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तो क्या अनिल अंबानी की आरकॉम का करोड़ों रुपये का बकाया AGR उनके भाई मुकेश अंबानी चुकाएंगे?

कहानी दो भाइयों की. मुकेश अंबानी और अनिल अंबानी. छोटे भाई, अनिल की थी ‘रिलायंस कम्यूनिकेशंस’. बड़े भाई, मुकेश की है ‘रिलायंस जियो इंफ़ोकॉम’. दोनों कंपनियों का मुख्य काम लोगों को मोबाइल नेटवर्क उपलब्ध करवाना. मुख्य अंतर- एक पास्ट टेंस, एक प्रेजेंट टेंस. आज इन दोनों कंपनियों की बात क्यूं? क्या है, जिसने अतीत और वर्तमान को जोड़ दिया है? एक ख़बर.

# कट टु करेंट-

फाइनेंशियल एक्सप्रेस के अनुसार, ख़बर ये है कि दूरसंचार विभाग चाहे तो रिलायंस जियो से AGR का लगभग 13,000 करोड़ रुपये बकाया वसूल सकता है.

# AGR क्या है?

अडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू. ये हुआ इसका फुल फ़ॉर्म. हिंदी में मतलब हुआ समायोजित सकल राजस्व. न फुल फ़ॉर्म से कुछ पल्ले पड़ा, न हिंदी मतलब से. थांबा. बताते हैं इसका मतलब.

देखिए, किसी टेलीकॉम कंपनी को अगर भारत में ऑपरेट करना है, तो उसे सरकार को कई चीजों के लिए पैसे देने होते हैं. बाक़ी छोटी-मोटी चीज़ें छोड़ भी दें तो कम से कम दो चीज़ों के लिए पेमेंट करना होगा. एक तो लाइसेंस के लिए और दूसरा स्पेक्ट्रम के लिए.

# लाइसेंस मतलब काम करने की इजाज़त, जो सरकार देगी. और इसके लिए पैसे लेगी. सालाना. इसलिए ही इसे एनुअल लाइसेंस फ़ीस कहा जा सकता है.

# स्पेक्ट्रम मतलब, समझ लीजिए, रेडियो फ़्रीक्वेंसी. वो माध्यम, जिसके बिना डेटा, फ़ोन कॉल और SMS जैसी मूलभूत मोबाइल सुविधाएं संभव नहीं. और इस स्पेक्ट्रम पर भी सरकार या दूरसंचार विभाग का अधिकार रहता है. इसे टेलीकॉम कंपनियों को बेचकर भी सरकार पैसा कमाती है. 2G घोटाले वाला मुद्दा तो याद ही होगा. दरअसल वो घोटाला, उसी दौरान हुआ बताया गया था, जब सरकार ने मोबाइल कंपनियों को 2G स्पेक्ट्रम बेचे. इसके बाद 3G और 4G स्पेक्ट्रम की भी नीलामी हुई. उससे भी सरकार ने पैसा कमाया.

बहरहाल, वापस लौटते हैं AGR में. तो, 1999 से पहले टेलीकॉम कंपनियां सरकार को लाइसेंसिंग के एवज़ में एक निश्चित राशि देती थीं. ये कहलाता था, ‘फ़िक्स्ड फ़ीस’ सिस्टम. फिर सरकार, टेलीकॉम इंडस्ट्री को बढ़ावा देने के लिए, इस सिस्टम को हटाकर ‘रेवेन्यू शेयरिंग मॉडल’ लेकर आई.

DoT यानी दूरसंचार विभाग की टीम. एक इवेंट के दौरान. (तस्वीर: PTI)
DoT यानी दूरसंचार विभाग की टीम. एक इवेंट के दौरान. (तस्वीर: PTI)

‘रेवेन्यू शेयरिंग मॉडल’ में टेलीकॉम कंपनियों को लाइसेंस फ़ीस के रूप में एक निश्चित राशि के बदले के अपने रेवेन्यू का एक निश्चित प्रतिशत देना तय हुआ. पहले ये 15% था और 2013 आते-आते ये घटकर 8% हो गया. मतलब कि कंपनियों को अपनी कमाई का 8% सरकार को देना था. याद रखिए कमाई का, प्रॉफ़िट का नहीं.

अब जैसे गोपीचंद की एक टेलिकॉम कंपनी है. अगर उसकी इस साल कमाई 100 रुपया हुई और खर्चा 90 रुपया, तो उसका प्रॉफ़िट हो गया 10 रुपया. तो क्या गोपीचंद अपने प्रॉफ़िट का 8% सरकार को देगा? नहीं. वो अपनी कमाई का, यानी 100 रूपये का 8% सरकार को देगा. यानी 8 रूपए. न कि 80 पैसा.

इसके अलावा स्पेक्ट्रम चार्जेज़ के रूप में भी टेलिकॉम कंपनियों को हर साल सरकार को अपने रेवेन्यू का 3-5% देना था. यहां पर भी रेवेन्यू का, न कि प्रॉफ़िट का.

लाइसेंस फ़ीस + स्पेक्ट्रम चार्जेज़ के रूप में टेलीकॉम कंपनियों द्वारा सरकार को दिया जाने वाला यही वार्षिक रेवेन्यू का ‘निश्चित प्रतिशत’ कहा गया, AGR. एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू.

# विवाद क्या है?

अब आप कहेंगे कि जब AGR साल दर साल दिया जाना था तो रिलायंस कम्यूनिकेशन का AGR अभी तक ड्यू क्यूं है? और वो JIO क्यूं देगी? चलिए टाइमलाइन बताई जाए आपको, विवाद भी समझ में आ जाएगा.

वोडाफोन आइडिया पर 50 हज़ार करोड़ से ज़्यादा का AGR बाकी है. (तस्वीर: PTI)
वोडाफोन आइडिया पर 50 हज़ार करोड़ से ज़्यादा का AGR बाकी है. (तस्वीर: PTI)

# टाइमलाइन-

1994 में टेलीकॉम कंपनियों को लाइसेंस बंटने शुरू हुए थे. 1999 में ‘रेवेन्यू शेयरिंग मॉडल’ इंट्रड्यूस हुआ. 2005 में टेलीकॉम कंपनियां AGR की परिभाषा को लेकर अड़ गईं.

परिभाषा को लेकर विवाद: जहां DoT, यानी डिपार्टमेंट ऑफ़ टेलीकम्यूनिकेशन के हिसाब से AGR में टेलीकॉम कंपनियों की सभी आय जुड़नी थीं, वहीं टेलीकॉम कंपनियों का कहना था कि इसमें सिर्फ़ ‘कोर बिज़नेस’ की आय ही जुड़े. ‘कोर बिज़नेस’ मतलब- सिम बेचने से, SMS, कॉल, डेटा पैक, कॉलर ट्यून्स, वैल्यू एडेड सर्विस (VAS) और मोबाइल से जुड़ी बाकी सुविधाओं से होने वाली आय. और DoT कह रहा था कि इस रेवेन्यू के अलावा बाकी चीज़ों से होने वाली आय को भी कंसीडर किया जाए. बाकी चीज़ें, जैसे- अगर कोई सर्विस प्रोवाइडर, सिम कार्ड के साथ-साथ फ़ोन बेच रहा है, अपने एसेट- जैसे ज़मीन बेच रहा है, अपना ऑफ़िस किसी और को किराए पर दे रहा है या बेच रहा है, वग़ैरह-वग़ैरह तो उससे होने वाली आय.

जब सरकार और कंपनियों के बीच विवाद बढ़ा तो मामला पहुंचा Telecom Disputes Settlement and Appellate Tribunal यानि TDSAT में. 23 अप्रैल, 2015 को TDSAT का फ़ैसला टेलीकॉम कंपनियों के पक्ष में नहीं तो, उनकी तरफ झुका हुआ सा आया. क्या आया, वो महत्वपूर्ण नहीं है, क्यूंकि अव्वल तो वो लंबा चौड़ा था और दूसरा उसका हमारी कहानी में साइड हीरो वाला रोल भी नहीं है. बस ये समझिए कि फ़ैसले से सरकार और DoT असंतुष्ट थे.

बहरहाल इसी बीच कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल ऑफ इंडिया यानी सीएजी की एक रिपोर्ट आ गई. रिपोर्ट में दावा किया गया कि टेलीकॉम कंपनियां अपना मुनाफा छुपा रही हैं और उन्होंने अपने मुनाफे में से तकरीबन 61,064.5 करोड़ रुपये कम करके बताए हैं.

फिर असंतुष्ट पार्टी, यानी सरकार या DoT, सुप्रीम कोर्ट चली गई. 24 अक्टूबर, 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के पक्ष में फ़ैसला दिया. कहा कि टेलीकॉम कंपनियों को, सरकार या DoT की परिभाषा के हिसाब से ही सरकार को पैसे देने पड़ेंगे. मतलब ‘कोर टेलीकॉम’ वाली आय और ‘नॉन टेलीकॉम’ वाली आय को जोड़कर ही AGR कैलकुलेट किया जाएगा.

ये भूचाल लाने वाला निर्णय था. क्यूंकि कई सालों से अटके पड़े केस के चलते कुल 15 टेलीकॉम कंपनियों पर 1.47 लाख करोड़ का बकाया AGR बन चुका था. इसमें से 75% के क़रीब तो ब्याज़, जुर्माना और जुर्माने पर ब्याज़ की ही राशि थी. मूलधन तो सिर्फ़ 25% के क़रीब था. इस 1.47 लाख करोड़ में से 92,642 करोड़ रुपए लाइसेंस फ़ीस के थे और 55,054.51 करोड़ रुपए स्पेक्ट्रम चार्जेज़ के.

वैसे इन 15 कंपनियों में से 10 या तो बंद हो गई हैं, दिवालिया हो गई हैं या इनकी दिवालिया होने की अर्ज़ी विचाराधीन हैं. जैसे टेलीनॉर, टाटा टेली-सर्विसेज़, विडियोकॉन. यूं इस वक़्त भारत में सिर्फ़ 4 टेलीकॉम कंपनियां रह गई हैं. जियो, एयरटेल, वोडफ़ोन-आइडिया (जो पहले अलग-अलग थीं) और सरकारी वाली बीएसएनएल. (पहले एमटीएनएल और बीएसएनएल भी अलग-अलग थीं.)

सुप्रीम कोर्ट. उच्चतम न्यायालय. जो DoT और टेलीकॉम कंपनियों को लगातर और जमकर डांट रहा है. साफ़ पता चलता है कि उसे जनता के पैसों की चिंता है. (तस्वीर: PTI)
सुप्रीम कोर्ट. उच्चतम न्यायालय. जो DoT और टेलीकॉम कंपनियों को लगातार और जमकर डांट रहा है. (तस्वीर: PTI)

टेलीकॉम कंपनियों के लिए करेले पर नीम चढ़ा वाली खबर ये थी कि इनको 3 महीने के भीतर सारे रुपये चुकाने थे. यूं 23 जनवरी, 2020 को ये डेडलाइन ख़त्म हो रही थी. लेकिन डेडलाइन के ख़त्म होने तक, कंपनियों की हालत डेड हो रही थी. जियो ने जिस तरह से बाकी टेलीकॉम कंपनियों की हालत खस्ता कर दी थी, उसके बाद इतने ढेर सारे रुपये चुकाना इन कंपनियों के लिए कंगाली में आटा गीला सरीखा था.

इंट्रेस्टिंगली, वो सरकार या उसका मंत्रालय ही था, जो अपने रुपये वसूलने के लिए सुप्रीम कोर्ट गया था. लेकिन फिर टेलीकॉम सेक्टर्स की गिरती हालत देखकर वो सरकार या उसका दूरसंचार मंत्रालय ही था, जिसने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावज़ूद अपने पैसे वसूलने के लिए कोई एफ़र्ट नहीं किए.

उल्टा अक्टूबर में, सरकार ने एक कमिटी (कमिटी ऑफ़ सेक्रेटरी) का गठन कर दिया, ये कैलकुलेट करने के लिए कि टेलीकॉम कंपनियों को कैसे और कितना बेलआउट, यानी कितनी राहत दी जाए.  इसके बाद 20 नवंबर, 2019 को टेलीकॉम कंपनियों को 2 साल का मोरेटोरियम मतलब मोहलत दे दी. 42,000 करोड़ रुपए का. स्पेक्ट्रम वाली राशि के पेमेंट पर. मतलब इतनी राशि टेलीकॉम कंपनियां 2 साल बाद जमा कर सकती थीं. हालांकि कमिटी ऑफ़ सेक्रेटरी को एक महीने के भीतर ही नवंबर 2019 में ये कहकर भंग कर दिया गया कि अब टेलीकॉम कंपनियों को 2 साल का मोरेटोरियम मिल तो गया है. अब क्या चाहिए. बाक़ी मामला कोर्ट में तय होगा.

13 फ़रवरी, 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने न केवल टेलीकॉम कंपनियों को डांट लगाई, बकाए का भुगतान तय समय पर न करने के लिए. बल्कि DoT को भी वसूली में हीला-हवाली के लिए डपट दिया. बड़े कटु वाक्य बोले, ‘देश में क़ानून का राज है या नहीं? क्या सुप्रीम कोर्ट बंद कर देना चाहिए? क्या सरकारी डेस्क अफ़सर सुप्रीम कोर्ट से बढ़कर है?’

इसके पहले 23 जनवरी वाली डेडलाइन ख़त्म होने से पहले, 16 जनवरी को, सुप्रीम कोर्ट में याचिका आई थी पुनर्विचार के लिए. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने मना कर दिया. इसी पर कोर्ट 13 फ़रवरी, 2020 को गुस्साया. इसके बाद 14 फ़रवरी, 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आज आधी रात से पहले पैसे दे दो.

इतनी डांट खा चुकने के बावज़ूद DoT फिर से सुप्रीम कोर्ट गया. 16 मार्च, 2020 को. अबकी बार फिर टेलीकॉम कंपनियों का पक्ष लेकर. कि इन्हें 20 साल तक का वक़्त दे दो पेमेंट करने को. साथ में निर्णय की तारीख के बाद की पेनल्टी और ब्याज़ भी इनसे न लिया जाए.

18 मार्च, 2020 को फिर DoT ने डांट खाई. कोर्ट ने कहा कि उसने टेलीकॉम कंपनियों को सेल्फ़-एसेसमेंट की इजाज़त कैसे दे दी? साथ में SC ने कहा-

क्या कंपनियां समझती हैं कि वो कोर्ट से ज़्यादा शक्तिशाली हैं… जो देय राशि है, उसे लेकर अब कोई आपत्ति नहीं स्वीकार की जाएगी… टेलीकॉम कंपनियों के टॉप अधिकारियों को जेल भेज दिया जाएगा… कंपनियों के मैनेजिंग डायरेक्टर्स को निजी तौर पर ज़िम्मेदार माना जाएगा… क्या हम (कोर्ट या बेंच) बेवक़ूफ़ है… क्या हमें नहीं पता, क्या चल रहा है… कंपनियां मीडिया के माध्यम से कोर्ट को प्रभावित करने की कोशिश कर रही हैं…

जियो ने अपना सारा AGR चुका दिया है. हालांकि, नई कंपनी होने के नाते, उसका AGR था भी कम. (तस्वीर: PTI)
जियो ने अपना सारा AGR चुका दिया है. हालांकि, नई कंपनी होने के नाते, उसका AGR था भी कम. (तस्वीर: PTI)

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने एक राहत भी दी कि DoT ने जो ‘उचित समयावधि’ देने की मांग की है, उस पर विचार किया जाएगा. कब किया जाएगा? अगली सुनवाई में. लेकिन, तीन जजों की बेंच ने कहा, जो भी हम देय राशि के बारे में निर्णय लेंगे, वो कंपनियों को देना पड़ेगा.

अगली सुनवाई में SC ने रोडमैप मांगा. पूछा, ‘कंपनियां कैसे भुगतान करेंगी? कंपनियां क्या ‘बैंक गारंटी’ देंगी? क्या कंपनी के डायरेक्टर निजी ‘बैंक गारंटी’ देंगे? बिना ऐसी किसी गारंटी के सरकारी भुगतान की किस्त नहीं बांधी जा सकती.’ इंट्रेस्टिंग बात ये थी कि कोर्ट ने अबकी कहा कि टेलीकॉम कंपनियों ने कोविड-19 के रिलीफ़ के लिए भी कुछ ज़्यादा योगदान नहीं दिया है. ये बात 11 जून, 2020 की है.

18 जून, 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने टेलीकॉम कंपनियों से पिछले 10 साल के फाइनेंशियल स्टेटमेंट जमा करने को कहा.

20 जुलाई, 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरकॉम, विडियोकॉन और एयरसेल के दिवालिया से जुड़े सारे रिकॉर्डस उसके साथ शेयर किए जाएं. ऐसा इसलिए ताकि दिवालिया होने की प्रक्रिया का ये कंपनियां दुरुपयोग न करें और बच निकलने का रास्ता न मानें.

10 अगस्त, 2020 को SC ने सराकर से एक प्लान तैयार करने को कहा कि वो कैसे उन टेलीकॉम कंपनियों से AGR वसूलेगी, जो इंसोल्वेंसी (दिवालिया) की प्रक्रिया में हैं.

इसके बाद हम आ गए हैं अंतिम दो सुनवाईयों में. 14 अगस्त और 17 अगस्त की.

# स्पेक्ट्रम शेयरिंग एग्रीमेंट

तो अब आपको समझ आ गया होगा कि रिलायंस कम्यूनिकेशन ने भी DoT को पैसे देने हैं. 25,194.58 करोड़ रुपए. सुप्रीम कोर्ट ने 14 अगस्त को कहा- DoT बताए, क्यूं इसमें से वो पैसे जियो को नहीं देने चाहिए, जो जियो पर बनते हैं?

दरअसल जनवरी-मार्च 2016 के दौरान रिलायंस कम्यूनिकेशन और जियो के बीच एक समझौता हुआ था. इसमें रिलायंस कम्यूनिकेशन ने जियो को 13 सर्किल्स के स्पेक्ट्रम्स बेच दिए थे. जबकि 15 सर्किल्स के स्पेक्ट्रम रिलायंस कम्यूनिकेशन और जियो शेयर कर रहे थे. इसलिए 14 अगस्त को SC ने पूछ लिया कि रिलायंस कम्यूनिकेशन, जियो और DoT बताए कि जब रिलायंस कम्यूनिकेशन के स्पेक्ट्रम का अब जियो इस्तेमाल कर रहा है तो क्यूं नहीं जियो ही उसके AGR का भुगतान करे?

स्मार्टफोन कैसा भी हो जब तो टेलीकॉम सर्विस देने वाली कंपनियां नहीं होंगी, सब बेकार. (तस्वीर: PTI)
स्मार्टफोन कैसा भी हो, जब तो टेलीकॉम सर्विस देने वाली कंपनियां नहीं होंगी, तो सब बेकार. (तस्वीर: PTI)

आगे बढ़ने से पहले एक सत्य कथा. मेरा लखनऊ में एक फ़ोटोग्राफ़र दोस्त है. उसे हिंदी के एक प्रतिष्ठित अख़बार के लिए तस्वीरें खींचनी होती हैं. लेकिन वो हर इवेंट में तो शामिल नहीं हो सकता न. इसलिए उसने लखनऊ में बाकी फ़ोटोग्राफ़र्स से दोस्ती बनाई हुई है. बाकी फ़ोटोग्राफ़र बेशक राइवल अख़बार और न्यूज़ एजेंसी के हैं लेकिन इनकी इस दोस्ती के चलते, हर अख़बार के फ़ोटोग्राफ़र को हर जगह जाने की ज़रूरत नहीं पड़ती. सभी फ़ोटोग्राफ़र सिर्फ़ एक या दो अलग-अलग इवेंट में जाते हैं. वहां की तस्वीरें कई एंगल्स से खींच लेते हैं और फिर एक तस्वीर अपने पास रखकर बाकी तस्वीरें, बाकी अख़बारों के फ़ोटोग्राफ़र्स के साथ शेयर कर देते हैं. यूं हर फ़ोटोग्राफ़र सिर्फ़ एक या दो इवेंट में जाता है, लेकिन फिर भी लखनऊ के सारे इवेंट्स की तस्वीरें इकट्ठा कर लेता है.

ऐसा ही स्पेक्ट्रम के केस में भी होता है. हो सकता है बिडिंग में वोडाफ़ोन को सिर्फ़ दिल्ली का, एयरटेल को सिर्फ़ मुंबई का और जियो को सिर्फ़ कोलकाता का 4G स्पेक्ट्रम मिले. इस स्थिति में तीनों कंपनियां राइवल होते हुए भी अपने-अपने स्पेक्ट्रम शेयर कर सकती हैं. और अगर कोई अपने स्पेक्ट्रम शेयर करने के पैसे लेना चाहे तो वो पैसे भी ले सकता है. क्यूंकि हो सकता है, दूसरी पार्टी एक जगह का स्पेक्ट्रम तो ले लेकिन रिटर्न में देने को उसके पास दूसरी जगह का स्पेक्ट्रम न हो.

आपने पास्ट में देखा होगा कि जब आप एयरटेल का सिम लेकर किसी दूसरे शहर जाते थे, तो उसमें वोडाफ़ोन या बीपीएल लिखा हुआ आता था. इसी स्पेक्ट्रम शेयरिंग के चलते.

फ़ाइनेंशिल एक्सप्रेस के अनुसार, स्पेक्ट्रम ट्रेडिंग गाइडलाइन में एक क्लॉज़ है. जिसके अनुसार-

स्पेक्ट्रम ट्रेडिंग के किसी भी समझौते से पहले, स्पेक्ट्रम विक्रेता को अपना सभी बकाया चुकाना होगा. स्पेक्ट्रम ट्रेडिंग के बाद अगर ट्रेडिंग दिन तक के किसी बकाए का पता चलता है तो उसकी देयता खरीदार के ऊपर होगी. इसके बाद सरकार अपने विवेक से वो पैसा खरीदार से या विक्रेता से या दोनों से वसूल करने का हक रखती है.

लेकिन स्पेक्ट्रम शेयरिंग तक तो ठीक. लेकिन क्या जब कोई कंपनी दिवालिया हो रही हो, तब उस दौरान उसके ख़रीदे गए स्पेक्ट्रम को किसी दूसरी कंपनी को बेचकर भी पैसे जुटाए जा सकते हैं?

दरअसल बात ये है कि दिवालिया की प्रक्रिया में दिवालिया हो रही कंपनी के एसेट बेचकर पैसे जुटाए जाते हैं. तो सवाल ये बना कि क्या स्पेक्ट्रम को कंपनी का एसेट माना जा सकता है?

एयरटेल एक वक्त में भारत की सबसे बड़ी कंपनी थी. लेकिन जियो के आने के बाद उनके मुनाफ़े में सेंध लग गई.
एयरटेल एक वक्त में भारत की सबसे बड़ी कंपनी थी. लेकिन जियो के आने के बाद उनके मुनाफ़े में सेंध लग गई.

17 अगस्त, 2020 की सुनवाई से पता लगा कि ऐसा नहीं किया जा सकता है. स्पेक्ट्रम पर देश का हक़ है, और सरकार पर उसकी देखभाल का ज़िम्मा है. मतलब यूं कहें कि इंसोल्वेंसी के दौरान स्पेक्ट्रम की ख़रीद फ़रोख़्त दिवालिया हो रही कंपनी के ‘एसेट’ की तरह नहीं की जा सकती.

लेकिन इस एक मुद्दे पर DoT और मिनिस्ट्री ऑफ़ कॉरपोरेट अफ़ेयर्स आमने सामने आ सकते हैं. इंट्रेस्टिंग ये कि दोनों सरकारी हैं, बल्कि सरकार का ही हिस्सा हैं. मिनिस्ट्री ऑफ़ कॉरपोरेट अफ़ेयर्स चाहती है कि स्पेक्ट्रम पर ख़रीददार कंपनी का हक़ हो, जिससे कि इंसोल्वेंसी के दौरान उसे बेचकर भी पैसे जुटाए जा सकें. SBI जैसा सरकारी बैंक भी यही चाहता है कि ख़रीदे गए स्पेक्ट्रम पर कंपनी का हक़ हो. SBI ऐसा इसलिए चाहता है, क्यूंकि उसने भी रिलायंस कम्यूनिकेशन जैसी दिवालिया हो रही कंपनियों को क़र्ज़ दिया है. और इंसोल्वेंसी के दौरान जितनी ज़्यादा आय होगी, उतने ज़्यादा पैसे SBI जैसे क़र्ज़दाताओं को मिलेंगे.

# ये स्पेक्ट्रम शेयरिंग वाली बात आई ही क्यूं?

पूरा मुद्दा वसूली को लेकर है. वो भी जनता के पैसे की वसूली का. जिसको लेकर SC बहुत ही सजग दिख रहा है. कोई भी सिरा खुला नहीं छोड़ रहा. शुक्रवार 14 अगस्त, 2020 की सुनवाई में SC ने कहा कि अगली सुनवाई 17 अगस्त को होगी. तब तक उसे स्पेक्ट्रम शेयरिंग को लेकर सारी डिटेल्स चाहिए. दिवालिया हो चुकीं, या होने जा रही कंपनियों के स्पेक्ट्रम कौन-कौन सी कंपनियां इस्तेमाल कर रही हैं? सरकार से कहा कि वो 17 तारीख़ को बताए कि क्या एक कंपनी का स्पेक्ट्रम दूसरी कंपनी को बेचा जा सकता है? और ये भी बताए कि जो कंपनियां दिवालिया हो गई हैं, या होने की प्रक्रिया में हैं, उनसे AGR वसूलने का सरकार के पास क्या प्लान है?

इन्हीं सवालों के दौरान अभी (काफ़ी लंबे समय से) दिवालिया होने की प्रक्रिया से गुज़र रही आरकॉम के स्पेक्ट्रम्स की बात भी आई. और तब दोनों अंबानी भाइयों की कंपनियों से कहा गया कि स्पेक्ट्रम शेयरिंग एग्रीमेंट SC के साथ शेयर करें.

इस पर जियो ने कोर्ट से 14 अगस्त को कहा कि-

# जहां तक ख़रीदे गए स्पेक्ट्रम की बात है जियो ने रिलायंस कम्यूनिकेशन (RCom) के उन स्पेक्ट्रम्स के सारे AGR चुका दिए हैं, जो 2016 के बाद के थे.

# शेयर्ड स्पेक्ट्रम्स के केस में उसकी लायबिल्टी केवल AGR के उस भाग को लेकर बनती है, जितना भाग शेयर किया जा रहा है. उस AGR का समय-समय पर जियो भुगतान कर रहा है. जो शुरू में हम RCom के साथ स्पेक्ट्रम्स शेयर कर रहे थे, वो RIL के बंद हो जाने के बाद एक्सक्लुसिवली हम यूज़ करने लग गए. (गोया किसी वॉट्सएप ग्रुप में से लोग एग्ज़िट करते जाएं और अंत में जो बचे, वो एडमिन हो जाए) DoT को चाहिए था कि जिस दिन रिलायंस कम्यूनिकेशन बंद हुई, उसी दिन उन स्पेक्ट्रम्स को वापस ले लेती.

जब रिलायंस कम्यूनिकेशन देश के चप्पे-चप्पे में छाया हुआ था.
जब रिलायंस कम्यूनिकेशन देश के चप्पे-चप्पे में छाया हुआ था.

17 अगस्त को जियो के वकील हरीश साल्वे ने कहा कि, ‘जियो, RCom की दिवालिया होने की प्रक्रिया में भाग नहीं लेगा और न ही रिलायंस कम्यूनिकेशन को ख़रीदेगा.’

आसान शब्दों में कहें तो हरीश साल्वे का कहना था कि RCom की देनदारी से जियो का कोई लेना-देना नहीं, हमें मुआफ़ रखो. वैसे भी जो देनदारी 24 अक्टूबर, 2019 वाले फ़ैसले में जियो की निकली थी, वो जियो पूरी दे चुका है. 194 करोड़ रुपए. जियो को फ़ायदा ये हुआ कि वो नई कंपनी है.

इसी सबके बीच 17 अगस्त को ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिवालिया की प्रक्रिया के दौरान स्पेक्ट्रम की ख़रीद-फ़रोख़्त नहीं हो सकती और उसे एसेट या दिवालिया हो रही कंपनी का एसेट नहीं माना जा सकता. सरकार या DoT ने कहा है कि SC जो भी निर्णय लेगी, उसे पूरी तरह मंज़ूर होगा.

तो सवाल ये है कि SC क्या निर्णय लेगी? आगे क्या होगा? अगली सुनवाई है, 19 अगस्त, 2020 को. नज़र रखिएगा. हम भी रखेंगे. सभी नहीं तो शायद कुछ सवालों के उत्तर मिल जाएं.

अपडेट (19 अगस्त, 2020)-

19 तारीख़ को हरीश साल्वे ने कहा कि (अगर स्पेक्ट्रम का पैसा या DoT का पैसा जनता का पैसा है तो) बैंकों का पैसा भी जनता का पैसा है. मतलब उनका तर्क ये था कि आरकॉम इंसोल्वेनसी को AGR से भागने का कारण नहीं बना रहा और लाइसेंस अग्रीमेंट साफ़-साफ़ कहता है कि स्पेक्ट्रम बैंक्स के लिए ‘सिक्योरिटी फ़िट’ है. मतलब उसे इंसोल्वेनसी के वक्त बेचकर बैंक्स का क़र्ज़ चुकाया जा सकता है. उन्होंने ये भी कहा कि आरकॉम द्वारा बैंक्स का 42,000 करोड़ रुपया देय है. और अगर स्पेक्ट्रम सेल की इजाज़त नहीं दी जाती तो इससे किसी का भी भला नहीं होने वाला. बेशक ऐसा DoT की इजाज़त के बिना नहीं किया जाएगा. और टेलीकॉम कंपनियों और सरकार के बीच वही रिश्ता है जो लीज़ में कुछ लेने वाले और देने वाले के बीच होता है. स्पेक्ट्रम एक एसेट है, जिसे ऑक्शन के दौरान ख़रीदा गया था.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि स्पेक्ट्रम ट्रेडिंग के दौरान तो बेचे जा सकते हैं, लेकिन इन्हें इंसोल्वेनसी के दौरान कैसे बेचा जा सकता है. ट्रेडिंग के दौरान बोले तो, जब स्पेक्ट्रम बेचे जा रहे हैं तब इसे बेचने वाली कंपनी ऑपरेटिंग अवस्था में है. इंसोल्वेनसी के दौरान तो हर चीज़ IBC की गाइडलाइंस के अनुसार होनी चाहिए. और IBC की गाइडलाइंस कहती हैं कि पहले बकाया चुकाया जाएगा तब चीज़ या एसेट बिकेगा. (अगर एक बार को इसे एसेट मान भी लिया जाए तो).

फ़ाइनल कमेंट: ये इश्यू ऑन गोइंग है. हमने कुछ दिनों पहले ही ये स्टोरी कर ली थी. लेकिन सोचा कि 19 अगस्त की सुनवाई को भी इसमें शामिल कर लेंगे. इश्यू ये हो रहा है कि इसकी सुनवाई रोज़ चल रही है. और हो सकता है जब आप ये स्टोरी पढ़ रहे हों, तब भी कोर्ट की सुनवाई ज़ारी हो. तो इस पूरी स्टोरी को आप AGR के लिए, आसान भाषा में और हियरिंग का पहला पार्ट भी मान सकते हैं.

जब भी कोई बड़ा निर्णय आएगा, या सुनवाई समाप्त होगी हम प्रयास करेंगे कि इसका क्लोज़र भी आपसे शेयर करें. और वहीं से शुरू करें जहां पर इसे समाप्त किया था.


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