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तानाशाही, विद्रोह, धमकी, बेईमानी... क़िस्सा सबसे बदनाम वर्ल्ड कप का

साल 1966. ताशकंद समझौता और फिर प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की मौत. भारत में मातम छाया था. और इसी दौरान अफ्रीका में भयानक मारकाट मची थी. कई देशों में सेना तख्तापलट कर सत्ता पर कब्जा कर चुकी थी. भयानक माहौल था. इसी माहौल में इंदिरा गांधी भारत की प्रधानमंत्री बनीं. और इसी साल एयर इंडिया की फ्लाइट 101 के क्रैश में डॉक्टर होमी जहांगीर भाभा मारे गए.

एशिया से लेकर अफ्रीका तक बवाल मचा हुआ था. और इन सबके बीच एक दौर में लगभग पूरी दुनिया पर राज करने वाले ब्रिटेन ने पहली बार फुटबॉल वर्ल्ड कप जीता. और इस जीत के आसपास ही तय हुआ कि साल 1978 का फीफा वर्ल्ड कप अर्जेंटीना में खेल जाएगा. फिर धीरे-धीरे वो साल-महीने और दिन भी आ गए, जब इस लैटिन अमेरिकी देश की जनता बेमन से इस टूर्नामेंट के स्वागत के लिए तैयार हुई.

# Dictatorship में Argentina

बेमन से इसलिए, क्योंकि अर्जेंटीना के अच्छे दिन जा चुके थे, देश पर तानाशाही चल रही थी. हर रोज लोगों के मारे जाने, गायब होने की ख़बरें पढ़ने-देखने-सुनने में आती थीं. विद्रोह करने वाले बुरी तरह से कुचले जा रहे थे. ऐसे माहौल में फुटबॉल के छोटे से छोटे मैच को त्यौहार की तरह मनाने वाले अर्जेंटीनी लोग, अनमने ढंग से दुनिया का सबसे बड़ा फुटबॉल टूर्नामेंट देखने के लिए तैयार हुए.

हालांकि चीजें अब भी मुश्किल थीं, तमाम देश यहां आने को तैयार नहीं थे. और इन देशों को लीड कर रहा था पिछले वर्ल्ड कप के फाइनल में हारा नीदरलैंड्स. लेकिन अर्जेंटीना के तानाशाह जनरल होर्हे रफाएल विडेला ने झूठे-सच्चे वादे कर सभी देशों को वर्ल्ड कप खेलने के लिए राजी कर लिया. लेकिन अभी सबसे बड़ा धमाका होना बाकी था. वर्ल्ड कप शुरू होने से दो साल पहले, 20 अगस्त 1976 को ऑर्गनाइजिंग कमिटी के चेयरमैन रिटायर्ड जनरल ओमर अक्टिस की गोली मारकर हत्या कर दी गई.

बताया जाता है कि वह टूर्नामेंट पर हो रहे खर्च के बेतहाशा बढ़ने के बारे में बात करने ही वाले थे. इसीलिए उन्हें चुप करा दिया गया. ख़ैर, विडेला ने किसी भी तरह का खूनखराबा ना होने देने का वादा कर टूर्नामेंट शुरू करा लिया. विडेला इस टूर्नामेंट के जरिए अपने देश में राष्ट्रवादी गर्व भरना चाहते थे. अंदर से टूट रहे अर्जेंटीना का ध्यान देश में फैली अव्यवस्था से हटाकर फुटबॉल पर लाना चाहते थे.

# रात का खेल

वह सफल भी हुए. टूर्नामेंट शुरू हुआ और मेजबानों ने पहले राउंड के अपने पहले दो मैच जीत लिए. इसके चलते आखिरी मैच हारने के बाद भी वह अगले राउंड में पहुंच गए. फिर आया दूसरा राउंड. पोलैंड को हराने के बाद अर्जेंटीना ने दूसरा मैच ब्राज़ील के साथ 0-0 से ड्रॉ खेल लिया. मेजबान सारा गणित अपने पक्ष में करने के लिए अपना हर मैच रात में खेलते आ रहे थे. और उन्हें पता था कि फाइनल में पहुंचने के लिए उन्हें अपना आखिरी ग्रुप मैच हर हाल में 4-0 से जीतना था.

और फिर जो हुआ, उसने इस टूर्नामेंट को सबसे घटिया और विवादित वर्ल्ड कप बना दिया. इस मैच में अर्जेंटीना के सामने था पेरू. और इसी मैच में दुनिया ने टूर्नामेंट शुरू होने से 10 दिन पहले ही हंगरी के मैनेजर द्वारा कही गई बात को सच होते देखा. हंगरी के कोच बारोटी ने कहा था,

‘सबकुछ, यहां तक कि हवा भी अर्जेंटीना के पक्ष में है.’

और इस मैच में यही हुआ. अर्जेंटीना ने पेरू को 6-0 से हरा दिया. ग्रुप मैचों में स्कॉटलैंड और ईरान को पीटने के बाद नीदरलैंड्स को 0-0 पर रोकने वाली पेरू की टीम अर्जेंटीना के खिलाफ एकदम पस्त दिखी. रेफरी के कई फैसले सीधे तौर पर संदेह पैदा करने वाले रहे. पेरू के कोच ने बीच मैच अपने बेस्ट प्लेयर को वापस बुला लिया. और इन तमाम बातों ने लोगों के मन में संदेह पैदा कर दिया. और ये संदेह बढ़ा कुछ दिन बाद हुए खुलासे से.

खुलासा इस बात का, कि मैच से ठीक पहले अमेरिका के पूर्व सेक्रेटरी ऑफ स्टेट हेनरी किसिंजर और अर्जेंटीना के तानाशाह जनरल विडेला ने एक प्री-मैच परेड की थी. बहुब्बड़े फुटबॉल फैन किसिंजर इस परेड में विडेला के साथ इस पेरू के ड्रेसिंग रूम तक गए थे. दावा था कि वहां विडेला ने पेरू के प्लेयर्स से कहा,

‘यह टूर्नामेंट अर्जेंटीना के लिए बहुत महत्वपूर्ण है.’

साथ ही उन्होंने अपने भाषण में लैटिन अमेरिकी एकजुटता पर भी जोर दिया. अंदरखाने के दावे यह भी कहते हैं कि अर्जेंटीना के तानाशाह ने पेरू के तानाशाह से समझौता कर लिया था. ब्रिटिश मीडिया का कहना था कि इस समझौते में पेरू को भारी मात्रा में अनाज की सप्लाई और अर्जेंटीना सेंट्रल बैंक में मौजूद पेरू के अकाउंट्स को अनफ्रीज करने से लेकर पेरू के 13 बंदियों को आज़ाद करना भी शामिल था. इस बारे में पूर्व अर्जेंटीनी स्ट्राइकर लिओपोल्डो ल्यूक ने टूर्नामेंट के बाद कहा था,

‘मैं इस बात पर दृढ़ता से विश्वास करता हूं कि हमें वह वर्ल्ड कप खेलना ही नहीं चाहिए था.’

ख़ैर ये सब तो बस बातें हैं बातों का क्या. पेरू और अर्जेंटीना का मैच फिक्स होने का कोई सबूत नहीं है. लेकिन 25 जून 1978 को हुए फाइनल में जो कुछ भी हुआ, वो सबने देखा. पहले तो अर्जेंटीना ने मैच के इजराइली रेफरी अब्राहम कीन को हटवाकर उनकी जगह इटैलियन रेफरी को दिला दी. दावा था कि नीदरलैंड्स और इजराइल के बीच के ताल्लुकात को देखते हुए कीन का फाइनल में रेफरी होना निष्पक्षता के खिलाफ होगा. मजे की बात ये है कि उस वक्त इटली और अर्जेंटीना में खूब छनती थी.

इसके बाद फाइनल के दिन नीदरलैंड्स को लंबे, घुमावदार रास्ते से स्टेडियम ले जाया गया. और स्टेडियम के अंदर पहुंचने के बाद उन्हें पूरे 10 मिनट तक अर्जेंटीना की टीम का इंतजार करना पड़ा. इस दौरान 70 हजार अर्जेंटीनी समर्थकों ने अपने शोर से नीदरलैंड्स के प्लेयर्स का हौसला गिराने में कोई कसर नहीं छोड़ी. और इसके बाद तो हद ही हो गई. अर्जेंटीना ने नीदरलैंड्स के कप्तान रेने वान दा केयकॉफ की कलाई पर लगे प्लास्टर पर आपत्ति जताते हुए मैच खेलने से ही मना कर दिया.

पूरे टूर्नामेंट इस प्लास्टर के साथ खेले केयकॉफ और उनकी टीम की एक भी दलील नहीं मानी गई. इटैलियन रेफरी सर्जियो गोनेला ने केयकॉफ को उस प्लास्टर पर और बैंडेज बांधकर आने के कहा. फिर कहीं जाकर शुरू हुआ मैच. मैच क्या, ये ग्लैडिएटर्स की फाइट थी. दोनों टीमों के प्लेयर्स बॉल से ज्यादा एक-दूसरे पर पिल रहे थे. और इस युद्ध में अंततः जीत हुई अर्जेंटीना की. मारियो केम्पेस ने दो और बर्तोनी ने एक गोल मार मेजबानों को 3-1 से जीत दिला दी.

# ट्रिविया

इस वर्ल्ड कप से पहले डेब्यू करने के बाद भी माराडोना को टीम में जगह नहीं मिली. इस बात से युवा माराडोना बहुत दिनों तक सदमे में रहे थे.

इस वर्ल्ड कप और फिर 1982 के वर्ल्ड कप में हुई घटनाओं के बाद ग्रुप के आखिरी मैच एक ही वक्त पर शुरू करने की रवायत शुरू की गई.


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