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फिल्मी किस्से: LOC कारगिल देखने गए थे, साइकिल देख आए

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एक अादमी था सदी भर पहले. उसके पैर में चक्कर था. अांखों में नवेले सपने. नासिक. बम्बई. गोधरा. लंदन. पढ़ाई आर्ट स्कूल से की थी. नाम बदलकर जादू के खेल दिखाने का शौक था. तकनीक का प्रेमी था. कहानियों में जीता था.

एक दिन बम्बई में घूमते, अचानक टेंट में चलता एक कमाल का ‘जादू’ देखा. क्या था ये जादू? यूरोप से वाया ब्रिटेन होते सिनेमा हिन्दुस्तान आ गया था. धुंडिराज गोविन्द फाल्के ने परदे पर चलती ‘लाइफ अॉफ क्राइस्ट’ देखी अौर मन ही मन कर तय कर लिया कि यही है वो ‘जादू’ जिसे उन्हें उमर भर दिखाना है. ‘लाइफ अॉफ क्राइस्ट’ देखी थी. क्या बनाना है इसका आइडिया वहीं था. उन्होंने भारतीय मिथकों को सिनेमा के परदे पर ज़िन्दा करने की सोची. वे कृष्ण चरित्र पर फिल्म बनाना चाहते थे, लेकिन कहानी का बड़ा फलक देखते हुए कैमरे की आंख से पहले एक ‘छोटी कहानी’ सुनाने की सोची. लेकिन कहानी ऐसी जो लोगों की स्मृतियों का हिस्सा हो. फिल्म बनी ‘राजा हरिश्चंद्र‘.

तारीख थी 3 मई अौर साल था 1913. बम्बई के कोरोनेशन थियेटर में ‘राजा हरिश्चचंद्र’ का पहला टिकटवाला शो हुआ. सिनेमा का जादू लोगों पर चल गया. इतिहास गवाह है, फिल्म की रील चल-चलकर ऐसी घिसी कि बरबाद हो गई. चार साल बाद ही फाल्के को जनता की मांग पर फिल्म दोबारा बनानी पड़ी. सिलसिला चल निकला.

वो दिन है अौर आज का दिन है. हम ऐसे डूबे इन कहानियों के जादू में, कि उस सदी भर पुरानी 3 मई की स्क्रीनिंग से अब तक उबर नहीं पाए हैं. ये कमबख्त सिनेमा हमें लील गया. जैसा ज्ञानी पुरुष रामाधीर सिंह ‘गैंग्स अॉफ वासेपुर’ में कह गए हैं, हम सबकी अपनी-अपनी पिच्चर बनने लगीं अौर मन के परदों पर चलने लगीं. हम उसी में जीने-मरने लगे. प्यार करने लगे.

आज उसी जादू भरे दिन की याद में. पेश है आपकी खिदमत, हम सबकी ‘अपनी-अपनी पिच्चरें’…

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देखो फिल्म देखने का शौक तो है हमको. लेकिन फर्स्ट डे फर्स्ट शो वाले नहीं हैं. तसल्ली से देखते हैं. अब तो लैपटॉप, डीवीडी की वजह से किश्तों में फिल्म देखते हैं. दो घंटे की पिच्चर खतम होने में कभी कभी 15 दिन लग जाते हैं. कभी एक दिन में चार देख लेते हैं. हमारे फिल्मी टेस्ट पर भी डार्विनवाद का असर पड़ा है. मतलब विकास की वही थ्योरी यहां भी लागू होती है.

पहले मित्थुन की वो फिल्में देखते थे जिनमें वो साइकिल के पीछे छिप जाते हैं. दोनों हाथों से लाठी को इस तरह नचाते हैं कि उनके बीच से बंदूक की गोलियां आकर लौट जाती हैं. आज कल के लौंडे उन सीन्स के GIF बनाके मौज लेते हैं. धर्मेंद्र की शॉर्ट स्कर्ट वाली फिल्म देखे हैं. वो वाली भी जिसमें वो विलेन की बंदूक से चली गोली को अपनी हथेली से रोक लेते हैं. और फिर अगला कतलकारी डायलॉग- तुम्हारी ये गोली, लोहे के इस शरीर के पार नहीं जा सकती. चलो वो सीन देख लो फिर आगे बात करें.

तो अंदाजा लग ही गया होगा कि कित्ते अच्छे से फिल्में देखे हैं हम. शोले पहली बार देखी थी 20 साल की उमर में. अमा गरियाव न बहुत दर्दनाक इस्टोरी है. हम देखने पाए यही क्या कम है. चलो अपने आदमी हो इसलिए बता देते हैं. इधर कान लाओ. दरअसल शोले और हमारा मेल जल्दी में बन नहीं पाया. ऊपर से कुंडली नहीं मिला कर भेजी गई होगी. जब हमारे घर ब्लैक एंड व्हाइट टीवी आया तो बैटरी आने में कुछ 7-8 साल लग गए. तो जब दिन में शोले आती थी तो हम स्कूल में होते थे. जब रात में आती थी तो बिजली नहीं होती थी. इसलिए जब तक गांव में रहे तब तक शोले देखने में कामयाबी नहीं मिली.

***

जहां तक अपनी लकड़बुद्धि की याददाश्त जाती है. हम पहली बार फिल्म देखे थे, वो भी पिच्चर हाल में, तो हमारी उम्र 6-7 साल थी. लखनऊ के लीला फिल्म थिएटर में गए थे. लीला के बारे में लखनऊ के बुजुर्ग बताते हैं कि वहां का परदा सबसे बड़ा और धांसू क्वालिटी का है. लेकिन ‘ससुरा बड़ा पइसा वाला’ आने के बाद वहां सिर्फ भोजपुरी फिल्में चलती हैं. तो हम गए थे लखनऊ, मौसी के घर. वहां मौसेरा भाई लगभग मेरी ही उम्र का. मुझसे ज्यादा चंट. दोनों लोग प्लान करके पहुंच गए. उसने टिकट खिड़की पर विकट कठिनाइयों से गुजर कर टिकट का जुगाड़ किया. वहां ‘दिलजले’ लगी थी, अजय देवगन वाली. मेरा पहला एक्सपीरिएंस था. इतनी तेज आवाज सुन कर फूंक सरक गई थी. ऊपर से मार काट, धूमधड़ाका. वहां तो अमरीश पुरी की आवाज सुने “यहां तो सभी दिलजले हैं लाले.” उस डायलॉग को रट लिेए. और सोनाली को दिल देकर लौट आए. उसमें हुई मार धाड़ का बड़ा असर था. उसी तरह सांय सांय ढिशुम ढिशुम करते हुए घर पहुंचे. वहां मम्मी इंतजार कर रही थीं. उसके बाद दिलजले में शक्ति कपूर का रोल याद कर लो. हम बता नहीं पाएंगे.

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दूसरा यादगार किस्सा उससे साल दो साल बाद का है. उसी दिन हमारे घर में ब्लैक एंड व्हाइट टीवी आया था. शटर वाला. अब सोचो. जिस दिन आपके यहां ऐसा कुछ आया था तो उसके बाद कितनी रातों तक नींद नहीं आई थी. हमारी तो पहिली रात थी यार. जुमे का मुबारक दिन. शुक्रवार की रात साढ़े नौ बजे फिल्म आती थी. डीडी1 पर. नई फिल्में दिखाने से परहेज था इस चैनल पर. शायद अब भी होगा. लेकिन एक आराम था. कि फिल्में बदल बदल कर दिखाते थे. सिर्फ सूर्यवंशम नहीं.

तो उस शुक्रवार आने वाली थी आशिक आवारा. सैफ अली खान और ममता विवादित कुलकर्णी की. तब ममता की जिंदगी में स्टारडस्ट की कामयाबी थी. विक्की ड्रग्स डोनर उनकी लाइफ में नहीं आया था. तो साहब टीवी आकर मेज पर धर गया. बाहर बरामदे में लगा था. गांव मोहल्ले के भी कुछ लोग आकर जमे थे. लंबा बांस जिसने कलेजा मजबूत करके दिया था. वो दादा भी वहीं खड़े थे. उसमें अंटीना सेट किया जा रहा था. ये सब तैयारी हो चुकी थी. प्लग तक सॉकेट में खोंसा जा चुका था. साहिबान, अब इंतजार था बिजली का.

चलो आंखें झपका लो अब. तो जैसे ही घड़ी नौ बजाइस, सबके पेचिस शुरू. मतलब पेट में दर्द भैया. रोज नौ बजे लाइट आती थी. उस दिन नहीं आई. उस दिन आई नौ बज कर 10 मिनट पर. और वो दस मिनट…दस मिनट दस साल की तरह गुजरे हैं. बिजली आते ही टीवी सरसराने लगा. आवाज आ रही थी. कुछ दिखाई नहीं दे रहा था. एक लड़का ऊपर दौड़ाया गया. जहां से उसे अंटीना वाला बांस घुमाना था. एक बीच में स्टेटस बताने के लिए. और हमारे बड़े भाई साहब गड़ गड़ करके चैनल घुमा रहे थे. उसको एक खास एंगल पर लाकर बीच में ईंट का अद्धा टुकड़ा फंसा दिया. तो आवाज थोड़ी खराब, और तस्वीरें थोड़ी साफ हो गईं. सब चिल्लाने लगे बस बस बस बस. और उन हालात में हमने आशिक आवारा देखी.

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तीसरी यादगार फिल्म है LOC कारगिल. जब ये आई थी तो हम इंटर में एडमिशन ले चुके थे. दिसंबर की घनघोर ठंड थी. स्कूल से 200 मीटर दूर फट्टा टॉकीज था. उसमें ऊपर तिरपाल टंगी थी. अंदर स्कूल की बेंच बिछी थीं. गर्दन और पीठ सीधी करके फिल्म देखनी थी. आलकनी बालकनी सब एक जैसा था. पांच रुपए का टिकट लेकर हम हॉल में घुसे. साइकिल बाहर खड़ी कर दी. रामभरोसे. उसमें ताला नहीं था. लेकिन साइकिल की चिंता नहीं थी. उसी दिन सीट कवर लगवाया था नया. सोच रहे थे साइकिल ले जाए तो कोई बात नहीं. लेकिन साला कौनो कवर न खोल ले जाए. इसलिए पिच्चर के बीच में हर 10 मिनट पर बाहर आकर साइकिल के दर्शन कर लेते थे. हमारा दावा है. अगर टाइम मशीन अवलेबल हो. और वैज्ञानिक लोग उस केस की सही जांच करें तो ये निकल कर आएगा. कि फिल्म से ज्यादा उस दिन मैंने अपनी साइकिल देखी थी.

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