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आई विल मिस यू गजेंद्र! बंबई वापस जाओ तो खिड़की से हाथ बाहर मत निकालना

एक कॉलेज है फिल्म एंड टेलिविज़न इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया. प्यार से एफटीआईआई कहते हैं. दुनिया जहान में नाम है इसका. यहां पिच्चर बनाने की पढ़ाई होती है. लेकिन पिछले कुछ समय से यहां की पहचान थे कलियुग के युधिष्ठिर गजेेंद्र चौहान. हमारे यहां सरकार पढ़ाई-लिखाई के हर संस्थान में ‘सुधार’ चाहती है. तो यहां के लिए भी एक समिति बनाई थी जिसने एफटीआईआई में कुछ सुधार सुझाए हैं.

इन सुधारों में से एक ये है कि यहां के छात्रों को अब डिप्लोमा की जगह डिग्री दी जाएगी. एफटीआईआई को एक यूनिवर्सिटी का दर्जा दिया जाएगा. तो ऐसे में इसके हेड के लिए किसी पढ़े लिखे प्रोफेसर टाईप डिग्रीधारी व्यक्ति की ज़रूरत पड़ेगी. गजेंद्र चौहान कितना पढ़े लिखे हैं, इसपर इफरात में लिखा-पढ़ी हो चुकी है. खैर, लगता है कि यही वजह है कि सरकार ने गजेंद्र का कार्यकाल आगे नहीं बढ़ाया. कल गजेंद्र का एफटीआईआई के चेयरमैन के तौर पर आखरी दिन है. अभी कुछ पक्का नहीं है, और एक दिन बाकी भी है. लेकिन पूरी सिनेमा बिरादरी अंटी बांधकर मना रही है कि कल के दिन के साथ गजेंद्र भी इतिहास बन जाएं. हम भी उसी उम्मीद में हैं. इसलिए गजेंद्र के लिए एक विदाई चिट्ठी लिख कर भेज रहे हैं.


 

प्रिय गजेंद्र,

सबसे पहले तो इस बात के लिए माफी कि पिछली बार मैं पूना (मैं पूना ही लिखूंगा – पूना! पूना! पूना!) आया था तो हमारा मिलना नहीं हुआ.  सॉरी, मैं नामों को लेकर थोड़ा पर्सनल हूं. हां तो बात ये थी कि आज अखबार खोला तो मुझे आठवें पन्ने पर एक कॉलम की एक खबर दिखी. कि आप एफटीआईआई के चेयरमैन नहीं रहेंगे. मैंने गूगल को सवाल पूछ-पूछ कर परेशान कर दिया, लेकिन सब जगह यही लिखा मिला कि आप जा रहे हैं. दिल बैठ गया. पिछले देढ़ साल आखों के सामने से तैर गए, किसी पिच्चर की तरह. वैसी ही, जैसी पिच्चर आपने कई फिल्म स्टूडेंट्स के जीवन की बनाई है.

मेरी मम्मी कहती है कि इंसान को हर किसी से सीखना चाहिए. इसलिए मैंने आपके जीवन से भी सीख ले ली है. मैं ये चिट्ठी इसलिए लिख रहा हूं कि आपको शुक्रिया अदा कर सकूं. आपकी वजह से ही मुझे अपने उन दोस्तों से जलन होना बंद हुई जिनका एफटीआईआई में सिलेक्शन हुआ था. आप न होते तो मुझे कभी न मालूम चलता कि एफटीआईआई के बच्चे एक पेड़ के नीचे शराब पीते और भांग फूंकते बैठते हैं. बच्चे कहां के, ये तो अधेड़ हैं अधेड़. सालों साल वहीं पड़े रहते हैं. मेरे मां-बाप ने भी ये जान कर चैन की सांस ली, कि लड़का वैसे चक्करों में नहीं पड़ा.

आपसे सबसे खास बात जो मैंने सीखी वो ये कि लोग लाख बातें बनाएं, अपनी प्रतिभा पर कभी डाउट नहीं करना चाहिए. आपके सर पर ‘ऊपर’ वाले का कमल हाथ  हो तो कहीं भी पहुंच सकते हैं चाहे बैकग्राउंड कुछ भी हो, या ना भी हो. दाएं-बाएं कहीं की ताकतें आपको नहीं रोक सकतीं. इसलिए अब से मैं हमेशा बड़ा सोचूंगा. मैं अब अपने स्टैंड पर अडिग रहना भी सीख गया हूं. किसी के सामने नहीं झुकता. चाहे सामने वाला 139 दिन मेरे दरवाजे पर पड़ा रहे. कोई भूखा मरे तो मेरी बला से.मैं एक डायरी भी बनाकर रखने वाला हूं, जिसमें मैं अपने खिलाफ बोलने वालों के नाम लिखकर रखूंगा. जब भी, जब भी मुझे ज़िंदगी मौका देगी तो मैं उसे धप्पा कर दूंगा. वो मेरा जितना नुकसान करेगा, उसका उसी शूटिंग रेशियो में बदला लूंगा.

मेरे पापा बोल-बोल के थक गए, पर मैं डिसिप्लिन नहीं सीखा. लेकिन आपसे मुझे इस मामले में भी खूब प्रेरणा मिली. मेरी ज़िंदगी में इतने सारे बदलाव लाने के लिए दिल से शुक्रिया. अब और नहीं लिखा जाता. तो थोड़े को बहुत समझना. किसी बात का बुरा लगा हो तो कमेंट बॉक्स में कह देना. और हां, जब बंबई वापस जाएं तो खिड़की से हाथ बाहर मत निकालना.

आपका,

लल्लन


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