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पतली कमर, बड़े स्तन: क्या औरत महज शरीर होती है?

ये स्टोरी वेबसाइट डेली ओ के लिए पर्ल खान ने लिखी थी. हम इसे वेबसाइट की इजाज़त से ट्रांसलेट कर आपको पढ़वा रहे हैं.


एक बच्चे के तौर पर मैंने अच्छे से कपड़े पहन कर तैयार होने के महत्व को समझा. हमारे घर कि चार-दीवारी में क्या होता है उससे कोई फर्क नहीं पड़ता. हम अच्छे से कपड़े पहन कर घर से बाहर जाते थे. दुनिया को जो हम छवि दिखाते थे, वो काफ़ी कूल और एक सफल परिवार की होती थी. मेकअप, गॉगल और स्टाइलिश कपड़ो का काम हमारी दुखी आत्माओं को ढ़कना था.

अच्छे कपड़े पहनने से अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के बीच अच्छा महसूस होता था. ख़ासकर उन दिनों में जब लोग छोटे शहरों में कपड़ो पर ज्यादा खर्च नहीं करते थे. एक चीज़ तय थी कि अच्छे कपड़े अपने अंदर के उथल-पुथल को ढकने में नकाब का काम करती थी.

मेरी मां इतनी ख़ूबसूरत थी कि वो जहां कहीं भी जाती थी़ं उन्हें उनकी ख़ूबसूरती के लिए बधाइयां मिलती थी. जो एक अजीब सा विरोधाभास था. मुझे अपनी मां की ख़ूबसूरती और स्टाइल सेंस पर काफी गर्व होता था. ठीक उसी वक़्त मैं अपनी मां के सामने अपने आप को बदसूरत समझती थी. मेरे लिए उनके स्टैण्डर्ड तक पहुंचना काफ़ी मुश्किल था. मुझे उनसे आधा  खूबसूरत दिखने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती थी.

अपने स्कूल के दिनों में मैं काफी दुबली-पतली हुआ करती थी. क्लास में मेरा कद भी सबसे छोटा था. जैसे-जैसे समय बीतता चला गया वैसे-वैसे भावनाओं के भार के साथ मेरा वजन भी बढ़ता चला गया.

जब में ग्यारहवीं क्लास में थी, तब मैं दिल्ली आई. दिल्ली आने से पहले में अपने वजन के बारे में नहीं सोचती थी. लेकिन यहां आने के बाद मुझे पता चला कि लोग स्लिम और कर्वी लड़कियों को ज्यादा पसंद करते हैं. जल्दी ही फैशन और ग्लैमर मेरी समझ में आने लगा.

एक छोटे से शहर से आने के बाद मेरे पास सिर्फ दो चॉइस थी, या तो में एक छोटे शहर की लड़की की तरह ही रहती जिसकी तरफ कोई ध्यान नहीं देता था या फिर अपनी बॉडी और अपनी ड्रेसिंग सेंस को बदलकर अपने आप को अप-मार्केट बनाती. मैंने दूसरे वाले को चुना. मैं लोगों से चाहती थी कि लोग मुझसे प्यार करें और  मेरी सराहना करें.

मुझे याद है कि कॉलेज में मुझसे किसी ने कहा था, “तुम मिनाक्षी शेषाद्री कि तरह सुंदर हो, लेकिन रवीना टंडन जितनी हॉट नहीं हों”. इसके बाद मैं काफी परेशान रहने लगी. और उसी वक्त से मेरे और मेरे शरीर के बीच जंग छिड़ गई. मुझे अपने शरीर और उसके बनावट से नफ़रत सी होने लगी.

मुझे लगा कि मेरी बॉडी मुझसे उतनी ही नफ़रत करती हैं, जितनी मैं उससे नफ़रत करती हूं. बॉडी का साइज बढ़ने लगा. जितना मैं उसे कंट्रोल करने की कोशिश करती वो उतना ही बढ़ता जा रहा था. पिछले दो दशक से मैंने डाईट और एक्सरसाइज के जरिए अपने वजन को रोकने के लिए ग्रीन टी, हॉट लेमन वॉटर जैसे सारे तरीके अपनाए.

पिछले कुछ सालों मैं मुझे सफलता मिली और मेरा वज़न 62 किलो से 47 किलो हो गया. इससे मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा अब में हर तरह के फैशनेबल कपड़े पहनने लगी. लेकिन अफ़सोस ये था कि कभी कुछ महीनों में कभी कुछ सालों में मेरा वजन बढ़ जाता था. इस बात को लेकर में घंटो चिंता करती थी. कभी-कभी तो डिप्रेशन में भी चली जाती थी. अपने वजन के कारण मैंने धीरे-धीरे अपने दोस्तों से भी मिलना जुलना बंद कर दिया. हर तरह के इवेंट में भी जाना छोड़ दिया.

कभी–कभी मेरा मन करता था कि मैं कहीं गायब हो जाऊं. और कभी-कभी दूसरों पर भी गुस्सा करने का मन करता था. इसके बाद मैंने मेडिटेशन करने की भी कोशिश की. मैंने सोचा की अब और नहीं बहुत हो गया. मैंने अपनी अलमारी से अपने सारे फैशनेबल कपड़े हटा दिए. क्योंकि फैंशन ने मेरी जिंदगी को उलझा के रख दिया था.

अब में एक साधारण ज़िन्दगी जीना चाहती थी. मैंने अपनी अलमारी में से सारे फैशनेबल कपड़े हटाकर सिर्फ कुछ जीन्स और टी-शर्ट ही रखे. लेकिन, ये साधारण जीवन मेरी पर्सनालिटी से मेल नहीं खा रहा था. जल्दी ही मैं एक बार फिर से फैशन, डाइट और एक्सरसाइज पर लौट आई. मैंने बॉडी इमेज को समझने के लिए कई किताबें पढ़ी और इस नतीज़े पर पहुचीं की बॉडी इमेज बचपन से ही बनती है.

मेरी काफी  इन्सल्ट होती थी. कभी मुझे कोई हाथी तो कभी लड़का बुलाते थे. घरवालों के मैसेज कि बात करें तो हमेशा कहते थे कि देखो तुम्हारी बहन कितनी सुंदर है, तुम्हारे चेहरे का रंग कितना ख़राब है. और, दोस्तों से भी यही सुनने को मिलता था की लड़को पर मसल्स अच्छे लगते है और लड़किया पतली दुबली और नाज़ुक अच्छी लगती है.

इन्हीं कमेंट्स  के कारण हम अपने लुक्स के प्रति एक अलग सी सोच बना लेते है. ये धारणा हमारे ज़िन्दगी जीने के नज़रिए को और हमारे खुद के प्रति और हमारी सोच को प्रभावित करती है. मेरा मूल्य सिर्फ इस पर निर्धारित रह जाता है की मैं कैसी दिखती हूं.

मुझे हमेशा अच्छा दिखना चाहिए, लोगों का धयान सबसे पहले मेरे लुक्स पर जायेगा, उनकी नज़रें सबसे पहले मेरी गलतियां खोजेंगी. और अगर उनको पता चलेगा कि मैं असल में कैसी हूं, तो वो मुझसे किनारा करना चाहेंगे.

मैंने अपने विचारों को लिखना शुरु कर दिया जिससे मेरे मन को काफी शांति मिली. लेकिन मेरा संघर्ष जारी रहा. अचानक फिर से मेरा वज़न बढ़ने लगा और जांच करने पर पता चला की मुझे ‘हाइपोथायरायडिज्म’ था. जिसके कारण वज़न आसानी से बढ़ता है.

जब मुझे काफी बड़े साइज़ के कपड़े खरीदने पड़ते थे तब में बहुत दुखी होती थी. सोचती थी कि क्या मुझे कभी मोटापे से छुटकारा नहीं मिलेगा. इतने बड़े शरीर को लेकर चलने में मुझे अंदर ही अंदर बहुत छोटा महसूस होता था. मेरा शरीर ही मेरी पहचान और मेरा अहम था. लोगों के बीच में बने रहने कि फिक्र मुझे लगातार परेशान करती थी.

जब में पीछे मुड़ कर देखती हूं तो ऐसे बहुत से मौंके याद आते है जिसका आनंद मैं सिर्फ अपने मोटापे के कारण नहीं उठा पाई. इस संघर्ष में मैं अकेली नहीं थी ऐसे बहुत से लोग थें जो अपने शरीर को लेकर कोई न कोई परेशानी का सामना कर रहे थे. बहुत पतला बहुत मोटा, बहुत छोटा या बड़ा कद , लडकियों में भारी स्तन या छोटे स्तन , घुंगराले या सीधे बाल, पीले या टेड़े मेढे दांत… इस लिस्ट का कोई अंत नहीं है.

मेरी एक दोस्त है जो बहुत पतली है लेकिन उसे लगता है की उसका थोड़ा सा पेट है. वहीं मेरी दूसरी दोस्त अपने छोटे स्तनों  को लेकर हमेशा परेशान रहती है. कुछ सहेलियां अपने शारीर की बनावट की कमियों को छुपाने के लिए ढ़ीले कपड़े पहनती हैं. कुछ ऐसे भी है जो हमेशा ये जानने की कोशिश करते है कि मैं कैसी लग रही हूं? क्या में मोटी लग रही हूं? कुछ दोस्त हमेशा यही बताने में लगे रहतें है कि मेरा वज़न कितना बढ़ गया हैं और कितना घट गया है.

जब से मुझे हाइपोथायरायडिज्म के बारे में पता चला मैंने ठान लिया कि मैं अब और संघर्ष नहीं करुंगी. क्या इस फैसले को लेने में मेरी मदद अकल ने की या फिर में पूरी तरह से थक चुकी थी. लेकिन सच्चाई ये थी की मैं थक चुकी थी. कहीं न कहीं मुझे लगा की ये समस्या सबको परेशान करती है, तो फिर ये समस्या ही नहीं हैं, ये ज़िन्दगी है.

अब मैंने अपने शारीर से लड़ना छोड़ दिया, और ध्यान और प्रार्थना में लग गई, और धीरे-धीरे भगवान के आशीर्वाद से मुझे अपने शरीर से लगाव होने लगा. मुझे ये बात अच्छे से समझ में आ गई की मैं जैसी हूं ठीक हूं. यहीं मेरा वक्तित्व हैं और यही मेरी पहचान.

इसी सोच को लेकर मुझे आगे बढ़ना हैं. मैं सुंदर, आकर्षक, हॉट, सेक्सी और गॉर्जस हूं. मैं फिर से एक बार दर्पण से दोस्ती कर सकती हूं. मुझे अपने शरीर से दोस्ती करने के लिए 20 साल लग गए. विश्वास नहीं होता लेकिन ये करके मेरे मन को बहुत शांति मिली.

अब मैंने अपनी एनर्जी ज्यादा महत्वपूर्ण कार्यो में लगा दी. मुझे अभी भी तैयार होना अच्छा लगता है. लेकिन अब में तैयार किसी को इम्प्रेस करने के लिए या अपनी कोई कमी को छुपाने के लिए नहीं करती. अब मैं अपनी ख़ुशी के लिए तैयार होती हूं. भगवान ने एक बहुत ही सुंदर सृष्टी की रचना की हैं. मुझे एक सुंदर शरीर दिया है. और ये मेरा कर्तव्य हैं कि मैं इस शरीर की अच्छे से देखभाल करूं और इससे प्यार करूं.

अब जब भी मेरे ख्यालों में वो हॉट स्लिम और सेक्सी शरीर आता हैं में उसी वक्त मोटापे और बीमारिओं से ग्रस्त व्यक्तियों के बारे में सोचने लगती हूं और अपने आप को ख़ुशकिस्मत समझती हूं. मैं तुरंत अपने आप को याद दिलाती हूं कि मेरा शारीर कितना स्वस्थ और फिट है. अब में लोगों के कमेंट की परवाह नहीं करती. आज में अपनी बॉडी को पहले से जादा प्यार और सम्मान देती हूं.

अब मेरे और मेरे शरीर के बीच में काफी अच्छी दोस्ती हो गई है. इसके कारण अब मैं खेलकूद में हिस्सा लेने लगी हूं. इस साल मैं हाफ मेराथन में दौड़ने की ट्रेनिंग ले रही हूं. मैं काफी उत्साहित हूं और अपने अंदर एक नई उर्जा महसूस कर रही हूं. आखिरकार मेरे और मेरे शारीर के बीच एक सही तालमेल बन गया है.

जो हमारा शरीर से रिश्ता बनता है उसी से हमारा अपने आप से रिश्ता बनता है.हम अपने शारीर को किस नज़र से देखते है उसी पर हमारी खुशियां आधारित रहती है.


दी लल्लनटॉप के लिए ये ट्रांसलेशन गौरव कुमार झा ने किया है.

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