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फिल्म रिव्यू: मित्रों

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एक लड़का है. नाम है जय. मर तर के इंजीनियरिंग कंप्लीट की है. एकाध महीने कॉल सेंटर की जॉब की है जहां से लड़ाई झगड़ा करके नौकरी छोड़ चुका है. अपने मध्यमवर्गीय गुजराती परिवार में रहता है.

बाप ज़्यादा तो नहीं मगर हर मिडिल-क्लास बाप की तरह ही थोड़ा सा खडूस है. जय के आलसी और लापरवाह व्यवहार से तंग आकर उसकी शादी करवाना चाहता है. अरेंज मैरिज. जय मानता है कि –

दुनिया में तीन तरह के लोग होते हैं. एक जो जॉब करते हैं, दूसरे जो बिज़नस करते हैं और तीसरे जो कुछ नहीं करते. और वो, तीसरी वाली कैटेगरी में आता है.

इसलिए ही वो इस अरेंज मैरिज के लिए राज़ी हो जाता है. क्यूंकि दहेज में एक करोड़ रुपए मिलने हैं. इसके लिए उसे शादी करनी होगी. अवनी से. अवनी जो एमबीए की हुई है. अवनी जिसका एक पास्ट है. अवनी जिसके और जय के बीच एक ही चीज़ कॉमन है कि दोनों को ही समोसे के ऊपर चटनी डालकर खाना नहीं पसंद है. अवनी एक्सप्रेसिव है. अपने हकों के लिए लड़ने वाली है. उसमें लीड करने की क्षमता है. यानी शादी मटेरियल हो न हो, मैनेजर मटेरियल तो है ही.

जय और उसके दोस्त पैसे कमाने के लिए यू-ट्यूब वीडियोज़ का सहारा भी लेते हैं. लेकिन वंस अ लूज़र, ऑलवेज अ लूज़र.
जय और उसके दोस्त पैसे कमाने के लिए यू-ट्यूब वीडियोज़ का सहारा भी लेते हैं. लेकिन वंस अ लूज़र, ऑलवेज अ लूज़र.

जब इन दोनों की मुलाकात ‘शादी के लिए लड़की देखने जाने वाले’ सेट में होती है तो चीज़ें खुलना शुरू होती हैं, और कहानी आगे बढ़ना शुरू होती है. जय का किरदार जैकी भगनानी ने और अवनी का किरदार कृतिका कामरा ने निभाया है.

# फ़िल्म की सबसे अच्छी बात है इसका पूरी तरह फैमिली फ़िल्म होना. यानी आप सपरिवार इसे देखने के लिए जा सकते हैं. ये फ़िल्म आपको इस मामले में हृषिकेश मुखर्जी और प्रियदर्शनी वाली मूवीज़ की याद दिलाती है. लेकिन केवल इस मामले में.

# फ़िल्म की दूसरी अच्छी बात है कि कॉमेडी के नाम पर ये कहीं भी लाउड नहीं होती. मतलब ये दर्शकों को हंसाने के लिए एफर्ट करती नहीं लगती. इसलिए ही दर्शक भी लाउड नहीं होते. मतलब ठहाके लगाकर नहीं हंसते, मुस्काराते हैं, जोक्स और ह्यूमर को एप्रिशिएट करते हैं.

यूं दर्शक ह्यूमर का 5 दिवसीय टेस्ट क्रिकेट देख रहे होते हैं, न कि ट्वेंटी-ट्वेंटी. वो भी लॉर्ड्स में, जहां सिक्स लगने पर चीयर-लीडर्स डांस नहीं करते, ट्रम्पेट नहीं बजते. बस लोग खड़े होकर ताली बजाते हैं और फिर से अपनी सीट में बैठ जाते हैं.

# फ़िल्म की तीसरी अच्छी बात ‘ग़ैर-पारंपरिक’ स्टोरी टैलिंग या स्क्रिप्ट है. खास तौर पर पहले हाफ में जहां पर बड़े यूनिक और खूबसूरत ढंग से कहानी आज और फ्लैशबैक के बीच डोलती है. इस बीच एक्टर्स का कैमरे को देखकर सीधे संवाद करना भी उसी यूनिक-नेस का हिस्सा है. लेकिन अव्वल तो स्क्रिप्ट की ये यूनिकनेस पूरी तरह यूनिक नहीं है. भारत और विश्व भर की कई फिल्मों में आपको इस ट्रीटमेंट वाली फ़िल्में देखने को मिल जाएंगी. साथ ही ये क्रिएटिविटी तब किसी काम नहीं आती जब फ़िल्म और स्क्रिप्ट के बेसिक्स में दिक्कत हो. और वो दिक्कत है फ़िल्म का स्लो और प्रीडिक्टेबल होना.

जैकी भगनानी बहुत डल लगते हैं. क्या इसे मेथड एक्टिंग का चरम कहा जा सकता है? ऐसा लगता तो नहीं!
जैकी भगनानी बहुत डल लगते हैं, जो कि उनके किरदार की भी मांग है. क्या इसे मेथड एक्टिंग का चरम कहा जा सकता है? ऐसा लगता तो नहीं!

# अपनी पहली फ़िल्म ‘फिल्मिस्तान’ के लिए तारीफ़ें बटोरने वाले डायरेक्टर नितिन कक्कड़ पहले हाफ तक तो फ़िल्म को ठीक-ठाक चला ले जाते हैं लेकिन सेकेंड हाफ बोझिल सा लगने लगता है.

होने को डिटेलिंग में काफी दिमाग लगाया गया है और मैंने देखा है कि जिन फिल्मों की डिटेलिंग में जितने एफर्ट डाले जाते हैं वो उतनी ज़्यादा कल्ट बनने की क्षमता रखती हैं. होने को ये फ़िल्म कल्ट बनेगी या एवरेज हिट होगी इस बात पर मुझे शक है. एक कांच के दरवाज़े में अवनी के नाराज़ होकर जाने की परछाई बनती है और उस दरवाज़े के पार उसे रोक न पाने के लिए मजबूर जय भी दिखता है. दोनों एक फ्रेम में. सुपर्ब!

नितिन के लिए हिदायत है कि वो इस फ़िल्म के बॉक्स ऑफिस कलेक्शन के प्रेरित/हतोत्साहित होकर ‘बॉलीवुड के मेन स्ट्रीम गिमिक’ के चक्कर में न पड़ें. ‘मित्रों’ देखकर कहा जा सकता है कि वे सही रास्ते में हैं, बेशक अभी मंज़िल तक नहीं पहुंचे हैं.

# मेन करैक्टर्स से ज़्यादा कॉमिक रिलीफ फ़िल्म के अन्य कलाकार देते हैं. ऐसा इसलिए है क्यूंकि उनको कहानी आगे नहीं बढ़ानी है. जय के दो दोस्तों, जिनका किरदार प्रतीक गांधी और नीरज सूद ने निभाया है, का रोल छोटा मगर दमदार है. वे जब भी आते हैं हंसते हैं, हंसाते हैं. जैकी भगनानी ने औसत एक्टिंग की है. उनके ढेर सारे शेड्स नहीं दिखते और ये फ़िल्म की मांग भी नहीं है. उनमें एनर्जी नहीं दिखती जो उनके किरदार के साथ मेल खाती है. लेकिन कहीं कहीं ये लो-एनर्जी, या हर वक्त उनींदी आंखें और चेहरा, बोर करता है. अपनी डेब्यू फ़िल्म ‘कल किसने देखा’ में उन्होंने कुछ डेब्यू एक्टर और प्रोमिसिंग एक्टर वगैरह के अवार्ड झटके थे लेकिन आज आठ साल बाद उनको देखकर कहा जा सकता है कि वो बॉलीवुड हीरोज़ की दूसरी जमात में खड़े हैं. उनको एकाध हिट फ़िल्म की या एकाध अच्छी स्क्रिप्ट की शिद्दत से ज़रूरत है. या फिर उन्हें फिर से फिल्मों को प्रोड्यूस करने के काम में ही लौट जाना चाहिए, जो वो पिछले कुछ सालों से करते आए हैं.

कृतिका की एक्टिंग औसत से अच्छी है. उनमें पोटेंशियल भी दिखता है लेकिन अगर भविष्य में उनके कैरियर में अच्छी फ़िल्में जुड़ती हैं तो ये फ़िल्म उनकी फिल्मोग्राफी की ‘आदि-आदि’ में शामिल हो जाएगी.

अवनी के किरदार में कृतिका का डेब्यू प्रॉमिसिंग है.
अवनी के किरदार में कृतिका का डेब्यू प्रॉमिसिंग है.

# फ़िल्म की एक और कमी अपने जेनरे यानी ‘कॉमेडी’ या ‘रोम-कॉम’ में खरी न उतरना है. न ही सिचुएशन से हिसाब से न ही डायलॉग के हिसाब से. यूं ये बड़ी सपाट तरीके से चलती है.

# फ़िल्म की सबसे ख़राब बात इसकी स्क्रिप्ट का प्रीडिक्टेबल होना है.

# म्यूज़िक ठीक-ठाक है लेकिन अपने दम पर फ़िल्म को हिट नहीं करवा सकता. किसी पुराने गीत का रिमिक्स या उसकी लिरिक्स को बदलने में कोई दिक्कत नहीं है. बल्कि इससे पुराने ऑरिजनल गीत को भी फिर से चर्चा में आने और सुने जाने का भी मौका मिलता है. लेकिन उसका ‘चलते-चलते’ वाले गीत की तरह हाल नहीं होना चाहिए. जो ऑरिजनल को छू भी नहीं पाता. ‘सनेड़ो’ गीत की लिरिक्स क्रिएटिव है. सोनू निगम का गाया गीत ‘दूर न जा’ भी अच्छा है. गीतों को फ़िल्म में इस तरह डाल गया है कि वो फ्लो को रोकते नहीं. ये भी एक अच्छी बात है.

यो-यो हनी सिंह का गाया – दिस पार्टी इज़ ओवर नाऊ तो खैर पहले ही हिट हो चुका है. लेकिन ये एक स्पॉइलर है कि ये फ़िल्म में नहीं दिखेगा. दी एंड के बाद एक गीत दिखाने का ट्रेंड देखने को मिल रहा है. जैसे जब वी मेट का ‘मौजा ही मौजा’. ऐसा ही एक गीत इसमें भी है – कमरिया. एंड में अच्छा लगता है.

'कमरिया' डांडिया वाली फील लिए हुए है. लास्ट में आता है.
‘कमरिया’ डांडिया वाली फील लिए हुए है. लास्ट में आता है.

# ‘मित्रों’ तेलुगु फिल्म पेली छुपूलू का रीमेक है. ऑरीजनल फ़िल्म दर्शकों को काफी पसंद आई थी. उसे बेस्ट तेलुगु फिल्म समेत दो नेशनल अवॉर्ड्स मिले थे. इसलिए ही तो रीमेक बना है. ये भी आएगी कहना मुश्किल है. फ़िल्म का नाम ‘मित्रों’, और इसके गुजराती बैकग्राउंड से दर्शकों को इसमें कुछ राजनैतिक टच होने की उम्मीद हो सकती है. लेकिन जिन्होंने इसके ट्रेलर या गाने वगैरह देखे हैं वो फ़िल्म देखने से पहले ही समझ गए होंगे कि फ़िल्म में राजनीति का चुटकी भर भी फ्लेवर नहीं है, सिर्फ़ एक भुला दिए जाने वाले डायलॉग के अलावा जो कि ट्रेलर में ही सुनने को मिल जाता है.


ओवर-ऑल ‘मित्रों‘ कैसी थी इसे इस तरह से बताना चाहूंगा कि फ़िल्म देखने जाते वक्त मेरे सर में दर्द हो रहा था. ये फ़िल्म के वजह से नहीं, उससे पहले से ही था. फ़िल्म ने बेशक मेरा सर-दर्द नहीं बढ़ाया लेकिन साथ ही साथ सर-दर्द भुलवाया भी नहीं.


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