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निदा ख़ान को मज़हब से निकालने वाले इन मुफ़्ती जैसे लोग ही इस्लाम के असली दुश्मन हैं

फ़िराक गोरखपुरी साहब का एक शेर है,

मज़हब कोई लौटा ले, और उसकी जगह दे दे
तहज़ीब सलीके की, इंसान करीने के

आए दिन कुछ न कुछ ऐसा होते रहता है, जिससे इस शेर के सदा प्रासंगिक होने का सबूत मिल जाता है. मज़हब के नाम पर नित नई मूर्खताएं सामने आती ही रहती हैं. हालिया वाकया निदा ख़ान का है.

बरेली की निदा ख़ान के खिलाफ़ फतवा आया है. फतवा जारी करने वाले हैं बरेली के इमाम मुफ़्ती खुर्शीद आलम साहब. फतवे के मुताबिक़ निदा ख़ान को इस्लाम से खारिज किया गया है. मुस्लिम समाज से उनका बहिष्कार करने की अपील की गई है. आगे कहा है,

# कोई उनसे कलाम न करे यानी बातचीत न करे.
# न ही साथ खान पान करे.
# अगर निदा ख़ान बीमार पड़ती हैं तो उन्हें दवाई न दी जाए.
# अगर वो मर जाती हैं तो कोई उनके जनाज़े में शामिल न हो.
# न ही कोई उनके जनाज़े की नमाज़ पढ़े.
# किसी कब्रस्तान में भी उन्हें जगह न दी जाए.

निदा ख़ान के लिए इतनी सज़ाएं घोषित करने की आखिर वजह क्या है? वजह है उनका इस्लाम की कुछ प्रथाओं के खिलाफ मुखरता से बोलना. किस्सा कुछ यूं है.

2015 में निदा ख़ान की शादी बरेली के शीरन रज़ा ख़ान से हुई थी. शीरन रज़ा ख़ान बरेली के मशहूर आला हज़रत खानदान से ताल्लुक रखते हैं. बकौल निदा उनके पति ने शादी के बाद से ही उन्हें मारने-पीटने का सिलसिला शुरू कर दिया था. इसके बाद फ़रवरी 2016 में उनके पति ने उन्हें तलाक़ देकर घर से निकाल दिया. निदा ने उनके इस फैसले को कोर्ट में चुनौती दी. कोर्ट ने तलाक को अवैध माना था.

अपने साथ हुई इस ज़्यादती ने निदा को उन प्रथाओं के खिलाफ खड़ा होने पर उकसाया, जो औरतों का जीना अज़ाब किए हुए हैं. चाहे ट्रिपल तलाक़ हो या हलाला. इसी से गुस्साए मुफ़्ती साहब ने उनके खिलाफ़ ये फतवा जारी किया है.

निदा ख़ान.
निदा ख़ान.

वैसे ये बताते चलें कि फतवा कोई हुक्म नहीं होता. जनता इसे मानने के लिए बाध्य नहीं होती. फतवा महज़ एक राय है जिसपर अमल करना न करना पूरी तरह से लोगों के विवेक पर डिपेंड करता है. कई बार ऐसे जाहिलाना फतवों की कीमत, उस कागज़ जितनी भी नहीं होती, जिसपर ये छपा होता है. पर ऐसे फैसलों का एक नकारात्मक पहलू भी है. ऐसी जहालत मुसलमानों की छवि पर कुछ और सियाही तो पोत ही जाती है.

कोई इन मुफ़्ती-मौलवियों को बताएं कि मज़हब खुदा और बंदे के बीच का आपसी मामला है. इसमें किसी बिचौलिए का कोई काम नहीं. निदा ख़ान इस्लाम में रहेंगी या नहीं, इसका फैसला कोई मुफ़्ती किसी हाल में नहीं करेगा. न ही किसी के कहने से वो इस्लामबदर हो जाएंगी. अब रही बात बीमारी में दवा न देने की या कब्रस्तान में कब्र न मयस्सर होने देने की. ये अपील इतनी घटिया है कि मज़हब के बुनियादी कॉन्सेप्ट के ही परखच्चे उड़ा देती है. करुणा तो मज़हब की बेसिक शिक्षाओं में से एक है. पैगंबर मुहम्मद तक हमेशा ये सीख देते रहे कि दुश्मन भी अगर बीमार हो तो उसकी तीमारदारी करो. यहां खुद को उनके उम्मती कहनेवाले बीमारों की दवा बंद करना चाहते हैं.

मुफ़्ती खुर्शीद आलम.
मुफ़्ती खुर्शीद आलम.

कब्र तो उन आतंकवादियों को भी उपलब्ध कराई जाती है, जो इंसानियत का ख़ून बहाने के बाद मर जाते हैं. दो गज़ ज़मीन हर इंसान का बुनियादी हक़ माना जाता है.  जिस्म मुर्दा होने के बाद कोई दुश्मनी बाकी नहीं रहती. ये लोग मज़हब की कौन सी तालीम लेकर आए हैं, जो किसी के मरने के बाद भी उससे घृणा करना जारी रखना चाहते हैं? क्या ऐसा करके वो अपने ही मज़हब को शर्मिंदा नहीं कर रहे?

वैसे ही ये बेहद मुश्किल दौर है. किसी एक शख्स की जहालत पूरी कौम के लिए सर्टिफिकेट बन जाती है. इन फतवेबाज़ों का तो कुछ नहीं जाता लेकिन मज़हब का पाबंद कोई आम आदमी बिना बात सफाइयां देने पर मजबूर हो जाता है.

इस फतवे की तो खैर कोई वैल्यू नहीं है. बावजूद इसके तमाम होशमंद आवाज़ों को इस मानसिकता का विरोध करना चाहिए. ऐसे जाहिलपने से खुद को अलग कर देना चाहिए. भले ही फिर वो कितने ही आला खानदान की दहलीज़ से निकलकर आया हो.


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