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मिनटों का कैसे हुआ कई घंटे लेने वाला कोरोना टेस्ट, आधार कार्ड की फोटोकॉपी वाले उदाहरण से समझिए

आजकल हमें दो टाइप के कोरोना वायरस टेस्ट का नाम खूब सुनाई दे रहा है. पहला है RT-PCR. पुराना और भरोसेमंद टेस्ट. इसके बारे में हम शुरू से ही सुन रहे हैं. क्योंकि पहले यही इकलौता टिकाऊ टेस्ट था. लेकिन अप्रैल शुरू होते ही भारत में लोगों ने एक नए और तेज़ टेस्ट का नाम सुना. Rapid Antibody Test. RT-PCR टेस्ट से जो नतीजे आने में घंटों लग जाते हैं, Rapid Antibody Test में वो बात मिनटों में पता चल जाती है. और इसके बारे में सबसे कमाल की बात ये है इस टेस्ट से हमारे पास एक साथ कई घरों में लाखों टेस्ट करने की क्षमता आ गई है.

भारत में कोरोना वायरस टेस्ट का ज़िम्मा ICMR के ऊपर है. Indian Council of Medical Research. ICMR ने 8 अप्रैल से लाखों Antibody Test करने की योजना पर काम शुरू कर दिया. आप ऐसा समझिए कि अगर RT-PCR टेस्ट पुराने ज़माने की टेलीफोन बूथ है, तो Rapid Antibody Test हमारे आपके हाथ में पहुंचने वाला मोबाइल फोन है. लेकिन मामला इतना सिंपल भी नहीं है. इस मोबाइल फोन का नेटवर्क ज़रा गड़बड़ है. ऐसा क्यों कहा जा रहा है? ये जानने के लिए हम इन दोनों टेस्ट के पीछे की साइंस समझेंगे, बिलकुल आसान भाषा में.

बारी-बारी दोनों को समझेंगे. शुरुआत करते हैं इनमें से वरिष्ठ यानी RT-PCR टेस्ट से.

RT-PCR टेस्ट

पूरा नाम – Reverse Transcription – Polymerase chain reaction Test. इसके नाम में इतनी बायोलॉजी देखकर ही आपने भागने का प्लान बना लिया होगा. लेकिन हम तो आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस और फोटोकॉपी की बात करने वाले हैं. बायोलॉजी बस उतनी ही होगी जितनी ज़रूरत है.

आधार कार्ड और ड्राइविंग लाइसेंस. ड्राइविंग लाइसेंस भारत का नहीं है. (विकिमीडिया)
आधार कार्ड और ड्राइविंग लाइसेंस. ड्राइविंग लाइसेंस भारत का नहीं है. (विकिमीडिया)

वायरस की बनावट में दो चीज़ें बहुत अहम होती हैं. पहली चीज़ है – बाहर की गोल प्रोटीन लेयर. और दूसरी चीज़ है – इस प्रोटीन लेयर के अंदर सुरक्षित रखा वायरस का जेनेटिक मटेरियल. जेनेटिक मटेरियल को आप यूं समझिए कि वायरस का पहचान पत्र है.

वायरस दरअसल एक गेंद है, जिसके अंदर एक पहचान पत्र रखा होता है. लैब में वायरस की पहचान करने के लिए यही पहचान पत्र यानी जेनेटिक मटेरियल देखा जाता है.

बायोलॉजी की दुनिया में मेनली दो टाइप के पहचान पत्र चलते हैं – DNA और RNA. सबसे ज़्यादा आपने DNA का नाम सुना होगा. DNA बायोलॉजी की दुनिया का आधार कार्ड है. बहुतों के पास होता है, और सारी व्यवस्था इसी को ध्यान में रखकर बनाई गई है. लेकिन अपना ये वाला कोरोना वायरस अलग स्वैग में चलता है. ये आधार कार्ड नहीं रखता. ये ड्राइविंग लाइसेंस लेकर घूमता है. ड्राइविंग लाइसेंस मतलब RNA. इसलिए इसके टेस्ट में ज़्यादा मेहनत करनी पड़ जाती है और टेस्ट के नाम में शुरू के दो शब्द एक्स्ट्रा जोड़ने पड़ते हैं.

कोरोना वायरस का स्ट्रक्चर. देखिए प्रेटीन लेयर और RNA यानी जेनेटिक मटेरियल को ध्यान से देखिए. (विकिमीडिया)
कोरोना वायरस का स्ट्रक्चर. देखिए प्रेटीन लेयर और RNA यानी जेनेटिक मटेरियल को ध्यान से देखिए. (विकिमीडिया)

वायरसों को पहचानने वाले बेसिक टेस्ट का नाम है – PCR. Polymerase chain reaction Test. PCR में क्या होता है?

यूं समझिए कि PCR में वायरस के पहचान पत्र की फोटोकॉपी होती है.

पूरी प्रोसेस को फोटोकॉपी वाले उदाहरण से ही समझते हैं. सबसे पहले एक फोटोकॉपी मशीन (PCR Machine) में सेटिंग भरी जाती है. सेटिंग के लिए चाहिए होता है – जीनोम सीक्वेंस. जैसे आधार कार्ड की एक डिजिटल फाइल को कम्प्यूटर में सेव किया जा सकता है. वैसे ही जेनेटिक मटेरियल की डिजिटल जानकारी को भी कंप्यूटर में सेव करी जा सकती है. इसी डिजिटल जानकारी को जीनमो सीक्वेंस कहते हैं.

जीनमो सीक्वेंस जेनेटिक मटेरियल का डिजिटल वर्ज़न होता है.

चीन में शुरुआती स्टडीज़ के बाद जनवरी में ही कोरोना वायरस का जीनोम सीक्वेंस सार्वजनिक कर दिया गया था. बाद में दूसरे देशों की कई यूनिवर्सिटीज़ और लैब्स ने भी इसे सबके सामने रखा. तो मशीन की सेटिंग ये होती है कि पहचान पत्र की फोटोकॉपी तभी शुरू होगी जब मशीन में सेट किया गया जीनोम सीक्वेंस सेंपल के जेनेटिक मटेरियल से मैच करेगा. 

तो होता यूं है कि आपके मुंह या नाक से सैंपल लेकर लैब भेजा जाता है. लैब में ये फोटोकॉपी मशीन जीनोम सीक्वेंस की सेटिंग के साथ रखी होती है. मान लीजिए किसी को वायरस इन्फेक्शन हो गया है. तो उसके सैंपल में भी वायरस मौजूद होगा. और वायरस के साथ उसका पहचान पत्र भी होगा. ये मशीन उस पहचान पत्र की फोटोकॉपी तभी शुरू करेगी, जब सैंपल में वो वायरस मौजूद होगा. लैब में यही देखा जाता है कि फोटोकॉपी हो रही है या नहीं. कई घंटों के लिए फोटोकॉपी मशीन को चालू छोड़ दिया जाता है. फिर बाद में चेक किया जाता है. अगर पहचान पत्र की बहुत सारी कॉपीज़ बन चुकी हैं इसका मतलब सैंपल में वायरस मौजूद है. फिर जिस व्यक्ति का ये सैंपल होता है, उसे कोरोना वायरस पॉज़िटिव घोषित कर दिया जाता है.

RNA में एक पट्टी होती है, DNA में दो पट्टियां लिपटी होती हैं. (विकिमाीडिया)
RNA में एक पट्टी होती है, DNA में दो पट्टियां लिपटी होती हैं. (विकिमाीडिया)

लेकिन ये तो सिर्फ PCR की बात हुई. ये RT-PCR क्या है?

क्या है कि हमारी फोटोकॉपी मशीन थोड़ी कम एडवांस्ड है. ये सिर्फ आधार कार्ड यानी DNA को ही कॉपी कर सकती है. इसमें ड्राइविंग लाइसेंस यानी RNA वाला मटेरियल डालने से कुछ नहीं होगा. और कोरोना वायरस तो RNA वाला वायरस है. फिर क्या किया जाए? यहां काम आती है Reverse Transcription – RNA को DNA में बदलने की प्रोसेस. अपने उदाहरण से समझें तो ड्राइविंग लाइसेंस को आधार कार्ड में बदलने की प्रोसेस.

आमतौर पर लोग आधार कार्ड लेकर ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने जाते हैं. बायोलॉजी की दुनिया में भी ऐसा ही होता है. आमतौर पर DNA को RNA बदला जाता है. और DNA को RNA में बदलने वाली प्रोसेस को Transcription कहते हैं. लेकिन यहां हमें उल्टा करना है. हमें तो कोरोना वायरस के RNA को DNA में बदलना है, ताकि DNA की फोटोकॉपी की जा सके. इसलिए इस प्रोसेस का नाम है Reverse Transcription. उल्टा ट्रांस्क्रिप्शन.

यही है वो PCR टेस्ट मशीन जिसे हम फोटोकॉपी मशीन के उदाहरण से समझा रहे हैं. (विकिमीडिया)
यही है वो PCR टेस्ट मशीन जिसे हम फोटोकॉपी मशीन के उदाहरण से समझा रहे हैं. (विकिमीडिया)

तो अब जहां भी आपको Reverse Transcription – Polymerase chain reaction लिखा दिखे, उसे यूं ही समझिएगा.

पहले कोरोना वायरस के ड्राइविंग लाइसेंस (RNA) को आधार कार्ड (DNA) में बदला जाएगा. और फिर आधार कार्ड की फोटोकॉपी करने की कोशिश होगी. अगर फोटोकॉपी सफल हुई इसका मतलब सेंपल में कोरोना वायरस मौजूद है.

इस फोटोकॉपी वाली चीज़ के सरलीकरण में एक चीज़ रह गई. वो ये कि इस प्रोसेस में पूरे के पूरे जेनेटिक मटेरियल की फोटोकॉपी नहीं की जाती. सिर्फ उसके एक यूनीक हिस्से को कॉपी किया जाता है. वायरस का जेनेटिक कोड हमारे पहचान पत्र जितना छोटा नहीं होता, वो बहुत बड़ा होता है. इसलिए फोटोकॉपी उसके किसी एक पर्टिकुलर हिस्से की होती है. वो हिस्सा जो उस वायरस के अलावा किसी और में मौजूद नहीं होगा. वायरस के जेनेटिक मटेरियल में ऐसे कई यूनीक हिस्से होते हैं. इसलिए हर देश की स्वास्थ संस्था अपनी समझ के हिसाब से एक हिस्से का चुनाव करती है. हो सकता है किसी देश में आधार कार्ड से जन्म तिथी फोटोकॉपी की जा रही हो, और किसी और देश में आधार कार्ड से पता फोटोकॉपी किया जा रहा हो. ICMR ने इंडिया की सारी लैब्स के लिए एक स्टैंडर्ड फिक्स कर रखा है कि किस हिस्से की फोटोकॉपी करके RT-PCR टेस्ट पर्फॉर्म करना है. ये है RT-PCR का सारा खेल. अब बात करते हैं स्टार ऑफ दी मोमेंट यानी Rapid Antibody Test की.

मुंह और नाक से कोरोना वायरस टेस्ट के लिए सेंपल इस तरह लिए जाते हैं. (विकिमीडिया)
मुंह और नाक से कोरोना वायरस टेस्ट के लिए सेंपल इस तरह लिए जाते हैं. (विकिमीडिया)

रैपिड एंटिबॉडी टेस्ट 

इसके नाम की तरह इसकी प्रोसेस और इसमें लगने वाला टाइम भी बहुत कम है. तीन चार लाइन की प्रोसेस है. और मिनटों का काम.

सबसे पहले तो ये समझ लीजिए कि इस टेस्ट के लिए दूसरे तरह का सैंपल लिया जाता है. RT-PCR में आपकी नाक से बलगम या मुंह से थूक लिया जाता है. लेकिन Rapid Antibody Test में आपका खून यानी ब्लड सैंपल लिया जाएगा. ऐसा इसलिए कि Antibody की मात्रा आपके खून में ज़्यादा होती है. लेकिन ये Antibody क्या होती है? इसी शब्द में तो टेस्ट का पूरा राज़ छिपा है.

हमारा खून जिसमें एंटीबॉडीज़ बनती हैं. (रॉयटर्स)
हमारा खून जिसमें एंटीबॉडीज़ बनती हैं. (रॉयटर्स)

देखिए, जब वायरस हमारे शरीर के अंदर हमला करता है, तो हमारा शरीर चुपचाप बैठकर तमाशा नहीं देखता. वो लड़ता है. और इस लड़ाई के लिए सैनिक तैयार करता है. इन्हीं सैनिकों को बायोलॉजी में Antibodies कहते हैं. हर वायरस से लड़ने के लिए हमारा शरीर एकदम अलग Antibodies तैयार करता है. किसी वायरस से लड़ने के लिए तलवार लिए घुड़सवार, किसी से लड़ने के लिए AK47 थामे जांबाज़.

कुलमिलाकर, कोरोना वायरस के घुसने पर शरीर में एक खास किस्म की Antibodies तैयार होती हैं. अगर ये कोरोना वायरस कभी आपके शरीर में घुसा है तो शरीर के अंदर वो Antibodies मौजूद होंगी. Rapid Antibody Test हमारे खून में उसी खास तरह की Antibodies तलाशता है. अगर वो Antibodies मौजूद होती हैं तो रिज़ल्ट पॉज़िटिव आता है. नहीं तो नेगेटिव. इसके लिए किसी लैब की या घंटों की ज़रूरत नहीं होती. न ही इसे करने के लिए कोई स्पेशलिस्ट चाहिए होते हैं. इसे आप घर बैठे एक छोटे से डिवाइस के ज़रिए मिनटों में कर सकते हैं.

अमेरिका की सबसे टॉप स्वास्थ संस्था CDC यानी Centers for Disease Control and Prevention द्वारा बनाई गई टेस्ट किट. (विकिमीडिया)
अमेरिका की सबसे टॉप स्वास्थ संस्था CDC यानी Centers for Disease Control and Prevention द्वारा बनाई गई टेस्ट किट. (विकिमीडिया)

इसलिए हम RT-PCR को टेलीफोन बूथ और Rapid Antibody Test को मोबाइल फोन कह रहे हैं. लेकिन पहले ही बता चुके हैं कि इस मोबाइल फोन का नेटवर्क थोड़ा गड़बड़ है. क्या दिक्कत है इसमें?

दया, कुछ तो गड़बड़ है!

दरअसल बात ये है कि शरीर में वायरस घुसने के बाद एक अच्छी खासी मात्रा में Antibodies बनने में कुछ दिन का वक्त लगता है. और एक बार एंटीबॉडीज़ बन जाती हैं तो वायरस खत्म होने के बाद भी वो हल्की मात्रा में शरीर में रह जाती हैं. तो इससे टेस्ट में दो गड़बड़ियां हो सकती हैं. हो सकता है कि किसी को वायरस इन्फेक्शन हो और उसमें Antibodies न बनीं हों, उस केस में ये निगेटिव रिज़ल्ट दे देगा. दूसरी चीज़ ये हो सकती है कि किसी के अंदर वायरस आकर चला गया हो, लेकिन उसके शरीर में Antibodies रह गई हों, तो उस केस में ये पॉज़िटिव रिज़ल्ट दे देगा. इसलिए इसे फाइनल और अल्टिमेट टेस्ट मानने की भूल मत कीजिएगा. ICMR Rapid Antibody Test का इस्तेमाल सिर्फ मास स्क्रीनिंग के लिए कर रहा है. मतलब एक बहुत बड़े समूह में वायरस से इन्फेक्टेड लोगों को चिन्हित करने के लिए. फाइनल रिज़ल्ट की घोषणा फिलहाल RT-PCR टेस्ट के बाद ही की जा रही है.

कुलमिलाकर बात ये है कि RT-PCR ज़्यादा महंगा, संसाधन लेने वाला, धीमा मगर एक पुख्ता टेस्ट प्रोसीजर है. जबकि Rapid Antibody Test सटीक न होने के बावजूद तेज़, सस्ता और जन-जन तक पहुंचने वाला टेस्ट है. ICMR भारत में मरीज़ों को पहचानने के लिए इन दोनों का इस्तेमाल कर रहा है. करना ही पड़ेगा.


विडियो – कोरोना वायरस से लड़ने के लिए इम्यूनिटी कैसे बढ़ाएं, आयुष मंत्रालय बता रहा है

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