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हिमाचल प्रदेश में शाम को बाज़ार जाने का जिम्मा महिलाओं के पास क्यों है?

सस्ती शराब. दो-सवा दो सौ में जिसका अद्धा आ जाए. उसकी महक नथुनों में घुस रही थी. आधी से ज़्यादा जनता ने वही पी रखी थी. मेरे हाथ में सेल्फी स्टिक जिसपर फ़ोन था और एक एलईडी लाइट लगी हुई थी. फेसबुक लाइव चल रहा था. लाइव के पहले हमारी गाड़ी जहां लगी थी, उसके ठीक सामने दो शराब के ठेके थे. लाइन से. दारू के दाम आदतन पूछ ही लिए थे. (सिर्फ पूछे थे बे बांगडू.) नोएडा से सस्ती मिलती है.

हिमाचल प्रदेश में लोगों की लाइफस्टाइल बाहर से काफी अलग है.
हिमाचल प्रदेश में लोगों की लाइफस्टाइल बाहर से काफी अलग है.

अगले कुछ दिनों में इधर-उधर घूमना होता रहा. फेसबुक लाइव चलते रहे. एक चीज और भी थी जो कॉमन रही. दारू. शाम 5 बजे के बाद यहां लोग शराब पीने लगते हैं. सस्ती वाली. बहुत ही कम ऐसी दुकानें दिखीं जहां ‘अच्छी’ शराब के ब्रांड भी मिलते हों. नादौन में यशपाल स्मृति भवन जाना हुआ. वहां की हालत वैसी क्यूं थी इसका सारा मामला वहां के केयर-टेकर की हालत देख के समझ में आ रहा था. दोपहर 12-सवा 12 का वक़्त था. केयर-टेकर महोदय धरातल से दो अंगुल ऊपर चल रहे थे. कैमरा सामने किया तो नीचे देखकर बात करने लगे. सांस में मिली दारू की गंध को दबाने की भरपूर कोशिश की जा रही थी. कला दीर्घा, जो कि इक्का-दुक्का लोगों का शयनकक्ष बन चुका था, में मूंग दाल नमकीन के कुछ खाली पैकेट दिखे. समझ में ये आया कि अच्छी शराब भले ही न पी जा रही हो, चखना ठीक-ठाक खाया जा रहा है.

हिमाचल प्रदेश में शाम को ज्यादातर लोगों की बोतल खुल जाती है.
हिमाचल प्रदेश में शाम को ज्यादातर लोगों की बोतल खुल जाती है.

लेकिन मेरे लिए सवाल अब भी वही था. यहां का आदमी शराब की ओर ही क्यूं भागता है? फिर समझ में आया कि उसके पास और कोई ऑप्शन ही नहीं है. पिछले 9 दिनों में हम जितनी भी जगहों पर गए हैं, उनमें मात्र 2 जगहें ऐसी हैं जहां कोई पिक्चर हॉल मौजूद था. इनमें से एक धर्मशाला में तो अभी साल भीतर ही मॉल चलना शुरू हुआ है. पहले वहां बस एक महंगी कॉफ़ी वाली दुकान हुआ करती थी, जहां कभी दिल्ली के लिए वॉल्वो पकड़ने की खातिर बारिश से बचने के लिए हमने पनाह ली थी. अभी तक की जगहों में धर्मशाला, मेक्लॉयडगंज, हमीरपुर को छोड़ दें तो कहीं भी खाने-पीने की जगहें नहीं हैं. कहीं भी कोई घूमने की जगह नहीं है. (वैसे तो पूरा हिमाचल ही घूमा जा सकता है, लेकिन जो वहीं पैदा हुआ है उसके लिए तो पहाड़ और झरने रोज़ का काम हैं.) खाने-पीने के नाम पर चाय के खोखे हैं, ढाबे हैं, मछली फ्राय करने वाली ठेले-नुमा दुकानें हैं.

हिमाचल के लोकल लोगों के लिए एंटरटेनमेंट के माध्यम, खासकर बच्चों के लिए काफी कम हैं.
हिमाचल के लोकल लोगों के लिए एंटरटेनमेंट के माध्यम, खासकर बच्चों के लिए काफी कम हैं.

यहां इक्का-दुक्का मौकों को छोड़ दें तो कहीं भी ऐसा नहीं देखने को मिला कि कोई बाप अपने बेटे या बेटी के साथ बाज़ार आया हुआ हो. बाज़ार आने का ज़्यादातर जिम्मा यहां की महिलाओं के पास है. शायद इसलिए कि बाज़ार से लौटने तक अंधेरा हो जाता होगा और फिर कहना पंकज उदास का – “ऐ ग़म-ए-ज़िन्दगी, कुछ तो दे मशवरा, एक तरफ़ उसका घर, एक तरफ़ मयकदा…”. यहां सब्जी-मसाले के सिवा लोग पैसा कहां खर्च करते होंगे, मालूम नहीं. बच्चों के पास पिज़्ज़ा और बर्गर जॉइंट्स नहीं हैं. उनके लिए डीसी और मार्वल कोई मायने नहीं रखते. उन्हें अपने बाप से आयरन मैन देखने की ज़िद नहीं करनी होती. और इसलिए बाप के पास रोज़ के पौव्वे का जुगाड़ मौजूद रहता है. और हां, ठंडी-गरमी सब बहाना है. जब घर में छटांक भर का बच्चा बाहर ले जाए जाने की ज़िद कर रहा हो तो बाप ठण्ड से निपटने के लिए एक शाल और डाल, उसे पिज़्ज़ा चखा ही लाएगा.

यहां एक बात का ध्यान रखा जाए कि बच्चों को पिज़्ज़ा, बर्गर खिलाने और आयरन मैन दिखाने की वक़ालत नहीं की जा रही है बल्कि इन्हें सांकेतिक अर्थों में इस्तेमाल किया जा रहा है.

बच्चों की ज़्यादातर ख्वाहिशें आर्मी में भर्ती या होम गार्ड की नौकरी तक सीमित हैं और लड़कियां टीचर बनना चाहती हैं. टेक्निकल एजुकेशन के नाम पर आईटीआई है जहां बिजली, लकड़ी, लोहे वगैरह का काम सिखाया जाता है. आईटीआई से नौकरी मिलने की कोई गारंटी नहीं है. घर से निकल बीसियों किलोमीटर दौड़ लगाने के बावजूद भी आर्मी में नौकरी की गारंटी नहीं है. अच्छी बात ये है कि लड़कियां ये शिकायत नहीं करतीं कि लड़के उन्हें छेड़ते हैं. कहती हैं, “कभी अगर कुछ हुआ तो हम गालियों से काम चला लेते हैं, जूते-चप्पल की नौबत ही नहीं आती.” पहाड़ की क्रूरता ने “तुमसा कोई प्यारा, कोई मासूम नहीं है, क्या चीज़ हो तुम खुद तुम्हें मालूम नहीं है…” जैसी परिकल्पना करने वाले कवि को बड़ी ज़ोर से मुंह चिढ़ाया है.

हिमाचल की रैलियों में पुरुषों के मुकाबले महिलाएं भी भारी संख्या में पहुंच रही हैं.
हिमाचल की रैलियों में पुरुषों के मुकाबले महिलाएं भी भारी संख्या में पहुंच रही हैं.

फ़िलहाल डलहौज़ी से कीबोर्ड पीटा जा रहा है. अगली सुबह पालमपुर में जागने का इरादा है. धर्मशाला से डलहौज़ी का रास्ता उतना ही कठिन है जितना आईआईटी की तैयारी. उसमें भी अगर कोई (योर मेजेस्टी) पूरे रास्ते सोता रहे तो उसके टैलेंट पर शक करना चांद पर थूकने जैसा ही होगा.

हिमाचल में दो तरह के लोग मिल रहे हैं. तीसरा कोई नहीं. एक वो जो राजनीति से एकदम विरक्त हैं. और दूसरे वो जो ये भी जानते हैं कि फलाने नेता की चड्ढी का साइज़ क्या है. बाकी, अभी तक सब ठीक चल रहा है. ठंड बढ़ रही है. आज नहाऊंगा नहीं. सुना है कि आगे चंबा में बर्फ़ मिलेगी. उसका इंतज़ार है.


हिमाचल प्रदेश इलेक्शन कवरेज का लल्लनटॉप वीडियो देखें- 

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