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नए यूज़र्स चाहें न चाहें, फ़ेसबुक उनके सामने किस तरह परोसता है हिंसात्मक कंटेंट?

Facebook का एक और कर्मचारी व्हिसलब्लोअर बनकर सामने आया है. कंपनी में बतौर रिसर्चर काम कर चुके इस कर्मचारी ने हाल में खुलासा किया है कि फेसबुक यूजर की टाइमलाइन पर हेट स्पीच, झूठी जानकारी और हिंसा फैलाने वाला कंटेंट पहुंचता है. रिसर्चर के मुताबिक, भारत में 2019 के लोकसभा चुनावों के दरम्यान ये ट्रेंड ज़्यादा था. फेसबुक की तरफ़ से इस बारे में चिंता जताई गई है. कहा गया है कि इसकी गहराई से जांच की जाएगी. आइए विस्तार से समझते हैं कि पूरा मामला है क्या.


अगर आप टूरिज्म के लिए किसी नई जगह जाएं तो आपको एक लोकल ट्रैवल गाइड की ज़रूरत पड़ सकती है. वो आपकी मदद करेगा उस जगह की ऐतिहासिक इमारतों और बाकी जगहों को बेहतर तरीके से समझने में. अब आपसे एक सवाल पूछते हैं. मान लीजिये आपको वहां तीन गाइड मिले. तीनों इस पेशे में आने के पहले अलग-अलग काम करते थे. एक किसी धार्मिक संस्था से जुड़ा धर्मगुरु था. दूसरा एक राजनीतिक दल का प्रवक्ता था. और तीसरा इतिहास का अध्यापक. आपसे सवाल है कि आप किसे अपना गाइड चुनेंगे?

ये सवाल क्यूं पूछा है, इसके लिए पूरा मामला समझते हैं. जवाब आपको खुद ही मिल जाएगा.

जानबूझकर घिनौना कंटेंट परोसता है फेसबुक?

अंग्रेज़ी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स की एक ख़बर के मुताबिक़, 4 फरवरी 2019 को एक फेसबुक रिसर्चर यानी शोधकर्ता ने इस सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एक नया अकाउंट बनाया. किसलिए? ये देखने के लिए कि केरल में रहने वाले एक शख्स के बतौर उसका फेसबुक एक्सपीरिएंस कैसा रहेगा. माने साफ़ है कि इस रिसर्च अकाउंट में एड्रेस ‘केरल’ का डाला गया था.

अब अगले तीन हफ्तों तक रिसर्चर ने एक सिंपल रूल के साथ ये फेसबुक अकाउंट यूज़ किया. रूल ये था कि फेसबुक पर ग्रुप्स जॉइन करने, वीडियो देखने और फेसबुक पर नए पेजों को एक्स्प्लोर करने के लिए कोई स्पेशल एफ़र्ट न डाला जाए. माने रिसर्चर ने फेसबुक पर ख़ुद से कुछ भी सर्च नहीं किया. बल्कि ये सब करने के लिए फेसबुक के एल्गोरिदम से जो भी रेकमेन्डेशन आए, उन्हीं को फॉलो किया.  

इसका रिज़ल्ट कान खड़े कर देने वाला था. कुछ ऐसा जिसकी वजह से हमें आपको ये ख़बर बतानी पड़ रही है. रिसर्चर के उस डमी फेसबुक अकाउंट पर भड़काऊ भाषण, ग़लत जानकारी और वायलेंट यानी हिंसात्मक सामग्री की बाढ़ सी आ गयी थी. तो क्या इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप अपनी फेसबुक एक्टिविटी को लेकर हमेशा सावधान रहते हैं? क्या इस प्लेटफॉर्म पर आपत्तिजनक जानकारी या कंटेंट परोसा ही जाएगा?

फरवरी 2019 के आख़िर में फेसबुक की एक इंटर्नल रिपोर्ट पब्लिश हुई. उसमें इसी रिसर्चर के डमी ‘टेस्ट यूजर’ के रिज़ल्ट को बाकायदा लिखा भी गया. शोधकर्ता ने रिपोर्ट में एक लाइन लिखी,

इस टेस्ट यूजर के न्यूज फीड में मैंने पिछले तीन हफ्तों में मरे हुए लोगों की जितनी तस्वीरें देखी हैं, उतनी मैंने अपने पूरे जीवन में नहीं देखीं.

ये इस तरह की अकेली रिपोर्ट नहीं थी. इंडिया में फेसबुक का जो इम्पैक्ट है, उससे जूझ रहे फेसबुक इम्प्लॉयीज़ ने दर्जनों स्टडीज़ और मेमो लिखे हैं. उनमें से ये एक है. फेसबुक के कर्मचारियों की ये स्टडीज़ एक तरह से इन आरोपों की पुख्ता तस्दीक करती हैं कि कंपनी हेट स्पीच और वायलेंट कंटेंट को ज्यादा तरजीह देती है. ये भी, कि फेसबुक इस बात को नहीं समझना चाहता कि किसी देश की स्थानीय संस्कृति और राजनीति पर उसका क्या पॉसिबल इफ़ेक्ट हो सकता है. और जब विवाद होते हैं तो फेसबुक उन पर कार्रवाई करने में भी फ़ेल रहती है.

भारत में फेसबुक कंटेंट पर कंट्रोल करने में क्यूं फ़ेल है?

हिन्दुस्तान में लगभग 34 करोड़ लोग हैं जो फेसबुक या इसके किसी और प्लेटफॉर्म जैसे वॉट्सऐप, इंस्टाग्राम या फेसबुक मेसेंजर का यूज़ करते हैं. इतने बड़े यूजर बेस के साथ हिन्दुस्तान फेसबुक के लिए सबसे बड़ा बाज़ार है. ये एक बड़ा कारण है कि यहां फेसबुक से जुड़ी दिक्कतें बाकी दुनिया के कंपैरिज़न में ज्यादा हैं. माने यहां स्थितियां ज्यादा बदतर हैं. वजह? एक तो रिसोर्सेज़ की कमी, और दूसरा ये कि भारत में 22 भाषाएं मान्यता प्राप्त हैं.जाहिर है इन सभी भाषाओं के यूजर भी हैं, वो भी बड़ी संख्या में. फेसबुक के पास इन सभी भाषाओं में पोस्ट होने वाले आपत्तिजनक कंटेंट से निपटने के रिसोर्सेज़ नहीं हैं, इसलिए इन पर कंट्रोल भी नहीं हो पाता.

हालांकि फेसबुक प्रवक्ता एंडी स्टोन कहते हैं कि कंपनी ने हिंदी और बंगाली सहित तमाम भाषाओं में हेट स्पीच खोजने और उस पर चेक लगाने के लिए टेक्नोलॉजी पर बहुत इन्वेस्ट किया है. वह ये भी बोले कि फेसबुक ने इस साल दुनियाभर में हेट स्पीच कंटेंट पर आने वाले व्यूज़ आधे कर दिए हैं.

फेसबुक स्पोक्सपर्सन एंडी स्टोन (फोटो - फेसबुक)
फेसबुक स्पोक्सपर्सन एंडी स्टोन (फोटो – फेसबुक)

खैर, आगे बढ़ते हैं. द न्यूयॉर्क टाइम्स के अलावा कई न्यूज़ आर्गेनाइजेशंस को सम्मिलित तौर पर फेसबुक के कुछ इंटर्नल डाक्यूमेंट्स मिले. किससे मिले? फेसबुक की व्हिसल ब्लोअर, फ्रांसेस ह्यूगन से, जो फेसबुक में प्रॉडक्ट मैनेजर थीं. पिछले दिनों इन्होंने फेसबुक पर आरोप लगाए थे कि फेसबुक के लिए उसका बिज़नेस ज्यादा ज़रूरी है, भले ही अपना बिज़नेस बढ़ाने के लिए फेसबुक को ऐसे कंटेंट को प्रमोट करना पड़े जो किसी देश की शान्ति के लिए ठीक न हो, यूज़र्स के लिए इनएप्रोप्रियेट हो. ह्यूगन ने क्या-कुछ कहा था, इसके लिए हमारी एक पिछली ख़बर का वीडियो आप इस लिंक से देख सकते हैं. 

फ्रांसेस ह्यूगन, जिन्होंने फेसबुक के खिलाफ़ आरोप लगाए थे
फ्रांसेस ह्यूगन, जिन्होंने फेसबुक के खिलाफ़ आरोप लगाए थे

खैर, उन डाक्यूमेंट्स पर वापस आते हैं जो न्यूज़ आर्गेनाइजेशंस के कंसोर्टियम को ह्यूगन से मिले. ये दस्तावेज़ ‘दि फेसबुक पेपर्स’ नाम के एक लार्ज मटेरियल का हिस्सा थे. अक्टूबर की शुरुआत में इन्हें मिस ह्यूगन ने ‘सिक्योरिटीज़ एंड एक्सचेंज कमीशन’ को दी गयी अपनी शिकायत में भी शामिल किया है. गौरतलब बात ये है कि इन डाक्यूमेंट्स में कई जगह इंडिया के बारे में भी रेफेरेंसेज़ शामिल थे.

# क्या था इन दस्तावेजों में?

इन दस्तावेजों में जो रिपोर्ट्स शामिल हैं, वो ये बताती हैं कि कैसे देश की सत्ताधारी पार्टी और विपक्षी हस्तियों से जुड़े फ़ेक एकाउंट्स नेशनल इलेक्शंस पर तगड़ा असर डाल रहे थे. इन रिपोर्ट्स में डिटेल से ये भी बताया गया है कि कैसे फेसबुक सीईओ मार्क जुकरबर्ग का एक प्लान हिन्दुस्तान में फ़ेक इनफॉर्मेशन फैलने की वजह बन रहा था. ख़ास तौर पर कोरोना महामारी के दौरान. जबकि ये प्लान था किसलिए? ‘मीनिंगफ़ुल सोशल इंटरैक्शंस’ यानी अर्थपूर्ण सामाजिक चर्चा या फिर दोस्तों और परिवार के बीच कंटेंट के लेनदेन पर फ़ोकस करने के लिए.  

इन्हीं डॉक्यूमेंट्स में ये भी कहा गया कि फेसबुक के पास इंडिया में पर्याप्त रिसोर्सेज़ नहीं हैं, जिसकी वजह से ये उन दिक्कतों को भी दूर करने में सक्षम नहीं है, जो इसने ख़ुद हिंदुस्तान में पैदा की हैं, इन दिक्कतों में एक है – एंटी मुस्लिम पोस्ट्स. 

2020 में राहुल गांधी के एक ट्वीट का स्क्रीनशॉट, जिसमें मोदी और मार्क जुकरबर्ग पर हेट-स्पीच फैलाने का आरोप लगाया गया था
2020 में राहुल गांधी के एक ट्वीट का स्क्रीनशॉट, जिसमें मोदी और मार्क जुकरबर्ग पर हेट-स्पीच फैलाने का आरोप लगाया गया था

 # कितना पैसा ख़र्च करता है फेसबुक हेट-स्पीच रोकने के लिए?

फेसबुक की रिसोर्सेज़ की कमी का मतलब भी समझ लीजिए. इन डाक्यूमेंट्स में से एक जो फेसबुक के रिसोर्स एलोकेशन यानी आवंटन की डिटेल देता है, उसके मुताबिक़, गलत सूचनाओं यानी मिस-इनफॉर्मेशंस या फेक-इनफॉर्मेशंस को कैटेगराइज़ करने (छांटने के लिए) फेसबुक का एक ग्लोबल बजट होता है. दिलचस्प बात ये है कि फेसबुक ने इस बजट का 87 फ़ीसद हिस्सा अकेले यूएसए के लिए रिज़र्व किया जबकि बाकी दुनिया के लिए केवल 13 फ़ीसद. अब करेले पे नीम चढ़ा जैसा फैक्ट ये है कि नार्थ अमेरिकन यूजर फेसबुक के ग्लोबल सोशल नेटवर्क का केवल 10 परसेंट हैं.

हालांकि इन आंकड़ों पर फेसबुक के स्पोक्सपर्सन ‘एंडी स्टोन’ कहते हैं कि ये अधूरे हैं. इनमें फेसबुक के थर्ड पार्टी फैक्ट-चेकिंग पार्टनर्स को शामिल नहीं किया गया है, जिनमें से ज्यादातर अमेरिका के बाहर के हैं.

लेकिन ये बात गले नहीं उतरती, क्यूंकि मामला फंड्स के खर्चे का है. और रिपोर्ट्स से साफ़ है कि बजट अमेरिका पर ही भर-भरके खर्च किया गया है. फेसबुक का सिर्फ़ अमेरिका पर ध्यान देना भारत और बाकी दूसरे देशों के लिए कितना बुरा है, ऐसे समझिये. 

# हिंदुस्तान के बाहर की कुछ मिसालें लेते हैं-

म्यांमार में पिछले साल नवंबर में इलेक्शन थे. फेसबुक के डॉक्यूमेंट्स से साफ़ होता है कि फेसबुक ने म्यांमार में मिस-इनफॉर्मेशन को कंट्रोल करने के लिए कुछ कदम उठाये थे. इन मिस-इनफॉर्मेशंस में वो चीज़ें भी शामिल थीं, जो म्यांमार सेना द्वारा पोस्ट की जा रही थीं. रिसर्च दिखाती हैं कि फेसबुक ने गलत इनफॉर्मेशन वाली भड़काऊ पोस्ट्स पर आने वाले व्यूज को 25 फ़ीसदी तक कम कर दिया. और फोटो पोस्ट्स जिनमें फ़ेक इनफॉर्मेशन थी, उनके व्यूज को लगभग 48.5 फ़ीसदी तक कम किया. फेसबुक ने यहां तक ठीक काम किया. लेकिन इलेक्शन के बाद फेसबुक ने फ़ेक और भड़काऊ कंटेंट को रोकने के लिए जो कदम उठाये थे, वापस ले लिए. सीधे तौर पर इसी का नतीजा तो नहीं कह सकते लेकिन हुआ ये कि चुनाव के बाद तीन महीने के अन्दर ही म्यांमार की सेना ने तख्तापलट कर दिया. हालांकि इस पर फेसबुक ने कहा कि तख्तापलट के बाद उसने म्यांमार के लिए कुछ स्पेशल पॉलिसीज़ बनाई हैं और म्यांमार की सेना को फेसबुक और इंस्टाग्राम से बैन कर दिया है. लेकिन इससे फायदा क्या ? चिड़िया तो खेत चुग ही गई. 

म्यांमार में सेना द्वारा तख्तापलट के बाद वहां के आर्मी चीफ़ के खिलाफ़ प्रदर्शन करते आम लोग (फोटो इंडिया टुडे )
म्यांमार में सेना द्वारा तख्तापलट के बाद वहां के आर्मी चीफ़ के खिलाफ़ प्रदर्शन करते आम लोग (फोटो इंडिया टुडे )

अब चलिए श्रीलंका. यहां लोग उन फेसबुक ग्रुप्स में हज़ारों यूज़र्स को जॉइन करवा रहे थे. जिनमें नफ़रत और हिंसा बढ़ाने वाला कंटेंट भर-भरके अवेलेबल था. यहां भी फेलियर फेसबुक का ही था.

इसी तरह इथियोपिया में भी एक नेशनलिस्ट ‘यूथ मिलिट्री ग्रुप’ फेसबुक पर भड़काऊ कंटेंट पोस्ट कर रहा था. इतना ही नहीं. हिंसा फैलाने के लिए इस ग्रुप की तरफ़ से फेसबुक मैसेंजर कॉल्स भी ख़ूब की जा रही थीं.

 # हिन्दुस्तान पर वापस आइये एंडी स्टोन के ही एक बयान के साथ-

 फेसबुक के स्पोक्सपर्सन एंडी स्टोन चीज़ें सुधारने की बात करते हुए कहते हैं,

अल्पसंख्यकों और हाशिये वाले बाकी समुदायों, ख़ास तौर पर मुसलमानों के खिलाफ़ इंडिया में और पूरी दुनिया में हेट-स्पीच (घृणास्पद भाषा) का इस्तेमाल बढ़ रहा है. इसलिए हम चीज़ों में सुधार कर रहे हैं. चूंकि हेट-स्पीच ऑनलाइन विकसित होती है, इसलिए हम अपनी नीतियों को अपडेट करने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

केटी हरबर्थ दस साल तक फेसबुक में बतौर ‘डायरेक्टर ऑफ़ पब्लिक पॉलिसी’ काम कर चुकी हैं. इसके अलावा केटी भारत में आम चुनाव के वक़्त भी सोशल सिक्योरिटी को डायरेक्टली देखा करती थीं. केटी कहती हैं,

इंडिया में फेसबुक के सामने रिसोर्सेज़ का सवाल तो ज़रूर है, लेकिन इन दिक्कतों का जवाब सिर्फ़ पैसा फेंक देना नहीं है. फेसबुक को कुछ ऐसा सोचना चाहिए जो इंडिया सहित पूरी दुनिया में लागू किया जा सके.

दि न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, फेसबुक के इम्प्लॉयीज़ ने सालों इंडिया में कई तरह के टेस्ट और ऑनग्राउंड स्टडीज़ कीं. 2019 के आम चुनावों से पहले ये काम बहुत बढ़ गया. 2019 में ही जनवरी के आखिर में फेसबुक के कुछ कर्मचारी भारत आये. यहां वो अपने भारतीय सहकर्मियों से भी मिले और कई इंडियन फेसबुक यूज़र्स से भी बात की.

इस ट्रिप के बाद लिखे गए एक मेमो के मुताबिक, यहां के यूज़र्स ने जो कुछ रिक्वेस्ट्स कीं, उनमें सबसे प्रमुख थी कि फेसबुक ऐसी फ़ेक इनफॉर्मेशंस पर कार्रवाई करे जिससे वास्तविक दुनिया में नुकसान होते हैं, खास तौर पर राजनीतिक और धार्मिक समुदायों के बीच के तनाव. कांग्रेस की तरफ़ से फेसबुक और मोदी की जुगलबंदी पर लगातार ये आरोप लगाए गए हैं कि भाजपा और आरएसएस फेसबुक को कंट्रोल कर रहे हैं और हेट-स्पीच बढ़ रही है. 

अब वापस उस रिसर्च पर चलते हैं, जो एक डमी अकाउंट बनाके एक रिसर्चर ने की थी.

रिसर्चर के मुताबिक़, फ़ेक इनफॉर्मेशन पर स्टडी करने के लिए उन्होंने जब फ़ेक अकाउंट खोला था, उसके दस दिन के बाद कश्मीर के डिस्प्यूटेड बॉर्डर रीजन में एक आत्मघाती बम विस्फोट हुआ, जिसके बाद हिंसा का दौर शुरू हो गया. हिंदुस्तान और पाकिस्तान के लोगों के बीच हेट-स्पीच, मिस-इनफॉर्मेशन और साजिशों की बाढ़ आ गयी. हमले के बाद फेसबुक उस फ़ेक अकाउंट को जिस फेसबुक ग्रुप के रिकमंडेशन भेज रहा था, उस ग्रुप में पाकिस्तान विरोधी कंटेंट आने लगा. भारतीय लोग भी अब ज्यादा तादात में इस ग्रुप में शामिल हो रहे थे.

# ट्विटर पर कैसे होती है पॉलिटिकल कंटेंट की ट्रेंडिंग 

सोशल मीडिया कंटेंट कैसे राजनीतिक स्तर पर चीज़ें बदलता है, इसके लिए हमने ट्विटर ब्लॉग में लूका बेली (Luca Belli) और रमन चौधरी (Rumman Chowdhury) का एक ब्लॉग पढ़ा. ये दोनों ट्विटर के सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग और स्टाफ मशीन लर्निंग डिपार्टमेंट से जुड़े हैं. इन्होंने सात देशों कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, जापान ,स्पेन, इंग्लैंड और अमेरिका के ट्वीट्स पर एक स्टडी की. स्टडी ऐसे कई सवालों के इर्द-गिर्द थी जिससे ये पता चले कि ट्विटर एल्गोरिदम किस तरह के कंटेंट को एम्प्लीफाई करता है, माने ट्रेंडिंग में लाता है.

-पहला सवाल था कि, ट्विटर पर पॉलिटिकल कंटेंट की ट्रेंडिंग ज्यादा कैसे होती है?
-दूसरा सवाल ये कि क्या ये एल्गोरिदम किसी ख़ास टाइप की पॉलिटिकल पार्टीज़ के कंटेंट को ज्यादा प्रेफ़रेंस देती है?
-तीसरा सवाल ये था कि, क्या न्यूज़ कंटेंट को बाकी चीज़ों से ज्यादा ट्रेंडिंग मिलती है?

इस स्टडी के परिणाम चौंकाने वाले थे. राइट विंग यानी दक्षिणपंथ की तरफ़ झुकाव रखने वाले न्यूज़ कंटेंट को ट्विटर की एल्गोरिदम ने ज्यादा वेटेज दिया था. माने ट्रेंडिंग ज्यादा मिली थी. जर्मनी को छोडकर 7 में से बाकी सभी 6 देशों में राइट विंग पॉलिटिकल ट्वीट ज्यादा एम्प्लीफाई हुए थे बजाय लेफ्ट विंग वाले ट्वीट के. 

माने साफ़ है कि अगर कोई यूजर अपनी तरफ़ से अपनी ख़ास रुचि का कंटेंट न भी खोजे तो भी सोशल मीडिया उसके सामने ऐसा कंटेंट ला देता है, जिसमें किसी एक पक्ष की तरफ़ राजनीतिक झुकाव हो, दूसरे दलों और धार्मिक समुदायों के प्रति घृणा हो, हिंसा का प्रचार करने वाली फोटोज़ हों, और गलत जानकारियां हों.

प्रधानमंत्री मोदी और मार्क जुकरबेर्ग (फोटो आज तक )
प्रधानमंत्री मोदी और मार्क जुकरबर्ग (फाईल फोटो आज तक)

आपसे शुरू में हमने जो सवाल किया था कि आप अपनी ट्रिप के लिए कैसा गाइड चाहेंगे. हमारे हिसाब से किसी ऐतिहासिक शहर को एक्सप्लोर करने में मदद के लिए आप बतौर गाइड उस हिस्ट्री टीचर को चुनेंगे. क्यूं? ताकि आपको अनबायस्ड और नॉन-वायलेंट सोच वाला गाइड मिले. ये टीचर भी हो सकता है निष्पक्ष न हो, लेकिन फिर भी ये आपको उस शहर की इमारतों के बारे में कम से कम तथ्यात्मक और सटीक जानकारी दे ही देगा. आप एक धर्मगुरु को बतौर गाइड नहीं लेंगे, उसकी प्रवृत्ति धार्मिक झुकाव वाली हो सकती है. वो आपको शहर की उन इमारतों के बारे में बताएगा जिनके फ़र्श पर सदियों पहले का ख़ून बिखरा हुआ है. न सिर्फ़ बताएगा, बल्कि आपको उस ख़ूनी धार्मिक संघर्ष का एक्सप्लेनर देते-देते एक ऐसे दोराहे पर खड़ा कर देगा जहां लड़ने वाले दो पक्षों में से आपको किसी एक की तरफ़ झुकना ही पड़ेगा. जीतने वाले की तरफ़ या फिर हारने वाले की तरफ़. हारने वाली की तरफ़ खड़े हुए तो आपके अन्दर रोष, गुस्सा या घृणा के भाव उपजेंगे. जीतने वाले की तरफ़ खड़े हुए तो ख़ुशी या पश्चाताप आपके मन में घर कर जाएगा. और वो गाइड जो किसी राजनीतिक दल का प्रवक्ता रहा था, वो भी आपको अपना वर्ज़न ज्यादा देगा, न्यूट्रल और सच्ची जानकारी कम.

आप जानकारियों को लेकर होशियार हैं तो शायद आप पर ये दोनों गाइड फ़र्क न भी डाल पाएं. लेकिन हिंदुस्तान के करोड़ों फेसबुक यूज़र्स में बच्चे भी हैं, बड़े भी. शिक्षित भी, अशिक्षित भी. व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी से निकले फ़ेक नॉलेज ने देश में कितने कांड कराये हैं, ये छिपा नहीं है.फ्रांसेस ह्यूगन ने भी जो आरोप फेसबुक की पॉलिसीज़ को लेके लगाया है, इस पूरी एनालिसिस के बाद ठीक मालूम होता है. कह सकते हैं कि फेसबुक को अपनी नीतियों में धंधे से ऊपर शान्ति की सोच को रखना चाहिए. बिज़नेस वॉल्यूम के बारे में सोचते वक़्त ये भी सोचना चाहिए कि वो यूज़र्स को परोस क्या रहे हैं. यूज़र्स के इंगेजमेंट टाइम के अलावा ये भी सोचना चाहिए कि फेसबुक का इस्तेमाल करने से कोई यूज़र अपनी रियल लाइफ़ में बन क्या रहा है.


 (ये स्टोरी हमारे साथ इंटर्नशिप कर रहे शिवेंद्र गौरव ने लिखी है.)


पिछला वीडियो देखें: हरियाणा: बीजेपी प्रवक्ता के भड़काऊ भाषण पर बवाल, वायरल वीडियो पर अब पुलिस क्या कह रही?

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