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'शरारत' की नानी जो फिल्मों में टैलेंट हंट के रास्ते आई थी

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फरीदा जलाल. एक अभिनेत्री जो अपने करियर के शुरूआती दौर में ही टाइपकास्ट कर दी गई. या तो बहन के रोल के लिए या फिर हीरो की वो मंगेतर जिसे ठुकराकर हीरो हीरोइन का हो जाता है. इसके बावजूद भी अगर नाम लेने भर से किसी कलाकार की सूरत आपकी आंखों के सामने झट से आ जाए, तो उसका करियर सफल ही माना जाएगा. फरीदा जलाल यकीनन उनमें से एक है. आधी शताब्दी तक चला और अभी भी जारी उनका फिल्म करियर ये बताने के लिए काफी है कि उन्हें सराहा जाता रहा है. पचास सालों से फिल्म इंडस्ट्री को अपनी सेवायें दे रही फरीदा जलाल का जन्म 14 मार्च 1949 को हुआ था.

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फरीदा जलाल को सिनेमा और टेलीविज़न दोनों ही दुनिया में बेहद पसंद किया गया. ‘शरारत’ टेलीसीरियल की नानी को कौन भुला सकता है! अपनी जादुई शक्तियां और अपनी परफेक्ट टाइमिंग के सदके वो बच्चे-बड़े सबकी दुलारी बनी रहीं. इसके अलावा ‘ये जो है ज़िंदगी’, ‘देख भाई देख’ और ‘अम्माजी की गली’ जैसे सीरियल्स में भी उनकी मौजूदगी धमाकेदार रही.

फरीदा की फिल्मों में एंट्री बहुत कम उम्र में हो गई थी. वो महज़ सोलह साल की थी जब उन्होंने फिल्मफेयर द्वारा कराए गए टैलेंट हंट में जीत हासिल की. साल था 1965. उनके साथ जो मेल प्रतियोगी विजेता चुना गया था वो और कोई नहीं राजेश खन्ना थे. उसी ऑडियंस में बैठे हुए ताराचंद बड़जात्या ने उन्हें अपनी फिल्म ‘तक़दीर’ में कास्ट कर लिया और यूं चल निकला उनके फ़िल्मी सफ़र का कारवां.

अगले पचास सालों में उन्होंने 200 से ज़्यादा फिल्मों में काम किया. ना सिर्फ हिंदी बल्कि तमिल, तेलुगु और इंग्लिश फिल्मों में भी उन्होंने अपने अभिनय की चमक बिखेरी. उनकी कुछ बेहद मक़बूल फिल्मों में ‘हिना’, ‘दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे’, ‘आराधना’, ‘पारस’, ‘मजबूर’, ‘कुछ-कुछ होता है’, ‘दिल तो पागल है’, ‘कहो ना प्यार है’, ‘कभी ख़ुशी कभी ग़म’ वगैरह रही.

फरीदा जलाल का नाम आते ही सबसे पहले याद आती है फिल्म ‘मम्मो’. श्याम बेनेगल का ये मास्टरपीस फरीदा जलाल के करियर का एवरेस्ट माना जाना चाहिए. ये उनका सबसे बेहतरीन काम है. महमूदा बेग़म उर्फ़ मम्मो की भूमिका को उन्होंने अक्षरशः जिया है. मम्मो बंटवारे के वक़्त पाकिस्तान जाने को मजबूर हुई थी और अब लौटने के बाद हिंदुस्तान में ही बने रहने की ख्वाहिशमंद है. दो देशों के बीच के वैमनस्य में किस तरह एक आम नागरिक पिस कर रह जाता है इसकी ज़िंदा तस्वीर है ये फिल्म. इसे अपने सशक्त अभिनय से ‘मस्ट वॉच’ की लिस्ट में डालने पर मजबूर करती हैं फरीदा जलाल.

इस फिल्म में वो सिर्फ और सिर्फ मम्मो लगी हैं, और कुछ नहीं. महमूदा बेगम के कई रूपों को उन्होंने इतनी सफाई से दर्शाया है कि आप हैरान रह जाते हो. बातूनी लेकिन समझदार! गुस्सैल लेकिन नर्मदिल! हर भाव उन्होंने बड़ी ही कन्विक्शन के साथ परदे पर साकार किया है. उन्हें मम्मो के रूप में देखना एक शानदार अनुभव है. अपने नवासे को फैज़ अहमद फैज़ की नज़्में सुनाती मम्मो को देखना एक दिलकश नज़ारा है. फैज़ को गुनगुनाते वक्त मम्मो के चेहरे के एक्सप्रेशंस अनमोल हैं. वो आंखों में उभर आई चमक, वो ख्वाबीदा लहजा आपको सम्मोहित कर लेता है. इस फिल्म के लिए उन्हें बेस्ट परफॉरमेंस का क्रिटिक्स अवॉर्ड भी मिला था. आज उनके जन्मदिन पर खुद पर एक एहसान कीजिए. ‘मम्मो’ देख डालिए.

फरीदा जलाल की कुछ यादगार भूमिकाओं को याद कर लेते हैं.

# मम्मो:

सबसे पहले तो मम्मो का ही एक सीन देखिए. ‘मम्मो’ अपने नाती रियाज़ को वो पार्टीशन के वक़्त की सूरतेहाल बता रही हैं. रियाज़ पूछता है,

“तुमने जहन्नुम देखा है?”

“हां बेटा, इन्हीं आंखों से देखा है. खुदा वो वक़्त फिर कभी न दिखाए.”

फिर आगे अपनी हिजरत को बयां करती मम्मो और बैकग्राउंड में गूंजती चीखो-पुकार. अपनी ज़मीन के कर्बला बन जाने की दहशतनाक याद मम्मो के चेहरे के ज़र्रे-ज़र्रे से टपकती है.बावजूद उन दहलाने वाली यादों के मम्मो अपने नवासे में उम्मीद का, हौसले का सिरम इंजेक्ट करना नहीं भूलती. ग़ालिब का शेर सुनाती है,

“रंज से खूंगर हुआ इंसा तो मिट जाता है रंज,
मुश्किलें इतनी पड़ी मुझपे के आसां हो गई”

 

#दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे:

भारतीय सिनेमा के इतिहास में सबसे ज़्यादा चलने वाली फिल्म में फरीदा जलाल के रोल को कौन भुला सकता है! सिमरन की दोस्त जैसी मां की भूमिका में उन्होंने एक फ्रेशनेस डाल दी थी. अपनी बेटी के सपनों की उड़ान से उसे इत्तेफ़ाक है लेकिन ज़मीनी हक़ीकत से वो भी ख़ूब वाकिफ़ है. जब राज और सिमरन के बीच के रिश्ते को वो भांप लेती है तब वो एक बेहद बोल्ड रुख अख्तियार करती है. ऐसा कदम उठाती है जो एक मिडिल क्लास भारतीय मां के लिए दुनिया उलट देने जैसी बात है. अपनी ही बेटी और उसके बॉयफ्रेंड को गहने की पोटली देकर कहना कि यहां से चले जाओ. ये नज़ारा भारतीय परिवारों में लगभग असंभव है. इसीलिए इस सीन में जब फरीदा जलाल बेटी की ख़ुशी के लिए एक क्रांतिकारी क़दम उठाने की सोचती है तो वो सीन ज़हन में सहेज कर रखने लायक बन जाता है. खुद देख लीजिए:

#पिंजर:

तीसरा सीन मुख़्तसर है. लेकिन पॉवरफुल है. फिल्म है पिंजर. इस फिल्म में फरीदा जलाल का रोल कुछ ख़ास लंबा नहीं है. बहुत छोटा है. लेकिन फिर भी इन पक्तियों के लेखक को वो इस फिल्म के लिए याद आईं इसका मतलब है उस एक सीन में कुछ बात ज़रूर होगी. दरअसल वो सीन कम महज़ एक डायलॉग है. अदला-बदली की शादी में एक तरफ वालों की लड़की का अगवा हो गया है. लेकिन शादी तो होनी ही है. वो लड़की वालों से मिलने जा रहे अपने पति से कहती है, “सुनिए जी, एक धेला भी ना उनसे लेना. और कहना कि उंगलियों पर गिन सकें इतने ही बाराती आएंगे. उनके यहां अमावस हो तो हम पूनम नहीं मनाएंगे.” इस बात को कहने के लिए जिस संवेदनशीलता की ज़रूरत होती है वो फरीदा के चेहरे पर पूरी तरफ नुमायां पाएंगे आप. यही उनकी जीत है.

इसके अलावा फिल्म हिना में उनके लेडी हकीम के रूप को भी एन्जॉय किया जा सकता है. नॉन-स्टॉप बोलती जाती बातूनी बीबी गुल के इलाज में दवाइयों के नुस्खे के साथ-साथ मुहब्बत भी मिली होती है. सबूत ये रहा.

जाते-जाते सुनिए फरीदा और ‘काका’ पर फिल्माया गया वो गीत जिससे उधार लिया हुआ एक जुमला आज कल बहुत चर्चित है. आपने भी किसी ने किसी से पूछा ही होगा पिछले दिनों. ‘बागों में बहार है?’


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