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माइकल मधुसूदन दत्त: वो कवि जिसने शादी से बचने के लिए धर्म बदल लिया

मेरा नाम माइकल है, कूल है ना? मुझे भी पता है. लेकिन जब मेरे सीनियर ने मुझसे मेरे नाम के पीछे की कहानी जाननी चाही, उस समय मैं दुनिया के सबसे डम्ब आदमी जैसा फील करने लगा. लोगों को आमतौर पर अपने नाम से जुड़ी सारी बातें पता होती हैं. क्योंकि तमाम लोग सबसे पहले यही पूछते हैं. उस दिन मैंने घर जाने के बाद जो पहला काम किया, वो ये कि अपने नाम से जुड़ी सारी डिटेल्स इकट्ठी कीं.

उसके बाद जो बात सामने आई, वो ये है कि मेरा नाम मेरे नाना ने रखा था. लेकिन वो प्रो-व्रो कुछ नहीं थे. उन्होंने मेरा नाम 19वीं सदी के मशहूर नाटककार और कवि ‘माइकल मधुसूदन दत्त’ के नाम पर रखा था. मेरे नाना का नामों को लेकर एक अजीब सा ऑब्सेशन रहा है. मेरे 6 मामा हैं, सभी के नाम का शुरुआती अक्षर ‘एस’ है. और उससे भी कमाल की बात ये है कि मेरी मां का नाम ‘जाह्नवी’ है और दत्त की मां का नाम भी ‘जाह्नवी’ ही था.

माइकल मधुसूदन दत्त के नाम पे ना जाइए, आदमी वो भी तोप ही थे. कुछ सोर्सेस के मुताबिक़ वो पहले भारतीय थे जिसने किसी यूरोपियन या एंग्लो-इंडियन महिला से शादी की थी. लेकिन ये उनकी सबसे बड़ी या एकमात्र उपलब्धि नहीं थी. उन्होंने ढेरों कविताएं, नाटक, कहानियां और ट्रांसलेशन लिखे थे. बंगाली मूल से होने की वजह से उनकी अधिकतर कृतियां बांग्ला भाषा में ही हैं. लेकिन डरने की जरुरत नहीं है, उनकी कुछ कहानियां और ट्रांसलेशन इंग्लिश में भी हैं.

उन्हें अपने इलाके में ‘ब्लैंक वर्स’ का अगुआ कहा जाता है. ब्लैंक वर्स एक तरह की कविता होती है, जो किसी रिदम में नहीं होती. उनकी ज़िंदगी बेहद संघर्षपूर्ण थी. और उसे संघर्षपूर्ण बनाए रखने में उनकी भूमिका कमाल की थी. उन्होंने उस दौर में वो फैसले लिए जिसे आज भी लोग लेने से पहले कई बार सोचते हैं. उनका विद्रोही स्वभाव आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उस दौर में था.

कुछ बचपन से ही थे टैलेंटेड, कुछ अंगरेजी की कारस्तानी थी

24 जनवरी, 1824 को अविभाजित बंगाल के जेस्सोर जिले के एक छोटे से गांव सागरदारी में जन्मे दत्त की शुरुआती पढ़ाई-लिखाई अपने गांव के ही स्कूल और मदरसों में हुई. यहां उन्होंने पर्शियन भाषा सीखी. घर का माहौल भी काफी इंग्लिश मीडियम टाइप था, तो यूरोपियन लिटरेचर से बचपन में ही परिचय हो गया था. अपने अंग्रेजी ज्ञान और लेखन के चलते स्कूल में भी टीचर्स के चहेते थे. मतलब अपनी भाषा में कहें तो मग्गू थे. अंग्रेजी का ज्ञान इतना टॉप क्लास था कि 17 की उम्र में ही कविता लिख के इंग्लैंड, पब्लिकेशन में भेजने लगे थे. हालांकि वो छप नहीं पाई.

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दत्त की निजी ज़िंदगी उनके आखिरी वक़्त तक उथल-पुथल से भरी हुई थी. वो अंग्रेजी के कवि बनना चाहते थे, और इसके लिए इंग्लैंड जाना चाहते थे. लेकिन पापा ने परमिशन नहीं दी. और ऊपर से शादी फिक्स कर दी. इससे नाराज दत्त ने अपने माता-पिता और रिश्तेदारों के विरोध के बावजूद 9 फरवरी 1843 को ईसाई धर्म अपना लिया. इस कांड ने उनकी ज़िंदगी ही बदल दी. उनके पापा ने उन्हें अपनी संपत्ति से बेदखल कर दिया. 1844 में उन्हें हिंदू कॉलेज से भी निकाल दिया गया.

अगले तीन साल की पढ़ाई उन्होंने बिशप कॉलेज से पूरी की. पारिवारिक और आर्थिक समस्याओं के कारण उन्हें बंगाल छोड़ मद्रास जाना पड़ा. मद्रास में एक अनाथालय में काम करने के बाद उन्होंने एक हाई स्कूल में टीचर की नौकरी कर ली. फिर आया साल 1848, मतलब बदलाव का साल. इस साल कई चीज़ें बदलीं लेकिन दत्त का नाम और उनका रिलेशनशिप स्टेटस सबसे खास थे. इसी साल मधुसूदन ने मद्रास महिला अनाथालय की एक लड़की ‘रेबक्का थोमसन मैक्टाविश’ से शादी कर ली. और अपने नाम में ‘माइकल’ जोड़ लिया. इस शादी से उन्हें 4 बच्चे हुए. अपने पिता से उनकी नाराजगी इस कदर थी, कि उनकी मृत्यु (1855) के बाद ही कलकत्ता वापस आए. वो भी बिना बीवी-बच्चों के.

माइकल मधुसूदन दत्त

लेकिन ज्यादा लम्बे समय तक वो अकेले नहीं रहे. 1858 में एक फ्रेंच लड़की ‘एमिलिया हेनरिता सोफी वाइट’ के साथ रिलेशनशिप में आए, जो मद्रास अनाथालय में उनके सहकर्मी की बेटी थी. उनसे माइकल को 3 बच्चे हुए. हालांकि इतनी सारी चीज़ों के बावजूद उनका ध्यान पढ़ाई से नहीं भटका. और वे 1862 में बैरिस्टरी करने इंग्लैंड चले गए. आर्थिक रूप से कमजोर होने की वजह से 1863 में उन्हें वरसाय (फ़्रांस का एक शहर) शिफ्ट होना पड़ा. 1865 में ईश्वरचंद्र विद्यासागर की आर्थिक मदद से वो वापस इंग्लैंड आकर अपनी बैरिस्टरी पूरी कर सके. इस वाकये के बाद दत्त, विद्यासागर को ‘दायार सागर’ (दया का सागर) बुलाने लगे. पढ़ाई पूरी करने बाद माइकल 1867 में कलकत्ता वापस आ गए और हाई कोर्ट में क्लर्क और फिर मुख्य अनुवादक की नौकरी करने लगे. इन सबके बीच उनका परिवार भी उनके साथ था.

ईश्वर चन्द्र विद्यासागर

हर माइकल को एक डेविड मिल ही जाता है

माइकल पर सबसे ज्यादा प्रभाव हिंदू कॉलेज में उनके प्रोफेसर रहे डेविड लेस्टर रिचर्डसन का था. डेविड खुद एक कवि थे. दत्त को कविता की ओर खींचने करने का श्रेय उन्हीं को जाता है. उस दौर में बंगाल कई तरह की समस्याओं से जूझ रहा था. लेकिन सबसे बड़ी समस्या थी- हिंदू समाज में प्रचलित अंधविश्वास, रूढियां, पुराने रीति-रिवाज़ और उनकी वजह से होने वाले अत्याचार और हत्याएं. इसके विरोध में हिंदू कॉलेज के छात्रों ने ‘यंग इंडिया’ नाम का एक आन्दोलन शुरू किया. दत्त इस आन्दोलन का हिस्सा तो नहीं, पर इसके समर्थक जरूर थे. वो इस आन्दोलन की सोच और कामों से खासे प्रभावित थे. माइकल मशहूर रोमांटिक पोएट ‘विलियम वर्ड्सवर्थ’ और ब्लैंक वर्स में कविताएं लिखने वाले ‘जॉन मिल्टन’ के भक्त थे. ब्लैंक वर्स में कविता लिखने की प्रेरणा उन्हें जॉन मिल्टन से ही मिली थी. उन पर ‘लार्ड बैरन’ का भी प्रभाव था, जो एक रोमांटिक कवि थे. उनका जीवन भी काफी हद तक माइकल जैसा ही था. दोनों ही रोमांटिक कवि थे. दोनों ज़िंदगी भर पैसे के लिए जूझते रहे. और दोनों ही ने एक से ज्यादा शादी की थी. संयोगवश माइकल का जन्म ठीक उसी साल हुआ जिस साल ‘बैरन’ की मृत्यु हुई थी यानी 1824 में.

लार्ड बैरन

नाटक में भी हाथ, कविता के साथ-साथ

दत्त की रुचि कविताओं में थी लेकिन वो नाटक भी लिखते थे. उन्होंने कई कविताएं लिखी जिसमे ‘द कैप्टिव लेडी’, ‘किंग पोरस’ और ‘विजंस ऑफ़ द पास्ट’, (इंग्लिश) खास हैं. पहले माइकल अंग्रेजी में ही लिखते थे, लेकिन फिर तत्कालीन शिक्षा समिति के अध्यक्ष ‘जॉन ऐलियट’ और अपने दोस्त ‘गौर दास’ के सलाह पर उन्होंने अपनी भाषा यानी बांग्ला में लिखना शुरू किया. अपने भाषा में लिखना उन्हें रास आ गया और उन्होंने एक के बाद एक 4 कविताएं लिख डालीं.

उनकी कविताओं में ‘मेघनाद वध काव्य’, ‘वीरांगना काव्य’, ‘तिलोत्तमा संभव काव्य’ और ‘ब्रज्गण काव्य’ (बांग्ला) ख़ास हैं. उनकी लिखी ‘मेघनाद वध काव्य’ को तो बांग्ला साहित्य का मैग्नम ओपस माना जाता. इस कविता में वे रावण के बड़े बेटे मेघनाद की आखिरी लड़ाई और मृत्यु की कहानी को विस्तार से बताते हैं. बांग्ला भाषा में नाटक तो माइकल के पहले भी लिखे जाते थे, लेकिन माइकल ने उसे नई ऊंचाई तक पहुंचाया. उनके नाटक व्यंगात्मक और अंग्रेजी स्टाइल के होते थे. जो सीन्स और एक्ट्स में बंटे होते थे. ऐसा बांग्ला साहित्य में पहली दफा हो रहा था. ‘शर्मिष्ठा’, ‘पद्मावती’, ‘एके की बोले सब्याता’, ‘कृष्णा कुमारी’ और ‘बुरो शालिकर घरे रों’ उनके प्रमुख नाटक हैं.

‘मायाकन्नन’ उनका आखिरी नाटक था जो उनकी मौत से एक साल पहले (1872) प्रकाशित हुआ. हिब्रू, लैटिन, ग्रीक, तमिल, तेलुगु, और संस्कृत जैसी भाषाओं की जानकारी ने उन्हें विश्व भर के अलग-अलग भाषाओं में लिखी साहित्यिक कृतियों से रूबरू होने का मौका दिया. उन्होंने संस्कृत ड्रामा ‘रत्नावली’ और बंगाली ड्रामा ‘नील दर्पण’ का अंग्रेजी अनुवाद भी किया. अपने आखिरी समय में दत्त ने ग्रीक भाषा की लोकप्रिय रचना ‘इलियड’ भी ‘द स्लेयिंग ऑफ़ हेक्टर’ नाम से अंग्रेजी नाटक के रूप में लिख रहे थे. लेकिन दुर्भाग्यवश वो उसे पूरा नही कर सके.

मेघनाद बध काव्य

मरे कैसे थे?

माइकल मधुसूदन दत्त ने 29 जून 1873 को कलकत्ता के एक अस्पताल में अपनी आखिरी सांसें ली. उनकी मृत्यु से ठीक तीन दिन पहले ही उनकी पार्टनर एमिलिया की भी मृत्यु हो गई थी. जबकि उनकी पत्नी रेबक्का की मृत्यु जुलाई 1892 को मद्रास में हुई. दत्त की मृत्यु के 15 साल तक किसी ने उनकी कोई खोज खबर नहीं ली. लेकिन बाद में उनकी कब्र पर उनकी मूर्ति स्थापित कर उसे समाधि का रूप दिया गया.

माइकल की समाधि

तो ऐसे थे ये वाले माइकल. एक माइकल मैं भी हूं. वो तो गए, मैं यहीं हूं. अब कोई पूछे तो बताने को मेरे पास एक पूरी कहानी है. जिस कहानी के अंदर नाटक हैं, कविताएं हैं. बहुत इमोशन है, प्यार है. उतार-चढ़ाव है. विद्रोह भी खूब है. कुल जमा अपने में ही भरपूर सी है उनकी कहानी. अब तो कोई पूछता है तो मुझे माइकल नाम के पीछे का किस्सा सुनाने में भी मजा आता है. अब, ये नाम मुझे भी कूल लगता है

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