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रिलायंस कंपनी के 54,000 करोड़ रुपए के 'राइट्स इश्यू' में बिना सोचे समझे ट्रैप मत हो जाना

30 अप्रैल, 2020 को रिलायंस की बोर्ड मीटिंग थी. जिसकी अध्यक्षता कंपनी के मैनेजिंग डाइरेक्टर और बोर्ड ऑफ़ डाइरेक्टर्स के चेयरमेन मुकेश अंबानी ने की. इस बैठक में कई बड़े निर्णय लिए गए. जैसे, कोरोना और लॉकडाउन के चलते मुकेश अंबानी साल भर तक कोई सैलरी नहीं लेंगे, बाक़ी एम्पलॉइज़ का भी परफ़ॉर्मेन्स लिंक्ड इंसेंटिव नहीं देने का निर्णय हुआ है. ये पूरी ख़बर आप यहां पर पढ़ सकते हैं.

इसके अलावा, इससे कहीं बड़ा एक और निर्णय इस मीटिंग में लिया गया है. ये स्टोरी उसी पर है. तो निर्णय ये है कि-

रिलायंस कंपनी की 53,125 करोड़ जुटाने की योजना है. राइट इश्यू करके. इससे पहले कंपनी 30 साल पहले राइट्स लेकर आई थी, और ये वाला ‘राइट’ भारत का सबसे बड़ा राइट होने जा रहा है.

हर राइट का मूल्य 1,257 रुपए रखा गया है. यानी रिलायंस शेयर के वर्तमान मूल्य से 207 रुपए कम या टेक्निकल भाषा में कहें तो 207 रुपए के डिस्काउंट पर. लेकिन ये राइट्स सिर्फ़ वही ख़रीद सकते हैं जिनके पास पहले से रिलायंस कंपनी के शेयर हों. हर 15 शेयर में आपको अधिकतम एक राइट ख़रीदने का अधिकार है. लेकिन ये आपका ‘राइट’ है ‘ऑब्लिगेशन’ नहीं. मतलब आप चाहें तो न ख़रीदें.

रिलायंस कंपनी के दो प्रमोटर्स. प्रमोटर्स बोले तो मालिक.
रिलायंस कंपनी के दो प्रमोटर्स. प्रमोटर्स बोले तो मालिक.

है न सारा सब कुछ कंफ्यूजिंग? यक़ीन करिए नहीं रहेगा, अगर आगे पढ़ेंगे.

# कंपनी कैसे-कैसे पैसे जुटाती है-

आपकी एक छोटी सी कंपनी है. जिसको अचानक करोड़ों का कॉन्ट्रैक्ट मिलता है. एक ऐसा कॉन्ट्रैक्ट, जिसके पूरे पैसे काम ख़त्म होने, या माल की डिलीवरी हो चुकने के बाद ही मिलेंगे.

अब कॉन्ट्रैक्ट साइन करते वक्त आपको लगता है कि कहीं आपने उससे ज़्यादा तो नहीं काट कर मुंह में भर लिया जितना आप चबा सकते हैं? आपका तो छोटा सा बिज़नेस है, इस काम के पैसे तो आपको बाद में मिलेंगे. लेकिन उससे काफ़ी पहले तो आपको करोड़ों रुपए जुटाने पड़ेंगे. कच्चे माल के लिए, मज़दूरों के लिए.

लेकिन चिंता मत कीजिए. आप तीन तरह से पैसे जुटा सकते हैं. एक तो उधार लेकर. दूसरा अपनी कंपनी में पैसा देने वालों को हिस्सेदारी देकर. और तीसरा, ‘पैसे दे दो, वापस नहीं करुंगा’ कहकर.

अब ऐसा नहीं है कि आपकी कंपनी छोटी थी इसलिए पैसों के वजह से काम अटक गया. बड़ी-बड़ी कम्पनियों के भी पैसों के चक्कर में काम अटकते हैं. और भी बड़े-बड़े अमाउंट के चक्कर में. और उन्हें भी ऊपर बताए गए तीन माध्यमों से पैसा जुटाना पड़ता है. बस अगर बड़ी-बड़ी कंपनियां ऐसा करती हैं तो उनके बड़े-बड़े नाम रख दिए जाते हैं, इसलिए हम लोग कनफ़्यूज हो जाते हैं.

# जैसे अगर कंपनियां उधार लेकर पैसा जुटा रही हैं तो कहते हैं, ‘कंपनी ने अपने डिबेंचर इश्यू किए हैं.’ डिबेंचर. डेट या ऋण, शब्द से बना है. और डिबेंचर इश्यू करने का मतलब ऐसे लीगल पेपर, जो वो आपको देगी, अगर आप उनको उधार देंगे. उन लीगल पेपर्स के दम पर आप उनसे समय-समय पर अपना ब्याज या मूलधन ले सकते हो. जैसा भी डिबेंचर में वर्णित है.

# ऐसे ही जब कंपनियां अपना एक हिस्सा बेचकर, या हिस्सेदारी बेचकर पैसा जुटाती हैं तो कहते हैं, ‘कंपनी ने अपने शेयर्स या इक्विटी जारी किए हैं.’ इक्विटी, इक्वल यानी बराबर शब्द से मिलकर बना है. यानी कंपनी को करोड़ों बराबर हिस्सों में बांट दिया गया है, और कुछ हिस्से आम-आदमी के ख़रीदने के लिए रख छोड़ें हैं. जितने हिस्से आप ख़रीदेंगे, आप उस कंपनी में उतने हिस्से के मालिक हो जाएंगे.

# तीसरा है, चैरिटी. वही, ‘पैसे दे दो, वापस नहीं करुंगा’. चैरिटी आपको एनजीओ वग़ैरह में ही देखने को मिलेगा.

अब आम आदमी डिबेंचर (बॉन्ड) और इक्विटी (शेयर्स), सिर्फ़ इसलिए नहीं लेता कि कंपनी का भला हो. अगर कोई डिबेंचर ले रहा है तो उसे वो सभी फ़ायदे मिलते हैं, जो उधार देने वाले को मिलते हैं. जैसे, पैसे तय समय पर बढ़ा के मिलना, उन पर तय समय पर ब्याज मिलना.

और दूसरी तरफ़ शेयर्स लेने वाले को वही सब फ़ायदे मिलते हैं जो कंपनी के मालिक को. ऑफ़ कोर्स उसी रेश्यो में, जिस रेश्यो में उसका कंपनी में हिस्सा है.

शेयर्स और डिबेंचर की परिभाषा समझने के बाद आपको समझ आ गया होगा कि शेयर्स लेने में रिस्क ज़्यादा है, लेकिन प्रॉफ़िट भी अनलिमिटेड. क्यूंकि अब आप कंपनी के लाभ-हानि से जुड़े हो. और डिबेंचर्स में रिस्क बेशक कम है, लेकिन आपको तय समय पर केवल तय पैसे ही मिलेंगे.

अब आप कहेंगे इसमें ‘राइट’ के बारे में तो कुछ आया ही नहीं, ये तो सब रॉन्ग ही रॉन्ग नज़र आ रहा. रुकिए जनाब, इतना ही आसान होता तो हमें एक बार में ख़बर न समझ आ जाती. उससे पहले ज़रा शेयर्स का पूरा तामझाम समझ लेते हैं.

# शेयर्स का ताम-झाम-

सबसे पहले कंपनी आईपीओ, यानी ‘इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग’ निकालती है. आईपीओ मतलब, कंपनी ऑफिशियली कह रही है कि आप लोग हमारी कंपनी में हिस्सेदारी खरीद सकते हैं. यूं, कंपनी को अगर अपनी 10% हिस्सेदारी आम लोगों को बेचनी है तो कंपनी 10% शेयर के आईपीओ निकालेगी. इस दस प्रतिशत को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटेगी. माना दस करोड़ टुकड़ों में. फिर हर टुकड़े की एक वैल्यू रखेगी. माना दस रुपए. इसका मतलब ये हुआ कि कंपनी अपनी 10% हिस्सेदारी 100 करोड़ रुपए में बेच रही है.

अब आप आईपीओ खरीदने के लिए अप्लाई करते हो, किस्मत अच्छी हुई तो आईपीओ मिल जाते हैं, और ज़्यादा किस्मत अच्छी हुई तो उसपर ‘लिस्टिंग गेन’ भी मिल जाते हैं. लिस्टिंग गेन क्या होता है वो भी बताते हैं. पहले कहानी आगे बढ़ाते हैं.

तो आपको आईपीओ मिल गया. इसका क्या करें? और अगर आईपीओ नहीं मिला, और लेना था तो क्या करें? अब आप कंपनी से डायरेक्ट तो शेयर/आईपीओ खरीद नहीं सकते.

तो जब कोई आईपीओ शेयर में बदल जाता है और शेयर मार्केट में खुल्ला छोड़ दिया जाता है, तो कहते हैं कि वो शेयर या कंपनी लिस्टेड हो गई. नेशनल स्टॉक एक्सचेंज और, बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज, ऐसे दो मार्केट्स के उदाहरण हैं जहां आपकी कंपनी लिस्टेड हो सकती है.

बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में अगर कोई आईपीओ या कंपनी लिस्ट हुई, तो इसका मतलब ये कि बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में उस कंपनी के शेयर्स की ट्रेडिंग की जा सकती है.
बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में अगर कोई आईपीओ या कंपनी लिस्ट हुई, तो इसका मतलब ये कि बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में उस कंपनी के शेयर्स की ट्रेडिंग की जा सकती है.

और जिस दिन कोई कंपनी मार्केट में लिस्टेड हो जाती है उस दिन फिर कंपनी नहीं, बाज़ार डिसाइड करता है कि एक शेयर की क्या वैल्यू है और होनी चाहिए?

जिस दिन कंपनी लिस्टेड होती है उस दिन उसके शेयर अगर उसकी आईपीओ वैल्यू से ज़्यादा हुए तो उसे कहते हैं लिस्टिंग गेन. जैसे हमारे उदाहरण में कंपनी ने आईपीओ के लिए हर शेयर की वैल्यू 10 रुपए रखी थी और माना जिस दिन कंपनी शेयर मार्केट में लिस्टेड हुई उस दिन उसकी वैल्यू मार्केट खुलते ही 12 रुपए हो गई तो आपको 2 रुपए प्रति शेयर का लिस्टिंग गेन मिल गया. यानी अब आप मार्केट में 12 रुपए प्रति शेयर के हिसाब से अपने शेयर बेच सकते हो.

# आइए अब ‘राइट्स’ समझें-

हमने आपको बताया कि कंपनी तीन तरीक़े से पैसे जुटा सकती है. ‘शेयर’, ‘डिबेंचर’, ‘चैरिटी’.

लेकिन जिन कंपनियों के शेयर्स मार्केट में तैर रहे हों उनके पास पैसा जुटाने का एक और माध्यम है. और यही तरीक़ा है, ‘राइट्स’. और चूंकि इसके माध्यम से पैसा जुटाने के लिए आपकी कंपनी के शेयर्स मार्केट में ट्रेड होना ज़रूरी हैं, इसलिए हमने पहले आपको शेयर मार्केट की जानकारी दी.

# तो चलिए अब एक उदाहरण लेते हैं-

मेरी कंपनी के 100 शेयर्स हैं. और हर शेयर की वैल्यू 10 रुपए है. तो मेरी कंपनी की कुल वैल्यू हो गई 1000 रुपए. इस हज़ार रुपए को मेरी कंपनी की ‘मार्केट कैपिटलाईजेशन’ कहेंगे.

अब मानिए ये 100 के सौ शेयर्स मेरे ही पास हैं. और एक दिन मैं कहता हूं कि मैं अपने शेयर 100 से बढ़ाकर 200 कर रहा. तो इससे हुआ क्या कि मेरे हर शेयर की वैल्यू आधी हो गई. दस रुपए से घटकर 5 रुपए हो गई. बस ये 2000 रुपए के छुट्टे कराने जैसा है. कि मेरे पास 2000 का 1 नोट हो या 100-100 के बीस, एक ही बात है.

# अब एक दूसरा उदाहरण लेते हैं-

मेरी कंपनी के 100 शेयर्स हैं. और हर शेयर की वैल्यू 10 रुपए है. अब मानिए ये 100 में से 50 शेयर्स मेरे पास हैं, और बाक़ी 50 कई अन्य लोगों के पास. जिनको मैं जानता भी नहीं. हो सकता है किसी के पास एक से ज़्यादा भी शेयर्स हों.

ख़ैर, एक दिन मैं कहता हूं कि मैं अपनी कंपनी के शेयर 100 से बढ़ाकर 200 कर रहा. तो इससे हुआ क्या कि मेरे हर शेयर की वैल्यू आधी हो गई. दस रुपए से घटकर पांच रुपए हो गई. जिसके पास एक पुराना शेयर था, मैंने उसे नए दो शेयर दे दिए. यूं ये भी 2000 रुपए के छुट्टे कराने जैसा है. कि मेरे और मेरी कंपनी के शेयर होल्डर्स के पास 10 रुपए का एक शेयर हो या 5 रुपए के दो, एक ही बात है.

[अगर कभी सुनें कि कंपनी ने अपने शेयर ‘स्प्लिट’ कर दिए तो इसका मतलब उस कंपनी ने इस दूसरे उदाहरण सरीखा ही कुछ किया है. ये ‘राइट्स’ के काफ़ी क़रीब है, लेकिन राइट्स नहीं. कंपनी अपने शेयर्स तब स्प्लिट करती है जब उसके एक शेयर की वैल्यू बहुत ज़्यादा हो जाता है. जैसे अगर किसी कंपनी के एक शेयर की वैल्यू माना एक लाख रुपए हो गई. तो जिसके पास दस हज़ार, पचास हज़ार रुपए हैं, वो तो कंपनी का एक शेयर भी नहीं ख़रीद पाएगा. कंपनी अगर उसे दस भागों में बांट दे, तो इसके पीछे उसकी नियत ये रहती है कि कोई दस हज़ार, बीस हज़ार रुपए भी इन्वेस्ट करना चाहे तो कर सकता है.]

# अब तीसरे उदाहरण में एक स्टेप और आगे बढ़ते हैं-

मेरी कंपनी के 100 शेयर्स हैं. और हर शेयर की वैल्यू 10 रुपए है. अब मानिए ये 100 में से 50 शेयर्स मेरे पास हैं, और बाक़ी 50 कई अन्य लोगों के पास. एक दिन मैं कहता हूं कि मैं अपनी कंपनी के शेयर 100 से बढ़ाकर 200 कर रहा. लेकिन अबकी बार मैं ये नहीं कहता कि जिनके पास एक पुराना शेयर था उन्हें दो नए शेयर दे दूं. बल्कि ये कहता हूं कि ये नए शेयर लोगों को ख़रीदने पड़ेंगे.

सोचिए मार्केट में एक दिन में ही उनके शेयर की वैल्यू 10 से घटकर 5 हो गई, जिनके पास मेरे शेयर पहले ही थे. ये तो एक तरह से धोखा ही हुआ न?

तो मैं कुछ चीज़ें कहता हूं-

देखो, तुम ये क्यूं भूल गए कि ‘मैं’ और ‘मेरी कंपनी’ दोनों अलग-अलग चीज़ हैं. इसलिए मेरे पास पड़े शेयर्स की वैल्यू भी तो 5 हो गई न? और वैसे भी ये नए शेयर्स मेरी कंपनी सिर्फ़ उनको बेच रही है जिनके पास पहले से ही शेयर्स हैं. और 10 नहीं, 5 नहीं सिर्फ़ 1 रुपए में बेच रही. बेशक हर आदमी अधिकतम सिर्फ़ उतने ही नए शेयर ख़रीद सकता है जितने उसके पास पुराने शेयर्स हैं. लेकिन न ख़रीदना चाहे तो कोई बात नहीं. ये आपका ‘राइट’ है ‘ऑब्लिगेशन’ नहीं. साथ ही अगर आपको इस सबसे दिक्कत है तो इन शेयर्स का मूल्य 5 रूपया होने से पहले ही आप अपने शेयर बेच सकते हो.

अभी आरआईएल के पास अच्छा मौक़ा था राइट्स इश्यू करने का. सारे शेयर गिर रहे हैं, लेकिन आरआईएल इतनी तेज़ी से नहीं गिर रहा.
अभी आरआईएल के पास अच्छा मौक़ा था राइट्स इश्यू करने का. सारे शेयर गिर रहे हैं, लेकिन आरआईएल इतनी तेज़ी से नहीं गिर रहा.

तो हुआ क्या कि हर बंदे ने 1 रुपए में वो शेयर ख़रीदा जिसकी मार्केट में वैल्यू 5 रुपए थी. लेकिन उसके पास पहले से ही 10 रुपए का शेयर था, जिसकी मार्केट में वैल्यू 5 रुपए थी. यानी उसके पास 11 रुपए में 2 शेयर्स हो गए. सिर्फ़ एक रुपए का नुक़सान. मेरे पास भी अब कंपनी के 100 शेयर हो गए हैं. और इसके एवज़ में मुझे सिर्फ़ 50 रुपए देने पड़े.

और इस पूरी प्रोसेस में कंपनी के पास 100 रुपए ‘कैश’ जमा हो गए. इस पूरी प्रोसेस को ही ‘राइट्स इश्यू’ करना कहा जाता है.

अच्छा एक और बात, अगर सबने अपने राइट का इस्तेमाल किया तो किसी का भी कम्पनी में ‘शेयर्स का प्रतिशत’ नहीं बदला.

अब ज़रा सोचिए, यही वाले एक्स्ट्रा शेयर अगर मेरी कंपनी ने सबके लिए खोले रखे होते तो बहुत ग़लत होता. क्यूंकि तब जिनके पास 10 रुपए वाले पुराने शेयर होते उनकी क़ीमत बैठे-बिठाए 5 रुपए हो गई होती. इसलिए राइट्स हमेशा उनको ही दिए जाते हैं, जिनके पास कंपनी के शेयर्स पहले से ही हों. हालांकि हमारे केस में ये अनुपात 1:1 का था यानी एक पुराना शेयर है तो एक नया शेयर ख़रीद सकते हो. लेकिन ये अनुपात बदलते रहता है. जैसे रिलायंस के केस में ये अनुपात 15:1 है.

आप पूछेंगे कि ये अनुपात कैसे डिसाइड किया जाता है? तो इसका उत्तर बहुत सिंपल है-

कंपनी देखती है कि उसने कितना फंड ‘रेज़’ करना है. यानी उसे कितने पैसे चाहिए. जैसे मेरी कंपनी को 100 रुपए चाहिए थे, और मैं हर नया शेयर 1 रुपए का बेच रहा था तो मेरी कंपनी 1:1 के रेश्यो में राइट इश्यू करेगी. वहीं अगर मेरी कंपनी को सिर्फ़ 50 रुपए इकट्ठा करने हैं और हर नया शेयर 1 रुपए का बेचना है तो कंपनी 2:1 के रेश्यो में राइट इश्यू करेगी. साथ ही अगर मेरी कंपनी को 100 रुपए इकट्ठा करने हैं और हर नया शेयर 2 रुपए का बेचना है तो भी कंपनी 2:1 के रेश्यो में ही राइट इश्यू करेगी.

हालांकि ये आपका ‘राइट’ है ‘ऑब्लिगेशन’ नहीं कि आप शेयर ख़रीदें या न ख़रीदें. लेकिन विशुद्ध गणित की बात करें तो,

# सबसे अच्छा विकल्प है कि राइट्स इश्यू होने से पहले ही आप अपने हाथ में रखे शेयर को 10 रुपए में बेच दो. नो लॉस लो प्रॉफ़िट.

# इससे कम अच्छा विकल्प है कि आपके पास जितने शेयर हैं उतने ही शेयर 1 रुपए प्रति शेयर के हिसाब से ख़रीद लें. प्रति दो शेयर 1 रुपए, या प्रति शेयर 50 पैसे का नुक़सान.

# और सबसे बुरा विकल्प है कि आप अपना शेयर न बेचो और एक रुपए वाला शेयर भी न ख़रीदो. यूं आपको हुआ प्रति शेयर 5 रुपए का नुक़सान.

हालांकि मार्केट में आपको तीनों तरह के लोग मिलेंगे. क्यूं? चलिए उदाहरण से ‘राइट’ समझने के बाद अब रिलायंस वाला केस समझते हैं. और भी ज़्यादा क्लियर हो जाएगा. और तीनों तरह के इंवेस्टर्स भी.

# आ अब लौट चलें, ख़बर पर-

रिलायंस का वर्तमान मार्केट कैप है 9,30,011 करोड़ रुपए. और अभी कुल शेयर हैं 635.25 करोड़. इस हिसाब से एक शेयर की क़ीमत हुई लगभग 1,464 रुपए. आप नीचे देख सकते हैं, यही गणित भी बता रही है और यही मार्केट भी. –

ऊपर जो प्राइस है (1444.90) उसपर गौर न करें. ये, बदलते रहता है. और ये तब का भाव है जब स्क्रीनशॉट लिया गया था. हमें मतलब 30 अप्रैल के भाव से है. जो कि नीचे रेड से मार्क किया है. 1464.00 रूपये, प्रति शेयर.
ऊपर जो प्राइस है (1444.90) उसपर गौर न करें. ये, बदलते रहता है. और ये तब का भाव है जब स्क्रीनशॉट लिया गया था. हमें मतलब 30 अप्रैल के ‘क्लोजिंग’ भाव से है. जो कि नीचे रेड से मार्क किया है. 1464.00 रूपये, प्रति शेयर. (तस्वीर: गूगल फ़ाइनेंस).

तो अब, जैसा कि हमें पता है, रिलायंस 53125 करोड़ रुपए के नए शेयर (राइट्स) इश्यू कर रहे हैं, प्रति शेयर 1,257 रुपए के हिसाब से-

# यानी कुल 42.26 करोड़ (53125/1257) नए शेयर.

# यानी राइट्स इश्यू हो चुकने के बाद कुल शेयर हो जाएंगे 677.51 करोड़ (635.25+42.26).  (क्यूंकि कंपनी के 635.25 करोड़ शेयर्स, पहले ही मार्केट में तैर रहे हैं.)

# यूं प्रति शेयर वैल्यू हो जाएगी 1372.69 (930011/677.51) रुपए.  (क्यूंकि कंपनी का मार्केट कैपिटलाईज़ेशन है 930011 करोड़ रुपए)

यूं अगर मार्केट फ़ोर्सेज़ कॉन्स्टंट रहते हैं तो सिर्फ़ इस एक कदम चलते शेयर की वैल्यू 1464 से घटकर 1372.69 हो जाएगी. यानी 91.31 रुपए कम. या लगभग 6%. यही वो 6% हैं जो इंवेस्टर्स की जेब में से कंपनी के पास जाएंगे. आप देखेंगे कि कंपनी के मार्केट कैप्टलाईजेशन (930011 करोड़ रुपए) का 6% भी लगभग वही अमाउंट है, जितने कंपनी राइट्स से जुटाना चाह रही है (53,125 करोड़). तो आपका गणित सही. आपका लॉजिक सही और आपका ‘राइट्स’ का फ़ंडा भी सही.

थोड़ा और आगे बढ़ें? तो कंपनी कह रही कि अगर आपके पास 1464 रूपए के 15 शेयर हैं तो आप 1257 रूपए का एक शेयर ख़रीद सकते हैं. यानी आपके पास 3 विकल्प हैं-

# पहला, आप अपने हर 15 पुराने शेयर पर एक नया शेयर ख़रीद लें. तब आपको प्रति शेयर पड़ा 1451 रूपए का. जबकी मार्केट में उसकी क़ीमत है 1372.69 रुपए. ये विकल्प आप तब चुनेंगे जब आपको लगेगा कि मार्केट में शेयर के दाम 1451 के ऊपर जाएंगे. हो सकता है जिस दिन ये शेयर्स अलॉट हों, उसी दिन डिमांड एंड सप्लाई का ऐसा हिसाब-किताब बने कि अलॉटमेंट के बावज़ूद शेयर के दाम गिरें ही नहीं. यही तो बात है. प्योर गणित तक तो सब ठीक था. लेकिन यहां पर सब मार्केट डिसाइड करेगा. यानी ये मानकर चलिए कि ऐसा नहीं होगा कि नए शेयर अलॉट होते ही शेयर्स के भाव अचानक से ठीक 1372.69 हो जाएं. वो उससे पहले ही कहीं ज़्यादा या कहीं कम हो चुके होंगे. हालांकि डिमांड एंड सप्लाई के हिसाब से भी देखें तो अब कंपनी के शेयर्स में 6% की बढ़त हो चुकी है. यानी सप्लाई बढ़ गई. तो बाक़ी मार्केट फ़ैक्टर्स कॉन्स्टंट रहें तो कंपनी के शेयर के दाम 6% घट जाएंगे. वही जो गणित के हिसाब से भी पता था.

# दूसरा, आप अपने अभी के शेयर्स बेच दें. तब आपको नो लॉस नो प्रॉफ़िट रहेगा. ये विकल्प आप तब चुनेंगे जब आपको लगेगा कि सब कुछ प्योर गणित के हिसाब से होगा और देर सबेर मार्केट भी रिलायंस के शेयर्स की वो बोली लगाने लग जाएगा, जो मैथ बता रही.

# तीसरा, आप नए डिस्काउंटेड शेयर तो न ख़रीदें, लेकिन अपने महंगे शेयर्स भी न बेंचे. तब आपको प्रति शेयर 1464 का पड़ा. ऐसा आप तब करेंगे जब आपके पास और शेयर ख़रीदने के पैसे नहीं होंगे, लेकिन साथ ही आप शेयर बेचना भी नहीं चाहते. क्यूंकि आप जानते हैं गणित चाहे कुछ भी बताए. ये शेयर इतना स्ट्रॉन्ग है कि अपनी गणित से निकाली वैल्यू (1372.69), डिस्काउंटेड शेयर को ख़रीदने के बाद की वैल्यू (1451) और अभी की वैल्यू (1464), इन सबको पार कर जाएगा.

अब एक सवाल का उत्तर दीजिए? अगर बहुत सारे लोग, तीसरे विकल्प के साथ जाते हैं यानी कुछ अपने लिए निर्धारित राइट्स नहीं ख़रीदते तो? और इस फ़िगर में एक फ़िगर और जोड़ दीजिए-

अधिकतर लोगों पास 15 के गुणांक में शेयर्स नहीं होंगे. जैसे 13 शेयर्स या 314 शेयर्स (300 शेयर्स के चलते 20 राइट्स तो ख़रीद लिए, लेकिन 14 शेयर्स के बदले कुछ नहीं मिला). तो हर इंवेस्टर के पास के ये बचे हुए शेयर जोड़ दें तो काफ़ी ढेर शेयर हो जाएंगे जिनके एवज़ में राइट्स की बिक्री या बंटवारा नहीं हो पाएगा.

तो इसका मतलब तो कंपनी जितने पैसे राइट्स ख़रीद कर जुटाने की सोच रही है, उतने नहीं जुटा पाएगी. इसपर कंपनी ने दो पॉईंट क्लियर किए हैं.

# कंपनी के प्रमोटर्स के लिए राइट्स लेना ‘राइट’ नहीं ‘ऑब्लिगेशन’ होगा. मतलब उनके पास अपने हिस्से के राइट न ख़रीदने का कोई विकल्प नहीं होगा.

# कंपनी के प्रमोटर्स बचे हुए राइट्स भी ख़रीदेंगे, जो बाकी लोगों ने नहीं लिए.

‘कम्पनी के प्रमोटर्स’ बोले तो, कंपनी के मालिक लोग, जिनके पास कंपनी के शेयर्स का 50% या उससे ज़्यादा हिस्सा है. बाकी लोग बोले तो, वो लोग जिन्होंने शेयर मार्केट से या आईपीओ से कंपनी के शेयर लिए हैं और फुटकर में शेयर्स हैं.

# समझ गया, अब ये राइट्स मूझे चाहिए, क्या करना होगा?

रिलायंस कंपनी राइट्स लेने से जुड़ी कई जानकारियां समय-समय पर देती रहेगी. उसपर नज़र रखिए. अभी तक की जो जानकारियां रिलायंस ने आउट की हैं, वो तो हम आपके साथ आगे शेयर कर ही देते हैं. बाक़ी भी अपडेट कर देंगे.

तो आपको पता है कि अगर आपको राइट्स लेने हैं तो आपके पास रिलायंस कंपनी के शेयर होने चाहिए. लेकिन ऐसा नहीं है कि जिस दिन राइट्स इश्यू किए जा रहे सिर्फ़ उसी दिन आपके पास ये शेयर्स होना ज़रूरी है. आपके पास ये शेयर्स कुछ दिनों पहले से होने चाहिए. कितने दिन पहले से, वो कंपनी बताती है.

और जिस तारीख़ या उससे पहले से आपके पास रिलायंस के शेयर होने ज़रूरी हैं, उस तारीख़ को कहा जाता है, रिकॉर्ड डेट. क्यूंकि कंपनी इस दिन रिकॉर्ड करती है कि किसके पास कितने शेयर्स हैं.

और ये रिकॉर्ड डेट है 14 मई, 2020. यानी आपके पास 14 मई या उससे पहले रिलायंस के जितने शेयर हैं उसी अनुपात में आपको राइट्स इश्यू होंगे.

जैसे, अगर 11 मई को आपके पास 30 शेयर्स हैं और 16 अप्रैल को आप 30 और शेयर्स ख़रीद लेते हो, तो आपके पास राइट्स इश्यू होने की डेट तक 60 शेयर्स तो बेशक हो जाएंगे, लेकिन आपको केवल 30 शेयर्स पर भी राइट्स लेने का अधिकार होगा. क्यूंकि 60 में से सिर्फ़ 30 शेयर्स ही ऐसे हैं जो आपके पास 14 मई, 2020 से पहले से हैं. यानी राइट्स इश्यू होने की तारीख़ पर आपके पास 60 शेयर्स बेशक होंगे, लेकिन आप राइट्स सिर्फ़ 2 ले सकते हैं 4 नहीं.

वैसे उड़ती-उड़ती ख़बर आई है कि राइट्स के लिए अप्लाई करने की तारीख़ 22 मई, 2020 हो सकती है. यानी 22 मई और 22 मई का बाद आपको दो तीन दिन दिए जाएंगे, राइट्स के लिए अप्लाई करने के वास्ते. फिर कुछ दिनों बाद आपको राइट्स इश्यू हो जाएंगे. राइट्स के किए अप्लाई करते वक़्त आपको 25% राशि जमा करनी होगी. बाक़ी की राशि, जब रिलायंस आग्रह करेगी, तब देनी होगी. यानी जब आप राइट के लिए अप्लाई करेंगे तो प्रति राइट आपको पूरे 1,257 रूपये नहीं, बल्कि इसका सिर्फ़ 25%, यानी 315 रूपये रिलायंस को देने होंगे. और कहीं अगर आपको राइट नहीं इश्यू होते तो आपको ये रूपये वापस मिल जाएंगे.

 


अंततः – कहीं पर स्टोरी में ‘राइट’ कहीं ‘राइट्स’ और कहीं ‘राइट्स इश्यू’ लिखा गया है. बिलकुल भी कनफ़्यूज न हों. ये सब एक ही मान के चलें. इसके अलग-अलग नाम आपको इसलिए सुनने को मिल जाएंगे क्यूंकि ये शेयर्स की तरह तुरंत नहीं ख़रीदे जा सकते, दरअसल आपको ‘राइट’ दिया जाता है कि आप लें न लें. और इस राइट देने को ‘राइट इश्यू’ करना कहा जाता है. 


वीडियो देखें:

अर्थात: केंद्र सरकार अगर राज्यों की नहीं सुनती है, तो लॉकडाउन 3.0 के बाद देश का क्या होगा?-

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