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इन्साइडर ट्रेडिंग करके शेयरों से करोड़ों कमाने की सोच रहे हैं तो ज़रा इसकी मंज़िल भी जान लीजिए

ज़्यादा दिन नहीं हुए जब ख़बर सामने आई कि SEBI (भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड) ने एक व्यक्ति, अमित रमेश के ऊपर 10 लाख रुपए का जुर्माना लगाया. कारण ये कि उसने DHFL (दीवान हाउसिंग एंड फ़ाइनेंस लिमिटेड) के शेयर्स की ‘इनसाइडर ट्रेडिंग’ की थी.

हाल ही में सोनी लिव की वेब सीरीज़ ‘स्कैम 1992: दी हर्षद मेहता स्टोरी’ बहुत चर्चा में रही. इसमें शेयर मार्केट और बैंकिंग फ़्रॉड के अलावा एक और छोटा सा सब-प्लॉट था, इनसाइडर ट्रेडिंग का. शेयर मार्केट से जुड़ी एक और चर्चित हॉलीवुड मूवी ‘वॉल स्ट्रीट’ (1987) में भी इनसाइडर या इनसाइड ट्रेडिंग की बात थी. लेकिन ये इनसाइडर ट्रेडिंग होती क्या है, और ये अनैतिक और अवैधानिक क्यूं हैं? आइए, आसान भाषा में जानते हैं.

# सेकेंड्री मार्केट-

इनसाइडर ट्रेडिंग के बारे में जानने से पहले आपको शेयर मार्केट को थोड़ा बहुत समझना होगा. क्यूंकि इनसाइडर ट्रेडिंग नाम का क्राइम वहीं अंजाम दिया जाता है.

किसी कंपनी को अगर अपना विस्तार करने के लिए पैसे चाहिए होते हैं तो उसके पास उपलब्ध कई विकल्पों में से एक होता है, अपनी हिस्सेदारी आम लोगों में बांट देना. इसके लिए कंपनी निकालती है IPO. इनिशियल पब्लिक ऑफ़रिंग. आप कंपनी को पैसे देकर ये IPO, यानी कंपनी की हिस्सेदारी सीधे कंपनी से ख़रीद सकते हैं.

एक बार अगर आपने IPO के माध्यम से किसी कंपनी के शेयर ख़रीद लिए तो ऐसा नहीं है कि आपको ता-उम्र उस कंपनी का हिस्सेदार बने रहना ज़रूरी है. आप IPO के माध्यम से ख़रीदे गए शेयर किसी और को भी बेच सकते हैं. इसके अलावा, जब कंपनी सीधे शेयर बेच रही थी, तब आपको नहीं मिले, या तब आपने नहीं लिए. लेकिन अब आपको चाहिए. तो आप किसी और से भी इन्हें ख़रीद भी सकते हो. और ये ख़रीद-फ़रोख़्त आप अनंत बार कर सकते हो.

गौर कीजिए कि IPO के अलावा एक बार भी आप कंपनी से सीधे शेयर नहीं ख़रीद रहे, न ही कंपनी को शेयर बेच रहे. आप तो सेकेंड हेंड शेयर्स बेच रहे हैं और सेकेंड हेंड शेयर्स ही ख़रीद रहे हैं. इसलिए ही तो जहां पर IPO की ख़रीद फ़रोख़्त होगी, उसे प्राइमरी और जहां पर इन सेकेंड हेंड शेयर्स की ख़रीद-फ़रोख़्त होती है, उसे सेकेंड्री मार्केट कहा जाता है.

तो जो रोज़ आप शेयर मार्केट की खबरें सुनते हैं, दरअसल वो एक सेकेंड्री मार्केट है. ये भी बता देते हैं कि शेयर मार्केट, SEBI (भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड) द्वारा रेग्यूलेटेड है. मतलब SEBI शेयर मार्केट की क्लास मॉनिटर है. जैसे RBI बैंकिंग की और IRDA इंश्योरेंस की.

SEBI के चेयरमैन अजय त्यागी. SEBI, शेयर मार्केट की नियामक संस्था यानी मॉनिटर है. और वहां के हर छोटे-बड़े क्रियाकलापों पर नज़र रखती है. (तस्वीर: PTI)
SEBI के चेयरमैन अजय त्यागी. SEBI, शेयर मार्केट की नियामक संस्था यानी मॉनिटर है. और वहां के हर छोटे-बड़े क्रियाकलापों पर नज़र रखती है. (तस्वीर: PTI)

अब लास्ट में एक बात ये भी समझने की है कि सेकेंड हैंड शेयर्स का मतलब ये नहीं कि वो कार, टीवी, फ्रिज की तरह सेकेंड हैंड हो जाने के बाद सस्ते बिकेंगे. शेयर्स एक पूंजी की तरह होते हैं. ठीक जैसे सोने के पुराने या नए, फ़र्स्ट हैंड या सेकेंड हैंड होने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, वैसे ही शेयर्स का भी हिसाब-किताब है. सोने की तरह ही शेयर्स के दाम भी सिर्फ़ और सिर्फ़ डिमांड एंड सप्लाई के आधार पर बढ़ते-घटते हैं. मतलब अगर किसी कंपनी के शेयर्स की डिमांड ज़्यादा होगी तो सेकेंड्री मार्केट में उसके दाम बढ़ते चले जाएंगे. और अगर किसी कंपनी के शेयर्स की डिमांड कम होगी तो ऑफ़ कोर्स उसके दाम कम होते चले जाएंगे.

लेकिन सोचिए कि किसी कंपनी के शेयर्स की डिमांड बढ़ेगी या घटेगी किस आधार पर? सिंपल है, कंपनी के परफ़ॉर्मेंस पर. अगर कंपनी ख़ूब प्रॉफ़िट कमा रही है, या उसने कोई ऐसी अद्भुत चीज़ का अविष्कार कर डाला है, जिसकी भविष्य में ख़ूब क़ीमत होने वाली है, तो कंपनी के शेयर्स की डिमांड बढ़ेगी. और अगर कोई कंपनी घाटे में जा रही है या फिर उसका या उसके मालिकों का कोर्ट में कोई विवाद चल रहा है तो उसके शेयर्स की डिमांड कम होगी. और यूं उसके शेयर्स के दाम भी सेकेंड्री मार्केट में घटते चले जाएंगे.

# शेयर मार्केट में कितने तरह के खिलाड़ी होते हैं-

तो अपने ख़रीद-बिक्री के इसी स्ट्रक्चर के चलते ये सेकेंड्री मार्केट अपने आप में एक इन्वेस्टमेंट का ज़रिया बन जाती है, FD या गोल्ड की तरह ही. वैसे तो कहा जाता है कि शेयर मार्केट में दो तरह के इंवेस्टर्स पाए जाते हैं-

पहले जो मार्केट में पैसा लेकर आते हैं, दूसरे जो अनुभव लेकर आते हैं. पैसे लेकर आने वाले अनुभव लेकर जाते हैं और अनुभव लेकर आने वाले पैसे लेकर जाते हैं.

लेकिन इंवेस्टर्स के ये दो प्रकार, कुछ अनौपचारिक हैं. औपचारिक रूप से बात करें तो शेयर मार्केट में पैसा लगाने वाले तीन तरह के ट्रेडर्स होते हैं.

# इंवेस्टर्स. जो एक या कई अलग-अलग कंपनियों के शेयर्स में पैसे लगाकर लंबे समय तक उन शेयर्स को अपने पास रखे रहते हैं. इंवेस्टर्स को बाज़ार के पल-पल के उतार चढ़ाव से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. मार्केट चाहे चढ़े चाहे उतरे, वो धीरे-धीरे अपनी इन्वेस्टमेंट बढ़ाते रहते हैं, और कई कंपनियों के शेयर्स में पैसे लगाना ज़ारी रखते हैं. 5-10-15 या ज़्यादा साल बीत जाने के बाद, या ज़रूरत के वक्त पैसे निकालते हैं. इस तरह की ट्रेडिंग दरअसल ट्रेडिंग नहीं, वेल्थ मैनजमेंट कही जाती है. क्यूंकि एक दिन इस तरह का इंवेस्टर बूंद-बूंद  करके घड़ा भर चुका होता है.

# स्विंग ट्रेडर्स. जो कुछ दिनों या कुछ महीनों के लिए किसी कंपनी के शेयर्स ख़रीदते हैं और उम्मीद के हिसाब से फ़ायदा या उम्मीद से ज़्यादा नुक़सान होने पर अपने पैसे निकाल लेते हैं. इन ट्रेडर्स का रिस्क बहुत ज़्यादा होता है, लेकिन रिटर्न भी उसी हिसाब से मिलते हैं.

# इंट्राडे ट्रेडर्स. इन तीसरे तरह के ट्रेडर्स को जुआरी भी कहा जा सकता है. ये सिर्फ़ एक दिन (इंट्रा डे) की ट्रेडिंग के हिसाब से पैसे कमाते हैं, और एक ही दिन में लाखों के वारे न्यारे कर देते हैं. इंट्रा-डे इसलिए स्विंग ट्रेडिंग और इन्वेस्टिंग अलग है क्यूंकि इसमें सारा खेल मार्जिन का है.

शेयर मार्केट (सांकेतिक तस्वीर)
शेयर मार्केट (सांकेतिक तस्वीर)

# मार्जिन ट्रेडिंग-

एक उदाहारण से समझिए इस मार्जिन का खेल:

माना ‘लल्लन इंटरनेशनल’ के एक शेयर का मूल्य 100 रुपया है. तो ऑफ़ कोर्स आप एक लाख रूपये में ‘लल्लन इंटरनेशन’ के 1000 शेयर्स ख़रीद सकते हैं. स्विंग ट्रेडर्स और इंवेस्टर्स ऐसा ही करते भी हैं.

लेकिन एक इंट्राडे ट्रेडर के पास विकल्प होता है कि वो जहां से शेयर ख़रीद रहा है, उस ब्रोकर से पूछे कि मेरे पास एक लाख रूपये हैं, तुम मुझे ’लल्लन इंटरनेशनल’ के कितने शेयर्स दे सकते हो? ब्रोकर बोलता है कि मैं तुम्हें 10,000 शेयर्स दे सकता हूँ, लेकिन जैसे ही शेयर का मूल्य 90 रुपया होगा, तुम्हें इन शेयर्स को बेच देना होगा. ताकि जो नुक़सान हो, तुम्हें हो. मुझे नहीं. साथ ही तुम्हें फ़ायदा हो या नुक़सान, तुम्हें आज के दिन की ट्रेडिंग ख़त्म होने से पहले अपने पूरे शेयर्स स्क्वेरऑफ़ करने ही होंगे. क्यूंकि अगले दिन का रिस्क मैं नहीं ले सकता.

स्क्वेरऑफ़ बोले तो जितने शेयर ख़रीदें हैं, उतने ही बेच देना या फिर जितने शेयर बेचे हैं उतने ही ख़रीद लेना. ये शब्द बेसबॉल से आया लगता है. जहां से ‘बैक टू स्कवायर वन’ मुहावरा आया. मतलब ये कि पहले जैसी स्थिति में वापस आ जाना.

वेनेज़ुला में बेसबॉल खेलता एक बच्चा. बेसबॉल से आया, बेक टू स्क्वेर वन या स्क्वेर ऑफ़. (तस्वीर: PTI)
वेनेज़ुला में बेसबॉल खेलता एक बच्चा. बेसबॉल से आया, बेक टू स्क्वेर वन या स्क्वेर ऑफ़. (तस्वीर: PTI)

इस तरह इंट्राडे ट्रेडर ने उतने ही रूपये में 10,000 शेयर्स पा लिए, जितने रुपयों में अन्यथा सिर्फ़ 1,000 शेयर्स आते. अब अगर शेयर का मूल्य एक रुपया भी बढ़े तो उसे सीधे 10,000 रूपये का फ़ायदा हो जाएगा. जबकि अन्य दो तरह के ट्रेडर्स (इंवेस्टर और स्विंग ट्रेडर्स) को सिर्फ़ 1,000 रूपये का.

लेकिन सोचिए अगर शेयर का मूल्य 90 रुपया हो गया तो इंट्राडे ट्रेडर्स के सारे रूपये एक ही दिन में डूब गए. जबकि बाकी दो तरह के ट्रेडर्स के सिर्फ़ 9000 रूपये डूबे. साथ ही हो सकता है कि बाकी दो तरह के ट्रेडर्स (अगले दिन या उसके अगले दिन, जब भी ‘लल्लन इंटरनेशनल’ के शेयर बढ़ेंगे) अपने डूबे हुए 9,000 रूपये वसूल कर ले जाएं. जबकी इंट्राडे ट्रेडिंग करने वाले के पैसे गए तो गए. उसके लिए हर दिन नया दिन है.

इसलिए ही इंट्राडे ट्रेडिंग कोई इन्वेस्टमेंट नहीं, एक जुआ है. जिसमें किसी एक का फ़ायदा, दरअसल दूसरे का नुक़सान है. जबकि इंवेस्टमेंट या स्विंग ट्रेडिंग में हर कोई फ़ायदे में रह सकता है, बिना किसी दूसरे को नुक़सान पहुंचाए. क्यूंकि तब, ’लल्लन इंटरनेशनल’ कंपनी की प्रोग्रेस पर आपके शेयर की वैल्यू डिपेंड होगी. इसलिए ही तो हमने कहा था कि इन्वेस्टमेंट को ट्रेडिंग नहीं वेल्थ मैनजमेंट करना कहा जा सकता है.

अच्छा, जब हमने आपको स्क्वेरऑफ़ की परिभाषा बताई तो ये भी बताया कि स्क्वेरऑफ़ का एक मतलब ये भी है कि जितने शेयर बेचे हैं, उतने ही ख़रीद लेना. ऐसा हमने इसलिए कहा क्यूंकि इंट्राडे ट्रेडिंग में आप तब भी शेयर्स बेच सकते हो, जबकी आपके पास हैं नहीं. लेकिन दिन ख़त्म होने से पहले आपको ये बेचे हुए शेयर्स स्क्वेरऑफ़ करने होंगे. मतलब ख़रीदने होंगे. यूं आपके पास दिन शुरू होने से पहले भी 0 शेयर्स थे और दिन ख़त्म होने के बाद भी. बस आपने बेच पहले दिए और ख़रीदे बाद में. इसमें अगर शेयर के भाव गिरते हैं तो ट्रेडर को फ़ायदा होता है और बढ़ते हैं तो नुक़सान होता है. ऐसा क्यूं ये आप मन ही मन में एक थॉट एक्सपेरिमेंट करके देख सकते हैं. बिना शेयर्स अंटी में हुए भी उनको बेच देने को ‘सॉर्ट’ करना या ‘सॉर्टिंग’ कहते हैं. सामान्यतः भी शेयर्स बेचने को ‘सॉर्ट’ करना या ‘सॉर्टिंग’ कहते हैं और शेयर ख़रीदने को ‘लॉन्ग’ करना कहते हैं.

# ये तीन टाइप के ट्रेडर्स कहां मिलेंगे?-

जब आप गाड़ी चलाते हैं तो आप ड्राइवर और जब खाना बनाते हैं तो शेफ़ कहलाते हैं. लेकिन आप सिर्फ़ ड्राइवर या शेफ़ नहीं हैं. बल्कि आप तो दोनों ही नहीं हैं. ऐसे ही एक ही व्यक्ति एक ही समय में इंवेस्टर, स्विंग ट्रेडर और इंट्राडे ट्रेडर तीनों भी हो सकता है या अलग-अलग समय में तीनों तरह की ट्रेडिंग कर सकता है. लेकिन फिर भी हो सकता है कि वो कहीं जॉब करता हो या उसकी कोई दुकान हो, पढ़ाई करता हो. मतलब, ट्रेडिंग कोई प्रोफ़ेशन नहीं है कि अगर आप इंवेस्टर्स हैं तो इंट्राडे ट्रेडिंग नहीं कर सकते. यानी ‘कोई भी’ व्यक्ति किसी भी तरह से शेयर मार्केट में पैसे लगा सकता है. ऑफ़ कोर्स नागरिकशास्त्र में पढ़े गए एक्सेप्शन, ‘वह भारत का नागरिक हो, उसकी उम्र अमुक-अमुक हो’ को हमारी ‘कोई भी’ की परिभाषा में इग्नोर किया जाए.

# इनसाइडर ट्रेडिंग-

तो जब कोई भी व्यक्ति ट्रेडिंग कर सकता है तो आप भी कर सकते हैं. और वो भी कर सकता है जो ’लल्लन इंटरनेशनल’ में जॉब करता हो, या उसका प्रमोटर (मालिकों में से एक) हो या उसका ग्राहक हो. ऐसा करना बिलकुल भी अनैतिक या अवैधानिक नहीं है. जो इल्लिगल है उसकी बात आगे करते हैं.

तो सोचिए, रमेश ’लल्लन इंटरनेशनल’ में जॉब करता है. मैनेजर है. उसे पता कि कंपनी कल दिन में 12 बजे अपना इस साल के रिज़ल्ट डिक्लेयर करेगी. और चूंकि रमेश कंपनी के फ़ाइनेंस डिपार्टमेंट में मैनेजर है, तो उसे पता है कि अबकी बार उसकी कंपनी को दबा के फ़ायदा हुआ है. साथ ही कंपनी का भविष्य भी उज्ज्वल दिख रहा है. तो वो अगले दिन मार्केट के खुलते ही इंट्रा-डे में ख़ूब मार्जिन लगाकर करोड़ों रूपये के शेयर ख़रीद लेता है. जैसे ही 12 बजते हैं तो उसके ख़रीदे हुए शेयर्स उसे करोड़ों का फ़ायदा दे जाते हैं.

अब कुछ दिनों बाद रमेश को फिर से पहले ही पता चल जाता है कि ’लल्लन इंटरनेशनल’ के हाथों से एक करोड़ों का विदेशी कॉन्ट्रैक्ट फिसल गया है. हालांकि अभी ये न्यूज़ में नहीं आया है लेकिन कल 10-11 बजते-बजते ये न्यूज़ फाइनेंशियल हलकों में उठना और फैलना शुरू हो जाएगी. इसके चलते रमेश, ख़ुदरा ख़रीददारों के लिए मार्केट खुलते ही, यानी सवा नौ बजे, खूब सारे शेयर्स शॉर्ट कर लेता है. और जैसे-जैसे विदेशी कॉन्ट्रैक्ट के कैन्सल हो जाने की ख़बर बाहर आना शुरू होती है, ’लल्लन इंटरनेशनल’ के शेयर्स औंधे मुंह गिरना शुरु हो जाते हैं. दिन ख़त्म होते-होते रमेश अपने बेचे हुए शेयर्स को स्क्वेर ऑफ़ करके अबकी भी ख़ूब सारा फ़ायदा कमा लेता है.

रमेश द्वारा की गई दोनों तरह की ट्रेडिंग इनसाइड ट्रेडिंग का उदाहरण है. हालांकि इनसाइड ट्रेडिंग, इंट्राडे ही हो, ये ज़रूरी नहीं. लेकिन फिर भी इसका सबसे हेवी-इंपेक्ट, बड़ा और बुरा प्रभाव, इंट्राडे ट्रेडिंग पर ही पड़ता है. कई कारणों के चलते. जैसे-

# अव्वल तो इंट्राडे ट्रेडिंग में ख़ूब सारा मार्जिन होने के चलते हज़ारों के बदले लाखों और लाखों के बदले करोड़ों के वारे न्यारे किए जा सकते हैं.

# दूसरा कैश मार्केट में बुरी ख़बर से फ़ायदा उठाने का इंट्राडे ही एक मात्र विकल्प है. क्यूंकि कैश मार्केट के शेयर्स आप एक ट्रेडिंग सेशन से ज़्यादा शॉर्ट करने नहीं रख सकते. कैश मार्केट और डेरिवेटिव्स का एक अलग लंबा सेशन, लेक्चर या स्टोरी बनती है. लेकिन इतना समझ लीजिए कि आप शेयर्स की ख़रीद को तो अगले दिन कैरी-फ़ॉर्वर्ड कर सकते हैं पर उसकी बिक्री को नहीं. बेचे हुए शेयर्स उसी दिन ख़रीदने पड़ते हैं, और यूं किसी बुरी ख़बर से फ़ायदा एक ट्रेडिंग सेशन में ही उठाया जा सकता है.

# तीसरा इंट्रा डे में ही एक का फ़ायदा दूसरे का नुक़सान है. यानी आप करोड़ों कमा रहे हैं तो निश्चित है कि कोई करोड़ों गँवा रहा है. जबकि, जैसा हमने पहले भी जाना कि स्विंग ट्रेडिंग या लॉन्ग टर्म इन्वेस्टमेंट में हर कोई फ़ायदा उठा सकता है. क्यूंकि तब शेयर्स की खुदरा ख़रीद-फ़रोख़्त से ज़्यादा कंपनी की परफ़ॉर्मेंस, कंपनी के शेयर्स की क़ीमत निर्धारित करती है.

# UPSI-

चलिए अब उदाहरण के बाद इनसाइडर ट्रेडिंग की एक परिभाषा बनाने का भी प्रयास करते हैं.

तो जिस किसी व्यक्ति या संस्था के पास किसी कंपनी से जुड़ी Unpublished Price Sensitive Information (UPSI) होती है उसके द्वारा ट्रेडिंग किया जाना इनसाइडर ट्रेडिंग है.

UPSI मतलब ऐसी जानकारी, जो कंपनी के शेयर्स के दामों के लिए बहुत ज़्यादा संवेदनशील है लेकिन अभी वो पब्लिश नहीं हुई. पब्लिश नहीं हुई मतलब, सेबी को रिपोर्ट नहीं हुई या फिर मीडिया में नहीं आई. यानी कुल मिलाकर वो जानकारी कुछ गिने-चुने लोगों के पास है. बाक़ी लोग इस कंपनी के शेयर्स में ट्रेडिंग करें तो कोई दिक्कत नहीं लेकिन वो गिने चुने लोग यदि UPSI के सार्वजनिक होने से पहले ऐसा करते हैं तो उन्हें इनसाइड ट्रेडर और उनकी ट्रेडिंग को इनसाइडर ट्रेडिंग कहा जाएगा.

अब कोई प्रमोटर या ट्रेडर, पकड़े जाने पर ऐसा कहे कि मेरे पास UPSI नहीं थी तो? इसी से बचने के लिए हर उस व्यक्ति की ट्रेडिंग को इनसाइडर ट्रेडिंग मान लिया जाएगा जिसके पास UPSI का एक्सेस हो. फिर चाहे उसने UPSI एक्सेस किया हो या नहीं. जैसे कंपनी के कर्मचारी, उसके प्रमोटर्स, कई दफ़ा उस कंपनी से जुड़ी हुई अन्य कंपनियां और आर्थिक संस्थान, जैसे जो कंपनी का ऑडिट कर रहे हों, वग़ैरह.

#इनसाइडर ट्रेडिंग अनैतिक कैसे है और ये कैसे पता चलेगा-

बुरी ख़बर हो या अच्छी ख़बर, एक दिन मार्केट में तो आनी ही है, तब बाकी लोग उसी हिसाब से पैसे लगाएंगे. तो किसी को पहले से पता लगा जाए और वो प्रॉफ़िट कमा ले तो क्या दिक्कत है?

दिक्कत तब नहीं है, जब आप या मैं ऐसा करते हैं. दिक्कत तब है जब आप रिसिविंग एंड में हों. यानी आपने और मैंने भी पैसे लगाएं हों लेकिन हमारे पर UPSI या उसका कोई स्रोत न हो. तब आपको और मुझे होगा करोड़ों का नुक़सान. क्यूंकि, जैसा आपको पता ही है कि शॉर्ट टर्म में (इंट्रा डे में) एक का प्रॉफ़िट दूसरे का नुक़सान है.

बारिश होने पर फुटबॉल का गेम नहीं रोका जाता लेकिन क्रिकेट रोक लिया जाता है. क्यूं? क्यूंकि फुटबॉल में दोनों ही टीमें एक ही समय में एक ही चीज़ कर रही हैं: गोल. लेकिन क्रिकेट में जो बैटिंग कर रहा है, उसके लिए तो पिच ख़राब हो गई. फ़ील्डिंग करने वाली टीम को तो अनड्यू एडवांटेज़ मिल गया.

तो यही अनड्यू एडवांटेज़ ट्रेडर्स को न मिले इसलिए इनसाइडर ट्रेडिंग न केवल अनैतिक है बल्कि अवैधानिक भी है. आपको याद है शेयर मार्केट की मॉनिटर, सेबी? वो इस तरह की किसी भी ट्रेडिंग में बहुत गहरी नज़र रखती है. उसके पास इनसाइडर ट्रेडिंग का पता लगाने के कई विकल्प है. साथ ही जब किसी कंपनी के रिज़ल्ट आ रहे हों तो उस कंपनी के प्रमोटर्स या वो कर्मचारी जिनके पास UPSI है, उनके लिए शेयर्स की ट्रेडिंग करना बैन होता है. जब किसी कंपनी का मर्जर-एक्वेज़िशन होता है, तब भी इस तरह के प्रतिबंध लगाए जाते हैं.

हर लिस्टेड कंपनी को न केवल अपने तिमाही रिज़ल्ट बल्कि कोई भी बड़ी ख़बर, सेबी को बताना ज़रूरी होता है. कंपनी से जुड़ी इस तरह की आर्थिक पारदर्शिता ये सुनिश्चित करती है कि या तो किसी कंपनी से जुड़ी कोई संवेदनशील जानकारी किसी के पास न हो, या फिर सबके पास हो. और अगर ऐसा संभव नहीं है कि वो जानकारी सबके पास रहे तो ये सुनिश्चित किया जाता है कि जिन गिनती के लोगों के पास भी वो संवेदनशील जानकारी है, वो और उनसे जुड़े हुए लोग शेयर्स की ख़रीद-फ़रोख़्त न कर पाएं. कम से कम तब तक, जब तक कि वो जानकारी सार्वजनिक न हो जाए.

सेबी शेयर मार्केट के हर छोटे-बड़े ट्रांजिक्शन पर नज़र रखती है. कुछ भी अलग सा पाया गया तो उसका पता लगना या लगाना मुश्किल नहीं होता. क्यूंकि अव्वल तो हर बड़े इंवेस्टर, हर प्रमोटर को अपने शेयर्स डिक्लेयर करना ज़रूरी है. दूसरा कंप्यूटर के डेटाबेस से लेकर पूर्वअनुभवों तक कई ऐसी चीज़ें हैं जिनसे ग़लत काम करने वाले को ट्रैक करना मुश्किल नहीं है. फिर चाहे वो ग़लत काम करने वाला हर्षद मेहता या केतन पारेख जैसा कोई शातिर दिमाग़ ही क्यूं न हो.

DHFL के 2016 के एक विज्ञापन का स्क्रीनशॉट. तब शहरूख को भी कहां पता होगा कि 2020 आने आने तक कंपनी की दुर्गति हो जाएगी. DHFL, NBFC का उदाहरण है. यानी शैडो बैंक्स का.
DHFL के 2016 के एक विज्ञापन का स्क्रीनशॉट. तब शहरूख को भी कहां पता होगा कि 2020 आने आने तक कंपनी की दुर्गति हो जाएगी. DHFL, NBFC का उदाहरण है. यानी शैडो बैंक्स का.

अमित रमेश, जिसकी बात हमने शुरू में की उसकी ट्रेडिंग, इनसाइड ट्रेडिंग के दायरे में इसलिए आयी थी क्यूंकि उसके पास DHFL के शेयर्स थे. अपने ये सारे शेयर्स उसने 29 जनवरी, 2019 को बेच डाले. इसके बाद DHFL के घोटाले की स्टोरी मार्केट में आई और उन लोगों के करोड़ों रूपये डूब गए जिन्होंने DHFL के शेयर्स ख़रीदे थे. 25 जनवरी के 1 फ़रवरी के बीच DHFL के शेयर्स 209 रूपये से 111 रूपये के हो गए थे. आधे से कुछ ज़्यादा. और 29 जनवरी, 2019 को भी DHFL के शेयर्स 8% से ज़्यादा गिरे थे. यूं अमित ने अपने शेयर्स पहले ही बेच के, लगभग 27,000 का नुक़सान होने से बचा लिया.

अब अमित की ट्रेडिंग इनसाइडर ट्रेडिंग क्यूं कहलाई गई? तब जबकि इससे बहुत पहले क्यूंकि ‘कोबरापोस्ट’ DHFL के घपले की ख़बर सार्वजनिक करने वाली थी लेकिन अपनी रिपोर्ट सार्वजनिक करने से पहले उन्होंने DHFL के प्रमोटर्स का पक्ष जानने के लिए कुछ सवाल पूछे थे. ये सवालों के सेट प्रोमोटर्स के पास ‘वाया’ अमित गए थे, क्यूंकि वो प्रमोटर्स का करीबी था. यूं उसे पता था कि आगे के दिन DHFL के लिए बद से बदतर होने वाले हैं. और यूं उसके द्वारा बेचे गए शेयर्स एक प्रोएक्टिव (क्रिया) नहीं रिऐक्टिव (प्रतिक्रिया) प्रक्रिया थी. उसके पास उपलब्ध ख़बर के चलते थी. ख़बर जिसे निश्चित रूप से UPSI कहा जा सकता है.

आपने वेब सीरीज़ में देखा होगा, अगर नहीं देखा हो तो हम बता देते हैं, हर्षद मेहता शेयर्स से प्रॉफ़िट कमाने के लिए एक डॉक्टर से संपर्क करता है. डॉक्टर दरअसल ट्रेड यूनियन का सदस्य होता है. हर्षद उससे कंपनियों की अंदरूनी खबरें निकालता है और फिर एडवांस में ही, यानी मार्केट में खबरें आने से पहले ही अपने ट्रेड निर्धारित करता है. ये इनसाइड ट्रेडिंग ठहरी. इसके बाद हर्षद इससे भी एक कदम आगे निकल जाता है, वो खबरें प्लांट भी करने लग जाता है. मतलब अब वो खबरों का प्यासा न होकर खबरों का स्रोत बन जाता है. कहना न होगा कि इस तरह से भी शेयर मार्केट से पैसे कमाना इल्लिगल है.

दरअसल लंबे समय तक इन्वेस्टेड रहने वालों को दबा के फ़ायदा देने वाला शेयर मार्केट शॉर्ट टर्म में बहुत ही संवेदनशील है. हर छोटी ख़बर का यहां पर बड़ा असर होता है. तभी तो टॉप 30 स्टॉक्स के ग्रुप को संवेदी सूचकांक (सेंसेक्स) कहते हैं. और इसलिए ही चीज़ें बहुत पारदर्शी रखी जाती हैं. रखे जाने की बहुत ज़रूरत होती है. ताकि अगर कोई जुआ समझ के भी इसे खेले तो पासा एक तरफ़ से भारी न हो.


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