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निशिकांत कामत- वो फिल्ममेकर, जो एक्सीडेंट से फिल्मों में आ गया

मशहूर फिल्ममेकर-एक्टर निशिकांत कामत नहीं रहे. उन्हें 31 जुलाई को जॉन्डिस के इलाज के लिए हैदराबाद के एआईजी (AIG) हॉस्पिटल में भर्ती करवाया गया था. वहां पहुंचने पर पता चला कि दो साल से उन्हें लिवर सिरोसिस है. लिवर सिरोसिस में इंसान का लिवर पूरी तरह खराब हो जाता है. 12 अगस्त को अस्पताल की तरफ से बताया गया कि निशिकांत की हालत काफी नाज़ुक है. 17 अगस्त को उनके गुज़रने की खबर आ गई. वो 50 साल के थे. उन्हें ‘डोंबिवली फास्ट’ (मराठी), ‘मुंबई मेरी जान’, ‘फोर्स’, ‘दृश्यम’ और ‘मदारी’ जैसी फिल्मों के लिए जाना जाता था.

फिल्मों में कैसे आए?

निशिकांत फिल्मों में आने को एक एक्सीडेंट बताते थे. उनके पिता मैथ्स पढ़ाते थे और मां संस्कृत की प्रोफेसर थीं. पढ़ाई-लिखाई वाले माहौल में बड़े हुए निशि रामनारायण रुइया कॉलेज में पढ़ाई कर रहे थे. कॉलेज में नाटक का रिहर्सल चल रहा था, निशिकांत खड़े होकर देख रहे थे. इतने में उस नाटक के डायरेक्टर ने पूछा- चार लोगों की भीड़ में खड़े रहना है. खड़े रहोगे? निशि मान गए. वहीं से थिएटर का चस्का लग गया. कॉलेज में खूब हमककर थिएटर-नाटक वगैरह करने लगे. हालांकि वो इसे लेकर बहुत सीरियस नहीं थे. कॉलेज से पासआउट होने के बाद होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई करने के लिए गोवा चले गए. वहां तीन साल गुज़ारने के दौरान निशिकांत को अहसास हुआ कि वो जो कॉलेज में कर रहे थे, वो टाइम पास नहीं था. क्योंकि गोवा में वो थिएटर और नाटक को बुरी तरह से मिस कर रहे थे. मुंबई लौटकर घरवालों को बताया कि सिनेमा बनाना चाहते हैं, तो उन्होंने कोई ऐतराज़ नहीं जताया. ऐसे निशिकांत कामत शो-बिज़नेस में आए.

अपने करियर की फिल्म 'हवा आने दे' के एक सीन में निशिकांत कामत.
अपने करियर की  पहली फिल्म ‘हवा आने दे’ के एक सीन में निशिकांत कामत.

22 साल में एडिटर और 24 साल में डायरेक्टर बन गए

निशिकांत के करियर की शुरुआत हुई एक मराठी टीवी शो से. इस प्रोजेक्ट पर उन्हें चौथे असिस्टेंट डायरेक्टर का काम मिला. एक प्रोजेक्ट पर कई असिस्टेंट डायरेक्टर काम करते हैं और उनकी काबिलियत और अनुभव के आधार पर उन्हें काम दिया जाता है. इस शो पर काम करने के दौरान उन्हें एडिटिंग का प्रोसेस करीब से देखने को मिला. 8 महीने टीवी में असिस्टेंटगिरी करने के बाद वो एडिटिंग करने लगे. तब उनकी उम्र कुछ 22 साल थी. इसके दो साल बाद उन्हें एक टीवी शो डायरेक्ट करने का भी मौका मिला. लेकिन मज़ा नहीं आ रहा था. उन्हें पिक्चर बनानी थी. जब भी किसी प्रोड्यूसर से मिलने जाते, वो टीवी का नाम सुनकर सकुचा जाता है. ऐसा काफी बार हुआ. इसलिए पांच साल काम करने के बाद निशिकांत ने टीवी छोड़ दिया.

रितेश देशमुख के प्रोडक्शन में बनी फिल्म 'लय भारी' के म्यूज़िक लॉन्च इवेंट पर राज ठाकरे और रितेश के साथ डायरेक्टर निशिकांत.
रितेश देशमुख के प्रोडक्शन में बनी फिल्म ‘लय भारी’ के म्यूज़िक लॉन्च इवेंट पर राज ठाकरे और रितेश के साथ डायरेक्टर निशिकांत.

बेरोज़गारी के दो साल दोस्तों के पैसे पर गुज़ारे

टीवी छोड़ने के बाद निशिकांत के पास कुछ काम नहीं था. घरवालों को पता न चले, इसलिए हर सुबह 10 बजे बाहर निकल जाते और रात को वापस लौटते. ये पूरा समय वो अपने कॉलेज में दोस्तों के साथ गुज़ारते. दोस्त चाय पिलाते, दोपहर का खाना खिलाते. निशि के एक दोस्त थे विनायक. मुंबई के माटुंगा इलाके में उनका एक उडुपी रेस्टॉरेंट हैं. उन दिनों में विनायक रोज निशिकांत को 50 रुपए देते थे. और उसके बारे में कभी कोई ज़िक्र नहीं करते. 1999 से 2001 तक ऐसा ही चलता रहा. इसी बीच निशिकांत की मां की डेथ हो गई. इस घटना के कुछ ही दिन बाद हालात बदल गए. फिल्म इंडस्ट्री में डायरेक्टर के नाम पर एंट्री पाना काफी मुश्किल हो रहा था, इसलिए निशिकांत लिखने लगे. मां की मौत के ठीक दो महीने बाद निशि को उनकी पहली फिल्म मिली. उनकी लिखी कहानी पर मराठी फिल्म ‘सातच्या आत घरात’ बन रही थी. ये कुछ नौजवान लोगों की कहानी थी, इसलिए डायरेक्टर संजय सरकार चाहते थे कि इसकी स्टारकास्ट भी यंग हो. उन्होंने निशिकांत को एक रोल ऑफर कर दिया. तब हालांकि निशि की उम्र 30 के पार थी लेकिन लंबे बाल वाले लुक की वजह से उनकी उम्र पता नहीं चलती थी. पहली ही फिल्म में निशिकांत को राइटर और एक्टर दोनों का काम मिल गया. ठीक इसी समय एक हिंदी फिल्म ‘हवा आने दे’ पर काम चल रहा था. बतौर एक्टर निशिकांत को इसमें भी कास्ट कर लिया गया. ‘सातच्या आत घरात’ तो बड़ी हिट रही लेकिन ‘हवा आने दे’ इंडिया में कभी रिलीज़ नहीं हो पाई. लेकिन इस फिल्म ने इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में काफी तारीफ बटोरी. निशिकांत की एक आदत थी कि वो जब भी कोई अवॉर्ड जीतते, मुंबई पहुंचने के बाद सबसे पहले विनायक के रेस्टॉरेंट जाते थे.

अपने दोस्त विनायक के साथ उनके रेस्टोरेंट के बाहर निशिकांत.
अपने दोस्त विनायक के साथ उनके रेस्टोरेंट के बाहर निशिकांत.

डायरेक्शन में डेब्यू किया और तहलका मचा दिया

2005 में बतौर डायरेक्टर निशिकांत कामत की पहली फिल्म रिलीज़ हुई. मराठी भाषा की ‘डोंबिवली फास्ट’. ‘एक आम आदमी अपनी रोजमर्रा की ज़िंदगी जी-जी कर पागल हो जाता है.’ अपनी लिखाई वाले दिनों में निशिकांत ने एक लाइन लिखकर रखी थी कि इस आइडिया पर कभी फिल्म बनाएंगे. इसी आइडिया पर उन्होंने ‘डोंबिवली फास्ट’ बनाई. माधव आप्टे नाम के एक ईमानदार नौकरीपेशा आदमी की कहानी, जो समाज में फैले भ्रष्टाचार से तंग आकर एक दिन समाज बदलने निकल पड़ता है. इस डर से कि जो लोग आज भ्रष्ट नहीं हैं, कल शांति से रहने के लिए उन्हें भी भ्रष्ट होना पड़ेगा. ‘डोंबिवली फास्ट’ अपने समय की सबसे कमाऊ मराठी फिल्म बनी. ढेरों अवॉर्ड्स मिले, जिसमें बेस्ट मराठी फिल्म का नेशनल अवॉर्ड भी शामिल है. निशिकांत कामत पहली ही फिल्म से डायरेक्टर के तौर पर स्थापित हो गए. उन्होंने अपनी ही इस फिल्म को तमिल में रीमेक किया, जिसे अब्बास-मस्तान की जोड़ी ने प्रोड्यूस किया. ये उनका पहला तमिल प्रोडक्शन था. ‘एवानो ओरुवन’ नाम से बनी ये फिल्म जबरदस्त हिट साबित हुई और क्रिटिकल अक्लेम के तो क्या ही कहने.

फिल्म 'डोंबिवली फास्ट' के पोस्टर पर फिल्म का नायक माधव आप्टे, जिसका किरदार संदीप कुलकर्णी ने निभाया था.
फिल्म ‘डोंबिवली फास्ट’ के पोस्टर पर फिल्म का नायक माधव आप्टे, जिसका किरदार संदीप कुलकर्णी ने निभाया था.

फिल्म बनाकर गायब हो गए, जॉन अब्राहम ने फोनकर बुलाया

2006 में निशिकांत लंदन गए हुए थे. उनके जाने के दो-तीन दिन के बाद मुंबई लोकल ट्रेन में बम धमाके हुए. मुंबई लोकल शहर की लाइफलाइन मानी जाती है. ये ब्लास्ट शाम 06:24 पर हुए, जो कि एक बड़ी आबादी के काम से लौटने का समय होता है. इस ब्लास्ट में सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 209 लोग मारे गए और 700 से ज़्यादा घायल हुए. इस घटना ने निशिकांत को हिला दिया. वो वापस मुंबई आए और इसके इर्द-गिर्द एक फिल्म बनाने की सोचने लगे. वो उस घाव को दिखाना चाहते थे, जो उस ब्लास्ट ने लोगों के दिल पर छोड़े थे. ये फिल्म थी ‘मुंबई मेरी जान’. एक बड़ी घटना पर सतही कमेंट्री की बजाय एक मजबूत सोशल ड्रामा. इसे निशिकांत अपनी सबसे पर्सनल फिल्म मानते थे. क्योंकि इसे बनाते समय वो कई ऐसे भावों से गुज़रे, जो उन्होंने अपने जीवन में कभी महसूस नहीं किए थे. लोगों की उजड़ी हुई ज़िंदगियों को उतने करीब से नहीं देखा था. उस घटना में मरे 209 लोगों की 209 कहानियां रही होंगी. निशि ने अपनी फिल्म के लिए उसमें से पांच कहानियां चुनीं. ये फिल्म रिलीज़ हुई, पैसे तो ज़्यादा नहीं कमाए लेकिन इसकी खूब तारीफ हुई. ‘मुंबई मेरी जान’ वाले जोन से बाहर आने के लिए निशिकांत ने अपना फोन-इंटरनेट बंद किया और गायब हो गए. 15 दिन बाद जब लौटे, तो कई प्रोड्यूसर्स उन्हें अपनी फिल्म डायरेक्ट करने का ऑफर दे रहे थे. उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि अब किस तरह की फिल्म बनाई जाए. ये सोचने के लिए वो फिर से गुम हो गए.

फिल्म 'मुंबई मेरी जान' के तीन अलग-अलग दृश्यों में परेश रावल, सोहा अली खान और इरफान. इनके अलावा फिल्म में के.के. मेनन और आर. माधवन ने भी ज़रूरी किरदार निभाए थे.
फिल्म ‘मुंबई मेरी जान’ के तीन अलग-अलग दृश्यों में परेश रावल, सोहा अली खान और इरफान. इनके अलावा फिल्म में के.के. मेनन और आर. माधवन ने भी ज़रूरी किरदार निभाए थे.

डेढ़ साल बाद उन्हें जॉन अब्राहम का फोन आया. उन्होंने एक तमिल फिल्म ‘काखा काखा’ के बारे में बताया. जॉन उसे हिंदी में बनाना चाहते थे. उन्होंने प्रोड्यूसर्स को साफ कह दिया था कि वो इस फिल्म का हिस्सा तभी बनेंगे, जब इसे निशिकांत कामत डायरेक्ट करेंगे. जॉन के ऑफर से खुश होने की बजाय निशिकांत चिंतित हो गए. वो इस पसोपेश में पड़े थे कि अगर उन्हें कहानी पसंद आ गई और जॉन उसमें फिट नहीं बैठे, तो क्या करेंगे. फाइनली उन्होंने फिल्म देखी और सभी चीज़ें अपनी जगह पर फिट हो गईं. उन्होंने जॉन से कहा वो इस फिल्म को फ्रेम टु फ्रेम रीमेक नहीं करना चाहते. वो इसे नॉर्थ इंडियन ऑडियंस और अपनी समझ के हिसाब से दोबारा लिखना चाहते हैं. इसके लिए उन्होंने पांच महीने का समय मांगा. साथ ही जॉन अब्राहम को 15 किलो वजन बढ़ाने का टास्क भी दे दिया. जब फिल्म पर काम शुरू हुआ, तब तक मेन प्लॉट के अलावा पूरी कहानी बदल चुकी थी. जॉन के साथ नए लोग कास्ट किए गए. ये सब चीज़ें मिलाकर ‘फोर्स’ नाम की फिल्म बनी. ये बढ़िया एक्शन फिल्म थी, जिसने ठीक-ठाक पैसे कमाए और सबके करियर को फायदा पहुंचाया. अगली बार निशिकांत और जॉन ने ‘रॉकी हैंडसम’ नाम की फिल्म पर साथ काम किया.

'फोर्स' की सक्सेस पार्टी के दौरान जॉन अब्राहम, विद्युत जामवाल और फिल्म के प्रोड्यूसर विपुल अमृतलाल (सबसे दाएं) शाह के साथ डायरेक्टर निशिकांत कामत.
‘फोर्स’ की सक्सेस पार्टी के दौरान जॉन अब्राहम, विद्युत जामवाल और फिल्म के प्रोड्यूसर विपुल अमृतलाल (सबसे दाएं) शाह के साथ डायरेक्टर निशिकांत कामत.

जब इरफान प्रोड्यूसर बने, तो फिल्म निशिकांत ने डायरेक्ट की

निशिकांत कामत एक्टर्स के भरोसेमंद डायरेक्टर थे. जिन्होंने भी अपना खुद का प्रोडक्शन शुरू किया, उनकी फिल्में निशिकांत ने डायरेक्ट कीं. ‘रॉकी हैंडसम’ जॉन के प्रोडक्शन की फिल्म थी. ‘फोर्स’ के बाद निशि रितेश देशमुख के प्रोडक्शन में बन रही फिल्म ‘लय भारी’ डायरेक्ट की, जिसमें सलमान खान ने गेस्ट अपीयरेंस किया था. ये फिल्म भी ब्लॉकबस्टर साबित हुई. मोहनलाल की ‘दृश्यम’ को रीमेक करने के लिए एक बार फिर से उन्हें चुना गया. इस फिल्म में वो पहली बार अजय देवगन के कद के सुपरस्टार के साथ काम कर रहे थे. इसे हिंदी सिनेमा इतिहास की सबसे शानदार थ्रिलर फिल्मों में गिना जाता है. 2016 में इरफान ने जब फिल्म प्रोडक्शन में कदम रखा, तो उन्हें भी अपने पुराने दिनों के साथी निशिकांत की ही याद आई. निशि और इरफान ने 1994 में एक टीवी शो पर साथ काम किया था. ‘मुंबई मेरी जान’ में भी  इरफान ने एक साउथ इंडियन मजदूर का रोल किया था. इरफान और निशिकांत के इस कोलैबरेशन का नाम था ‘मदारी’. एक सोशल थ्रिलर, जिसे इरफान का वन मैन शो कहा गया. ये फिल्म भी सफल साबित हुई. डायरेक्टर के तौर पर ये निशिकांत कामत की आखिरी फिल्म साबित हुई. हालांकि वो इंडस्ट्री में एक्टिव रहे और एक्टिंग प्रोजेक्ट्स पर काम करते रहे. उन्होंने ‘डैडी’ और ‘जूली 2’ जैसी फिल्मों में अहम किरदार निभाए. वो आखिरी बार विक्रमादित्य मोटवाने की ‘भावेश जोशी’ में विलेन के रोल में नज़र आए थे.

फिल्म 'मदारी' के प्रमोशन के दौरान निशिकांत और इरफान. अब दोनों ही इस दुनिया में नहीं हैं.
फिल्म ‘मदारी’ के प्रमोशन के दौरान निशिकांत और इरफान. अब दोनों ही इस दुनिया में नहीं हैं.

वीडियो देखें: इरफान की लाइफ के वो किस्से जो उन पर बुक लिखने वाले पत्रकार ने बताए

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