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बिहार में बाढ़: माल-मवेशी सड़क पर, झोपड़ी में से बहती नदी और पेड़ पर टंगा है 'विकास' का बल्ब

बिहार के पश्चिम चंपारण के मुख्यालय बेतिया को सुगौली से जोड़ने वाली मुख्य सड़क पर एक पुल है. पुल के नीचे से तिलावे नदी हल्ला मचाती हुई गुजर रही है और ऊपर करीब बीस टेंट लगे हैं. इसके बाद जो जगह बची है. वहां गाय, बैल और भैंस पागुर कर रहे हैं. थोड़ी देर पहले हल्की बरसात हुई है. सो गोबर पानी में मिलकर हर ओर फैल गया है. मानो किसी नौसिखिए ने पुल की सतह को गोबर से पोत दिया है. हम यहां पहुंचे तो बड़ी संख्या में लोग जमा हो गए. सिर के ऊपर काला छाता लगाए बुधन मांझी हमसे कहते हैं,

“हुज़ूर, देखीं कौना हाल में बानी. पूरा टोला डूब गईल बा. हमनी के कुछ त भेंटे के चाही” (देखिए, हम किस हाल में हैं. पूरा टोला डूब गया है. हम लोगों को कुछ मिलना चाहिए.)

इनके इतना कहते ही ये साफ हो गया है कि ये सभी लोग हमें सरकारी बाबू समझ रहे थे. और राहत की उम्मीद कर रहे थे. सो हमने भी अपना परिचय तुरंत दे दिया और आगे बढ़ गए. ये परिवार जो पुल पर टेंट में रह रहे हैं, वो करमवा गांव के मुशहरी टोला के रहनियार हैं. पुल की बगल में ही इनका टोला है. तीन दिन पहले जब नदी में पानी बढ़ा तो मुशहरी टोले से नदी बहने लगी.

हम टेंट और माल-मवेशियों के बीच से होते हुई पुल के दूसरे छोर पर आ गए हैं. यहां से मुशहरी टोला देखा जा सकता है. टोले के बीच से एक पक्की सड़क जा रही है, जिसकी दोनों तरफ छोटी-छोटी झोपड़ियां खड़ी हैं. इन झोपड़ियों के आसपास से नदी बह रही है. साफ दिखता है टोले में बाढ़ और गरीबी का संगम हुआ है, जिसमें विकास डूब रहा है.

हम सड़क पर बह रहे पानी को हेलकर आगे बढ़ते हैं. हर कोई हमें अपनी झोपड़ी दिखाना चाह रहा है. महिलाएं इस काम में सबसे आगे हैं. मांग भर सिंदूर लगाए और चमकीली लाल साड़ी पहने झूलीनिया मांझी साथ-साथ चल रही हैं और हर कुछ देर पर इशारे से बता रही हैं कि किस झोपड़ी की क्या हालत है. किस झोपड़ी में कब पानी आया और अभी उसकी क्या स्थिति है. जब हमने झूलीनिया से पूछा कि इस आफत में खाने-पीने का क्या इंतज़ाम है, तो जवाब भोजपुरी में मिला,

“का इंतज़ाम रहत! हमनी के ई दसा त हर साले के बा एहिला कुछ कूटा-पिसा के रखेली जा. अभी बाल-बच्चा उहे खाला. कौनो कुछ देवे वाला नइखे. जे आवेला से देख के चल जाला.”(कोई इंतज़ाम नहीं है. हर साल यही स्थिति रहती है सो पहले से अनाज तैयार रखते हैं. वही सब बच्चों को खिला रहे हैं. कोई कुछ देता नहीं है. जो आता है वो देखकर चला जाता है.)

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बाढ़ से जूझते मनुष्य और जानवर

ये जवाब कम, सवाल ज़्यादा है. हम अपने हिस्से का सवाल समझ चुके हैं. लेकिन नासमझ बने रहते हुए आगे बढ़ते हैं. इच्छा हुई कि सामने खड़ी कई झोपड़ियों में से किसी एक के अंदर दाखिल हुआ जाए. लेकिन ऐसा हो न सका. एक जगह कोशिश भी की तो पैर अंदर रखते ही धंस गए और बाहर निकलना पड़ा. इसलिए झोपड़ी के अंदर जाने का विचार छोड़ आगे बढ़ गए.

आगे घर नहीं दिख रहे थे. केवल पानी ही पानी है. सामने से तेज रफ़्तार में नदी की धारा बह रही है. मुझे लगा टोला खत्म. इसके आगे आबादी नहीं है. लेकिन तभी पीछे से पंद्रह-बीस साल के एक लड़के ने कहा,

“आगे बढ़ीं, आगे. एने के देख लेहनी त तनी ओनहू के त घर सब देखीं.” (आगे बढ़िए आगे. इधर का घर देख लिए तो उधर वाला भी देख लीजिए.)

लड़के की बात सुनने के बाद मेरे मुंह से अनायास ही निकल गया,

“क्या, उधर भी घर है? इस पानी को कैसे पार करेंगे? बहुत तेज धारा है?”

तभी बगल से एक आवाज आई,

“हुजूर, हमर नाम सिंहासन डोम ह. ओहे पारी घर में कमरभर पानी ह. विकलांग जनाना के ले के ओही में रहेलीं. चल के तनी देख लीं. ई पानी से न डरीं, हमनी के रोज़ पार करेली जा.” (हमारा नाम सिंहासन डोम है. उस तरफ घर है. इस पानी से मत घबराइए. हम रोज पार करते हैं. उस तरफ चल के एक बार घर की हालत देख लीजिए.)

Bihar flood
तस्वीर- विकास/लल्लनटॉप

सिंहासन डोम के इतना कहने और सामने से आ रहे दो लोगों को देखकर हिम्मत हुई. आगे बढ़े. यक़ीन मानिए, पानी बहुत तेज रफ्तार से बह रहा है. मेरे एक हाथ में कैमरा है. मैं उसे भूल गया हूं और सारा ध्यान पैर पर है. ऐसा लग रहा है कि कहीं भी पैर फिसला तो बह जाएंगे. यहां बड़ी बात ये नहीं है कि मुझे दिक्कत हो रही है. समझने वाली बात ये है कि इस टोले के आदमी, औरत और बच्चे रोज इसे पार करके आ-जा रहे हैं. कभी भी, कोई किसी बड़े हादसे का शिकार हो सकता है.

पानी की धारा को पार करके हम टोले के दूसरे हिस्से में आ गए हैं. यहां पक्के मकान हैं. लेकिन किसी भी घर में दरवाजा नहीं है. पर्दे के नाम पर कपड़े का एक टुकरा झूल रहा है. टोले के एकदम आख़िरी छोर पर सिंहासन डोम का घर है. दो कमरे हैं. बगल में कभी भी ढह जाने वाला शौचालय है. घर के सामने बरगद का एक बड़ा और घना पेड़ है. पेड़ पर बिजली का बल्ब झूल रहा है और नीचे सिंहासन डोम का परिवार पानी में तैर रहा है. जब हमने सिंहासन से पूछा कि बिजली आती है, तो वो तपाक से बोले,

“हां, बिजली त आवेला, लेकिन हमरा त एकठो घर चाही जे साल में चार महीना डूबल न रहे. बिजली-बत्ती त बादो में आई त चली.” (हां. बिजली आती है. लेकिन हमको अभी बिजली नहीं चाहिए. एक ऐसा घर चाहिए जो साल के चार महीना पानी में डूबा हुआ न रहे.)

सिंहासन डोम को लगता है कि बिजली-बत्ती के बाद में भी आने से काम चलेगा. लेकिन सरकार को ऐसा नहीं लगता. सरकार के मुताबिक़ बिजली की रौशनी में विकास का चेहरा चमकता है सो पहले बिजली आएगी. फिर इंटरनेट फ्री मिलेगा. हर घर को नल का जल मिलेगा. चाहे वो बाढ़ के इन तीन महीनों में बर्बाद हो जाए. फिर कहीं जाकर घर का नंबर आएगा. जब घर का नंबर आएगा भी तो इन्हें मिलेगा या नहीं, ये किसी को नहीं पता.


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