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मुस्लिम देश शरणार्थियों की मदद नहीं करते, ये बात झूठ है

ये आर्टिकल सरफ़राज़ कटिहारी ने लिखा है. सरफ़राज़ बिहार के कटिहार के रहने वाले हैं. फिलहाल दिल्ली में रहते हैं. लॉ की पढ़ाई कर रहे हैं. सरफ़राज़ को दी लल्लनटॉप पर छपे एक ‘गेस्ट आर्टिकल’ से असहमति हुई. उन्होंने उसको काउंटर करते हुए फेसबुक पर एक पोस्ट लिखी. हमने उन्हें एप्रोच किया और कहा कि आप सीधे हमें लिख दीजिए. हम आपकी बात भी पब्लिश करेंगे. लल्लनटॉप एक ओपन प्लेटफॉर्म है और यहां हर तरह के विचारों का स्वागत है. अन्य पाठकों को भी अगर हमारे किसी आर्टिकल से असहमति होती है और उनके पास कहने को ज़बरदस्त बात हो, तो वो बेझिझक हमें लिख भेजें. हम छापेंगे उसे. 

सरफ़राज़ अपने इस आर्टिकल में उदाहरण समेत बता रहे हैं कि कैसे समय-समय पर मुस्लिम मुल्क शरणार्थियों की मदद के लिए आगे आते रहे हैं.


आपने कभी नहीं सुना होगा कि मुसलमानों ने भी यहूदियों को शरण दी थी. न ही ये सुना होगा कि मुस्लिम देशों में ईसाईयों ने शरण ली. और न ये जानकारी आपको मिली होगी के हिंदुओं ने भी भागकर किसी मुस्लिम देश में शरण ली हुई है. वजह यही है कि इन जानकारियों को आवाम तक पहुंचने नहीं दिया जाता है.

इसी कारण आजकल सोशल मीडिया सहित मुख्यधारा की मीडिया में इस्लामोफोबिक समूहों द्वारा एक प्रोपगेंडा फैलाया जा रहा है. जिसमें मुख्य सवाल कुछ यूं हैं,

# मुस्लिम शरणार्थी मुस्लिम देशों में क्यों नहीं बसते हैं?

# मुस्लिमों ने कभी गैर-मुस्लिम की मदद की है क्या? 

# जब उन्होंने कभी मदद नहीं की है, तो फिर वो गैर-मुस्लिमों से क्यों उम्मीद रखते हैं?

# वो नॉन-मुस्लिम बहुल राष्ट्र में शरण क्यों लेते हैं?

ये सत्य है कि आज कुछेक मुस्लिम, मुस्लिम राष्ट्र और यूरोप सहित दुनिया भर के देशों में शरणार्थी की हैसियत से शरण लिए हुए हैं. 90% से ज़्यादा मुसलमानों ने अपने पड़ोस के मुस्लिम देशों में ही शरण ले रखी है. लेकिन इतिहास देखने से हमें ये भी पता चलता है कि मुस्लिम आवाम हमेशा ही विपत्ति में फंसे लोगों की मदद और बचाव में खड़ी रही है. अगर ऐसा नहीं भी होता, तो भी ये सवाल निहायत ही गलत होता. एक तरफ आप खुद को मानवतावादी और सबको बराबर समझने की बात कर रहे हैं, दूसरी तरफ कुतर्क द्वारा वर्ग विशेष के प्रति विद्वेष की भावना पैदा कर रहे हैं.

जब आप ‘मुस्लिमों ने कभी किसी दूसरी कौम को शरण नहीं दी, इसीलिए दूसरों को भी नहीं देनी चाहिए’ जैसी बात कहते हैं, तो आप भी उन्हीं की तरह हो गए. तब तो यूनाइटेड नेशन्स जैसा कोई मानवतावादी इदारा भी नहीं था, न ही विपत्ति में पड़े लोगों को शरण देने के लिए यूनाइटेड नेशन्स की नीति थी.

इतिहास और वर्तमान में मुस्लिम राष्ट्र और लोगों द्वारा गैर-मुस्लिमों की मदद की बात बताना इसलिए जरूरी है, क्योंकि इतिहास और वर्तमान से सवाल पूछने वाले इस्लामोफोबिक ही नहीं, बल्कि इंसानियत विरोधी लोग हैं. जो लोगों को इंसानियत के मुखालिफ बनाने की कवायद शुरू कर चुके हैं. ये देश ही नहीं, दुनियाभर के लिए नुकसानदेह है.

अमेरिका में एक धड़ा ऐसा भी था, जो शरणार्थियों को लेने से इंकार कर रहा था. (Image: Reuters)
अमेरिका में एक धड़ा ऐसा भी था, जो शरणार्थियों को लेने से इंकार कर रहा था. (Image: Reuters)

अतीत में मुसलमानों और मुस्लिम सल्तनत द्वारा की गई मदद

# स्पेन के सेविल्ले को ईसाईयों द्वारा जीतने के बाद 1391 में जब यहूदियों को वहां से खदेड़ा गया, तब वो मज़लूम लोग भूमध्यसागर पार करके उत्तर अफ्रीका के मुस्लिम इलाके (अल्जीरिया, मोरक्को, तंजानिया) में जा बसे थे. फिर जब इबेरियन प्रायद्वीप की जीत हुई, अर्थात reconquista के बाद बादशाह फर्डीनांड और रानी इसाबेला को जब 1492 में स्पेन और 1496 में पुर्तगाल से भगाया गया, तब वो भी यहूदी समंदर को पार करके उत्तर अफ्रीका के मुस्लिम इलाकों और फिर तुर्की में आकर बसे थे.

# सुल्तान बायेजिद द्वितीय ने उन मजलूम यहूदियों को बसाने और दूसरी ज़रूरतों का सामान मुहैया कराने के लिए बाजाब्ता अपना फरमान निकाला था. उन्होंने अपने अधिकारियों समेत सभी निवासियों को उनकी मदद करने के लिए कहा था. 1492 में स्पेन से लगभग 1 लाख 50 हजार लोग तुर्की की खिलाफत-ए-उस्मानिया में आकर बसे थे. इतना ही नहीं, बल्कि उन मज़लूम यहूदियों को समंदर के उस पार से इस पार लाने के लिए जहाज भी भेजा गया था.

# द्वितीय विश्व युद्ध के समय हिटलर के आदेश पर फ्रांस की विची हुकूमत ने यहूदियों की हत्या का फरमान जारी किया. तब मोरक्को के सुल्तान मोहम्मद पांचवां ने सिर्फ अपने यहां के यहूदियों को ही नहीं बचाया, बल्कि कई फ्रेंच यहूदी भी फ्रांस से भागकर वहां आए. उन्होंने सबको शरण दी. उस वक़्त हिटलर की हुकूमत फ्रांस पर थी. फ्रांस की विची सरकार उसकी मुखौटे वाली सरकार थी और मोरक्को फ्रांस का protectorate अर्थात मातहत था.

विश्वयुद्ध के समय मोरोक्को के सुलतान रहे मुहम्मद. (Image: AP)
विश्वयुद्ध के समय मोरोक्को के सुलतान रहे मुहम्मद. (Image: AP)

# होलोकास्ट के समय तुर्की के बेहिक एरकिन ने, जो उस समय फ्रांस में तुर्की के राजदूत थे, लगभग 20,000 से ज़्यादा यहूदियों की जान बचाई थी. उन्हें सुरक्षित वहां से निकाला. साथ ही बेहिक एरकिन ने यूरोप के सभी तुर्किश अधिकारियों से भी आग्रह किया कि जहां तक मुमकिन हो, यहूदियों को बचाया जाए.

# उसी दौरान ट्यूनीशिया के खालिद अब्दुल वहाब ने बहुत से यहूदियों की जान बचाई. उन्हें लेबर कैंप, डेथ कैंप और जर्मन फौजियों के अत्याचार से बचाया. जिसकी वजह से उन्हें ‘अरब शिंडलर’ के नाम से याद किया जाता है.

खालिद-उल-वहाब उर्फ़ 'अरब शिंडलर'. (Image: neogaf.com)
खालिद अब्दुल वहाब उर्फ़ ‘अरब शिंडलर’. (Image: neogaf.com)

# दूसरे विश्व युद्ध के समय बहुत बड़ी तादाद में ईसाई और यहूदी मिडिल-ईस्ट में आकर बसे थे. सिर्फ पोलैंड के ही तीन लाख से ज्यादा ईसाई ईरान में आकर बसे थे. फिलिस्तीन और सीरिया के इलाकों में भी लाखों यूरोपियन आकर बसे थे. उस समय यूरोप में इकलौता मुस्लिम मुल्क अल्बानिया था. वहां भी मुसलमानों और उनके साथ ईसाइयों ने मिलकर वहां रहने वाले अति-अल्पसंख्यक यहूदियों की जान बचाई थी. हिटलर के दाहिने हाथ एइच्मान के अनुसार उस वक़्त 200 यहूदी थे अल्बानिया में. दूसरे इलाकों से भी वहां और यहूदी आये थे अपनी जान बचाने. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद अल्बानिया में 2,000 यहूदी हो गए थे.

वर्तमान की स्थिति

पिछले कुछ दशकों के इतिहास में हम देखते हैं कि जब श्रीलंका से तमिल हिंदू भागना शुरू हुए, तो कुछ भारत में आए, तो साथ ही कुछ मलेशिया में भी गए जो कि मुस्लिम-बहुल देश है. अभी सीरिया की जंग के दौरान कुछ ईसाई शरणार्थियों ने तुर्की में शरण ली हुई है. रोहिंग्या मामले में बांग्लादेश में ही रोहिंग्या मुसलमानों के साथ रोहिंग्या हिंदुओं ने भी शरण ले रखी है. चूंकि अराकान में हिंदू काफी कम हैं, इसलिए वहां से भागने वाले हिंदुओं की संख्या भी कम है. लेकिन जो भी भागे हैं, उन्हें बांग्लादेश में शरण मिली हुई है.

अफ्रीका में अक्सर सिविल वॉर चलता रहता है, तो लोग बगल के शांति वाले देश में भाग कर शरण लेते रहते हैं. कई बार ईसाई लोग मुस्लिम-बहुल राष्ट्र में शरण लेते हैं, तो कई बार मुस्लिम लोग ईसाई-बहुल राष्ट्र में शरण लेते हैं.

ईरान में पनाह की तलाश में पहुंचे सीरियन शरणार्थी. (Image: Reuters)
ईरान में पनाह की तलाश में पहुंचे सीरियन शरणार्थी. (Image: Reuters)

अंत में एक बात और. वो ये कि ज़्यादातर लोग अपने अशांत देश को छोड़कर शांति वाले पड़ोसी देश में ही शरण लेते हैं, ताकि हिंसा से बच सकें. इसमें जहां स्थलीय सीमा वाले देश पड़ोसी देश कहलाते हैं, वहीं समुद्री सीमा के पार वाले मुल्क को भी पड़ोसी देश ही बोला जाता है. अफ़सोस की बात है कि 2001 के बाद से काफी मुस्लिम देश अशांत हैं, तो वहां के लोग शरण लेने के लिए भूमि की सीमा या समुद्री सीमा को पार करके अपने पड़ोस के मुल्क में जा रहे हैं. यूनाइटेड नेशन्स द्वारा भी शरणार्थियों का बंटवारा होता है. उन्हें दूसरे मुल्कों में बसाया जाता है, ताकि पड़ोसी देश पर ही सारा बोझ न पड़ जाए.

सबसे ज्यादा मुस्लिम रिफ्यूजी कहां हैं?

इस आर्टिकल में हमने मुस्लिम देशों में रहने वाले मुस्लिम रिफ्यूजियों का ज़िक्र नहीं किया है. ये जानना ज़रूरी है कि दुनिया भर में मुस्लिम रिफ्यूजियों की नब्बे प्रतिशत से भी अधिक आबादी अभी भी मुस्लिम देशों में ही रहती है. चाहे सीरिया के रिफ्यूजी हों, या अफ़ग़ान और अराकान के रोहिंग्या रिफ्यूजी. इनमें से 90% से ज़्यादा लोग आज भी तुर्की, जॉर्डन, पाकिस्तान, ईरान, बांग्लादेश, सऊदी अरब, मलेशिया, इंडोनेशिया आदि देशों में शरण लिए हुए हैं.

जॉर्डन के इस 'अल ज़ातारी' रिफ्यूजी कैंप में करीब 41,000 रिफ्यूजियों ने शरण ली. (Image: Reuters)
जॉर्डन के इस ‘अल ज़ातारी’ रिफ्यूजी कैंप में करीब 41,000 रिफ्यूजियों ने शरण ली. (Image: Reuters)

इसके इलावा अगर इंटरनेशनल ऐड ग्रुप की बात की जाए, तो दुनिया भर में मुसलमानों के कई इंटरनेशनल ऐड ग्रुप्स हैं. ये ग्रुप्स दुनिया भर में विपत्ति के समय, चाहे वो युद्ध हो, गृहयुद्ध हो या प्राकृतिक आपदा, बीमारी, अकाल हो, बिना किसी नस्लीय और धार्मिक भेदभाव के लोगों की मदद करते हैं.

धार्मिक संगठन भी लगे हैं मदद करने में

सवा अरब आबादी वाले भारत में अभी तक मुस्लिम सहित किसी भी धार्मिक समूह का ऐसा कोई भी गैर-सरकारी इंटरनेशनल ऐड ग्रुप नहीं है, जो विश्व स्तर पर इस तरह की मदद करता हो. लेकिन दुनिया भर में अलग-अलग धर्मों के पास इंटरनेशनल ऐड ग्रुप मौजूद हैं, जो बिना किसी भेदभाव के लोगों की मदद करते हैं. विदेश में बसे भारतीय मूल के सिक्खों ने भी खालसा ऐड के रूप में विश्व स्तर पर काम करना शुरू किया है, जो कि यूनाइटेड किंगडम में रजिस्टर्ड है.

दुनिया के कई देश बढ़ाते रहे हैं मदद का हाथ

कई देशों की सरकार भी विपत्ति में फंसे हुए लोगों की आर्थिक, अनाज और अन्य तरह से मानवीय मदद करती है. आज़ादी के बाद भारत सरकार भी दूसरे मुल्कों की विपत्ति में हमेशा आगे रही है. चाहे नेपाल हो, श्रीलंका, बांग्लादेश, अफ्रीकी देश, या फिर छोटे से टापूनुमा देश मालदीव की बात हो. अभी भी भारत सरकार ने विपत्ति से जूझ रहे रोहिंग्या लोगों के लिए मदद भेजी है. संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के बाद तो इस तरह की मदद करना आम बात हो गई है.

म्यांमार से विस्थापित रोहिंग्या मुस्लिमों की मदद को पहुंचे भारतीय लोग.
म्यांमार से विस्थापित रोहिंग्या मुस्लिमों की मदद को पहुंचे भारतीय लोग.

आज अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा डोनर, मतलब मदद करने वाला देश है. उसके बाद तुर्की विश्व में दूसरे स्थान पर है. जीडीपी का रेश्यो देखा जाए तो तुर्की मदद करने में प्रथम स्थान पर है. भारत, फ्रांस, जापान, सऊदी अरब से लेकर बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे कम विकसित राष्ट्र भी आज विपत्ति में पड़े पड़ोसी या दूर के राष्ट्रों की मदद करते हैं. लेकिन जब ये आम बात नहीं हुआ करती थी, तब तुर्की के ओस्मानिया खलीफा ने 19वीं शताब्दी में सुदूर देश आयरलैंड की तीन जहाज़ खाद्य पदार्थ के साथ आर्थिक मदद की थी. वहां भयानक अकाल पड़ा था.


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