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अहमद फ़राज़: हिंदुस्तान में पैदा हुए वो पाकिस्तानी शायर, जिन्होंने सबसे बड़ा सम्मान लौटा दिया था

अहमद फ़राज़.

शामिख फ़राज़

शामिख फ़राज़ उन खुशनसीब लोगों में से हैं, जिन्होंने अपनी ज़िंदगी में दो सदियों का संगम देखा. बचपन बीसवीं सदी में बीता और जवान इक्कीसवीं सदी में हुए. कंप्यूटर इंजीनियरिंग की डिग्री और प्रोफेशन भी उसी से जुड़ा, लेकिन शौक के चलते हिंदी और बहुत से विदेशी लेखकों को पढ़ा. फिर ब्लॉग, अख़बार में कॉलम लिखे. आइए आज अहमद फ़राज़ के जन्मदिन पर इनका लिखा एक लेख आपको पढ़वाते हैं.

अहमद फ़राज़ एक ऐसा नाम, जिसके बिना उर्दू शायरी अधूरी है. आज अगर एशिया में इश्किया शायरी में फैज़ अहमद “फैज़” के बाद किसी शायर का नाम आता है, तो वो हैं अहमद “फ़राज़”. उनकी ग़ज़लें हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के अलावा कई और मुल्कों में भी मशहूर हैं. जहाँ भी इंसानी आबादी पाई जाती है, उनकी ग़ज़लें पढ़ी और सुनी जाती हैं.

अहमद फ़राज़ का असली नाम सैयद अहमद शाह था. फ़राज़ उनका तखल्लुस (उपनाम) था. उनकी पैदाइश पाकिस्तान के नौशेरा जिले में 12 जनवरी 1931 को एक पठान परिवार में हुई. उन्होंने पेशावर यूनिवर्सिटी से शिक्षा प्राप्त की, और वहीं पर कुछ वक़्त तक रीडर भी रहे. उनका विसाल (निधन) 25 अगस्त, 2008 को इस्लामाबाद के एक अस्पताल में हुआ. उन्हें गुर्दे की बीमारी थी. उन्हें पाकिस्तान का सबसे बड़ा सम्मान ‘हिलाल-ऐ-इम्तियाज़’ भी हासिल था. लेकिन 2006 में उन्होंने यह पुरस्कार इसलिए वापस कर दिया कि वे सरकार की नीति से सहमत और संतुष्ट नहीं थे. इसी के साथ उन्हें कई गैर मुल्की सम्मान भी मिले थे. उनकी शायरी सिर्फ़ मुहब्बत की राग-रागिनी नहीं थी बल्कि सियासत पर तीखी टिप्पणी भी होती थी. फ़राज़ की तुलना इक़बाल और फ़ैज़ जैसे बड़े शायरों से की गई है. वे अपने समय के ग़ालिब भी कहलाए.

अब किस का जश्न मनाते हो उस देस का जो तक़्सीम हुआ
अब किस के गीत सुनाते हो उस तन-मन का जो दो-नीम हुआ

उस मशरिक़ का जिस को तुम ने नेज़े की अनी मर्हम समझा
उस मग़रिब का जिस को तुम ने जितना भी लूटा कम समझा

उस मरियम का जिस की इफ़्फ़त लुटती है भरे बाज़ारों में
उस ईसा का जो क़ातिल है और शामिल है ग़मख़्वारों में

उन भूखे नंगे ढाँचों का जो रक़्स सर-ए-बाज़ार करें
या उन ज़ालिम क़ज़्ज़ाक़ों का जो भेस बदल कर वार करें

या उन झूठे इक़रारों का जो आज तलक ऐफ़ा न हुए
या उन बेबस लाचारों का जो और भी दुख का निशाना हुए

‘फ़राज़’ की मकबूलियत और शोहरत का अंदाज एक वाकये से लगाया जा सकता है. एक बार अमेरिका में उनका मुशायरा था, जिसके बाद एक लड़की उनके पास ऑटोग्राफ लेने आयी. नाम पूछने पर लड़की ने कहा, “फराज़ा”. फराज़ ने चौंककर कहा, “यह क्या नाम हुआ?” तो बच्ची ने कहा, “मेरे मम्मी पापा के आप पसंदीदा शायर हैं. उन्होंने सोचा था कि बेटा होने पर उसका नाम फराज़ रखेंगे लेकिन बेटी हुई तो उन्होंने फराज़ा नाम रख दिया.” इस बात पर उन्होंने एक शेर कहा था.

और फराज़ चाहिए कितनी मोहब्बतें तुझे ,

मांओं ने तेरे नाम पर बच्चों का नाम रख दिया

इसी तरह से उनकी वतनपरस्ती की एक मिसाल मिलती है. पश्चिम एशिया के अरबी बोलने वाले मुल्कों में एक जश्ने-शोरा (एक प्रकार का काव्योत्सव) बहुत मशहूर है. उसमें तमाम मुल्कों से अलग-अलग ज़बानों के मशहूर शायर हिस्सा लेने के लिए बुलाये जाते हैं. उसी में पाकिस्तान से उर्दू की नुमाइन्दगी करने गए थे अहमद फ़राज़. हिन्दुस्तान से उर्दू की नुमाइन्दगी करने के लिए भेजे गए थे रिफ़त सरोश. यह वह वक़्त था, जब इराक़ की लड़ाई ईरान से चल रही थी. तमाम मुल्कों के शायर बग़दाद में मौजूद थे. इराक़ी हुकूमत को लगा कि यह बढ़िया मौक़ा है दुनिया भर के शायरों को ईरान की ज़्यादतियों को दिखाने का. इसलिए उन्होंने काव्योत्सव के एक दिन पहले जंग के मोर्चे पर ले जाने के लिए एक बस का इन्तज़ाम किया. सभी को एक-एक यूनिफॉर्म पकड़ाना शुरू कर दिया. सबब यह बताया गया कि जंग के मोर्चे पर जा रहे हैं तो जंग की पोशाक ही होनी चाहिए. हिफाज़त के मद्देनज़र यह ज़रूरी है. तमाम मुल्कों के शायर पोशाक लेकर बस में जा बैठे. जब भारत से गए एक हिंदी कवि का नंबर आया तो वह अड़ गए कि मैं यह नहीं पहनूंगा. इंचार्ज इराक़ी कमाण्डर उसे समझाने आया तो उन्होंने उसे समझाना शुरू कर दिया. बताया कि मैं बसरा से एक बार उस इलाक़े को देखने एक पत्रकार के रूप में सादे लिबास में जा चुका हूं. दोबारा अगर आप उस इलाक़े में ले ही जाना चाहते हैं तो मैं जैसा हूं, भारतीय, वैसा ही चलूंगा. आपकी फौजी वर्दी पहनकर हर्गिज़ नहीं जाऊंगा. कभी अगर फौजी वर्दी पहनने का अवसर आया भी तो अपने देश के लिए पहनूंगा, इराक़ या ईरान के लिए नहीं. अफसर ज़रा तन्नाया लेकिन कर कुछ न पाया. उसने तुरुप चाल चली कि अगर मोर्चे पर आपको कुछ हो गया, गोली ही लग गई तो? “तो मैं, ज़ाहिर है कि मर जाऊंगा, लेकिन मरूंगा तो भारतीय.” उन्होंने कहा. उन हिंदी कवि के साथ साथ रिफ़त सरोश भी अड़ गए. और लोग भी मेरी इस दलील में शामिल न हो जाएं, इस डर से वर्दी न लेने वाले लोगों को साथ न ले जाना मुनासिब पाया गया और वह वापस रिफ़त सरोश के साथ होटल लौट आए. लॉबी में देखा कि फ़राज़ पहले से ही कुछ चाहने वालों के साथ बैठे हैं. उन्होंने ही टोका, ‘तो आप लोग भी नहीं गए?’ ‘जी नहीं ! हमें उनकी वर्दी पहनना गवारा नहीं था.’ हिंदी कवि ने कहा. ‘निहायत अहमक़ाना ज़िद थी. मैं भी इसी वजह वापस आ गया.’ फ़राज़ ने कहा. फिर हिंदी कवि ने मजाकिया लहजे में कहा कि इतने लम्बे-तगड़े पठानी बदन पर कोई इराक़ी वर्दी फिट भी तो नहीं आ सकती थी, फ़राज़ साहब. इतने ख़ूबसूरत बदन के सामने वर्दी को खुदकुशी करनी पड़ती और उन्होंने फ़राज़ साहब की ही ग़ज़ल का एक शेर उन्हें नजर किया :

जिसको देखो वही ज़ंजीर-ब-पा लगता है

शहर का शहर हुआ दाखिले-ज़िन्दा जानां!

फ़राज़ को जिन दो ग़मों ने ज़िन्दगी भर परेशान किया. वो हैं उन्हें देश निकला दे देना और पाकिस्तान में जम्हूरियत कायम न हो पाना. उन्होंने एक ग़ज़ल कही थी.

रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ

किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझसे ख़फ़ा है तो जमाने के लिए आ

पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो
रस्मो-रहे-दुनिया ही निभाने के लिए आ

जैसे तुझे आते हैं न आने के बहाने
ऐसे ही किसी रोज़ न जाने के लिए आ

कुछ लोगों का कहना है कि उन्होंने यह ग़ज़ल ‘पुष्पा डोगरा’ के लिए कही थी, जो भारतीय कत्थक डांसर थी. लेकिन अहमद फ़राज़ का कहना था कि यह ग़ज़ल उन्होंने पाकिस्तान की जम्हूरियत के लिए कही.

दूसरा गम उन्हें देश निकाला से मिला था. अपने इस गम को कितनी खूबसूरती से उन्होंने अपने अश’आर में कहा है.

कुछ इस तरह से गुज़ारी है ज़न्दगी जैसे
तमाम उम्र किसी दूसरे के घर में रहा

किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल
कोई हमारी तरह उम्र भर सफर में रहा

हिजरत यानी देश से दूर रहने का दर्द और अपने देश की यादें उनके यहां मिलती हैं.

वो पास नहीं अहसास तो है, इक याद तो है, इक आस तो है
दरिया-ए-जुदाई में देखो तिनके का सहारा कैसा है

मुल्कों मुल्कों घूमे हैं बहुत, जागे हैं बहुत, रोए हैं बहुत
अब तुमको बताएं यारो दुनिया का नज़ारा कैसा है

ऐ देश से आने वाले मगर तुमने तो न इतना भी पूछा
वो कवि कि जिसे बनवास मिला वो दर्द का मारा कैसा है

अहमद फ़राज़ पाकिस्तान में जितने लोकप्रिय रहे, उतने वह भारत में भी थे. वह भारत को अपना दूसरा घर भी कहते थे. फ़राज़ हिन्दुस्तानी मुशायरों में उन्हें बख्शी गई इज़्जत का बयान करते नहीं थकते थे.

हिन्दुस्तान में अक्सर मुशायरों में शिरकत से मुझे ज़ाती तौर पर अपने सुनने और पढ़ने वालों से तआरुफ़ का ऐज़ाज़ मिला और वहां के अवाम के साथ-साथ निहायत मोहतरम अहले-क़लम ने भी अपनी तहरीरों में मेरी शे’री तख़लीक़ात को खुले दिल से सराहा. इन बड़ी हस्तियों में फ़िराक़, सरदार अली जाफ़री, मजरूह सुल्तानपुरी, डॉक्टर क़मर रईस, खुशवंत सिंह, प्रो. मोहम्मद हसन और डॉ. गोपीचन्द नारंग ख़ासतौर पर क़ाबिले-जिक्र हैं.

क्या कहा दूसरे शायरों ने अहमद फ़राज़ के बारे में

फ़राज़ की शायरी ग़मे दौरां और ग़मे जानां का एक हसीन संगम है. उनकी ग़ज़लें उस तमाम पीड़ा की प्रतीक हैं, जिससे एक हस्सास (सोचने वाला) और रोमांटिक शायर को जूझना पड़ता है. उनकी नज़्में ग़मे दौरां की भरपूर तर्जुमानी करती हैं. उनकी कही हुई बात, जो सुनता है उसी की दास्तां मालूम होती है.

-कुंवर महेंद्र सिंह बेदी “सहर”

इस दौर में भारत और पाकिस्तान की बंदिशों को नहीं मानने वाले लोगों की बेहद कमी है. पाकिस्तान में रहते हुए जिस तरह की परेशानियों को उन्होंने झेला और उसके बाद भी इंसानी आजादी और मजहब के भेदभाव से ऊपर उठकर लिखा, वह काबिले तारीफ है.

-डॉ. अली जावेद (नेशनल काउंसिल फॉर प्रमोशन ऑफ उर्दू लैंग्वेज के पूर्व निदेशक)

फराज़ उर्दू रोमांटिक शायरी का ऐसा नाम है, जिसकी गज़लों और नज्मों से तीन पीढ़ियां वाकिफ हैं. इस वक्त उनके जितने शेर लोगों को याद हैं, उतने शायद ही किसी अन्य शायर के हों.

मशहूर शायर मुमताज राशिद

फ़राज़ अपने वतन के मज़लूमों के साथी हैं. उन्हीं की तरह तड़पते हैं, मगर रोते नहीं. बल्कि उन जंजीरों को तोड़ते और बिखेरते नजर आते हैं, जो उनके माशरे (समाज) के जिस्म (शरीर) को जकड़े हुए हैं. उनका कलाम न केवल ऊंचे दर्जे का है बल्कि एक शोला है, जो दिल से ज़बान तक लपकता हुआ मालूम होता है.

-मशहूर शायर मजरूह सुल्तानपुरी

वैसे तो फ़राज़ एक ग़ज़ल कहने वाले शायर की हैसियत से जाने जाते हैं, लेकिन उनकी नज्मों का भी कोई सानी नहीं है.

भले दिनों की बात है
भली सी एक शक्ल थी
न ये कि हुस्न-ए-ताम हो
न देखने में आम सी
न ये कि वो चले तो कहकशां सी रहगुज़र लगे
मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे
कोई भी रुत हो उस की छब
फ़ज़ा का रंग-रूप थी
वो गर्मियों की छांव थी
वो सर्दियों की धूप थी
न मुद्दतों जुदा रहे
न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो
न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद
न ये कि इज़्न-ए-आम हो
न ऐसी ख़ुश-लिबासियां
कि सादगी गिला करे
न इतनी बे-तकल्लुफ़ी
कि आइना हया करे
न इख़्तिलात में वो रम
कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें
न इस क़दर सुपुर्दगी
कि ज़च करें नवाज़िशें
न आशिक़ी जुनून की
कि ज़िंदगी अज़ाब हो
न इस क़दर कठोर-पन
कि दोस्ती ख़राब हो
कभी तो बात भी ख़फ़ी
कभी सुकूत भी सुख़न
कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़रां
कभी उदासियों का बन
सुना है एक उम्र है
मुआमलात-ए-दिल की भी
विसाल-ए-जां-फ़ज़ा तो क्या
फ़िराक़-ए-जां-गुसिल की भी
सो एक रोज़ क्या हुआ
वफ़ा पे बहस छिड़ गई
मैं इश्क़ को अमर कहूं
वो मेरी ज़िद से चिड़ गई
मैं इश्क़ का असीर था
वो इश्क़ को क़फ़स कहे
कि उम्र भर के साथ को
वो बद-तर-अज़-हवस कहे
शजर हजर नहीं कि हम
हमेशा पा-ब-गिल रहें
न ढोर हैं कि रस्सियां
गले में मुस्तक़िल रहें
मोहब्बतों की वुसअतें
हमारे दस्त-ओ-पा में हैं
बस एक दर से निस्बतें
सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं
मैं कोई पेंटिंग नहीं
कि इक फ़्रेम में रहूं 
वही जो मन का मीत हो
उसी के प्रेम में रहूं 
तुम्हारी सोच जो भी हो
मैं उस मिज़ाज की नहीं
मुझे वफ़ा से बैर है
ये बात आज की नहीं
न उस को मुझ पे मान था
न मुझ को उस पे ज़ोम ही
जो अहद ही कोई न हो
तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी
सो अपना अपना रास्ता
हंसी-ख़ुशी बदल दिया
वो अपनी राह चल पड़ी
मैं अपनी राह चल दिया
भली सी एक शक्ल थी
भली सी उस की दोस्ती
अब उस की याद रात दिन
नहीं, मगर कभी कभी

जिस तरह उर्दू शायरी अहमद फ़राज़ के बिना पूरी नहीं हो सकती, उसी तरह अहमद फ़राज़ भी अपनी इस ग़ज़ल के बिना पूरे नहीं हो सकते. शायद उनकी सबसे मशहूर ग़ज़ल कहूं तो अतिश्योक्ति नहीं होगी.

सुना है लोग उसे आंख भर के देखते हैं
सो उसके शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं

सुना है रब्त है उसको ख़राब हालों से
सो अपने आप को बरबाद कर के देखते हैं

सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उसकी
सो हम भी उसकी गली से गुज़र के देखते हैं

सुना है उसको भी है शेर-ओ-शायरी से शगफ़
सो हम भी मोजज़े अपने हुनर के देखते हैं

सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं
ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं

सुना है रात उसे चांद तकता रहता है
सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं

सुना है हश्र हैं उसकी ग़ज़ाल सी आंखें
सुना है उस को हिरन दश्त भर के देखते हैं

सुना है दिन को उसे तितलियां सताती हैं
सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं

सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उसकी
सुना है शाम को साये गुज़र के देखते हैं

सुना है उसकी सियाह चश्मगी क़यामत है
सो उसको सुरमाफ़रोश आह भर के देखते हैं

सुना है उसके लबों से गुलाब जलते हैं
सो हम बहार पर इल्ज़ाम धर के देखते हैं

सुना है आईना तमसाल है जबीं उसकी
जो सादा दिल हैं उसे बन संवर के देखते हैं

सुना है जब से हमाइल हैं उसकी गर्दन में
मिज़ाज और ही लाल-ओ-गौहर के देखते हैं

सुना है चश्म-ए-तसव्वुर से दश्त-ए-इम्कां में
पलंग ज़ाविए उसकी कमर के देखते हैं

सुना है उसके बदन के तराश ऐसे हैं
के फूल अपनी क़बायें कतर के देखते हैं

वो सर-ओ-कद है मगर बे-गुल-ए-मुराद नहीं
के उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं

बस एक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का
सो रहर्वान-ए-तमन्ना भी डर के देखते हैं

सुना है उसके शबिस्तान से मुत्तसिल है बहिश्त
मकीन उधर के भी जलवे इधर के देखते हैं

रुके तो गर्दिशें उसका तवाफ़ करती हैं
चले तो उसको ज़माने ठहर के देखते हैं

किसे नसीब के बे-पैरहन उसे देखे
कभी-कभी दर-ओ-दीवार घर के देखते हैं

कहानियां हीं सही सब मुबालग़े ही सही
अगर वो ख़्वाब है ताबीर कर के देखते हैं

अब उसके शहर में ठहरें कि कूच कर जायें
फ़राज़ आओ सितारे सफ़र के देखते हैं

फ़राज़ को गुज़रे कई बरस हो गए, मगर आज भी वह हमारे दिलों में ज़िंदा हैं.

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें

चलते चलते अहमद फ़राज़ के कुछ लोकप्रिय अशआरः

इस से पहले के बे-वफ़ा हो जाएं
क्यों न ऐ दोस्त हम जुदा हो जाएं

दोस्त बन कर भी नहीं साथ निभानेवाला
वही अंदाज़ है ज़ालिम का ज़मानेवाला

वक़्त ने वो ख़ाक उड़ाई है के दिल के दश्त से
क़ाफ़िले गुज़रे हैं फिर भी नक़्श-ए-पा कोई नहीं

करूं न याद अगर किस तरह भुलाऊं उसे
ग़ज़ल बहाना करूं और गुनगुनाऊं उसे 

जो भी दुख याद न था याद आया
आज क्या जानिए क्या याद आया
याद आया था बिछड़ना तेरा
फिर नहीं याद कि क्या याद आया

तुम भी ख़फ़ा हो लोग भी बरहम हैं दोस्तो
अब हो चला यक़ीं के बुरे हम हैं दोस्तो
कुछ आज शाम ही से है दिल भी बुझा-बुझा
कुछ शहर के चिराग़ भी मद्धम हैं दोस्तो

 

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