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141 बरस पुराने इतिहास वाली कंपनी ने भारत से बोरिया-बिस्तर क्यों समेट लिया?

भारत को एक ग्लोबल मैनुफैक्चरिंग हब बनाने के सपने को नाम दिया गया मेक इन इंडिया. फिर कोरोना महामारी के दौरान इस बात का प्रचार हुआ कि जो कंपनियां चीन छोड़ेंगी, वो भारत आने वाली हैं. जब से अमेरिकी ऑटोमोबाइल निर्माता फोर्ड ने भारत में अपनी दोनों फैक्ट्रियों को बंद करने का ऐलान किया है, तब से सब इन्हीं पुरानी बातों को खोद-खोदकर निकाल रहे हैं. बहस के एक तरफ सरकार के आलोचक हैं, जो गिनवा रहे हैं कि जनरल मोटर्स, हार्ले डेविसन और यूनाइटेड मोटर्स के बाद अब फोर्ड भी अपनी दुकान बंद कर रहा है. मतलब सरकार की नीति में खामियां हैं. वहीं दूसरी तरफ सरकार के समर्थकों का दावा है कि GM, हार्ले और अब फोर्ड भी भारत से इसलिए जा रहे हैं क्योंकि वो भारत के बाज़ार के हिसाब से खुद को ढाल नहीं पाए. आज हम इसी सवाल को टटोलेंगे कि भारत में ऑटोमोबाइल मैनुफैक्चरिंग से विदेशी कंपनियों के लौटने की वजह पॉलिसी फेलियर है कि बिज़नेस फेलियर.

फोर्ड का वक्त बदला

Obstacles are those frightful things you see when you take your eyes off the goals.

मानी, बाधाओं से आपको तब डर लगता है, जब लक्ष्य से आपकी नज़रें हट जाती हैं. ये बात कभी फोर्ड कंपनी के संस्थापक हेनरी फोर्ड ने कही थी. लेकिन ऐसा लगता है कि उनका दर्शन फोर्ड कंपनी भारत में अपने कारोबार में ठीक से उतार नहीं पाई. फोर्ड मोटर्स ने भारत से बोरिया बिस्तर समेटने का ऐलान कर दिया है. 25 साल पहले जब फोर्ड ने भारत आने का मन बनाया था, तब महाराष्ट्र और तमिलनाडु में फोर्ड के स्वागत की होड़ मच गई थी. दोनों प्रदेश चाहते थे कि फोर्ड का प्लांट उनके यहां लगे. लाखों डॉलर के निवेश और बहुत सारी नौकरियों का मामला था, जो सरकारें चुनाव में भुना सकती थी. लेकिन फोर्ड अपने बड़े नाम के हिसाब से उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी. अमेरिका से चलकर दुनिया का कार बाजार जीतने वाली ये कंपनी भारत से हारकर लौट रही है. तो भारत में फोर्ड से कहां गड़बड़ हुई. क्यों नहीं टिक पाई. इस पर विस्तार से बात करेंगे. लेकिन पहले संक्षिप्त में फोर्ड का इतिहास. कैसे छठवीं कक्षा पास किसान के लड़के ने बिल्कुल ज़ीरो से शुरू करके इतनी बड़ी कंपनी बनाई थी.

19वीं सदी से शुरुआत

फोर्ड की कहानी 19वीं सदी के आखिर से शुरू होती है. अमेरिका के मिशिगन राज्य में डेट्रायट नाम का शहर है. डेट्रायट से कुछ मील दूर स्प्रिंगवेल्स नाम का इलाका. उस दौर में यहां ज्यादातर खेती किसानी करने वाले लोग रहते थे. तो स्प्रिंगवेल्स में ही एक किसान परिवार में 30 जुलाई 1863 को हेनरी फोर्ड का जन्म हुआ. हेनरी ने छठवी क्लास तक पढ़कर स्कूल छोड़ दिया. 16 साल की उम्र में ही कमाने के लिए पास के डेट्रायटर शहर चले गए. एक फैक्ट्री में काम मिल गया. मशीनों में उनकी दिलचस्पी थी. 1880 के दशक में उन्होंने पेड़ काटने वाले भाप के इंजनों की रिपेयरिंग शुरू कर दी. इंजन में उनकी दिलचस्पी बढ़ती गई. 1893 में उन्होंने चार पहियों वाली साईकिल बनाई. तीन साल की मेहनत के बाद साइकिल में इंजन जोड़ दिया.

इस तरह से 1896 में पहली बार इंजन से चलनी वाली चार पहियों की साइकिल जैसी एक कार हेनरी फोर्ड ने बनाई. अब उनको कार बनाने का फॉर्मूला आ गया था. इसलिए छोटी कारों के इंजन तैयार करने लगे. 1903 में जाकर 28 हज़ार डॉलर्स के साथ फोर्ड कंपनी शुरू की गई. और मॉडल ए, मॉडल बी, मॉडल सी, मॉडल टी- ऐसे नामों से फोर्ड कंपनी ने कारें बनाकर बेचना शुरू कर दिया. फिर थंडर, मस्टंग जैसी कारें बनाकर दुनिया में धूम मचा दी. तब अमेरिका में फोर्ड के मुकाबले सिर्फ जनरल मोटर्स कंपनी ही थी. 1920 और 30 के दशक में फोर्ड दुनिया की सबसे बड़ी कार कंपनियों में शुमार हो गई थी. इसके मालिक हेनरी फोर्ड की उस ज़माने में तूती बोलती थी. इतने ताकतवर और लोकप्रिय हो गए थे कि उन्हें राष्ट्रपति पद का दावेदार माना जा रहा था. 1924 के राष्ट्रपति चुनावों से पहले ज्यादातर सर्वे में जनता ने पहली पसंद हेनरी फोर्ड को बताया था. हालांकि बाद में उन्होंने अपनी दावेदारी वापस ले ली थी. और वो राष्ट्रपति नहीं बन पाए. लेकिन दुनिया के कार बाज़ार में उनका झंडा बुलंद रहा. और सोवियत, जर्मनी जैसे दुनिया के कई देशों में फोर्ड ने प्लांट्स शुरू कर दिए.

भारत में फोर्ड

अब फास्ट फोरवर्ड कर 1990 के दशक में आते हैं. भारत में नरसिम्हा राव की सरकार ने आर्थिक नीतियों में उदारीकरण लागू किया. दुनिया की कंपनियां भारत में अपना बाज़ार देख रही थी. हुंडई, रेनो, जैसे कई कार कंपनियां भारत का रुख कर रही थी. और इसी क्रम में 1996 में फोर्ड कंपनी भारत पहुंची. तमिलनाडु में चेन्नई के पास पहला मैन्यूफैक्चरिंग प्लांट शुरू किया. भारत में प्लांट खोलने से एक साल पहले ही फोर्ड ने महिंद्रा एंड महिंद्रा कंपनी के साथ साझेदारी कर ली थी. कहते हैं कि तब महिंद्रा ने फोर्ड पर महाराष्ट्र में प्लांट लगाने के लिए ज़ोर दिया था. बैकिंग थी महाराष्ट्र सरकार की. लेकिन बाजी तमिलनाडु ने मारी. उस वक्त की तमिलनाडु की मुख्यमंत्री ने अधिकारियों से कह दिया था कि किसी भी कीमत पर फोर्ड उनके राज्य में आनी चाहिए. फोर्ड ने भी तमिलनाडु को जाना बेहतर समझा. वजह ये भी थी कि उस वक्त देश के एक तिहाई ऑटोपार्ट्स तमिलनाडु में ही बनते थे. तो कंपनी को सहूलियत दिखी. इस तरह से भारत में फोर्ड की यात्रा शुरू हुई.

हिट या फ्लॉप?

महिंद्रा के साथ मिलकर फोर्ड ने पहली कार लॉन्च की एस्कॉर्ट. ये कार ज्यादा चली नहीं. इसके बाद 1999 में फोर्ड ने Ikon लॉन्च की. और फिर 12 और ब्रांड्स लॉन्च किए. कई मॉडल्स पॉपुलर भी हुए. फोर्ड फिगो, ईकॉस्पोर्ट्स ये गाड़ियां अब भी सड़कों पर आराम से दिख जाती हैं. कुछ गाड़ियों को छोड़कर फोर्ड का ज्यादातर मामला फ्लॉप ही रहा. 25 साल में फोर्ड भारत के बाज़ार में अपनी जगह नहीं बना पाया. हम पिछले वित्त वर्ष के कुछ आंकड़े देते हैं. फोर्ड ने साल भर में सिर्फ 48 हज़ार गाड़ियां बेची. यानी देश में जितनी गाड़ियां बिकी उसका 1.84 फीसदी. इस वित्त वर्ष के शुरुआती 5 महीनों में भी फोर्ड ने सिर्फ 15 हजार 818 गाड़ियां बेची हैं. जबकि दो साल पहले भारत आई किया कंपनी ने करीब 74 हज़ार यूनिट बेच दी हैं. खपत नहीं हुई तो फोर्ड का घाटा भी बढ़ता गया. 10 साल का घाटा है करीब 14 हजार करोड़ रुपये. बीच में एक बार 2011 के आसपास फोर्ड ने दोबारा खुद को खड़ा करने की कोशिश की थी. गुजरात के साणंद में अपना नया प्लांट शुरू किया. लाखों डॉलर इंवेस्ट किए. लगा कि शायद यहां से फोर्ड की किस्मत बदल सकती है. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. फोर्ड अपने घाटे में और उलझती गई.

क्यों पिछड़ी कंपनी?

अब बात आती है कि भारत में फोर्ड जम क्यों नहीं पाई. हिंदू बिजनेस लाइन अखबार में एन माधवन का इस पर अच्छा विश्लेषण मिलता है. वो लिखते हैं फोर्ड कंपनी भारत का बाज़ार ठीक से समझ नहीं पाई. अमेरिका के कार बाज़ार हमारे यहां का बाज़ार बहुत अलग है. अमेरिका में कार खरीदने वाले ये देखते हैं कि साइज़ कौनसी है या इंजन कौनसा है, कितनी ताकत है इंजन में. अपना मामला अलग है. हमारे लिए पैसा मायने रखता है. कीमत कितनी है, एवरेज कितना देती है. पुरानी होने के बाद बेचेंगे तो कित्ता पैसा उठेगा. कार खरीदने के हमारे ये पैमाने होते हैं.

फोर्ड को बहुत देर से ये बातें समझ में आई. बाजार को समझने में गंभीरता नहीं दिखाई थी. पहली कार एस्कॉर्ट से ही फोर्ड की इमेज खराब होती गई. एस्कॉर्ट दुनिया के ज्यादातर देशों में बाज़ार से बाहर हो चुकी थी. ज्यादा साख नहीं थी. गाड़ी दमदार साबित नहीं हुई, तो फोर्ड की खराब पब्लिसिटी हुई. फोर्ड ने बाज़ार को समझकर अपनी रणनीति बदलने की कोशिश की. फोर्ड फिएस्टा, फोर्ड फिगो जैसे छोटी गाड़ियां लॉन्च की. ये पसंद भी की गई है. फोर्ड इकॉस्पोर्ट्स का भी अच्छा मार्केट बन गया. लेकिन फोर्ड कभी भी सुज़ुकी और हुंडई को मात देने की हालत में नहीं रही. किसी रेंज में फोर्ड की गाड़ी बेस्ट सेलर नहीं रही.

बिज़नेस मॉडल असफल

पत्रकार कुशान मित्रा ने भी ट्विटर पर लिखा है कि फोर्ड क्यों फेल हुआ. उनके मुताबिक फोर्ड ने भारत की कुछ बेहतरीन कारें बनाई हैं. लेकिन खुद की वजह से ही वो फेल हो गए. एसयूवी सेगमेंट की कार ईकॉस्पोर्ट्स खराब मार्केटिंग और कीमत की वजह दूसरी कंपनियों को मात नहीं दे पाई. फोर्ड फिगो का पेट्रोल इंजन बेहतरीन है, लेकिन इस सेगमेंट में टाटा, हुंडई, या सुजुकी से ज्यादा नहीं बेच पाए. यानी अच्छी कारें बनाने के बावजूद फॉर्ड के बिजनेस मॉडल का फेल्योर रहा.

फोर्ड के फेल्योर को हम हुंडई के उदाहरण से भी समझ सकते हैं. 1996 में ही हुंडई ने भी भारत में अपना प्लांट शुरू किया था. फोर्ड और हुंडई की यात्रा साथ साथ शुरू हुई. तब हुंडई का फोर्ड जितना नाम भी नहीं था. हुंडई के लिए चुनौती ज्यादा थी. लेकिन 25 साल बाद आज हुंडई भारत की दूसरी सबसे बड़ी कंपनी है. पिछले वित्त वर्ष में हुंडई की लगभग 4 लाख 71 हज़ार गाड़ियां बिकी थी. भारत के कार बाजार में हुंडई की हिस्सेदारी 18 फीसदी से ज्यादा है.

कैसे हुआ ये. हुंडई ने भारत के बाज़ार की अच्छी रिसर्च की. ग्राहकों के मन को समझा. हुंडई की पहली कार थी सेंट्रो. हैचबैक कार. बिल्कुल नीचे से शुरू किया. सेंट्रो अपने सेगमेंट में हिट रही. यहां से हुंडई की इमेज भी अच्छी बनती गई. बाज़ार बनता गया और इसीलिए आज हुंडई का बाज़ार बढ़ रहा है और फोर्ड का सिमट गया है.

किसी कंपनी का बंद होना, मतलब हज़ारों लोगों का रोज़गार जाना. फोर्ड के जाने से करीब 4 हज़ार लोगों का रोज़गार सीधे तौर पर जाएगा. और करीब 40 हज़ार और लोग, जो अप्रत्यक्ष रूप से फोर्ड के साथ रोज़गार पा रहे थे. उनका भी नुकसान होगा. हालांकि फोर्ड ने कहा है कि कर्मचारियों से बात करके उनके नुकसान की भरपाई करेंगे. हालांकि ये नौकरी तो जाएंगी है. और अर्थव्यवस्था के मुश्किल दौर में ये पीड़ादायक है.


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