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जब गालिब को मुगल बादशाह जेल से छुड़ाने में नाकाम हो गया था

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vineet singh विनीत दी लल्लनटॉप के रीडर और पक्के वाले दोस्त हैं. बलिया से हैं. जहां से चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने थे. उन्हीं ने देवस्थली विद्यापीठ स्कूल खोला था जिस स्कूल में पढ़े हैं विनीत. आजकल मुंबई में रहते हैं और वहीं से दुनिया देख रहे हैं. अपने देखे सुने का तमाम एक्सपीरिएंस लल्लन के साथ भी बांटते हैं. इस बार मिर्जा गालिब को पकड़ लिए. उन पर कुछ लिखा है, आप भी पढ़िए.

 

 

हजारों ख्वाहिशें ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमां लेकिन फिर भी कम निकले

इश्क पर जोर नहीं है ये वो आतिश ‘गालिब’
कि लगाए ना लगे और बुझाए ना बुझे
गुरु ये गालिब हैं. जी आप जरूर परिचित होंगे. इतने महान शायर से भला कौन परिचित नहीं होगा. कभी न कभी आपने भी इनका कोई ना कोई शेर जरुर कहीं न कहीं पढ़ कर माहौल जरूर बनाया होगा. मैंने तो बहुत बार गालिब चचा को पढ़ कर लड़कियों, लड़कों और बड़े-बुजुर्गों को इम्प्रेस किया है. खैर आज उनके लिखे का नहीं बल्कि उनके बारे में बात करना है.

दरअसल जितना दिलचस्प उनका लिखा हुआ हर एक शेर है, उतना ही हैरान करने वाला रहा है उनका जीवन. यूं समझिए कि आला दर्जे की नवाबी भी थी और आला दर्जे की फकीरी भी. दुनिया भर की शोहरत भी थी और साथ के साथ दुनिया भर की बदनामी भी.

गालिब मियां जितने मकबूल शायर थे. अपनी आदतों की वजह से उतने ही बदनाम भी रहे. जिस गालिब के कलामों को आज भी हर दूसरा आदमी इधर उधर चेंपता रहता है, उस गालिब का अपना जीवन बड़ी दुश्वारियों में गुजरा. लेकिन भले ही उनकी जिंदगी में तमाम उतार चढ़ाव, अमीरी और मुफलिसी आती जाती रही लेकिन गालिब के जीने का अंदाज नहीं बदला. मसलन वो शराब सिर्फ मंहगी वाली और खासकर अंग्रेजी ही पीते थे भले ही पैसों की कितनी भी किल्लत हो. चाहे घोड़ा गाड़ी से सैकड़ों किलोमीटर जाकर लाना पड़े लेकिन पीना है तो अंग्रेजी वाली. आमदनी से कई गुना ज्यादा महीने का खर्च था. और इसी नवाबी के चलते उन्होंने लगभग हर जानने वाले सेठ, दुकानदार या दोस्तों से इतना कर्जा ले लिया कि कई साहूकारो ने तो उन पर मुकदमे भी कर दिए. और अब तक की तारीख के सबसे बड़े शायर को कर्ज ना चुकाने के आरोप में घर से गिरफ्तार कर के कचहरी में पेश किया गया. कहते हैं कि एक वक्त उन पर उस समय 40 हजार रुपए का कर्ज था. 19 वी सदी में ये बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी.

गालिब का एक शेर है –
कर्ज की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हां
रंग लावेगी हमारी फाकामस्ती एक दिन

इससे अलग मियां गालिब को जुआ खेलने की आदत भी थी. और इसके चलते तो उन्हें 6 महीने की जेल भी हुई. मतलब सलमान भाई और संजू बाबा से पहले भी कलाकार जेल जाते रहे हैं. लेकिन गालिब थोड़े बदनसीब थे. जहां भाई और बाबा को बेल और पैरोल मिल जाता था वही तत्कालीन बादशाह बहादुर शाह जफर कि सिफारिश भी उन्हें कैद से आजाद न करा सकी. बस बादशाह के कहने पर बामश्क्कत कैद को सामान्य कैद में तब्दील कर दिया गया. अब आप सोच रहे होंगे कि ये कैसे संभव है कि बादशाह अपने चहेते शायर को आजाद भी नहीं करा सका. तो वो इसलिए कि तब तक मुगलिया सल्तनत बिल्कुल कमजोर हो चुकी थी और असली राज कंपनी बहादुर का चलने लगा था. मतलब असली हुकूमत सात समंदर पार से चलने लगी थी. खैर कुछ जुगाड़ लगा कर और एक डॉक्टर से मेडिकल सर्टिफिकेट की मदद से उनके चाहने वालों ने तीन महीनों के बाद उन्हें जेल से रिहा कराया.

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इस अजीम शायर का छोटा सा जीवन परिचय भी देते चलें. मिर्जा असदुल्लाह बेग खान का जन्म आगरा में हुआ था. गालिब इनका तखल्लुस (पेन नेम) था. इसी नाम से वो शेरो शायरी करते थे. उनके दादा समरकंद (उज्बेकिस्तान) से भारत आए थे. गालिब आगरा छोड़कर दिल्ली के बल्लीमारान मे आकर बस गए. गालिब ने जीते जी शायरी के अलावा कोई और काम मुक्कम्ल तौर पर अख्तियार नहीं किया. उनके आमदनी का एकमात्र श्रोत उनकी पेंशन थी जो उन्हें मुगल शासकों की तरफ से मिलती थी.जो बाद में अंग्रेजी हुकूमत ने बंद कर दी क्योंकि अग्रेजों को लगता था कि गालिब विद्रोहियों का साथ देते हैं. रुकी हुई पेंशन को शुरू कराने वो अंग्रेजी हुक्मरानों से बात करने कलकत्ता भी गए. लेकिन बात नहीं बनी. खैर मुसीबत उनकी निजी जिंदगी में भी कम नहीं रही. गालिब के सात बच्चे हुए लेकिन कोई दो साल की उम्र भी पूरा नहीं कर पाया. तमाम दुश्वारियों के बावजूद वो लिखते रहे. तारीफों के साथ ही साथ अलग अलग मौकों पर लोगों का उनके ऊपर फिकरे कसने का दौर भी चलता रहा. लेकिन गालिब भी कम ढीठ नहीं थे. अपनी मौज में ही रहे. एक शेर पढ़ें आपको खुद समझ में आ जाएगा.

थी खबर गर्म की ‘गालिब’ के उड़ेंगे पुर्जे
देखने हम भी गए थे पर तमाशा न हुआ

गालिब की इज्जत जितनी बड़े और खास महफिलों में थी उससे ज्यादा इज्जत उन्हें दिल्ली के जुवारी देते थे. किसी भी धर्म और परंपरा में बंध के नहीं जीते थे गालिब. न रोजे न नमाज. और जम के शराब पीते थे. बच्चों की मौत से अपने धर्म से और भी बागी होते गए. सबसे दिलचस्प बात जो मुझे लगती है वो ये कि मियां गालिब के बारे में जितनी खबर दूसरे लोग रखते थे. उससे ज्यादा वो खुद से वाकिफ थे. खुद की पूरी खबर थी उनको. वो कहते थे –

होगा कोई ऐसा जो ‘गालिब’ को ना जाने
शायर तो अच्छा है पर बदनाम बहुत है

अब गालिब कथा समाप्त हुई और अब आप लोग अपने अपने काम में लग सकतें हैं और हां गालिब का एक आध शेर जरुर याद कर लें. बहुत काम आता है.


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