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क्या सच में रामदेव की रुचि सोया ने पांच महीने में लोगों को करोड़पति बना दिया?

रुचि सोया. खबरों में बना हुआ है. क्यूं? क्यूंकि इसके शेयर ने पांच महीने में इन्वेस्टर्स के पैसे 80 गुना कर दिए हैं. तो-

# अगर आपने 27 जनवरी, 2020 को इसमें 1 करोड़ रुपये लगाए होते, किसी से ब्याज़ में उधार लेकर भी, तो भी आप उसे उसके पैसों का पांच गुना लौटाकर भी 75 करोड़ के मालिक बन गए होते.

अब हम इसपर ख़बर कर रहे हैं क्यूंकि-

# गणित और लॉजिक के आधार पर ये आपका करोड़पति हो जाना अक्षरशः सत्य है लेकिन यक़ीन कीजिए अगर आप सही समय पर सही जगह भी होते तो भी ऐसा संभव नहीं था. और इसी गणित और वास्तविकता के बीच के अंतर को समझेंगे हम रुचि सोया की इस स्टोरी में.

स्टोरी शुरू करने से पहले एक सवाल-

# अगर एक आदमी एक काम को एक घंटे में करता है तो 3,600 आदमी उस काम को कितने समय में करेंगे? उत्तर देंगे बिलकुल अंत में. और ये भी बताएंगे कि ये सवाल हमने क्यूं पूछा.

# रुचि सोया की हिस्ट्री-

रुचि सोया. 34 साल पुरानी कंपनी. दिनेश सहारा ने इसे 1986 में खोला. सोया की खान कहे जाने वाले राज्य मध्य प्रदेश में. इसके ब्रांड कितने हिट हुए थे इसका अंदाज़ा इससे लगाइए कि जिस तरह आप टूथपेस्ट को कोलगेट और ट्रू-कॉपी को ज़ीरॉक्स कह देते हैं वैसे ही सोया चंक्स को भी कई बार आपने न्यूट्रिला बोला होगा.  ये न्यूट्रिला, रुचि सोया का ही ब्रांड है. और भी कई ब्रांड्स कंपनी की प्रॉडक्ट लाइन में हैं- रुचि गोल्ड, महकोश वगैरह.

2001 से 2015 तक लगातार रुचि सोया ने अपने शेयर धारकों को डिवीडेंट दिए हैं. डिवीडेंट मतलब शेयर धारकों की मलाई. फिर 2016 में क्यूं नहीं दे पाई? 2016 ही नहीं उसके बाद से कभी भी नहीं दे पाई. हुआ ये कि 2016 से कंपनी को भारी नुक़सान होना शुरू हो गया. करेले पे नीम चढ़ा ये कि कंपनी पहले से ही कर्ज़ में थी. 2008 में 2000 करोड़ के कर्ज़ से दबी कंपनी 2012 में अपना कर्ज़ करीब 6000 करोड़ तक बढ़ा चुकी थी.

असल में जब कंपनी फ़ायदे में थी तब भी वो एक्सपेंशन के लिए क़र्ज़ पर क़र्ज़ लेती रही. कंपनी का टर्नओवर तो बहुत ज़्यादा था लेकिन प्रॉफ़िट, टर्नओवर का सिर्फ़ 2-5 प्रतिशत.  2017 में इसने बैंकरप्सी फ़ाइल की. यानी दिवालिया होने की अनुमित मांगी.

कहते हैं कि कंपनी के मालिक को सट्टे की आदत लग गई थी. कमोडिटी में ट्रेडिंग शुरू की. करोड़ों रुपए गंवा दिए. बैंक्स से उधार लिए. उस उधार को चुकाने के लिए फिर से उधार लिए. कुचक्र शुरू हुआ. बैंक नाराज़ हो गए. तो जब रुचि सोया ने बैंकर्स को 9,300 करोड़ रुपए का उधार चुकाना था तब बैंक कंपनी को NCLT (नेशनल कम्पनी लॉ ट्रिब्यूनल) घसीटकर ले गए. इन बैंक्स में सबसे बड़े ऋणदाता थे, स्टैंडर्ड चार्टेड बैंक और डीबीएस बैंक.

आसान भाषा में समझिए कि NCLT में अगर कोई कंपनी जाए, या किसी कंपनी को ले जाया जाए तो दोनों का ही अर्थ है कि वो कंपनी या तो दिवालिया होगी, उसके एसेट्स बेचकर उधार चुकाए जाएंगे. या फिर कोई ख़रीददार मिले तो उसे कंपनी (ज़्यादातर औने-पौने दामों में) बेचकर तक़ादा करने वालों की भीड़ शांत की जाए.

तो बात तय हुई कि रुचि सोया बेची जाएगी, ताकि उधार चुकता किया जा सके. कंपनी की बोली लगाई अडानी और पतंजलि आयुर्वेद ने.

गौतम अडानी
गौतम अडानी

पहले ये बिडिंग अडानी ने जीत ली थी. लेकिन इनसॉल्वेंसी कोड के सेक्शन 29A के अनुसार, कोई व्यक्ति अगर किसे फ़ंसे हुए लोन से जुड़ा हो तो वो या उसके रिश्तेदार किसी अन्य कंपनी को ख़रीदने के लिए बोली नहीं लगा सकते. तो सवाल ये कि अडानी का आख़िर वो कौनसा रिश्तेदार था, जिसके चलते,  उनको रामदेव से मुंह की खानी पड़ी?

रोटोमैक वाला केस तो याद ही होगा. रोटोमैक के मालिक विक्रम कोठारी थे. उन्होंने बैंक ऑफ़ बड़ोदा का करोड़ों का लोन डिफ़ॉल्ट किया था. हालत यहां तक पहुंच गई कि CBI ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया. अब विक्रम कोठारी की बेटी, नम्रता, गौतम अडानी की बीवी हैं. गौतम अडानी, अडानी ग्रुप के मालिक.

अब आप कहोगे कि दो दिग्गज (अडानी और रामदेव) एक एक डूबते टाइटैनिक (रुचि) के लिए क्यूं लड़-खप रहे थे? इसलिए, क्यूंकि वो जहाज़ नहीं, टाइटैनिक था. मतलब, उजड़ गई फिर भी दिल्ली. मतलब,

भारत में खाने वाले तेल का दो तिहाई ‘आयात’ किया जाता है. वहीं, रुचि सोया के पास 30 लाख टन प्रतिवर्ष से ज़्यादा की ऑइल रिफ़ाइनिंग की क्षमता है. देश भर में इसके 13 रिफ़ाइनिंग प्लांट्स है, जिसमें से आधे दर्जन तो समुद्र के काफ़ी क़रीब हैं.

विक्रम कोठारी
विक्रम कोठारी

अडानी इसमें इंट्रेस्टेड थे, क्यूंकि ‘फ़ॉर्चून’ तेल कंपनी अडानी ग्रुप की ही है, और ये ख़रीद उनके लिए एक एक्सपैंशन सरीखी थी. रही बात पतंजलि की, तो वो FMCG में कितनी और कितने सालों से एग्रेसिव है ये तो आपको अपने नज़दीकी पतंजलि स्टोर और टीवी पर आने वाले उनके विज्ञापनों से पता चल ही गया होगा.

# हिस्ट्री के बाद गणित-

तो अंततः पतंजलि ने रुचि सोया को ख़रीद लिया. 4,350 करोड़ में. बात सितंबर 2009 की है. इस 4,350 करोड़ में से 4,235 करोड़ रुपए बैंक्स का उधार चुकाने में गए. हालांकि ये कुल क़र्ज़ का आधा भी नहीं था लेकिन चलो!

और इंट्रेस्टिंग बात ये कि ‘रुचि सोया’ ख़रीदने के लिए पतंजलि ने अपने जेब से पैसे नहीं दिए. ज़्यादातर पैसे बैंक्स से ही लोन लिए गए. वो गुलज़ार का गीत था न-

पैसा कमाने के लिए भी पैसा चाहिए! गोलमाल है भई…

नवंबर, 2016 में रुचि सोया को शेयर मार्केट से डीलिस्ट कर दिया गया तब इसके एक शेयर का मूल्य 3.32 रुपये था. डीलिस्ट मतलब, रिटेल इंवेस्टर्स इसके शेयर न ख़रीद सकते थे, और जिनके पास रुचि सोया के शेयर पहले से थे वो न बेच सकते थे. इसके बाद रीस्ट्रक्चरिंग की प्रक्रिया चालू हुई. तो 4,350 करोड़ में से बैंक का उधार दे चुकने ने बाद जो पैसे बचे उससे कंपनी की रीस्ट्रक्चरिंग की गई. बस इसे ऐसे समझ लीजिए कि जैसे PVR अनुपम इन दिनों बंद है. क्यूंकि उसका जीर्णोद्धार हो रहा है. जीर्णोद्धार के बाद उसे दोबारा खोल दिया जाएगा. वैसे ही इस कंपनी के शेयर्स की ट्रेडिंग कुछ दिनों के लिए बंद कर दी गई.

27 जनवरी, 2020 को इसके शेयर्स को फिर से मार्केट में ख़रीद-फ़रोख़्त के लिए री-लिस्ट किया गया.

कंपनी किसी ने ख़रीदी, किसी ने बेची, कोऊ नृप होई, आप-हम पब्लिक को क्या लेना? अजी बिलकुल लेना है. इनसॉल्वेंसी, डीलिस्टिंग, रीस्ट्रक्चरिंग, री-लिस्टिंग के बाद आपके शेयर्स का क्या हुआ, जिसके बारे में सब लोग कह रहे 80 गुना बढ़ गया?

इसका उत्तर जानने से पहले ये जान लीजिए इनसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी क़ानूनों में खुदरा शेयरधारकों के लिए कोई क़ानून/प्रोविज़न नहीं है. जिसने अब कंपनी ख़रीदी है, निर्णय लेने का अधिकार उसे दे दिया जाता है. उसे जो भी शेयरधारकों के साथ करना है करे. ऐसा इसलिए, क्यूंकि अगर कोई कंपनी को ख़रीदने वाला ही न होता तो शेयरधारकों को वैसे भी कुछ नहीं मिलना था. इसलिए शेयरधारकों को भागते भूत की लंगोट से संतुष्ट होना पड़ता है.

# तो, पतंजलि ने क्या किया?

डीलिस्टिंग के वक्त रुचि सोया के एक शेयर का मूल्य 3.32 रुपये था. रीस्ट्रक्चरिंग के बाद हुई री-लिस्टिंग में शेयर का मूल्य तय हुआ 16.10 रुपये. इस हिसाब से तो हर शेयर धारक की इन्वेस्टमेंट सिर्फ़ डेढ़ महीने में (रीस्ट्रकचरिंग और री-लिस्टिंग के दौरान) पांच गुना हो गई होगी. नहीं? उत्तर है ‘नहीं.’

पतंजलि ने भारत में शेयर के दो सबसे बड़े बाज़ारों, BSE (बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज) और NSE (नेशनल स्टॉक एक्सचेंज) को ये नोटिफ़िकेशन दे दिया कि वो शेयरधारकों की शेयर की क़ीमत को 99% घटा रहा है. या शेयरधारकों को हर 100 पुराने शेयर के बदले 1 नया शेयर दे रहा है. ये हुआ 1:100 डाईल्यूशन.

और ये डाईल्यूशन इसलिए किया गया ताकि रिटेल इंवेस्टर्स के शेयर घटें और प्रमोटर्स के शेयर बढ़ें. या प्रमोटर्स को कंपनी में ज़्यादा से ज़्यादा हिस्सेदारी मिले. प्रमोटर्स बोले तो, मालिक लोग. आगे और समझेंगे इनके बारे में.

उदाहरण से समझते हैं.

मान लीजिए डीलिस्टिंग के ऐन पहले मैने रुचि सोया के 100 शेयर्स ख़रीदे.

अब, डीलिस्टिंग के वक्त एक शेयर का मूल्य = 3.32 रुपये.
तो डीलिस्टिंग के वक़्त मेरा इनवेस्टमेंट = 100X3.32 = 332 रुपये.

रीलिस्टिंग के वक्त एक शेयर 16.10 रुपये का हो गया था.
इसलिए मेरा इन्वेस्टमेंट बढ़कर हो गया = 16.10X100 = 1610 रुपये का.

लेकिन पतंजलि ने कहा कि 100 पुराने शेयर्स के बदले एक शेयर देगी.
यानी अब मेरा इनवेस्टमेंट बचा = 1610/100 रुपये का = 16.10 का.
(यूं भी देख लीजिए अगर एक शेयर 16.10 का है तो मेरे पास अब एक ही तो शेयर बचा)

यानी मेरे 332 रुपये हो गए 16.10 रुपये. साथ ही मेरे पास अब 100 नहीं एक ही शेयर है.

अब 29 जून को एक शेयर की कीमत 1431 रुपये थी. यानी मेरा 332 रुपये का इन्वेस्टमेंट बढ़कर हो गया 1431 रुपये. यानी डीलिस्टिंग से ऐन पहले का मेरा इनवेस्टमेंट 29 जून को सवा चार गुना टू बी प्रिसाइस 4.34 गुना हो गया.

अब आप ये कहेंगे कि अगर रि-लिस्टिंग के बाद शेयर ख़रीदे होते तो? तब तो यक़ीनन 88.88 (1431/16.10) गुना फ़ायदा होता. है न? तो ज़रा ठहरिए. कुछ और फ़ैक्ट्स पर गौर करिए-

1) रुचि सोया के केवल 28 लाख शेयर मार्केट में हैं, और उनमें से भी रीलिस्टिंग के बाद से कुछ हज़ार की ट्रेडिंग हुई है. मतलब कुछ सौ लोग हैं, जिन्हें इस तेज़ी का फ़ायदा मिला होगा. और उसमें से भी दसेक लोग होंगे जिन्हें रि-लिस्टिंग के बाद इसके शेयर मिले होंगे. लेकिन रि-लिस्टिंग के बाद रोज़ ही ‘अपर सर्किट’ लग रहा.

‘अपर सर्किट’ लग रहा मतलब ‘सेबी’ (जो शेयर मार्केट के लिए वही है, जो RBI बैंकिंग के लिए) के नियमों के अनुसार एक दिन में रुचि सोया 5% से ज़्यादा न बढ़ सकता न घट सकता. जैसे ही वो 5% बढ़ा. ख़रीद रुक गई. जैसे ही वो 5% घटा बिकवाली रुक गई. और रुचि सोया के साथ दिक्कत ये कि रिलिस्टिंग के बाद से हर ट्रेडिंग सेशन में, हर दिन, आम लोगों के लिए शेयर मार्केट के खुलने से पहले ही ‘अपर सर्किट’ लग जाता था. यानी आप शेयर्स नहीं ख़रीद सकते थे. यूं रुचि सोया का शेयर मिलना IRCTC में टिकट बुक करने से भी ज़्यादा मुश्किल हुआ जा रहा था. रिलिस्टिंग के बाद से 18 मई, 2020 तक इसमें हर रोज़ अपर सर्किट लगते रहे.

# इसका एक मतलब ये कि रुचि सोया का शेयर 27 जनवरी, 2020 से लेकर 18 मई, 2020 तक हर रोज़ बिला नागा 5% बढ़ता रहा. उतना, जितना एक दिन में ज्याद से ज्यादा बढ़ सकता था.

# लेकिन इसका दूसरा मतलब ये कि 27 जनवरी, 2020 से लेकर 18 मई, 2020 तक आप इसके शेयर शायद ही ख़रीद पाते.

लेफ़्ट में है ‘रुचि सोया’ के शेयर प्राइस पिछले पांच दिनों में. आप देखिए, कैसे सीढ़ीनुमा हैं. ऐसा इसलिए, कि सुबह ही 5 प्रतिशत बढ़ जाते हैं फिर दिनभर स्थिर रहते हैं. क्यूंकि ट्रेडिंग की रुक जाती है. एक सीढ़ी लास्ट वाली नीचे उतर रही है. यानी 29 जून, 2020 को शेयर के प्राइस 5 प्रतिशत घट गए फिर दिनभर स्थिर रहे. जबकी बाकी शेयर्स के प्राइज़ दिनभर घटते-बढ़ते रहते हैं. जैसा हमारे उदाहरण में राइट में ‘इंडसइंड बैंक’ के पिछले पांच ट्रेडिंग सेशंस के प्राइस दिखाए गए हैं. रुचि सोया सी यूनिफ़ॉर्मेटी इंडसइंड या किसी भी और स्टॉक के प्राइस में कहां? (स्क्रीनग्रैब- गूगल फ़ाईनेंस)
लेफ़्ट में है ‘रुचि सोया’ के शेयर प्राइस पिछले पांच दिनों में. आप देखिए, कैसे सीढ़ीनुमा हैं. ऐसा इसलिए, कि सुबह ही 5 प्रतिशत बढ़ जाते हैं फिर दिनभर स्थिर रहते हैं. क्यूंकि ट्रेडिंग की रुक जाती है. एक सीढ़ी लास्ट वाली नीचे उतर रही है. यानी 29 जून, 2020 को शेयर के प्राइस 5 प्रतिशत घट गए फिर दिनभर स्थिर रहे. जबकी बाकी शेयर्स के प्राइज़ दिनभर घटते-बढ़ते रहते हैं. जैसा हमारे उदाहरण में राइट में ‘इंडसइंड बैंक’ के पिछले पांच ट्रेडिंग सेशंस के प्राइस दिखाए गए हैं. रुचि सोया सी यूनिफ़ॉर्मेटी इंडसइंड या किसी भी और स्टॉक के प्राइस में कहां? (स्क्रीनग्रैब- गूगल फ़ाईनेंस)

आसान शब्दों में कहें तो 19 मई, 2020 पहला ऐसा मौक़ा था, जिस दिन शायद आपका ट्रेड एग्ज़ीक्यूट हो जाता. मतलब शायद आपको शेयर मिल जाते. पर-

# तब शेयर का मूल्य 706 रुपये था.

# और तब भी शेयर बेचने वाले कितने ही लोग होंगे? क्यूंकि रुचि सोया के 99.03 शेयर पतंजलि के पास हैं और .97 शेयर. यानी 28 लाख शेयर 82 हज़ार लोगों के पास हैं. मतलब रिटेल शेयर-धारकों के पास. और उसमें से भी आज तक कुछ हज़ार शेयर ट्रेड हुए हैं.

2) आप शेयर के अभी तक के न्यूनतम भाव से शेयर के अभी तक के अधिकतम भाव की तुलना करेंगे तो आपको प्रॉफ़िट ही प्रॉफ़िट दिखेगा. लेकिन सोचिए, ज़्यादातर ने तो ये शेयर कंपनी के ‘बर्बाद होने की खबरों’ से पहले ही बेच दिए होंगे. और कइयों ने अधिक मूल्य पर भी ख़रीदे होंगे. सोलह हज़ार से लेकर तीन रुपये के बीच में झूलने वाले इस शेयर में ज़्यादातर इंवेस्टर्स को नुक़सान ही हुआ होगा.

3) गौर करें कि रुचि सोया के बहुत थोड़े ही शेयर, शेयर मार्केट में ट्रेड होते हैं. इसलिए ख़रीद और बिक्री दोनों ही के वक़्त मांग और आपूर्ति में बहुत बड़ा अंतर आ जाता है. मतलब या तो (ज़्यादातर) इसे बेचने वाले नहीं होते, तो अपर सर्किट पर अपर सर्किट लगता है. या (कभी-कभी) इसे ख़रीदने वाले नहीं मिलते तो लगातर लोवर सर्किट लगते हैं. जैसे 19 मई से 27 मई के बीच लगे. और शेयर का मूल्य 706 से 519 रूपये प्रति शेयर तक गिर गया. यानी इन दिनों में आप अपने शेयर बेच नहीं पाते. और प्रॉफ़िट बुक नहीं कर पाते. यानी यदि रुचि सोया के शेयर ग़लती से अगर आपके पास हैं भी तो एग्ज़िट करके प्रॉफ़िट बुक करना भी उतना ही दुरूह है, जितना एंट्री करना. आसान क्या है? दूर से इसे घटते-बढ़ते देखना और अफ़सोस करना.

वो छोटा सा दौर, जब इसमें रोज़ लोवर सर्किट लग रहे थे. (स्क्रीनग्रैब: गूगल फ़ाईनेंस).
वो छोटा सा दौर, जब इसमें रोज़ लोवर सर्किट लग रहे थे, और शेयर 26% से ज़्यादा गिर गया. (स्क्रीनग्रैब: गूगल फ़ाईनेंस).

4) कुछ फ़िगर्स बताएंगे तो आपकी आंखें खुली की खुली रह जाएंगी. जैसे-

30 दिसंबर, 2007 को रुचि के एक शेयर का मूल्य 16,525 था, जो 25 जनवरी, 2009 तक गिरकर 1,680 हो गया. मतलब लगभग एक साल में इंवेस्टर्स के पैसे 1/10 गुना हो गए. एक लाख के दस हज़ार हो गए.

फिर 5 सितंबर,2010 को ये शेयर बढ़कर 14,115 रुपये हो गया. मतलब फिर पौने दो सालों में, इंवेस्टर्स के पैसे 8 गुना हो गए. मतलब एक लाख के आठ लाख.

अब आप बताइए क्या किसी कंपनी के शेयर केवल फ़ंडामेंटल्स के आधार पर इतने फ़्लक्चुएट करते हैं? तो इस शेयर के साथ पहले से ही सट्टे वग़ैरह के शक पैदा होते आए हैं. वैसा ही कुछ अब भी नज़र आ रहा है. सवाल तो ये होना चाहिए कि क्या इसपर सेबी की नज़र रहनी चाहिए?

तीसरे पॉईंट की पुष्टि करता, ‘रुचि सोया’ का ये हिस्टोरिकल ग्राफ. 'गूगल फ़ाइनेंस' या अन्य किसी बिज़नेस वेबसाइट में ये ग्राफ़ इसलिए नहीं मिलेगा, क्यूंकि उसमें शेयर के रेट डायल्यूट करने के बाद दिखाए गए हैं. मतलब 16,000 की जगह 160 रूपये. (स्क्रीनग्रैब- याहू फ़ाईनेंस).
तीसरे पॉईंट की पुष्टि करता, ‘रुचि सोया’ का ये हिस्टॉरिकल ग्राफ. ‘गूगल फ़ाइनेंस’ या अन्य किसी बिज़नेस वेबसाइट में ये ग्राफ़ इसलिए नहीं मिलेगा, क्यूंकि वहां पर शेयर के रेट डायल्यूट करने के बाद दिखाए गए हैं. मतलब 16,000 की जगह 160 रूपये. (स्क्रीनग्रैब- याहू फ़ाईनेंस).

4) वैसे इतनी तेज़ी के बारे में एक अंतिम लाइन और बता दें- अगर 30 दिसंबर, 2007 को आपने इस शेयर में एक लाख रुपये लगाए होते तो आज वो 90 रुपये से भी कम हो गए होते. और ये हम बता रहे हैं सारी तेज़ी-मंदी को जोड़-जाड़ कर.


लेकिन यही तेज़ी, कंपनी के प्रमोटर्स (मालिकों) के किए एक बहुत बड़ा वरदान है. क्यूंकि अब उनके पास 99.03 प्रतिशत शेयर्स हैं. हालांकि ये 99.03 प्रतिशत शेयर्स वो अगले 1 साल तक नहीं बेच सकते. लॉक इन पीरियड के चलते. लेकिन उनकी कंपनी का मार्केट कैपिटलाईज़ेशन तो बढ़ते रहना है. क्यूंकि मार्केट कैपिटलाईज़ेशन = कुल शेयरों की संख्या x प्रति शेयर का मूल्य.

यही लगा लीजिए कि जब कंपनी रिलिस्ट हुई थी तो उसका मार्केट कैपिटलाईज़ेशन, महज़ 500 करोड़ के लगभग था, जो आज 40 हज़ार करोड़ से भी ज़्यादा का हो गया है. सिर्फ़ ऊपर की साधारण गणित के चलतेऔर इसी सब के चलते ये कंपनी मार्केट कैपिटलाईज़ेशन के मामले में बाटा, टाटा स्टील, हिंडाल्को जैसी कंपनियों को पछाड़ कर सुर्ख़ियां बटोर रही है. 

याद ये भी रखिए कि सेबी की गाइडलाइंस के अनुसार लॉक-इन पीरियड ख़त्म हो जाने के अगले दो साल के भीतर, रुचि सोया के प्रमोटर्स को अपने शेयर घटाकर 75% करने होंगे. यानी इस रि-लिस्टिंग के एक साल बीत जाने के बाद ‘फ़्लोटिंग-शेयर्स’ (शेयर मार्केट में बिक्री-ख़रीद के लिए उपलब्ध शेयर्स) की संख्या में वृद्धि देखने को मिलेगी और अपर सर्किट-लोवर सर्किट लगने बंद होंगे. 


# प्रमोटर्स-

किसी कंपनी के प्रमोटर्स यानी कंपनी के मालिक. जिनके पास बहुत बड़ी मात्रा में शेयर होते हैं. तो रुचि सोया की प्रमोटर हुई, पतंजलि. स्पेसिफ़िक होकर बोलें तो-

पतंजलि आयुर्वेद – 48.17%

पतंजलि परिवहन – 16.90%

पतंजलि ग्रामोद्योग न्यास – 13.52%

दिव्य योग मंदिर – 20.28%

कुल मिलाकर 29.29 करोड़ शेयर्स सिर्फ़ 15 प्रमोटर्स के पास हैं. अकेले पतंजलि आयुर्वेद के पास ही 14.25 करोड़ शेयर्स हैं (जो की कुल शेयर्स का 48.17 प्रतिशत हैं.)

# उत्तर है, एक सेकेंड-

तो शुरू में हमने आपसे एक सवाल पूछा था- अगर एक आदमी एक काम को एक घंटे में करता है तो 3,600 आदमी उस काम को कितने समय में करेंगे? उत्तर सिंपल है 1 सेकेंड में. लेकिन क्या ऐसा ‘सच’ में सम्भव है? मतलब, ऐसे तो आदमी बढ़ाते जाओ काम नैनो और माइक्रो सेकेंड में भी हो जाएगा.

तो अब आते है स्टोरी के शुरू के पॉईंट पर, जहां पर हमने आपसे कहा था कि अगर आपने 27 जनवरी, 2020 को इसमें 1 करोड़ रुपये लगाए होते, किसी से ब्याज़ में उधार लेकर भी, तो भी आप उसे उसके पैसों का पांच गुना लौटाकर भी 75 करोड़ के मालिक बन गए होते.

लेकिन वास्वतिकता देखिए-

पूरे 1 करोड़ इन्वेस्ट करने के लिए आपको रुचि सोया के 5.6 लाख के क़रीब शेयर ख़रीदने होते. वो भी ठीक तब जब शेयर रिलिस्ट हुए थे. यानी 27 जनवरी, 2020 को. उसके बाद जितनी देर करते रहते उतना फ़ायदा ‘गुणात्मक रूप से’ घटता रहता.

सोचिए 5.6 लाख के क़रीब शेयर. इतने शेयर्स तो, रुचि सोया को रिलिस्ट होने को 6 महीने आए हैं, अभी तक ट्रेड (ख़रीद-फ़रोख़्त) नहीं हुए. तो सार यही है कि- बड़ी बड़ी हेडलाइंस बना रहा ये शेयर प्राइस, ये गुणात्मक प्रॉफ़िट, प्रमोटर्स को छोड़कर किसी को भी नहीं हुआ है. और जिनको छोटा-मोटा हज़ार-दस हज़ार का हुआ भी है वो भी गिनती के लोग हैं. आस-पास ढूंढकर देखिए कितने लोग मिलते हैं? लेकिन रुचि सोया से लाखों का नुक़सान उठाने वाले बहुत से लोग मिल जाएंगे.

इसलिए- देख पराई चूपड़ी मत ललचाओ जी!

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