुआ है. आज इंडिया से 20 सैनिक मारे गए. आपने हर जगह दिखा दिया. पारदर्शिता है न. सच्चाई है न. विलाप हुआ. बहुत बुरा लगा. लेकिन चाइना ने अपना बताय तक नहीं कि उसका एक मरा है या 43 मरे हैं या 50 मरे हैं या ज़्यादा मरे हैं. ये कोई देश थोड़ी है, जो अपनी सच्चाई नहीं बता सकता.

सॉल्यूशन की बात पर अंशुमन कहते हैं-

सरकार ज़्यादा कुछ नहीं करेगी फ़िलहाल. ये विरोध चलने दिया जाएगा. इस विरोध से चाइना के ऊपर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की कोशिश की जाएगी. जाओ सड़क पर चिल्लाते रहो लेकिन व्यवहारिक रूप से अगर आपको बॉयकॉट करना है तो कह दीजिए कल से चीन से टायर इंपोर्ट नहीं होगा. अभी वन प्लस की दूसरी फ़्लैश सेल शुरू होने वाली है, देखिए कितने फ़ोन बिक जाएंगे इंडिया में खड़े-खड़े. जहां कंजंप्शन आता है वहां लोग टेक्नॉलजी, बेनिफ़िट्स, कॉस्ट, ये सारी चीज़ें देखते हैं. और इसलिए व्यवहारिक रूप से ये सम्भव नहीं है, जब तक कि आपके पास कैपीसिटी न हो. तो हमें नहीं लगता कि अभी तत्काल सरकार इसमें बहुत बड़ा डिसीज़न लेने वाली है. और सरकार का भी तो नुक़सान है. जितना इंपोर्ट कम होगा, उतना रेवेन्यू कम होता जाएगा न. भई ड्यूटी भी तो मिलती है सरकार को इससे.

# अंततः-

पूरी बहस को एक क्लोज़र सा देते हुए अंशुमन बताते हैं-

बॉयकॉट चाइना के बाद क्या होगा ये छोड़िए, बॉयकॉट चाइना ही नेक्स्ट टू इम्पॉसिबल है. चाइना जितना एक्सेस कर चुका है भारत के पूरे सिस्टम में, अलग अलग तरीक़े से स्टार्टअप्स से लेकर आपके घर के दरवाज़े पर लगी डोर बेल और डोर मेट तक. यहां से अगर आपको चाइना को बाहर निकालना पड़ेगा तो उतनी ही पूंजी, उतनी ही तकनीक और उतनी ही कैपिसिटी लानी होगी और ये पूंजी, तकनीक और कैपिसिटी सिर्फ़ नारे लगा लेने से नहीं आ जाएगी. इसके लिए एक लंबा अभियान चलाना पड़ेगा. सरकार को उसकी क़ीमत चुकानी पड़ेगी. टैक्स कम करने पड़ेंगे. दुनिया की कंपनियों को बुलाना पड़ेगा. जो ग़ैर-चाइना कंपनियां हैं, उनसे तकनीक लेनी पड़ेगी. तो ये एक आसान प्रक्रिया नहीं है. ये प्रक्रिया अगर आसान होती तो भारत में भारतीय लोग पहले से ही नहीं इन चीज़ों का प्रोडक्शन कर रहे होते? फिर चीन की कंपनियां भारत में क्यूं बेच रही होती.

इसलिए ये लड़ाई ऐसी नहीं है, जिस लड़ाई को चुटकियों में नारेबाज़ी के आधार पर लड़ा जा पाएगा. इसके लिए भारत में बड़े पैमाने पर, छोटे सामान्य चीनी मिट्टी के कप बनाने से लेकर और चप्पलों और जूते के सोल बनाने से लेकर और एक सॉफ़्ट टॉय बनाने से लेकर बड़े पैमाने पर बिजली के टरबाइन बनाने तक की क्षमताएं ईजाद करनी पड़ेंगी.


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