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जल रहे हैं जंगल और पिघल रहे हैं ग्लेशियर, क्या होगा धरती का भविष्य?

जनवरी 2019. अमेज़न के वर्षावनों में लगी आग ने ख़ूब सुर्खियां बटोरी. साउथ अमेरिका का बड़ा हिस्सा इसकी चपेट में आया. ब्राज़ील इससे प्रभावित होने वाले देशों की लिस्ट में सबसे ऊपर था. उस तरफ पुराने सूखे पेड़ों को जलाकर खेती लायक ज़मीन तैयार करने की पुरानी परंपरा रही है. लेकिन 2019 में जो हुआ, वो कल्पना से परे था. उसी समय अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा की एक तस्वीर भी वायरल हुई. अंतरिक्ष से खींची उस तस्वीर में पूरा ब्राज़ील धुएं से घिरा दिख रहा था. अगले साल आगजनी की घटनाओं में 28 फीसदी बढ़ोत्तरी दर्ज़ की गई.

जून 2019. गर्मी के मौसम में ऑस्ट्रेलिया में वाइल्डफ़ायर की घटनाएं आम हैं. सूखे पेड़ों को जलाकर आग शांत पड़ जाती है. लेकिन 2019 में ऐसा नहीं हुआ. गर्म हवाओं और सूखे ने मिलकर इस आग को भड़का दिया. फिर क्या था? अगले कई महीनों तक ऑस्ट्रेलिया के जंगल स्वाहा होते रहे. इसकी आंच शहरों तक भी पहुंची. सिडनी जैसे महानगर में प्रदूषण स्तर 11 गुणा तक बढ़ गया. ऑस्ट्रेलिया के वाइल्डफ़ायर में ढाई करोड़ एकड़ से अधिक में फैले जंगल नष्ट हुए. एक अरब से अधिक जानवरों की मौत हुई. कई प्रजातियां तो लुप्त होने की कगार पर पहुंच गईं.

अक्टूबर-नवंबर 2020. हरिकेन एटा के कारण सेंट्रल अमेरिका बुरी तरह प्रभावित हुआ. कई देशों में बाढ़ और भूस्खलन ने सैकड़ों जानें ली. अस्सी लाख से अधिक लोग विस्थापित हुए. कुल नुकसान, लगभग साठ हज़ार करोड़ रुपये का. इन देशों ने तूफान से बचने के लिए पहले से तैयारी कर रखी थी. लेकिन रफ़्तार में मात खा गए. जानकारों ने कहा कि नए तूफ़ानों की रफ़्तार अनुमान से कहीं ज़्यादा थी.

अगस्त 2021. ग्रीस, तुर्की, स्पेन, इटली और लेबनान के जंगल एक-एक कर जल रहे हैं. अमेरिका का कैलिफ़ोर्निया स्टेट लगातार दूसरे बरस अपने इतिहास की सबसे ख़तरनाक वाइल्डफ़ायर का सामना कर रहा है. दुनिया के सबसे ठंडे इलाकों में से एक साइबेरिया के जंगलों में भी आग लगी है. रूस के कई शहरों के ऊपर धुएं की चादर बिछी हुई है.

जर्मनी और चीन में आई बाढ़ हो या ईरान में पड़ा सूखा. ये सारी घटनाएं अप्रत्याशित हैं. मतलब कि ऐसी आपदाओं का अनुमान किसी ने नहीं किया था. ये आपदाएं पिछले एक-दो साल के भीतर आईं है और उनकी संख्या लगातार बढ़ रहीं है. हाल में आई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि जो अतीत में देखने को मिला, वो तो ट्रेलर मात्र है. असली पिक्चर अभी बाकी है. और, ये पिक्चर सीधे तौर पर इंसानी सभ्यता के अस्तित्व से जुड़ी है.

यूनाइटेड नेशंस का पर्यावरण से जुड़ा पैनल है, इंटर-गवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज यानी IPCC. इसने जलवायु परिवर्तन के खतरे से जुड़ी अपनी विस्तृत रिपोर्ट पेश कर दी है. दो हफ़्ते तक चले मंथन के बाद 195 देशों ने रिपोर्ट को मंज़ूरी दी थी. यानी इस रिपोर्ट में जो कुछ बातें कही गईं है, उस पर दुनिया के अधिकांश देश एकमत हैं.

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प्रतीकात्मक तस्वीर. फोटो सोर्स- आजतक

इस रिपोर्ट का सार क्या है?

आसान भाषा में कहें तो ये हमारे लिए अंतिम चेतावनी की तरह है. अगर हमने समय रहते सही कदम नहीं उठाए तो अगले कुछ सालों में कई देश हमेशा के लिए लुप्त हो सकते हैं. इस रिपोर्ट में और क्या-क्या है? किन देशों पर सबसे अधिक ख़तरा मंडरा रहा है? भारत के संदर्भ में क्या बातें बताई गईं है? और, आगे का रास्ता क्या है?

पिछले कई वर्षों से ‘क्लाइमेट चेंज’ या जलवायु परिवर्तन सबसे चर्चित कीवर्ड्स की लिस्ट में बना हुआ है. दुनिया की आधी से अधिक समस्याओं की वजह. पहले ये समझते हैं कि क्लाइमेट चेंज आख़िर है क्या?

किसी इलाके में बरसों का वेदर पैटर्न क्लाइमेट कहलाता है. इस सामान्य स्थिति में आने वाला बदलाव क्लाइमेट चेंज है. मसलन, अंटार्कटिका में गर्मी पड़ने लगे या सहारा के रेगिस्तानों में बर्फ़ गिरने लगे. इससे क्या होगा? जो वहां की जलवायु के अनुकूल ख़ुद को ढाल चुके हैं, उनके लिए ज़िंदा रहना मुश्किल हो जाएगा. उनके लिए नई मुश्किलें पैदा होंगी. अगर वे नए माहौल में नहीं ढल पाए तो उनका नामलेवा भी न बचेगा.

ये आशंका अब तक हम किताबों में पढ़ रहे थे. लेकिन अब ये धरातल पर उतर आया है. दुनिया में क्लाइमेट चेंज़ की रफ़्तार बहुत तेज़ हो गई है. आप लगातार सुन रहे होंगे कि धरती पर मौजूद ग्लेशियर्स पिघल रहे हैं. इसके क्या नुकसान हैं? ग्लेशियर्स हमारी धरती, हमारे समंदरों की हिफ़ाजत करने वाली एक छतरी है. उनकी बर्फ़ सूरज से आ रही अतिरिक्त उष्मा को वापस अंतरिक्ष में फेंक देती है. इस तरह हमारे ग्रह का तापमान नियंत्रण में रहता है.

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प्रतीकात्मक तस्वीर. फोटो सोर्स- आजतक

लेकिन जब से क्लाइमेट चेंज आया है, ग्लेशियर्स तेज़ी से ख़त्म हो रहे हैं. आर्कटिक क्षेत्र की बर्फ़ ख़त्म हो रही है. उसके भीतर का समुद्री पानी एक्सपोज़ हो रहा है. ये अब सूरज की रोशनी को वापस अंतरिक्ष में नहीं भेजता. बल्कि उन्हें सोख लेता है. इसके चलते ध्रुवों का तापमान और बढ़ रहा है. ग्लेशियर्स पिघलने की प्रक्रिया लगातार बढ़ रही है. अनुमान है कि साल 2100 तक दुनिया के एक-तिहाई से अधिक ग्लेशियर्स पिघल जाएंगे.

इससे क्या ख़तरा है?

ग्लेशियर्स के पिघलने से समंदर का जलस्तर बढ़ेगा. प्रायद्वीपीय देश सबसे पहले डूबेंगे. एक उदाहरण है, हिंद महासागर का देश मालदीव. यहां के अस्सी फीसदी द्वीप समंदर से एक मीटर से भी कम की ऊंचाई पर बसे हैं. ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण हर साल समुद्र का स्तर तीन से चार मिलीमीटर बढ़ रहा है. कहा जा रहा है कि 2050 तक मालदीव के कई द्वीप समंदर में समा जाएंगे. इस सदी के अंत तक पूरा मालदीव ही गायब हो जाएगा. साल 2012 में मालदीव सरकार ने कहा था कि वे ऑस्ट्रेलिया, भारत और श्रीलंका में ज़मीन खरीदने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि विस्थापित लोगों को वहां बसाया जा सके.

एक तरफ देशों के डूबने का ख़तरा होगा, वहीं तापमान बढ़ने की वजह से कई इलाकों में सूखे के हालात बन जाएंगे. भू-जल का स्तर नीचे गिरा तो खेती के लिए पानी मिलना मुश्किल होगा. यानी भोजन पर संकट पैदा होगा. हीटवेव और वाइल्डफ़ायर की फ़्रीक्वेंसी बढ़ जाएगी. खतरनाक चक्रवातों और फ़्लैश फ़्लड्स की संख्या बढ़ जाएगी. डर वाली बात ये है कि इनका अनुमान लगा पाना मुश्किल होगा. मतलब ये कि इंसान हमेशा के भय के साये में ज़िंदगी बिताएगा.

हमने ये समझ लिया कि क्लाइमेट चेंज क्या है और इसके क्या नुकसान हैं? अब समझते हैं, इसका कारण क्या है?

तापमान में बेतहाशा वृद्धि की एक वजह है, कार्बन डाई ऑक्साइड का तेज़ी से हो रहा उत्सर्जन. आपको पता है. जंगल, पेड़-पौधे, मिट्टी, समंदर…ये सब क़ुदरत के फेफड़े हैं. हम जितना कार्बन डाई ऑक्साइड छोड़ते थे, उसका आधे से ज़्यादा हिस्सा ये सोख लेते थे. मगर इंसानों ने जंगलों को तेज़ी से काटना शुरू किया. कभी खेती के लिए. कभी खनिज-संसाधनों के लालच में. कभी इंसानी बसाहट के विस्तार के लिए. कभी कारख़ानों के लिए. जंगलों की कटाई के साथ-साथ कार्बन उत्सर्जन की गति भी बेतहाशा बढ़ती गई.

जब हमने कोयले, तेल और गैस का इस्तेमाल करना नहीं सीखा था, तब से अब तक धरती का तापमान औसतन 1.2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया है. वैज्ञानिकों ने एक लिमिट तय की थी. उनका कहना था कि डेढ़ डिग्री सेल्सियस तक की बढ़ोत्तरी को झेला जा सकता है. नया अनुमान कहता है कि 21वीं सदी खत्म होते-होते धरती का औसत तापमान तीन डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाएगा हम जिस रफ़्तार से आगे बढ़ रहे हैं, उसके अनुसार हम इस स्तर तक बहुत पहले भी पहुंच सकते हैं.

अभी वाले स्तर पर ही हम जैसी घटनाएं देख रहे हैं, तीन डिग्री सेल्सियस के स्तर पर क्या तबाही मचेगी, इसकी बस कल्पना ही की जा सकती है.

क्लाइमेट चेंज की इन्हीं भयावहताओं और आशंकाओं को IPCC की रिपोर्ट ने जोर-शोर से उठाया है. IPCC की स्थापना 1988 के साल में की गई थी. ये हर पांच-सात साल में क्लाइमेट चेंज से जुड़ा विश्लेषण पेश करती है. पिछली विस्तृत रिपोर्ट 2013 में आई थी.

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प्रतीकात्मक तस्वीर. फोटो सोर्स- आजतक

यूनाइटेड नेशंस के सेक्रेटरी-जनरल अंतोनियो गुतेरेस ने कहा कि ये आख़िरी वॉर्निंग है. IPCC की रिपोर्ट में एक स्वर में इस बात पर जोर दिया गया है कि पूरी समस्या की इकलौता वजह इंसानों की ज़रूरत से ज़्यादा दखलअंदाज़ी है.

रिपोर्ट में और क्या कहा गया है?

– दर्ज़ रेकॉर्ड के मुताबिक, हम इतिहास के सबसे गर्म मौसम में जी रहे हैं.
– हालिया समय में, समंदर का जलस्तर बढ़ने की रफ़्तार तिगुनी हो गई है. हम कितनी भी कोशिश कर लें, इसे रोकना नामुमकिन है.
– इस सदी के अंत तक समंदर का जलस्तर दो मीटर तक बढ़ सकता है. साल 2150 तक ये स्तर पांच मीटर तक पहुंच जाएगा.
– 1950 के बाद से हीटवेव्स की संख्या लगातार बढ़ी है. आनेवाले समय में इनका दायरा और बढ़ेगा.

विकसित देश तो अपने बचाव का रास्ता निकाल लेंगे. उनके पास पैसा है और संसाधन भी. लेकिन सबसे ज़्यादा ख़तरा ग़रीब देशों को होगा. जहां ग़रीबी, भूखमरी और अस्थिर सरकारों से लोग परेशान हों, वहां क्लाइमेट चेंज की बात करना मज़ाक की तरह होगा. उनकी ज़िम्मेदारी विकसित देशों को ही उठानी होगी. ये एक साझा मिशन है. एक भी हाथ छूटा, पूरा चक्र गड़बड़ा जाएगा.

वैज्ञानिकों ने साफ़-साफ़ कहा है अब वापसी का कोई रास्ता नहीं है. Either you act on it or face the consequences.

आगे का रास्ता क्या है?

जानकारों का कहना है कि अभी उम्मीद बची है. और वो संभव होगा साझा प्रयास से. अगर 2030 तक कार्बन उत्सर्जन को आधा और 2050 तक शून्य पर ले आया जाए तो तापमान को अनियंत्रित होने से रोका जा सकता है. हमारे पास ऊर्ज़ा के नए और सुरक्षित विकल्प उपलब्ध हैं.

जलवायु के बारे में वैज्ञानिकों की समझ लगातार विकसित हो रही है. हमारी कम्प्यूटर तकनीक का स्तर भी बढ़ा है. अब हम कहीं सटीक तरीके से मौसम का पूर्वानुमान लगा सकते हैं.

इन सबका मनमाफ़िक फल मिले, इसका ज़िम्मा सरकारों की इच्छाशक्ति पर टिका है. नवंबर 2021 में स्कॉटलैंड के ग्लासगो में 196 देशों के नेता इकट्ठा हो रहे हैं. क्लाइमेट चेंज को कंट्रोल करने की सारी उम्मीद इसी कॉन्फ़्रेंस पर टिकी है. इसमें नेता 2015 के पेरिस एग्रीमेंट की समीक्षा करेंगे. साथ ही वे आगे के रास्ता भी तलाशेंगे. IPCC की रिपोर्ट उन्हें क्लियर पिक्चर उपलब्ध कराएगी.

ग्लासगो के कॉन्फ़्रेंस से किन अहम फ़ैसलों की उम्मीद लगाई जा रही है?
– पहला, कोयले के इस्तेमाल पर रोक.
– दूसरा, जंगलों की कटाई पर बैन.
– तीसरा, इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा.
– और चौथा, रीन्यूएबल एनर्जी में निवेश.

कहा जा रहा है कि हमारी धरती का भविष्य काफी हद तक इसी कॉन्फ़्रेंस पर निर्भर करता है. उम्मीद यही करनी चाहिए कि हमारे जनप्रतिनिधि आपसी रंज़िश को भुलाकर इंसानी सभ्यता को बचाने के लिए एकजुट होंगे.

अब ये जानते हैं कि IPCC की रिपोर्ट में भारत के लिए क्या है?

इस सदी के अंत तक, भारत के 12 तटीय शहर तीन फीट तक पानी में डूब सकते हैं. इनमें मुंबई, चेन्नई, कोच्चि और विशाखापत्तनम जैसे शहर शामिल हैं. हिमालय के ग्लेशियर धीरे-धीरे कम होंगे. इसके अलावा, कई इलाकों में हीटवेव्स की आशंका भी जताई गई है. भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कार्बन उत्सर्जक देश है. पहले दो हैं, चीन और अमेरिका. उसके ऊपर उत्सर्जन में कटौती करने का दबाव रहता है. हालांकि, भारत का कहना है कि उसने अपनी ज़रूरत की तुलना में इसमें काफी कटौती कर ली है. भारत का तर्क है कि इस दिशा में पहल विकसित देशों को करनी चाहिए. उनके पास पैसे और संसाधन की कमी नहीं है.

ग्लासगो में तमाम विरोधाभासों का अंत हो पाता है या नहीं, यही करोड़ों ज़िंदगियों का भविष्य तय करेगा.

दुनिया भर की बड़ी खबरें-

वाणिज्य दूतावास को खाली कराने का ऐलान

भारत ने अफ़ग़ानिस्तान के मज़ार-ए-शरीफ़ के वाणिज्य दूतावास को खाली कराने का ऐलान किया है. भारतीय दूतावास ने शहर में रह रहे भारतीयों को भी विशेष विमान से निकलने की अपील की है. इन लोगों को भारतीय वायुसेना के विमान से नई दिल्ली लाया जाएगा.

उधर, तालिबान के बढ़ते हमलों के बीच दोहा में नए दौर की बात शुरू होने वाली है. अमेरिका की तरफ से ज़ाल्मी ख़ालिज़ाद इसमें हिस्सा लेंगे. अमेरिका और तालिबान के अलावा कई और देशों के प्रतिनिधि और संगठन भी इस बैठक में शामिल होंगे. इस बातचीत में युद्धविराम और हिंसा कम करने की संभावना तलाशी जाएगी. अमेरिका तालिबान पर हिंसा कम करने का दबाव बनाने की फ़िराक़ में है.

लेकिन तालिबान इस बात को मान ही लेगा, ऐसा कहा नहीं जा सकता. अमेरिका पहले ही तालिबान पर हवाई हमलों की संख्या बढ़ाने से इनकार कर चुका है. उसने साफ़ कर दिया है कि ये अफ़ग़ानिस्तान का आंतरिक मसला है. पेंटागन के प्रवक्ता का बयान है कि लड़ाई उनकी है, संघर्ष उनका है. हार-जीत भी उन्हीं की है. हमारा कोई लेना-देना नहीं.

अमेरिका दो दशक तक अफ़ग़ानिस्तान में कुंडली जमाकर बैठा रहा. वो आतंकवाद की समस्या का समाधान करने के इरादे से घुसा था. लेकिन अब उस समस्या को कई गुणा बढ़ाकर भाग रहा है. बहुत संभावना है कि इस हफ़्ते दोहा में होने वाली बातचीत बेनतीजा रह जाए. तालिबान, अफ़ग़ानिस्तान के अस्सी फीसदी से अधिक इलाके पर क़ब्ज़ा कर चुका है. पिछले चार दिनों में छह बड़े शहर उसके खाते में आए हैं.

दुनिया की महाशक्तियां लोकतंत्र बचाने और सभ्यता कायम करने की आड़ में अपना हित साधती रहीं है. जब उनके हित पूरे हो जाते हैं, वो पिछले दरवाज़े से निकल लेते हैं. इन सबमें पिसता है आम इंसान. अफ़ग़ानिस्तान इसका ताज़ा उदाहरण है. पिछले एक महीने में तालिबान और अफ़ग़ान सेना के बीच की लड़ाई में एक हज़ार से अधिक बेगुनाह नागरिक मारे जा चुके हैं. पिछले तीन दिनों में 27 बच्चों की हत्या हो चुकी है.

कनाडा और चीन के बीच क्या चल रहा है?

चीन की एक अदालत ने कनाडा के नागरिक रॉबर्ट सेलेनबर्ग की अपील खारिज कर दी है. रॉबर्ट को ड्रग्स की तस्करी के आरोप में मौत की सज़ा सुनाई गई थी. अब चीन का सुप्रीम कोर्ट इस फ़ैसले को रिव्यू करेगा. हालांकि, ये तय माना जा रहा है कि मौत की सज़ा बरकरार रहेगी. रॉबर्ट सेलेनबर्ग को दिसंबर 2014 में चीन में गिरफ़्तार किया गया था. नवंबर 2018 में उसे 15 साल जेल की सज़ा सुनाई गई.

इस फ़ैसले के कुछ दिन बाद कनाडा पुलिस ने टेक कंपनी हुवेई की सीएफ़ओ मेंग वांग्झू को हिरासत में ले लिया. चीन इससे नाराज़ हो गया. उसने धमकी दी कि अगर मेंग को नहीं छोड़ा गया तो नतीजा भुगतना पड़ेगा. कनाडा ने इस धमकी को नज़रअंदाज़ कर दिया. मेंग की गिरफ़्तारी के ठीक चार हफ़्ते बाद चीन में रॉबर्ट सेलेनबर्ग का केस दोबारा खुला. फिर से सुनवाई हुई और सज़ा को फांसी में बदल दिया गया.

कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने आरोप लगाया था कि चीन बदले की भावना से काम कर रहा है. तब से दोनों देशों के संबंध खराब चल रहें है. कनाडा के ही एक और नागरिक माइकल पेवोर के मुकदमे का फ़ैसला कल आने वाला है. माइकल के ऊपर जासूसी का आरोप है. चीन ने उनको मेंग की गिरफ़्तारी के कुछ दिनों के बाद अरेस्ट किया था.

लेबनान में ईंधन की सप्लाई में कमी

लेबनान में ईंधन की सप्लाई में कमी के कारण भयानक अफरा-तफरी मची है. 09 अगस्त को तेल भरवाने को लेकर हुई हिंसा में तीन लोग मारे गए. फ़्यूल शॉर्टेज़ की वजह से बड़ी आबादी बिना बिजली के रह रही है. नेशनल इलेक्ट्रिक कंपनी ने हाथ खड़े कर दिए हैं. कंपनी का कहना है कि वो दिन में एक घंटे से अधिक बिजली दे पाने की स्थिति में नहीं है. अस्पतालों के पास डीजल नहीं है. उनकी मशीनें बंद पड़ीं है.

ईंधन की तस्करी हो रही है. जिनके पास स्टॉक है, वो कालाबाज़ारी के धंधे में उतर चुका है. जबकि सरकार के पास इतना पैसा नहीं है कि वो तेल आयात कर सके. लेबनान पिछले साल से ही आर्थिक मंदी का सामना कर रहा है. पहले कोरोना महामारी और उसके बाद अगस्त 2020 में हुए बेरूत ब्लास्ट ने हालात और बिगाड़ दिए. लेबनान की मुद्रा का भाव कौड़ियों के बराबर रह गया है.

कल तक एक अमेरिकी डॉलर की क़ीमत 20 हज़ार लेबनीज़ पाउंड के बराबर थी. जब हम आपको ये ख़बर सुना रहे हैं, ये अंतर और बढ़ चुका होगा. सबसे बड़ी समस्या ये है कि लेबनान में अभी स्थायी सरकार नहीं है. दूसरे देशों का कहना है कि जब तक नई सरकार सुधारों को लागू नहीं करती, वे मदद नहीं करेंगे. कुल जमा बात ये है कि लेबनान फ़ेल्ड स्टेट बनने की कगार पर खड़ा है. बस दिन गिने जा रहे हैं.


 

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