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पाकिस्तानी प्लेयर के हार्ट ट्रांसप्लांट के लिए एक इंडियन हॉस्पिटल ने बड़ा दिल दिखाया है

1994 का साल था. पाकिस्तान ने पहले जर्मनी के खिलाफ चैंपियन्स ट्रॉफी और फिर हॉलैंड के खिलाफ खेलते हुए वर्ल्ड कप जीता था और कारण बना था एक खिलाड़ी. दोनों में मंसूर अहमद बतौर गोलकीपर पैनल्टी शूटआउट में गोल बचाकर मैच जीते थे. उस वक्त मंसूर अहमद का नाम पाकिस्तान में काफी पॉपुलर हो गया था.

अब यही खिलाड़ी इन दिनों मुसीबत में है. 49 साल के इस खिलाड़ी को अब हार्ट में दिक्कत है और डॉक्टरों ने हार्ट ट्रांसप्लांट की सलाह दी है. अब न तो मंसूर अहमद के पास र्प्याप्त पैसा है और न पाकिस्तानी हुकूमत की तरफ से मदद की कोई उम्मीद. ऐसे में मंसूर ने सोशल मीडिया पर इंडिया से मदद मांगी है. मंसूर ने एक वीडियो डालकर कहा है कि उसने खेल के मैदान पर इंडिया के मुंह से कई बार जीत छीनी और भारतीयों का दिल तोड़ा. मगर अब उसे भारत के सपोर्ट की जरूरत है और वो विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से अपील करना चाहते हैं कि उन्हें इंडिया आने के लिए मेडिकल वीजा दें और यहां इनका इलाज हो सके.

वीडियो देखिए:

मंसूर ने पाकिस्तान के लिए 1986 से 2000 तक बतौर गोलकीपर हॉकी खेला. वो टीम के कप्तान भी थे. इस दौरान इन्होंने 338 इंटरनेशनल मैच खेले, पाकिस्तान के लिए तीन ओलंपिक गेम्स में शामिल हुए. यही नहीं 1992 ओलंपिक्स में मंसूर की टीम को कांस्य पदक भी मिला था. 1994 का साल था जब पाकिस्तान ने चैंपियन्स ट्रॉफी और वर्ल्ड कप जीता था. इन दो इवेंट्स में पाकिस्तान के लिए एक अच्छी खबर थी. खबर ये कि दोनों इवेंट्स पाकिस्तान ने जीते थे और दोनों में मंसूर अहमद ने बतौर गोलकीपर  पैनल्टी शूटआउट में गोल बचाकर मैच जीते थे.

वहीं, मंजूर की इस अपील के बाद फोर्टिस अस्पताल ने मुंबई या चेन्नई में मुफ्त ट्रांसप्लांट करने का ऑफर किया है. फिलहाल मंसूर कराची के जिन्ना पीजी मेडिकल सेंटर में भर्ती हैं और वहां उनके हार्ट में डले पेसमेकर और स्टेंट में कुछ दिक्कत आ रही है. मुंबई मिरर के मुताबिक फोर्टिस के ज़ोनल डायरेक्टर डॉक्टर एस नारायणी ने कहा है कि मंसूर अहमद का रजिस्ट्रेशन मुंबई और चेन्नई के सेंटरों में कर दिया गया है. जैसे ही उन्हें सरकार से इजाज़त मिलती है, उनका इलाज यहां किया जाएगा.

कुछ दिन पहले शाहिद अफरीदी ने भी मंसूर के घर जाकर उनका हालचाल जाना था और इसका वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किया था.

वहीं महाराष्ट्र के स्वास्थय मंत्री डॉ. दीपक सावंत का भी इसपर बयान आया है,  “जब बात किसी इंसान की जान बचाने की आती है तो सरहदें कोई मायने नहीं रखती हैं. हम कई विदेशी नागरिकों का इलाज करवाते हैं और अगर किसी को इंडिया आकर इलाज करवाने की जरूरत है तो  किसी को कोई दिक्कत नहीं  होनी चाहिए.”

इस खिलाड़ी के लिए आगे का रास्ता आसान नहीं है. कारण ये कि किसी भी विदेशी मरीज के लिए तभी हार्ट का इंतजाम किया जा सकता है जब पहले से कोई भी इंडियन वेटिंग लिस्ट में न हो. इंडिया में आमतौर पर हार्ट ट्रांसप्लांट के लिए 6-8 महीने का वक्त लगता है. सरकार और अस्पताल दोनों को एक अंडरटेकिंग देनी पड़ती है कि हार्ट ट्रांसप्लांट किसी भी दूसरे मरीज को नजर अंदाज करके नहीं किया गया है.


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