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यूपी में अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक रहे अफसर को विकास दुबे एनकाउंटर पर शक क्यों है?

कानपुर में आठ पुलिसवालों की हत्या का आरोपी विकास दुबे 10 जुलाई को पुलिस मुठभेड़ में मारा गया. इस एनकाउंटर पर सवाल उठ रहे हैं. ‘दी लल्लनटॉप’ ने विभूति नारायण राय से इस मसले को लेकर फोन पर बात की. विभूति नारायण राय उत्तर प्रदेश में अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक रहे हैं. जानते हैं उन्होंने क्या कहा.

इस पूरी घटना को आप कैसे देखते हैं?

पूर्व एडीजीपी विभूति नारायण राय ने कहा, ये बहुत बुरी घटना है. बहुत ही शातिर तरीके से एक आदमी को मारा गया है. किसी भी जांच या न्यायिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया. कल से शोर हो रहा था कि उसे (विकास दुबे)  मार दिया जाएगा, मार दिया जाएगा. लेकिन लग रहा था कि शायद न मारा जाए, क्योंकि उसने जो नाटक किया था महाकाल मंदिर में कि मैं विकास दुबे कानपुर वाला हूं, उसने साबित कर दिया था कि उसे जिंदा पकड़ा गया था. ऐसे में उसे उम्मीद थी कि पुलिस उसे मारेगी नहीं.

क्या स्थिति होती है, जब एक दुर्दांत अपराधी को एक राज्य से दूसरे राज्य में ले जाया जाता है. क्या इस तरह की स्थितियां पैदा हो सकती हैं कि कोई गाड़ी से भागने की कोशिश करे और उसमें पुलिस को इस तरह गोली चलानी पड़े कि अपराधी की जान चली जाए?

पूर्व एडीजीपी ने कहा कि प्रैक्टिकली ये हो सकता है, लेकिन पता चल जाता है कि कौन-सी सच्ची घटना है और कौन-सी झूठी. जैसे उसे (विकास) को लेकर आ रहे थे, तो आपने हथकड़ी नहीं लगाई थी. उसके पैर में रॉड पड़ी थी. ऐसे में एक्सिडेंट हो जाए और जो पहले से ही ऐसी स्थिति में है, वो निकल जाए, इस पर कोई विश्वास नहीं करेगा. आप इतने बड़े क्रिमिनल को लेकर आ रहे हैं, तो हथकड़ी क्यों नहीं लगाई गई थी.

दूसरी चीज ये कि जो उज्जैन में हुआ था, वो सरेंडर था. जो आदमी सरेंडर कर रहा है, वो रास्ते में भागने की कोशिश क्यों करेगा. अब तो वो कानपुर जाता. उसे पता था कि उसकी गिरफ्तारी दिखाई जा चुकी है, तो पुलिस भी ज्यादा देर अपने पास नहीं रख पाती. 24 घंटे में मैजिस्ट्रेट के सामने पेश करना पड़ता. आज (10 जुलाई, 2020 को) ही 10-11 बजे तक तो मैजिस्ट्रेट के सामने पेश करना पड़ता, तो वो निश्चिंत था. इसलिए वो उज्जैन में चिल्ला रहा था कि मैं विकास दुबे हूं, ये शो करने के लिए कि पता चल जाए कि वो जिन्दा है.

पोस्टमॉर्टम में सामने आ सकता है सच

राय ने आगे कहा- मैंने सुना है कि उसको छाती पर गोलियां लगी हैं. अगर कोई व्यक्ति भाग रहा है, तो उसकी छाती पर गोलियां कैसे लग सकती हैं. गोलियां तो पीठ में लगनी चाहिए. छाती पर गोली तो तभी लगेगी, जब आप आमने-सामने से मार रहे हैं. अगर डॉक्टर ईमानदारी से पॉस्टमॉर्टम करें, तो ये पता चल सकता है कि उसे कितने करीब से गोली मारी गई है. इतने झोल हैं कि इसमें शामिल लोग मान रहे हैं कि इसकी कोई जांच नहीं होगी.

पुलिस हिंसा को समाज का समर्थन

राय का कहना है कि पुलिस की हिंसा को हमारा समाज भी सेलिब्रेट कर रहा है. कानपुर में लोग नारे लगा रहे हैं. मिठाइयां बांट रहे हैं. उसी तरह जैसे आज से चार महीना पहले हैदराबाद में डॉक्टर की हत्या के आरोपी जो पकड़े गए थे, मारे गए. सबको पता था कि पुलिस ने मारा है. इसके लिए उन्हें हार पहनाया गया, माला पहनाया गया. ये बहुत दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है. आप स्टेट के वायलेंस को रिकॉगनाइज कर रहे हैं. वैलिडेट कर रहे हैं और उसे रिस्पेक्टेबल भी बना रहे हैं. ये खतरनाक है.

पुलिस और प्रशासन ऐसा करते हुए जानते हैं कि वो जो कर रहे हैं वो ठीक नहीं है, लेकिन ऐसा क्या हो जाता है कि पुलिस की टीम जो इस तरह के वारदात में शामिल होती है उन्हें कभी उसका नतीजा नहीं भुगतना पड़ता. आपकी नजर में प्रोसिजियल दिक्कत क्या है?

राय ने आगे कहा- मैंने बहुत सारे मामलों में देखा है कि भुगतना भी पड़ा है. इस तरह के फैसले में ग्रुप में कौन रहा होगा. एक सीनियर इंस्पेक्टर रहा होगा. लेकिन उसके ऊपर के जो लोग हैं- एसएसपी, डिआईजी, आईजी, डीजी हैं, मुख्यमत्री तक ये बात जाएगी. इन लोगों को कब सजा मिलती है. ये हो ही नहीं सकता कि अगर कोई एनकाउंटर मैनेज हो, तो उसे सीनियर लेवल से क्लियरेंस न मिली हो. अगर सच में एक्सिडेंट हुआ था, तब तो समझ में आता है कि ग्राउंड पर जो सबसे सीनियर अफसर रहा होगा, वही फैसला करेगा. वो तो सिपाही भी कर सकता है कि अगर उसकी राइफल छीन कर कोई बदमाश भाग रहा है, तो उसको भी अधिकार है कि वो उसे मारे. लेकिन अगर एनकाउंटर मैनेज्ड है, तो ये तो हाइएस्ट लेवल से तय हुआ होगा. लेकिन जब सजा मिलेगी, तो इन्हीं लोगों को मिलेगी. टीम में जो सीनियर इंस्पेक्टर रहा होगा और बाकी टीम मेंबर्स को.

आप यूपी में एडीजीपी रहे हैं. यूपी में ये नेक्सस कितना तगड़ा है? पॉलिटिशियन, क्रिमिनल्स और पुलिस का?

बहुत तगड़ा है. अब इसी को लीजिए.अगर ये आठ लोगों को नहीं मारता, तो हम लोगों का ध्यान भी नहीं जाता. पिछले 15-20 साल में शासन करने वाली पार्टियां- बीजेपी, एसपी और बीएसपी, तीनों ने इसका इस्तेमाल किया. किसी न किसी पार्टी से इलेक्शन लड़ता रहा. इसने थाने में घुसकर मर्डर किया था. सपा की सरकार थी. उसके बाद इसको पुलिस का प्रोटेक्शन दिया था, जो बडे़ माफिया रहे. क्राइम के बल पर अरबों कमा लिए. विधायक बने, एमपी बने, मंत्री तक बने. वो पिछले 15-20 साल में इन तीनों पार्टियों के शह पर पले. कोई भी पार्टी दूध की धुली नहीं है.


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