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सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड स्कीम: सरकार से सोना ख़रीदने से पहले ये सारी बातें ज़रूर जान लो

वो ज़माना, जब सोने की अशर्फ़ियां, सोने के सिक्के चलते थे. तब आपके सिक्के पर किसी भी देश की मुहर हो, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ना था. क्यूं? क्यूंकि, आज-कल के नोटों की तरह, नोट के मैटेरियल की क़ीमत और उसपर लिखी क़ीमत अलग नहीं थी. सोना किसी भी देश का हो, सिक्का किसी भी शेप का हो, उसकी वैल्यू नहीं बदलनी. शून्य तो नहीं ही होनी थी. सोचिए अगर तब नोटबंदी (या सिक्का-बंदी) होती तो कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. किसी को अपने सोने के सिक्के बदलवाने की ज़रूरत नहीं पड़ती.


बाद में भी जब विश्व की सरकारों ने काग़ज़, प्लास्टिक, फ़ाइबर के नोट छापने शुरू किए, एल्यूमिनियम के सिक्के छापे, तब भी अंडरलाइंग एसेट सोना ही था. ‘अंडरलाइंग एसेट’ मतलब, किसी देश की सरकार उसी हिसाब से पैसे छापती जितना उसके पास ‘गोल्ड रिज़र्व’ यानी सोने का भंडार होता. हालांकि अब कई देशों ने इस नियम को तिलांजलि दे दी है. अमेरिकन डॉलर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जो अंधाधुन छापे जा सकते हैं. लेकिन इस तरह अंधाधुन पैसे छापने से ‘चादर से लंबी टांग पसारने’ वाली स्थितियां पैदा होते देर नहीं लगती और वेनेजुएला सा हाल भी हो सकता है.

आपने सोचा कभी कि पुराने जमाने में लोग सोने, चांदी, हीरे की अंगूठी, चैन वग़ैरह क्यूं पहनते थे? सामाजिक विज्ञान पढ़ने वाले एक बंदे ने मुझे समझाया इसका कारण. क्यूंकि अगर कोई लंबी यात्रा पर जा रहा हो तो (जेब और पैसे दोनों के दौर से पहले) वो इसी तरीक़े से अपने पास कैश रख रहा था. ऐसा कैश जो पूरी दुनिया में चलता था.

राजा. वो कितने ज़्यादा हीरे जवाहरात पहनता था. उसके तो ताज में भी कितने सारे महंगे हीरे जवाहरत जड़े होते थे. ताकि वो कहीं फ़ंसे तो पूरी सेना ही खड़ी कर सके. ‘खून भरी मांग’ में रेखा का कैरेक्टर, सब कुछ लुट जाने के बावज़ूद भी इसलिए उठ खड़ा हुआ क्यूंकि उसने कानों में डायमंड पहना था. उसे बेचकर प्लास्टिक सर्जरी करवाई, आगे की लड़ाई लड़ी.

यानी जहां आज के दिनों में सोने के जेवर बेचना या गिरवी रखना, ‘बहुत बड़ी विपत्ति’ का पर्यायवाची है, वहीं पुराने ज़माने में सोना एक लिक्विड एसेट था. ‘जिसकी’ नहीं ‘जिससे’ ख़रीद-फ़रोख़्त होती थी.

# भई कहना क्या चाहते हो?-

हमने ये हिस्ट्री इसलिए समझी ताकि आज के हिसाब से सोने को समझा जाए. आज सोने से नहीं, सोने की ही ख़रीद-फ़रोख़्त होती है. दो वजहों से. कंजंप्शन के लिए और इंवेस्टमेंट के लिए. कंजंप्शन बोले तो, सुंदर दिखने के लिए, शादी के लिए, या घर में कोई स्वर्ण मूर्ति लगानी हो, या आप सोना-चांदी च्यवनप्राश बनाते हों. इंवेस्टमेंट बोले तो, ‘आज ख़रीद रहा, मुझे लगता है कल दाम बढ़ेंगे. जब दाम बढ़ेंगे तब बेच दूंगा.’

इसलिए सोना ख़रीदते वक़्त सबसे पहला सवाल ये होना चाहिए कि आप सोने को किसलिए ख़रीद रहे हैं. अगर इंवेस्टमेंट के वास्ते ख़रीद रहें हैं तो, कभी भी उसे ज़ेवर में न गढ़वाएं. बहुत से लॉस तो तुरंत हो जाएंगे. जैसे सोने की शुद्धता, मेकिंग कॉस्ट. फिर उसे घर में रखने पर चोरी हो जाने का डर. लॉकर में रखने पर एडिशनल कॉस्ट. साथ ही इस तरह का गढ़ा सोना उतना ‘लिक्विड’ नहीं होता जितना इंवेस्टमेंट के लिए बना सोना, जिसकी बात हम आगे करेंगे, क्यूंकि पूरी स्टोरी उसी पर है. ‘उतना लिक्विड नहीं’ होता से मतलब हमारा ये है कि आप न तो उसे तुरंत भुना सकते हैं और न ही पूरा मूल्य मिलेगा, कि जितनी उसकी इस वक़्त कुल क़ीमत है. जबकी इंवेस्टमेंट के लिए बनाए गए सोने को बनाया ही इस तरह से गया होता है, कि जब चाहें बेच सकें, मार्केट रेट में. हज़ारों ख़रीदने वाले, हज़ारों बेचने वाले हैं.

‘इंवेस्टमेंट के लिए बनाए गए सोने’ का अर्थ ये मत समझिए कि ये सोना ‘कंजंप्शन के लिए बनाए सोने’ से क्वालिटी में अलग होता है. न. क्वालिटी में तो दोनों ही तरह का सोना एक हो सकता है. 22 कैरेट – 24 कैरेट वाली बात भी एक्सपेशन नहीं. क्यूंकि आप चाहें तो इंवेस्टमेंट क्वालिटी के सोने (24 कैरेट) से आप ज़ेवर भी बना सकते हैं. जैसे हमारे कुमाऊं  में होता है. तो नहीं अंतर होता है प्रोसेस में. जहां ‘कंजंप्शन के लिए’ आप सोने को सुनार से ख़रीदते हैं, और कहीं नहीं बेचते हैं, वहीं ‘इंवेस्टमेंट के लिए’ बनाए सोने को आप कई तरीक़ों से ख़रीद सकते हैं और उन्हीं तरीक़ों से बेच सकते हैं. ऑल्मोस्ट इंस्टेंटली. वो तरीक़े हम आगे डिस्क्स करेंगे. क्यूंकि अब हम सिर्फ़ ‘इंवेस्टमेंट’ पर फ़ोकस करेंगे. बाक़ी तरह की सोने की अशुद्धियां (पन इंटेडेड) यहीं पर समाप्त.

# कैसे करें सोने में इन्वेस्ट-

# बिस्कुट- आप सोने के बिस्कुट ख़रीद सकते हो, लेकिन ये इंवेस्टमेंट का बहुत पारंपरिक तरीक़ा है. इसमें भी वो सारे नुक़सान बने ही रहते हैं जो ‘कंजंप्शन’ वाले सोने को ‘इंवेस्टमेंट’ की तरह यूज़ करने में होते हैं. साथ ही एक और, सबसे बड़ा नुक़सान है कि आप इसमें छोटे-छोटे इंवेस्टमेंट नहीं कर सकते. और ‘कंजंप्शन’ वाले सोने का एक ड्रॉ बैक जो हमने अभी के लिए बचाकर रखा था, वो है GST. जो सोने के बिस्कुट पर भी लागू होती है, लेकिन बाक़ी गोल्ड इंवेस्टमेंट स्कीम्स पर नहीं.

आज के दिनों में सोने के जेवर बेचना या गिरवी रखना, ‘बहुत बड़ी विपत्ति’ का पर्यायवाची है.
आज के दिनों में सोने के जेवर बेचना या गिरवी रखना, ‘बहुत बड़ी विपत्ति’ का पर्यायवाची है.

# वर्चुअल सोना- इसमें आप सोने में इन्वेस्ट तो करते हो पर सोने की फ़िज़िकल डिलीवरी आपको नहीं मिलती. बल्कि ऐसे पेपर्स मिलते हैं, जिनकी अंडरलाइंग वेल्यू सोना है. वैसे ही जैसे करेंसी के बारे में शुरुआत में बताया था. तो जैसे-जैसे सोने के दाम बढ़ेंगे-घटेंगे क्रमशः उसी अनुपात में इन पेपर्स के दाम भी बढ़ेंगे-घटेंगे. मतलब आप अगर ये सोना ख़रीदें तो, आपको सिर्फ़ और सिर्फ़ एक ऐसा पेपर मिलेगा जिसमें कहा होगा कि आप इस सोने के मालिक हैं. इस पेपर को आप कभी भी, करेंट प्राइस पर दूसरे को बेच सकते हो, या उस जगह बेच सकते हो जहां से ये ख़रीदा है. बेचने वाला ख़ुशी-ख़ुशी आपको ‘काग़ज़ों में सोना’ बेचेगा और ख़रीदने वाल ख़ुशी-ख़ुशी आपसे ‘काग़ज़ों में सोना’ ख़रीदेगा. काग़ज़ भी छोड़िए ऑनलाइन के दौर में एक क्लिक से सारा काम हो जाएगा.

ऐसा (वर्चुअल) सोना आप कई तरीक़े से ख़रीद सकते हो. हर महीने की किस्त भी बंधवा सकते हो. सब कुछ पारदर्शी तरीक़े से होता है. फ़्रॉड न हों इसके चलते कहीं सरकार की, कहीं बैंक्स के क्लास मॉनिटर RBI की, कहीं शेयर मार्केट के क्लास मॉनिटर SEBI की या इनमें से  कोई दो या तीनों की नज़र आपके इंवेस्टमेंट में रहती है. हां, ये अलग बात है कि ‘मांझी गर नाव डुबाए तो उसे कौन बचाए?’ उस स्थिति में ‘स्कीम’ का ‘स्कैम’ हो जाता है.

बहरहाल, कई बार तो ये क्लास मॉनिटर ही इंवेस्टमेंट स्कीम्स लेकर आते हैं. जिससे आपका पैसा ‘सेफ़, सेफ़र, सेफ़ेस्ट’ की सुपरलेटिव कैटेगरी में आ जाता है. ऐसा ही एक इंवेस्टमेंट प्लान है, ‘सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड’ जो RBI लेकर आता है. पर इसे समझिए कि सरकार ही लेकर आती है. यूं आपको इश्यूअर वाले खाने में हर जगह, ‘भारत सरकार के बिहाफ में RBI के द्वारा’ पढ़ने को मिलेगा.

# सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड स्कीम-

एक साल में RBI कई बार एक टाइम विंडो खोलती है, जब आप सोने में इन्वेस्ट कर सकते हो. ‘टाइम विंडो खोलती है’ मतलब, साल में कई बार ऐसे दिन आते हैं, जब आप सीधे सरकार से सोना ख़रीद सकते हो. ऑफ़ कोर्स वर्चुअल सोना. इस साल सरकार ये विंडो 6 बार खोलने वाली थी. जिसमें से 4 बार ये खोली जा चुकी है और दो बार अभी और खुलेगी. नीचे एक्सेल शीट में आप ये विंडो देख सकते हैं.

तो पहली विंडो (April 20-24, 2020) को, ‘2020-21 सीरीज़ वन’ और ऐसे ही लास्ट विंडो को, ‘2020-21 सीरीज़ सिक्स’ कहा जाएगा. चूंकि ये 5 दिन की विंडो हर साल खुलती है इसलिए अगले साल की पहली विंडो को, ‘2021-22 सीरीज़ वन’ कहा जाएगा. बाक़ी नामकरण आप खुद कर और समझ सकते हैं.

तो चूंकि इस स्टोरी को किए जाते वक़्त ‘2020-21 सीरीज़ फ़ोर’ की विंडो चल रही है, इसलिए हम इसी सीरीज़ की बात करेंगे. हालांकि बहुत संभावना है कि कॉन्सेप्ट हमेशा यही रहेंगे 5 साल बाद आने वाली सीरीज़ के भी. तो अगर आप ये स्टोरी 2025 में भी पढ़ें तो सोने के मूल्य के अलावा ज़्यादा कुछ बदला नहीं लगेगा आपको.

तो,

# ’2020-21 सीरीज़ फ़ोर’ की ये विंडो 5 दिन खुली है. यानी आप 06 जुलाई, 2020 से – 10 जुलाई, 2020 के शाम साढ़े तीन बजे तक सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड स्कीम में इंवेस्टमेंट करने के लिए अप्लाई कर सकते हो. आप बाकी सीरीज़ देखें तो गौर करेंगे कि ये विंडो हमेशा 5 दिन की होती है.

# 14 जुलाई, 2020 को ये यूनिट्स आपको इश्यू हो जाएंगी. उसी दिन आपके अकाउंट से पैसा कटेगा. अप्लाई करते वक्त नहीं.

# आप न्यूनतम एक ग्राम सोना और महत्तम 4 किलो सोना ख़रीद सकते हो. और सोना एक ग्राम के गुणांक में ही ख़रीद सकते हो. मतलब, ढाई ग्राम सोना नहीं ख़रीद सकते हो. या तो आपको दो ग्राम ख़रीदना होगा या तीन.

# महत्तम मात्रा की ये कैपिंग साल भर की है. मतलब ये नहीं कि 4 किलो सोना, सीरीज़ 4 से ख़रीद लिए और 4 किलो, सीरीज़ 5 से भी.

# NGO या अन्य ‘स्पेसफ़िक’ संस्थाओं के लिए ये अपर लिमिट 20 किलो, प्रतिवर्ष की हो जाती है.

# 1 ग्राम सोने का मतलब यहां पर 1 यूनिट है. मतलब जब आप कहते हो कि आपने सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड की 1 यूनिट ख़रीदी तो दरअसल आप कह रहे होते हो, आपने सरकार से 1 ग्राम, 24 कैरेट वर्चुअल गोल्ड ख़रीदा.

# हर टाइम विंडो की तरह सीरीज़ 4 में भी सरकार ने 1 यूनिट की क़ीमत फ़िक्स्ड करी हुई है. जो कि 4,852 रूपये है. फ़िक्स्ड करी हुई है, मतलब इन 5 दिनों में सोना कितना ही घटे बढ़े सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड आपको 4,852 में एक ग्राम सोना देगा. और हां इसपर मिलेगा 50 रूपये, प्रति ग्राम का डिस्काउंट. मतलब रेट हो गया, 4,802 प्रति ग्राम.

सोना, सोना ही है. उतना ही अमूल्य. चाहे देश काल परिस्थितियां कुछ भी हों.
सोना, सोना ही है. उतना ही अमूल्य. चाहे देश काल परिस्थितियां कुछ भी हों.

# आप कहेंगे कि रेट फ़िक्स करके डिस्काउंट देने का क्या मतलब? सीधे ही बोल दो न कि सरकार ने एक ग्राम सोने का मूल्य 4,802 रखा है. नहीं, इसे डिस्काउंट की तरह बताना इसलिए ज़रूरी है क्यूंकि सरकार आपको आपके इंवेस्टमेंट पर हर साल 2.5% का ब्याज़ भी दे रही है. और वो ब्याज़ आपको 4,852 में देगी, न कि 4,802 वाले डिस्काउंटेड रेट पर.

# इस 50 रूपये को ‘डिस्काउंट’ की तरह स्पेसिफ़ाई करने का दूसरा कारण ये है कि, आप चाहें तो ये स्कीम ऑनलाइन भी ले सकते हैं और ऑफ़लाइन भी, लेकिन ये डिस्काउंट आपको यूनिट्स ऑनलाइन ख़रीदने पर ही मिलेगा. ऑफ़लाइन आप ये किसी बैंक से या पोस्ट ऑफ़िस से ख़रीद सकते हैं. पर वो बड़ा लफड़े वाला काम है. फ़ॉर्म भरो, जमा करो. फिर कोरोना काल में बैंक जाओ.

बेहतर है कि अगर आपका डीमेट अकाउंट है तो आप इसे ऑनलाइन ख़रीदें. जैसे पैसों के लिए बैंक अकाउंट होते हैं वैसे ही शेयर, डिबेंचर, IPO जैसे फाइनेंशियल इंस्ट्रूमेंट्स के लिए डीमेट अकाउंट होते हैं. जहां पर आप इंस्ट्रूमेंट्स रख सकते हो, ख़रीद सकते हो, बेच सकते हो. डीमेट अकाउंट पर हम अलग से स्टोरी करेंगे. चाहें तो आप अपने बैंक से संपर्क कर लें, ज़्यादातर बैंक्स डीमेट भी हैंडल करते हैं.

# अच्छा, जो ब्याज़ आपको सालाना मिलेगा, वो अर्धवार्षिक आधार पर दिया जाएगा. मतलब, 1.25% पहली छमाही में, 1.25% दूसरी छमाही में. और ये होगा सिंपल इंट्रेस्ट. न कि चक्रवृद्धि ब्याज़. मतलब आपको एक बार ब्याज़ मिल गया तो वो आपको इंवेस्टमेंट में यूं नहीं जुड़ जाएगा कि फिर आपको आपके मूलधन पर तो ब्याज़ मिले ही और पिछली बार मिले ब्याज़ पर भी ब्याज़ मिले.

# मैच्योरिटी के बाद आप अपना सारा सोना, कैश में बदल सकते हो. उस वक्त सोने की जो वैल्यू होगी आपका ख़रीदा सोना, या आपकी यूनिट्स की उतनी ही वैल्यू हो जाएगी. यानी ब्याज़ तो मलाई भर समझिए, आपका सोने पर किया इंवेस्टमेंट तो जस का तस है.

# सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड स्कीम की मैच्योरिटी 8 साल की होती है, लेकिन आप 5 साल बाद इसे कभी भी कैश करवा सकते हैं.

'सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड स्कीम' के इश्यूअर वाले खाने में आपको हर जगह ‘भारत सरकार के बिहाफ में RBI के द्वारा’ पढ़ने को मिलेगा.
‘सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड स्कीम’ के इश्यूअर वाले खाने में आपको हर जगह ‘भारत सरकार के बिहाफ में RBI के द्वारा’ पढ़ने को मिलेगा.

# अब आप कहेंगे कि इसमें तो लॉक इन पीरियड है तो लिक्विडिटी वाली बात कहां से हुई, जो शुरू में ‘इंवेस्टमेंट वाले सोने’ के बारे में बताई थी? तो यहां पर बात आती है सेकंडेरी मार्केट की. मतबल एक बार आपको यूनिट्स मिल गईं तो आप किसी दूसरे को अपनी यूनिट्स करेंट प्राइस में बेच सकते हो. और न केवल ये पूरी तरह लीगल है बल्कि RBI खुद इसे फ़ेसिलिटेट करती है. ये शेयर मार्केट जैसा ही हिसाब किताब है. शेयर मार्केट भी तो शेयर्स के लिए सेकेंड्री मार्केट है. क्यूंकि आप शेयर मार्केट में शेयर्स की ख़रीद-फ़रोख़्त करते हैं तो आप डायरेक्ट कंपनी से शेयर नहीं ख़रीदते, न उन्हें बेचते हो. इसलिए ही उसे ‘सेकंडेरी मार्केट’ कहा जाता है.

हां, लेकिन जो गोल्ड सॉवरेन बॉन्ड आपने ऑफ़लाइन ख़रीदा है उसकी ट्रेडिंग करना लगभग असंभव है, क्यूं? इसलिए क्यूंकि डिमेट अकाउंट ही है जो फाइनेंशियल इंस्ट्रूमेंट्स की ख़रीद फ़रोख़्त को उतनी बढ़िया से मैनेज करता है, जैसे बैंक्स पैसे मैनेज करते हैं.

# आइए इससे जुड़े टैक्सेशन की बात कर ली जाए. जो 2.5% का ब्याज़ आपको हर साल मिल रहा है वो पूरी तरह टैक्स के दायरे में आता है.

# हां मगर आप अगर अपनी यूनिट्स को भुनाते हैं तो-

a) अगर आप अपने यूनिट्स 3 साल के भीतर बेचते हैं तो उसके प्रॉफ़िट में आपको शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन टैक्स लगेगा. मतलब आपका इंवेस्टमेंट था 20,000 रूपये का, बढ़कर हो गया 22,000 का तो सिर्फ़ 2,000 रूपये पर ही शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन टैक्स लगेगा. कैसे लगेगा? इस 2,000 रूपये को आप अपनी उस साल की टोटल इनकम में जोड़ देंगे, जिस साल आपने पैसे निकाले हैं. और फिर आप इस बढ़े हुए अमाउंट पर ही इनकम टैक्स देंगे.

b) अगर आप अपने यूनिट्स 3 से 5 साल के बीच कैश करवाते हैं तो लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स भी लगेगा. कैसे लगेगा? माना आपका इंवेस्टमेंट था 20,000 रूपये का, बढ़कर हो गया 22,000 का. तो 2,000 रूपये पर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स कैल्क्यूलेट किया जाएगा. और ये होगा प्रॉफ़िट का 20% + सेस.

c) अगर आप अपने यूनिट्स 5 साल के बाद बेचते हैं तो उसमें कोई टैक्स नहीं लगेगा. यहां पर ये बाकी ‘वर्चुअल गोल्ड’ स्कीम्स से एक पॉईंट ज़्यादा कमा लेती है. क्यूंकि उनमें कैपिटल गेन टैक्स लगता ही लगता है.

ध्यान दीजिए कि 5 साल से पहले आप पाने यूनिट्स सेकेंडरी मार्केट में ही बेच सकते हैं.


पार्ट 2 – गोल्ड सॉवरेन बॉन्ड (कॉन्सेप्ट) 

हमने अपनी एक स्टोरी में बताया था कि कोई कंपनी मूलतः दो तरीक़े से पैसा मार्केट से उठा सकती है. एक तो अपनी कंपनी में हिस्सेदारी बांटकर, दूसरा मार्केट से उधार लेकर. अगर हिस्सेदारी बांटे तो, जिन्होंने कंपनी को पैसा दिया है उन्हें कंपनी के प्रॉफ़िट-लॉस का भागीदार बनाया जाएगा. और अगर कंपनी उधार ले तो, जिन्होंने कंपनी को पैसा दिया है उन्हें कंपनी के प्रॉफ़िट-लॉस से कोई लेना देना नहीं, उन्हें बस समय-समय पर ब्याज़ और मूलधन दे दिया जाएगा, जैसा उधार लेने वाले और देने वाले के बीच हुए कॉन्ट्रैक्ट में वर्णित है.

जब कंपनी पहले तरीक़े से पैसे इकट्ठा करती है, तो पैसे देने वालों को रिटन डॉक्यूमेंट्स के तौर पर शेयर्स (इक्विटी) देती है. और जब कंपनी दूसरे तरीक़े से पैसे इकट्ठा करती है, तो पैसे देने वालों को रिटन डॉक्यूमेंट्स के तौर पर डिबेंचर्स दे देती है. तो जब सुनिए कि कंपनी अपने शेयर्स मार्केट में ला रही, तो जानिए कंपनी के मालिक अपनी हिस्सेदारी कम करके आम जनता को बेच रहे. जब सुनिए कि कंपनी ने अपने डिबेंचर्स इश्यू किए हैं तो जानिए कंपनी के मालिक मार्केट से, आम जनता से, उधार ले रहे हैं.

# सोना एक कमोडिटी है-

कमोडिटी मतलब वो चीज़, जिसे अगर आप अपने पास ज़िंदगी भर भी रखे रहें तो भी ये आपको पैसा कमा के नहीं देगी. या जिसे आप जब तक बेचें न, तब तक आपको पैसे कमाकर नहीं देगी. सोने के साथ यही है. सोने का अंडा देने वाली मुर्गी पर ये बात लागू नहीं होती. ऐसे ही ऑइल, दलहन, तिलहन वग़ैरह का भी हाल है. यूं ये सारी चीज़ें भी कमोडिटी हैं.

जबकि अगर आप किसी कंपनी में इन्वेस्ट करें तो, आप चाहे उस इंवेस्टमेंट से ज़िंदगी भर न निकलें, लेकिन वो फिर भी आपको कमाकर देगा. कभी प्रॉफ़िट के रूप में कभी, डिवीडेंट के रूप में. रियल एस्टेट ले लीजिए, जिसमें आपको या तो हर महीने मकान का किराया मिलते रहेगा, या फिर उसके रहते आप हर महीने मकान का किराया बचाएंगे. चाहे आप उसे ज़िंदगी भर न बेचें. तो फिर रियल एस्टेट भी कमोडिटी नहीं हुई.

याद रखिए जो चीज़ आपको नियमित रूप से पैसे कमाकर नहीं दे सकती, उसके दाम सिर्फ़ और सिर्फ़ डिमांड एंड सप्लाई पर आधारित होते हैं.

# सरकार का उधार-

आपको पता ही होगा कि सरकार का बहुत सारा ख़र्चा रहता है, विकास कार्यों में, सैलरी देने में, वग़ैरह, वग़ैरह… और आय के दो सबसे बड़े स्रोत हैं- टैक्सेशन और उधार. उधार वर्ल्ड बैंक से भी लिया जा सकता है, IMF से भी लिया जा सकता है और बाक़ी सारे विकल्पों के अलावा जनता से भी लिया जा सकता है. जनता से उधार लेने के लिए वही प्रोसेस ठहरी, जो पहले बाक़ी प्राइवेट कंपनियों की होती है. मतलब डिबेंचर इश्यू करना. डिबेंचर को डेट बॉन्ड भी कहते हैं. और सरकार अगर ऐसे डिबेंचर इश्यू कर रही है तो उसे सॉवरेन बॉन्ड कहते हैं. सॉवरेन का शाब्दिक अर्थ तो ‘राज करने वाला’ होता है, लेकिन यहां पर तात्पर्य ऐसी संस्था से है जो इन बॉन्ड्स की ज़िम्मेवारी ले रही है. मतलब सरकार. तो जब सुनें ‘सॉवरेन बॉन्ड’, तो जान लें कि रिटर्न्स बेशक कम मिलें लेकिन ये ज़रूर है कि पैसे शयाद ही डूबें. तो जैसा डिबेंचर्स में होता है, वैसा ही हिसाब-किताब सॉवरेन बॉन्ड का भी है. सरकार आम लोगों से उधार लेती है, और जिसने सरकार को उधार देकर सॉवरेन बॉन्ड लिए हैं उनको कोई मतलब नहीं कि सरकार को घाटा होता है फ़ायदा, उन्हें उनके पैसे (मूलधन) और उसपर ब्याज़, जिसे कूपन रेट भी कह देते हैं, तयशुदा समय पर मिलते रहेंगे.

# गोल्ड सॉवरेन बॉन्ड, एक डेट बॉन्ड होते हुए भी आपको मूलधन की सिक्यूरिटी और एश्योर्ड रिटर्न क्यूं नहीं दे रहा?

‘सॉवरेन बॉन्ड’, अपनी परिभाषा के अनुसार ही, वो फ़ाईनेंशियल इंस्ट्रूमेंट होते हैं, जिसमें आपका मूलधन सिक्योर रहता है. न बढ़ता है न घटता है. इवन आपके रिटर्न्स भी एश्योर्ड रहते हैं. मतलब, जितने पैसे शुरू में प्रॉमिस किए गए हैं, उतने ही मिलेंगे. न घटेंगे, न बढ़ेंगे.

क्यूंकि ऐसा होता ये ‘शेयर्स’ न कहलाए जाते? तो फिर हमारे मन में सवाल आया कि गोल्ड सॉवरेन बॉन्ड में आपका मूलधन भी क्यूं घट-बढ़ रहा है? इसका उत्तर ढूंढते हुए कहीं कोई एनेकडॉट या कोई लॉजिक नहीं मिला. ‘ऐसा है तो, है’ कहकर हम भी आगे बढ़ सकते थे, लेकिन फिर कुछ लॉजिक लगाए और हमारे समझ में ये आया कि दरअसल गोल्ड सॉवरेन बॉन्ड में भी सरकार लोगों से उधार ले रही है. लेकिन अबकी सरकार ये नहीं कह रही कि हमें रूपये उधार दो. वो दरअसल कह रही है कि हमें सोना उधार दो. तो माना आपने 10 ग्राम सोना ख़रीद कर सरकार को उधार दिया. अब जितने पैसे का सोना आपने ख़रीदकर सरकार को दिया है, उसका 2.5% पैसा सरकार हर साल आपको देगी. और जब तय समय आएगा, आपको आपका सोना भी वापस कर देगी.

हां इसमें ये और जोड़ लीजिए कि सोना उधार लेते वक़्त भी सरकार कहेगी कि हमें सोना नहीं, अभी सोने का जो भाव चल रहा है उतने पैसे दे दो, सोना हम ख़ुद ख़रीद लेंगे. और जब सोना वापस चाहिए होगा, तब भी तुमको सोना नहीं तुम्हारे सोने को बेचकर तुम्हें पैसे वापस देंगे.

तो यूं देखिए, आप सोने पर इन्वेस्ट नहीं कर रहे, सोने को करेंसी मानकर सरकार के डेट बॉन्ड में ही इन्वेस्ट कर रहे.

साथ ही इस कॉन्सेप्ट से एक और चीज़ का उत्तर भी ‘हां’ मिल जाता है कि- क्या आपका मूलधन, जो आपने सरकार को दिया वो अंत में पूरा आपको मिल गया? दरअसल वो मूलधन करेंसी नहीं, सोना था.

सोना सोना बाबा, सोना सोना बाबा, सोना, सोना, सोना...
सोना सोना बाबा, सोना सोना बाबा, सोना, सोना, सोना…

यूं ये कुछ-कुछ डिबेंचर्स और शेयर्स (इक्विटी) का मिला जुला रूप है. कैसे? देखिए इसे इस तरह से भी समझा जा सकता है, सरकार आपसे जितना सोना उधार ले रही है उतना ही आपको वापस कर दे रही है. और अगर सोने की अशर्फ़ी आज भी चलती तो आप कहते जितना पैसा सरकार ने उधार लिया उतना ही वापस कर दिया. लेकिन अब चलते हैं काग़ज़ के नोट, ऑनलाइन लेन-देन, तो सोने में जो एप्रीसिएशन हुआ वो फ़ायदा (या नुक़सान), ‘की तुलना में हुआ’. किसकी तुलना में? करेंसी की तुलना में.

साथ ही सोचिए न, अगर इस परिभाषा से हम गोल्ड सॉवरेन बॉन्ड को नहीं समझते तो यही समझ में नहीं आता कि-

गोल्ड तो ‘कमोडिटी’ है. वो सरकार के पास रह लेने भर से तो सरकार को कोई फ़ायदा देगी नहीं. तो सरकार क्यूं ही पूरा सोना वापस कर दे रही है, और साथ ही हर साल 2.5% ब्याज़ भी दे रही है?

लेकिन वहीं अपनी लल्लनटॉप परिभाषा से चलें तो सरकार दरअसल लोगों से उधार ले रही है. अबकी पैसा नहीं सोना. उस सोने को विकास कार्यों में लगाएगी, मतलब उससे गुड्स एंड सर्विसेज़ ख़रीदेगी, और जैसे मैच्योरिटी में बाकी सॉवरेन बॉन्ड में पैसा वापस करती है, इसमें आपका सोना वापस कर देगी.

सवाल ये कि सरकार पैसे ही क्यूं नहीं उधार ले लेती? उत्तर है उधार को और ‘ल्यूकरेटिव’ बनाने के लिए. वो देखा है न कुछ चैरिटी के लिए सिर्फ़ पट्टा लगा लेते हैं या माइक में अनाउंस कर देते हैं, जबकि कुछ लोग क्रिकेट मैच या कोई जादू टाइप ऑर्गनाइज़ करते हैं, और बिके हुए टिकट के पैसे चैरिटी में देते हैं. वैसे ही यहां भी है.

एक और बात पर गौर कीजिए अगर नॉर्मल सॉवरेन बॉन्ड होते तो क्या आप 2.5% ब्याज़ प्रतिवर्ष में मान जाते? वो भी चक्रवृद्धि नहीं, सिंपल इंट्रेस्ट?


सरकार की मंशा कुछ भी रहे लेकिन, आपके लिए ये दो तरफ़ा फ़ायदा है. सोने में इंवेस्टमेंट भी हो रहा है. और एक निश्चित राशि, छोटी ही सही, सरकार ब्याज़ के रूप में भी दे रही है.


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