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अब RT-PCR टेस्ट को भी गच्चा दे रहा कोरोना वायरस, एक्सपर्ट ने बताई वजह

कोरोना वायरस संकट के फिर बढ़ने के बीच एक चिंताजनक जानकारी सामने आई है. खबरों के मुताबिक, कोविड-19 महामारी की वजह बना ये वायरस अब RT-PCR जांच में भी डिटेक्ट नहीं हो पा रहा है. हम आपको ऐसे 5 केस बताएंगे, जिनमें मरीजों में कोविड-1 के लक्षण होने की बात कही गई है, लेकिन उनकी टेस्ट रिपोर्ट नेगेटिव आई है. एक्सपर्ट्स की भी मदद लेकर ये जानने की कोशिश भी करेंगे कि ऐसी सिचुएशन में कैसे तय करें कि व्यक्ति को कोरोना है या नहीं.

फॉल्स नेगेटिव, जान का खतरा

कोरोना के बढ़ते संक्रमण से जहां टेस्टिंग सेंटरों पर लंबी वेटिंग जमा हो गई है, वहीं एक अलग तरह की परेशानी भी खड़ी हो रही है. दरअसल, कई लोगों में कोविड इन्फेक्शन होने का पता एक ही RT-PCR टेस्ट में नहीं चल पा रहा. इस कारण उन्हें 2 या उससे ज्यादा बार RT-PCR टेस्ट कराना पड़ रहा है. इससे न सिर्फ कोरोना के इलाज में देरी हो रही है, बल्कि आसपास के दूसरे लोग भी संक्रमित हो रहे हैं. इसे फॉल्स नेगेटिव कहा जाता है. जब शरीर में वायरस इन्फेक्शन हो, लेकिन टेस्ट में उसका पता ना चले और रिपोर्ट नेगेटिव आए, तब ये टर्मिनोलॉजी इस्तेमाल की जाती है.

कोरोना टेस्ट में पहली बार नेगेटिव आने के बाद कुछ दिन में फिर से पॉजिटिव आ जाने के मामले पिछली कोरोना वेव में भी देखे गए थे. लेकिन इस बार जैसे इस तरह के मामलों की बाढ़ आ गई है. गुड़गांव के रहने वाले रोहित त्यागी लल्लनटॉप से हुई बातचीत में कहते हैं,

‘पिछले हफ्ते तेज बुखार और सिरदर्द के बाद मैंने अपना RT-PCR टेस्ट कराया. अगले दिन रिपोर्ट आई तो मैं नेगेटिव निकला. मैंने इसे सामान्य जुकाम, बुखार समझा. लेकिन सिरदर्द और बदन दर्द लगातार बना हुआ था. डॉक्टर की सलाह पर 4 दिन बाद फिर टेस्ट कराया. इस बार टेस्ट पॉजिटिव आ गया. मेरी पत्नी और भाई का टेस्ट भी पॉजिटिव आया है. अगर पहली बार में ही टेस्ट पॉजिटिव आता तो मैं खुद को आइसोलेट कर लेता. तब शायद पत्नी और भाई को कोरोना इंफेक्शन से बचा पाता.’

इसी तरह के कई केसेज लोग सोशल मीडिया पर भी रिपोर्ट कर रहे हैं. ट्विटर यूजर इला काजमी बताती हैं,

‘मेरी RT-PCR रिपोर्ट नेगेटिव आई. लेकिन मैं कोरोना पॉजिटिव हूं. ये बात सीटी स्कैन से सामने आई है. आखिर इन नेगेटिव RT-PCR का भरोसा कैसे किया जाए.’

एक और यूजर सृष्टि ने लिखा अगर आप किसी कोरोना पेशेंट के संपर्क में आए हैं और उसके बाद आपका कोरोना का टेस्ट नेगेटिव आया है तो इसे हल्के में न लें. कई बार फॉल्स नेगेटिव रिजल्ट आ रहे हैं. अगर आपको लक्षण दिख रहे हैं तो आराम करें.

अर्जिता सिंह लिखती हैं,

‘ये फॉल्स नेगेटिव हो सकता है. टेस्ट कोविड को पकड़ने में सफल नहीं हो पा रहे हैं. मेरे पिता को बुखार आ रहा है. लेकिन उनका कोविड टेस्ट नेगेटिव आया है. एक सीनियर डॉक्टर ने कुछ ब्लड टेस्ट कराने को कहा है. इनसे पता चला है कि उन्हें कोविड है.’

RT-PCR टेस्ट होता क्या है?

भारत में कोरोना वायरस टेस्ट का ज़िम्मा Indian Council of Medical Research (ICMR) के ऊपर है. उसने RT-PCR टेस्ट को कोरोना टेस्टिंग के मामले में ‘गोल्ड स्टैंडर्ड’ करार दिया है. इसका टेस्ट का पूरा नाम है – Reverse Transcription Polymerase Chain Reaction Test. इस टेस्ट को कुछ ऐसे समझें,

वायरस की बनावट में दो चीज़ें बहुत अहम होती हैं. पहली चीज़ है, बाहर की गोल प्रोटीन लेयर. और दूसरी चीज़ है, इस प्रोटीन लेयर के अंदर सुरक्षित रखा वायरस का जेनेटिक मटेरियल. जेनेटिक मटेरियल को आप यूं समझिए कि वायरस का पहचान पत्र है. वायरस दरअसल एक गेंद है, जिसके अंदर एक पहचान पत्र रखा होता है. लैब में वायरस की पहचान करने के लिए यही पहचान पत्र यानी जेनेटिक मटेरियल देखा जाता है. जांच करने वाली मशीन में पहले से वायरस का जेनेटिक मैटीरियल मौजूद होता है. जब नाक या मुंह से लिया गया स्वैब या सैंपल उसमें डाला जाता है तो मशीन उस सैंपल और पहले से मशीन में मौजूद सीक्वेंस का मिलान करती है. अगर मिलान सही होता है तो मरीज को पॉजिटिव घोषित कर दिया जाता है. अगर नहीं तो उसे नेगेटिव माना जाता है.

Coronavirus Test
RTPCR टेस्ट को कोरोना टेस्ट के लिहाज से सबसे अच्छा बताया जाता रहा है. पिछले साल से ही दुनियाभर इसके ऊपर निर्भर है. प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स

RT-PCR से कैसे बच रहा वायरस?

अब दिक्कत ये आ रही है कि जो वायरस अपना रूप बदल चुका है. और टेस्टिंग किट में इस्तेमाल हो रहा सीक्वेंस है पुराना. इस कारण वायरस को डिटेक्ट करने में ये तकनीक अक्सर गच्चा खा रही है. अमेरिका की इलिनॉइस यूनिवर्सिटी और मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने पिछले साल सितंबर महीने में ही एक रिसर्च पेपर प्रकाशित किया था. इसमें कोरोना के बदलते रूप के कारण उसके टेस्ट की पकड़ से बचने पर चिंता जताई गई थी. इसमें कहा गया,

“पीसीआर डायग्नोस्टिक टेस्ट के रीएजेंट्स की डिजाइनिंग कोविड-19 महामारी के लिए जिम्मेदार सार्स-सीओवी-2 वायरस के शुरुआती नमूनों पर आधारित थी. वो नमूने खासकर चीन के वुहान शहर से 5 जनवरी, 2020 को लिए गए कोरोना की जीनोम सीक्वेंसिंग के थे.”

इस रिसर्च में नए वैरिएंट के आने के बाद टेस्टिंग में और दिक्कत आने की बात भी कही गई थी.

इंस्टिट्यूट ऑफ लीवर एंड बाइलियरी साइंसेज में क्लिनिकल माइक्रोबायॉलजी की प्रोफेसर डॉक्टर प्रतिभा काले ने टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार में इसकी एक दूसरी ही वजह बताई. उन्होंने कहा,

‘जिन मरीजों की रिपोर्ट गलत आ रही है, संभव है कि वायरस ने उनकी नाक और गले में अपनी जगह बनाई ही नहीं हो. इस कारण नाक या गले से लिए गए स्वैब सैंपल की टेस्ट रिपोर्ट नेगेटिव आ रही है. साल बदलने के साथ ही बदले रूप वाले कोरोना से पाला पड़ा है, जिससे निपटने में हमें ज्यादा मशक्कत करनी होगी.’

वहीं, कोविड संक्रमण को लेकर काम कर रहे डॉक्टर विपिन वशिष्ठ का कहना है,

‘वैसे तो RT-PCR टेस्ट को कोविड-19 टेस्टिंग का गोल्ड स्टैंडर्ड माना गया है. लेकिन ये बात शुरुआत से सामने आ रही है कि इसके रिजल्ट की प्रामाणिकता 70 से 75 फीसदी है. ऐसे में जरूरी नहीं है कि पहली बार में टेस्ट कराने पर रिजल्ट सही ही आए.’

Corona Medical Test
कोरोना वायरस का बदलता रूप भी आरटीपीसीआर टेस्ट में फाल्स नेगेटिव आने के लिए जिम्मेदार बताया जा रहा है. (फाइल फोटो- PTI)

तो अब किया क्या जाए?

कोरोना के फॉल्स नेगेटिव केसेज को लेकर जब हमने एक्सपर्ट्स से बात की तो सबने एक बार नेगेटिव आने के बाद RT-PCR दोहराने की बात की. हालांकि जब उनसे इस बीच बाकी सबके इन्फेक्ट हो जाने के खतरे के बारे में पूछा गया तो उनके पास इसे लेकर कोई पुख्ता जवाब नहीं मिला.

कोरोना वायरस पर लगातार नजर बनाए हुए डॉक्टर विपिन वशिष्ठ ने हमसे कहा,

‘मेरे हिसाब से RT-PCR टेस्ट ही सबसे बेहतर टेस्ट है. लेकिन अगर इसके नेगेटिव आने के बाद भी सिंपटम बने हुए हैं तो छाती का सीटी स्कैन कराया जा सकता है. अगर फेफड़ों में कोई दिक्कत है तो इसके जरिए डायग्नोस किया जा सकता है.’

पटेल चेस्ट इंस्टीट्यूट, नई दिल्ली के डायरेक्टर डॉक्टर राजकुमार ने भी RT-PCR की हिमायत की. उन्होंने हमें बताया,

‘ICMR सहित कई संस्थाएं इस टेस्ट को फुल प्रूफ बता चुकी हैं. ये बात सही है कि पिछले साल के मुकाबले इस बार फॉल्स नेगेटिव टेस्ट के मामले ज्यादा आ रहे हैं. वायरस में आ रहे बदलाव की वजह से भी ऐसा मुमकिन है. अगर मरीज का टेस्ट नेगेटिव आ रहा है, लेकिन उसे सांस लेने में ज्यादा दिक्कत बनी हुई है तो फेफड़ों का सीटी स्कैन किया जा सकता है. लेकिन ये प्रक्रिया सिर्फ गंभीर केसेज में ही अपनाई जा सकती है. सीटी स्कैन को मास लेवल पर नहीं ले जाया जा सकता.’

इसके अलावा रिसर्च  में बताया गया है कि खून में बढ़े सीआर प्रोटीन (C-reactive protein) की मात्रा से भी कोविड-19 का पता लगाया जा सकता है. कुछ एक्सपर्ट्स ने ब्लड चेकअप के दौरान सीआर प्रोटीन का लेवल चेक करा कर कोविड-19 की पुष्टि करने की बात कही. लेकिन उन्होंने इसे भी मास टेस्टिंग के लिहाज से उतना कारगर नहीं बताया.


वीडियो – कोलकाता पुलिस ने फेक कोरोना टेस्टिंग रैकेट में तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया

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