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तालिबान के आतंक के बीच 'फॉल ऑफ साइगॉन' की चर्चा क्यों हो रही है?

इतिहास एक बहुत ही रोचक विषय है. जरूरी भी. कई विचारकों ने इतिहास को लेकर अपने विचार रखे हैं. मसलन, कार्ल मार्क्स ने कहा था कि इतिहास खुद को दोहराता है. पहले त्रासदी और फिर प्रहसन के रूप में. कार्ल मार्क्स को प्रभावित करने वाले जर्मनी के महान दार्शनिक हीगल ने भी इतिहास को लेकर एक जरूरी बात कही थी. उन्होंने कहा था,

‘हमने इतिहास से केवल इतना सीखा है कि हम इतिहास से कुछ नहीं सीखते.’

अफगानिस्तान में पिछले कुछ महीनों में जो कुछ हुआ है, उसने इतिहास के बारे में कही गई इन दोनों बातों को सही साबित कर दिया है. पूरे देश पर कट्टर इस्लामिक विचारधारा रखने वाले तालिबान का कब्जा हो गया है. 20 साल बाद तालिबान अब फिर से अफगानिस्तान की सत्ता में है. तालिबान के आतंक के चलते लाखों लोग अपना घर छोड़ने के लिए मजबूर हुए हैं. काबुल एयरपोर्ट पर भीड़ की भीड़ जमा है. लोग अपना ही देश छोड़ने के लिए मजबूर कर दिए गए हैं. इतिहास खुद को त्रासदी के तौर पर दोहरा रहा है.

तालिबान ने 15 अगस्त की रात को काबुल स्थिति राष्ट्रपति भवन पर कब्जा कर लिया. (फोटो: अल जजीरा)
तालिबान ने 15 अगस्त की रात को काबुल स्थिति राष्ट्रपति भवन पर कब्जा कर लिया. (फोटो: अल जजीरा)

इस बीच सोशल मीडिया पर एक तस्वीर वायरल है, जो यह बता रही है कि इतिहास से सच में कुछ नहीं सीखा गया है. इस तस्वीर में असल में दो तस्वीरें हैं. एक साल 1975 की और दूसरी अभी की. दोनों ही तस्वीरों में कई बातें कॉमन हैं. मसलन, दोनों ही तस्वीरों में अमेरिकी मिलट्री हेलिकॉप्टर हैं. ये हेलिकॉप्टर विदेशी जमीन पर फंस गए अमेरिकी राजनयिकों, अधिकारियों और अमेरिकी सेना की मदद करने वाले उस देश के लोगों को निकालने के लिए लगाए गए हैं. 1975 की फोटो दक्षिणी वियतनाम की राजधानी साइगॉन (saigon) की है. अभी की फोटो अफगानिस्तान की राजधानी काबुल की है. साइगॉन में 1975 में अमेरिका ने जो रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया, उसे इतिहास का एक सबसे बड़ा रेस्क्यू ऑपरेशन कहा जाता है. इस ऑपरेशन की तस्वीरें लगभग 19 साल तक चले वियतनाम युद्ध में अमेरिकी हार का प्रतीक बन गईं. अब काबुल से आईं इसी तरह की तस्वीरों की तुलना साइगॉन की 46 साल पुरानी तस्वीरों से की जा रही है. अमेरिकी सरकार पर सवाल उठाए जा रहे हैं.

क्या है ‘फॉल ऑफ साइगॉन’?

सोशल मीडिया पर इन दोनों तस्वीरों को डालने वाले कह रहे हैं कि अमेरिका की एक बार फिर से हार हुई है. जिस तरह से 1975 में उत्तरी वियतनाम के कम्युनिस्ट गुरिल्ला लड़ाकों ने अमेरिकी समर्थन वाले दक्षिणी वियतनाम पर कब्जा कर लिया था, उसी तरह से अब तालिबान लड़ाकों ने भी पूरे अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया है. अमेरिकी सरकार और वहां के राष्ट्रपति जो बाइडेन की किरकिरी इसलिए और भी ज्यादा हो रही है, क्योंकि लगभग एक महीने पहले उन्होंने कहा था कि इस तरह की कोई भी नौबत नहीं आएगी, जब अमेरिकी दूतावास के ऊपर हवाई जहाज भेजकर लोगों को रेस्क्यू करना पड़े. हालांकि, अब राष्ट्रपति बाइडेन अफगानिस्तान से अमेरिकी राजनयिकों, अधिकारियों और अमेरिकी सैनिकों की मदद करने वाले स्थानीय लोगों को निकालने के लिए लगभग तीन हजार सैनिक भेज चुके हैं.

दूसरी तरफ, अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन लगातार यह कह रहे हैं कि काबुल से अमेरिकी राजयनिकों और अधिकारियों को वापस लाने की तुलना साइगॉन के रेस्क्यू ऑपरेशन से नहीं की जा सकती है, और अफगानिस्तान में अमेरिका की हार नहीं हुई है. वहीं रिपब्लिकन पार्टी के नेता बार-बार अफगानिस्तान से अमेरिका की वापसी को ‘फॉल ऑफ साइगॉन’ जैसा बता रहे हैं. उनके मुताबिक अफगानिस्तान में अमेरिका की शर्मनाक हार हुई है. ऐसे में यह जानना जरूरी है कि आखिर ‘फॉल ऑफ साइगॉन’ क्या है.

‘फॉल ऑफ साइगॉन’ का सीधा संबंध लगभग दो दशक तक चले वियतनाम युद्ध से है. शीतयुद्ध की छाया में लड़ा गया यह युद्ध 1955 में शुरू हुआ. एक तरफ था उत्तरी वियतनाम, जिसे बाद में सोवियत संघ और चीन से मदद मिली. दूसरी तरफ था दक्षिणी वियतनाम, जिसे अमेरिका का समर्थन प्राप्त था. मिलर सेंटर की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 1963 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति लिंडन बी जॉनसन ने राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी के एक मेमोरेंडम को मंजूरी दी थी. जिसमें कम्युनिस्ट ‘खतरे’ से निपटने के लिए दक्षिणी वियतनाम को सहायता देने की बात कही गई थी.

उत्तरी वियतनाम के गुरिल्ला सैनिकों को सोवियत संघ और चीन की तरफ से मिल रही थी.
उत्तरी वियतनाम के गुरिल्ला सैनिकों को सोवियत संघ और चीन की तरफ से मदद मिल रही थी.

दरअसल, वियतनाम पर लंबे समय तक फ्रांस का कब्जा रहा. बाद में जापान ने भी इस देश पर कब्जा कर लिया. लेकिन दूसरे विश्वयुद्ध में जापान की हार के बाद एक बार फिर से वियतनाम का नियंत्रण फ्रांस के पास आ गया. दूसरी तरफ, वियतनाम में कुछ ऐसे लोग थे, जो फ्रांस के शासन को उखाड़ फेंकना चाहते थे. इन्हीं में से प्रमुख नेता का नाम था- हो ची मिन्ह. हो ची मिन्ह कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित थे और उनके नेतृत्व में वियतनाम के उत्तरी हिस्से में कम्युनिस्ट शासन स्थापित हो गया था. 1950 के आते- आते उनका लक्ष्य था कि दक्षिणी वियतनाम में भी इसी तरह का शासन स्थापित किया जाए. दूसरी तरफ, फ्रांस का समर्थन प्राप्त दक्षिणी वियतनाम के राजा बाओ दाई चाहते थे कि पूरे वियतनाम में पूंजीवादी व्यवस्था का शासन चले. ऐसे में दोनों पक्षों के बीच युद्ध छिड़ गया जिसमें अंतत: फ्रांस की हार हुई. फ्रांस को वापस जाना पड़ा. इस बीच अमेरिका को लगा कि फ्रांस के जाने से पूरे वियतनाम में कम्युनिस्ट शासन स्थापित हो जाएगा. ऐसे में साल 1965 में अमेरिका वियतनाम युद्ध में कूद पड़ा.

युद्ध में कूदने के बाद अगले तीन साल के भीतर अमेरिका ने वियतनाम में लगभग पांच लाख सैनिक तैनात कर दिए. भीषण लड़ाई हुई. वियतनाम युद्ध ऐसा पहला युद्ध था, जिसका टेलिकास्ट टीवी पर हुआ. लोगों ने युद्ध की विभीषिका को देखा. इस बीच अमेरिका के अंदर ही इस युद्ध का विरोध बढ़ने लगा. अमेरिकी लोगों को लगने लगा कि इस युद्ध से उनके देश का कोई लेना देना नहीं है. इस पर जो पैसे खर्च किए जा रहे हैं, वो अगर अमेरिकी लोगों की भलाई के लिए खर्च हों, तो ज्यादा अच्छा रहे. दूसरी, तरफ बड़ी संख्या में अमेरिकी सैनिक भी मारे जा रहे थे. इसे लेकर भी अमेरिका के लोग नाराज थे. आंकड़ों के मुताबिक इस पूरे युद्ध में 58 हजार अमेरिकियों और लगभग ढाई लाख वियतनामियों की जान गई थी.

वियतनाम युद्ध पहला ऐसा युद्ध था, जिसका टेलीकास्ट हुआ. युद्ध की विभीषिका देखकर इसका विरोध अमेरिका में भी होने लगा. (फोटो: एपी)
वियतनाम युद्ध पहला ऐसा युद्ध था, जिसका टेलीकास्ट हुआ. युद्ध की विभीषिका देखकर इसका विरोध अमेरिका में भी होने लगा. (फोटो: एपी)

तमाम प्रयासों के बाद भी अमेरिका यह युद्ध जीत नहीं पाया. साल 1973 में अमेरिका और उत्तरी वियतनाम के बीच एक समझौता हुआ. पेरिस पीस अकॉर्ड्स के नाम से जाने गए इस समझौते के तहत दोनों पक्षों ने लड़ाई बंद करने का फैसला किया. इसी समझौते के तहत, अमेरिका ने वियतनाम से अपने सैनिक वापस बुलाने शुरू कर दिए. हालांकि, अगले साल उत्तरी वियतनाम ने इस समझौते से अपने हाथ वापस खींच लिए. लेकिन तब तक अधिकतर अमेरिकी सैनिक वापस जा चुके थे. कुछ पांच हजार के आसपास अमेरिकी ही दक्षिणी वियतनाम की राजधानी साइगॉन में बचे हुए थे. अमेरिकी विदेश मंत्रालय की वेबसाइट के मुताबिक इनमें दूतावास में काम करने वाले कर्मचारी और राजनयिक भी शामिल थे.

इस बीच उत्तरी वियतनाम के गुरिल्ला लड़ाके एक के बाद एक दक्षिणी वियतनाम के शहरों को जीतते जा रहे थे. हालांकि, इसमें काफी समय लग रहा था. आखिरकार 30 अप्रैल, 1975 को इन कम्युनिस्ट गुरिल्ला लड़ाकों ने साइगॉन में अपना झंडा फहरा दिया. इसी को ‘फॉल ऑफ साइगॉन’ कहा गया. साइगॉन पर उत्तरी वियतनाम का नियंत्रण होते ही युद्ध का अंत हो गया.

ऑपरेशन फ्रीक्वेंट विंड की कहानी

उत्तरी वियतनाम ने साइगॉन पर कब्जा 30 अप्रैल को किया. यह कब्जा तब हुआ, जब अमेरिका ने ऑपरेशन फ्रीक्वेंट विंड के तहत पिछले 24 घंटे के भीतर करीब 7 हजार लोगों को रेस्क्यू किया. इनमें से लगभग साढ़े पांच हजार लोग वियतनाम के थे. जिस समय यह ऑपरेशन हुआ, उस दौरान जेराल्ड फोर्ड अमेरिका के राष्ट्रपति थे. वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक 28 अप्रैल, 1975 की शाम को जेराल्ड फोर्ड एक मीटिंग में थे. उसी दौरान उनके डेपुटी नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर ने उन्हें एक नोट दिया. इसमें लिखा था कि साइगॉन बस उत्तरी वियतनाम के कब्जे में जाने ही वाला है, हमें वहां तुरंत रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू करना होगा.

यह नोट पाने के बाद फोर्ड ने अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और तत्कालीन विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर से फोन पर बात की. उन्हें पता चला कि बहुत से अमेरिकी राजनयिक और अधिकारी फंस गए हैं. एयरपोर्ट जाने के लिए ना केवल सड़कें, बल्कि सी लिंक भी ब्लॉक कर दिए गए हैं. ऐसे में उन्हें बाहर निकालने का केवल एक ही जरिया है और वो है हेलिकॉप्टर.

जमीनी हकीकत से रूबरू होने के बाद राष्ट्रपति ने तुरंत रेस्क्यू मिशन चलाने की इजाजत दे दी. अगले 19 घंटों में साइगॉन में 80 से अधिक अमेरिकी मिलिट्री हेलिकॉप्टर के जरिए रेस्क्यू मिशन चलाया गया. एक हेलिकॉप्टर में एक बार में 50 लोगों को ले जाने की क्षमता थी. अमेरिकी दूतावास में लोगों की भीड़ इकट्ठा हो गई. दूतावास के अधिकारियों ने भी जितना जल्दी हो सका, उतनी तेजी से लोगों के वीजा अप्रूव किए. CIA द्वारा प्रयोग में लाई गई बिल्डिंग्स की छतों पर हेलिकॉप्टरों की लैंडिंग होने लगी. लोगों का हुजूम इन हेलिकॉप्टरों की ओर दौड़ने लगा. इसी दौरान यूनाइटेड प्रेस इंटरनेशनल के फोटोग्राफर ह्यूबर्ट वैन एस ने एक तस्वीर खींची. यह तस्वीर इस पूरे प्रकरण की सबसे आइकॉनिक तस्वीर मानी जाती है.

यह तस्वीर वियतनाम युद्ध में अमेरिका की हार का प्रतीक है. यह इस युद्ध की सबसे आइकॉनिक तस्वीर मानी जाती है. इसे यूनाइटेड प्रेस इंटरनेशनल के फोटोग्राफर ह्यूबर्ट वैन एस ने खींचा था.
यह तस्वीर वियतनाम युद्ध में अमेरिका की हार का प्रतीक है. यह इस युद्ध की सबसे आइकॉनिक तस्वीर मानी जाती है. इसे यूनाइटेड प्रेस इंटरनेशनल के फोटोग्राफर ह्यूबर्ट वैन एस ने खींचा था.

हालांकि, काबुल में अभी तक अमेरिकी दूतावास से इस तरह की तस्वीरें देखने को नहीं मिली है. न्यूज एजेंसी एपी की रिपोर्ट के मुताबिक काबुल स्थित अमेरिकी दूतावास की छत से धुआं जरूर उठता दिखा. एजेंसी की रिपोर्ट के मुताबिक, 15 अगस्त की सुबह एक तरफ जहां अमेरिकी दूतावास के ऊपर मिलिट्री हेलिकॉप्टर लैंड कर रहे थे, तो दूसरी तरफ अधिकारी संवेदनशील कागजों को जला रहे थे. यह धुआं उन्हीं कागजों के जलने से निकल रहा था. अधिकारी नहीं चाहते थे कि किसी भी तरह से ये कागजात तालिबान के हाथ लग जाएं.

दूसरी तरफ, धुएं के बीच हेलिकॉप्टरों के जरिए अमेरिकी अधिकारियों और राजनयिकों के रेस्क्यू की तस्वीरों ने अपने आप यह कहानी कह दी कि अमेरिका अपने पीछे किस तरह की अराजकता छोड़कर जा रहा है. इस तरह की तस्वीरें देखकर इनकी तुलना ‘फॉल ऑफ साइगॉन’ की तस्वीरों से होना अवश्यंभावी ही था.

काबुल की तस्वीरें और बाइडेन की फजीहत

जैसा कि हम ऊपर बता चुके हैं कि एक महीने पहले ही अमेरिकी राजनीतिक और मीडिया के गलियारों में आशंका जताई जा रही थी कि काबुल से भी साइगॉन जैसी तस्वीरें आ सकती हैं. हालांकि, बाइडेन प्रशासन बार-बार यह आश्वस्त करने की कोशिश कर रहा था कि ऐसा नहीं होगा. दूसरी तरफ, जब काबुल से इस तरह की तस्वीरें आने लगीं, तब अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन अलग-अलग मीडिया चैनलों पर यह समझाने की कोशिश कर रहे थे यह स्थिति साइगॉन जैसी नहीं है. अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थान CNN से उन्होंने कहा,

“याद रखिए, यह साइगॉन नहीं है. हम 20 साल पहले अफगानिस्तान में गए थे. हमारे सामने एक मिशन था. वो मिशन था- उन लोगों को सबक सिखाना जिन्होंने हमारे ऊपर 9/11 का हमला किया. हमने इस मिशन में कामयाबी पाई है.”

उन्होंने ABC न्यूज को दिए एक इंटरव्यू में बताया कि हमारे राजनयिकों को सुरक्षित निकालने के लिए राष्ट्रपति बाइडेन ने पर्याप्त संख्या में अमेरिकी सैनिकों की तैनाती की है. यही नहीं, एक तरफ हम अपने राजनयिकों को वापस बुला रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ हम काबुल में अपनी उल्लेखनीय राजनयिक उपस्थिति बनाए रखेंगे.

अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन बार-बार कह रहे हैं कि अफगानिस्तान से वापस आने की तुलना वियतनाम युद्ध से नहीं की जा सकती है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: एपी)
अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन बार-बार कह रहे हैं कि अफगानिस्तान से वापस आने की तुलना वियतनाम युद्ध से नहीं की जा सकती है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: एपी)

अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थान अल जजीरा की रिपोर्ट कहती है कि ब्लिंकेन ने तालिबान से यह भी कहा कि है अगर रेस्क्यू ऑपरेशन में उसकी तरफ से कोई व्यवधान आता है, तो उसे गंभीर परिणाम भुगतने होंगे. हालांकि, इन दोनों तस्वीरों को एक जैसा और अमेरिका के लिए शर्मनाक बताकर रिपब्लिकन पार्टी बाइडेन प्रशासन पर दबाव बना रही है. रिपब्लिकन पार्टी के सबसे वरिष्ठ नेता और सीनेटर मिच मैकोनेल ने तो यहां तक कह दिया कि राष्ट्रपति बाइडेन को लगता है कि युद्ध को खत्म करने का सबसे बेहतर जरिया इसे हार जाना है. मैकोनेल ने यह भी कहा कि अमेरिका को अफगानिस्तान के सुरक्षाबलों को और मदद मुहैया करानी चाहिए.

दूसरी तरफ, द गार्डियन ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि इन सब आलोचनाओं के बीच राष्ट्रपति बाइडेन अभी भी अपनी बात पर टिके हुए हैं. उनका कहना है कि अमेरिका अब तक के अपने सबसे लंबे युद्ध में खरबों डॉलर खर्च कर चुका है और उसके हजारों सैनिक मारे जा चुके हैं. ऐसे में अब अमेरिका को यह युद्ध आगे बढ़ाने की जरूरत नहीं है.


वीडियो- तालिबान ने दानिश सिद्दीकी के साथ किस हद तक बर्बरता की थी, अब पता चला!

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