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'जाट का मंदिर तो खेत ही होता है'

प्रसिद्ध हिंदी फिक्शन लेखक, कवि, गीतकार और स्क्रिप्ट राइटर डॉ. दुष्यंत का पहला काव्य संग्रह (2005) ही, राजस्थानी अकादमी द्वारा पुरुस्कृत हो गया था. मूलतः किसान परिवार से संबंध रखने वाले दुष्यंत साहित्यिक पत्रिका के ‘शब्दक्रम’ के संस्थापक और संपादक रह चुके हैं. उनकी कहानियों का पहला संग्रह जुलाई की एक रात,  जून 2013 में पेंगुइन ने प्रकाशित किया गया था.

डॉक्टर दुष्यंत कई नौकरियों को करने और छोड़ने के बाद 2007 में राजस्थान पत्रिका समूह के ‘डेली न्यूज़’ में शामिल हो गए थे और बाद में लगभग एक दशक तक रविवार के विशेषांक के प्रमुख रहे. गीतकार के रूप में उनका ‘एमटीवी साउंड ट्रिपिन’ के लिए लिखा एक गीत और रणदीप हुड्डा अभिनीत फ़िल्म ‘लाल रंग’ का ‘बावली बूच’ अतीत में काफी सराहा गया है.

बावली बूच

‘ट्रिपल तलाक’ अभियान के लिए लिखा उनका गीत पूरे सोशल मीडिया में धूम मचा चुका है.

तलाक़-तलाक़-तलाक़

प्रस्तुत अंश उनकी नवीनतम पुस्तक ‘वाया गुड़गांव’ से लिया गया है जिसका फर्स्ट एडिशन हाल ही में यानी नवंबर के अंतिम सप्ताह में आया है. ‘जगरनॉट प्रकाशन’ द्वारा प्रकाशित यह उपन्यास जाट और जाटों की अस्मिता, जाटपन की ख़ूबसूरती, उसकी विशेषताओं के इर्द गिर्द बड़ी रोचकता के साथ बुना गया है. इसमें हरियाणा और उससे सटे हुए राजस्थान की आंचलिक भाषा की सुवास है. उपन्यास की दो सबसे बड़ी विशेषताओं में से प्रथम है आधुनिकता और पुरातन का संगम और दूसरी ये कि, सम्पूर्ण उपन्यास बिना घटना प्रधान हुए भी रोचक बना रहता है. उपन्यास का एक नमूना आप नीचे प्रस्तुत अंश के माध्यम से देख सकते हैं:


***जाट का मंदिर तो खेत ही होता है***

महेंद्र के पिता राजेंद्र को लगता है कि गांव की सरपंची में रामेसर को डमी सरपंच बनाकर सत्ता पर कब्जार बनाए रखना लंबे समय तक नहीं चल पाएगा. उसका बेटा भीम जवान हो गया है, बेटा उनके परिवार की वो इज्जबत करे तो करे, ना करे तो ना करे, नई पीढ़ी का क्या भरोसा है भाई. वे महेंद्र की शादी एक राजनीतिक परिवार में करवाकर अपने राजनीतिक करियर को बेहतर कर देना चाहते हैं. विधानसभा के चुनाव भी नजदीक हैं. पंजाब और हरियाणा के कई बड़े प्रभावशाली राजनीतिक जाट परिवार उनके राडार में है. उनकी निगाह पंचकोसी वालों पर है.

हां, वही पंचकोसी, पूर्व लोकसभा अध्यक्ष चौधरी बलराम जाखड़ वाला गांव. राजेंद्र जी को लगता है, वहां अगर महेंद्र के रिश्ते का विधान बैठ जाए तो स्वाद ही आ जाए राजनीति करने का. चौटाला यानी भारत के पूर्व उप प्रधानमंत्री चौ. देवीलाल का गांव, के गांव वालों से तो उनका कोई पंगा हो गया था. अपने गांव से कभी कबड्डी की टीम लेके गए थे, कोई ऊंच नीच हो गई. दूसरा, मुखिया परिवार के सिहाग गोत्रीय होने की वजह से वैसे ही भाईपे में हो गया, वरना इस वक्त जरूर वे चौटाला को भी महेंद्र की संभावित ससुराल के रूप में मान या गिन रहे होते. हालांकि एक दो बिचोलों ने चौटाला की अच्छी लड़कियां बताईं तो उनका जवाब था कि छोरियां, बहन, बेटियां तो लो, सबकी सांझी होती है, उनको अच्छा घर और वर मिले.

पर यार, चौटाला वालों से जी सा नहीं मिलता मेरा. राजेंद्र का घाव कुछ ज्यादा ही गहरा है, अब जाट की अणख का मामला तो ऐसा ही होता है, ना जंचे तो पक्के मोगे की काली मिट्टी की जमीन छोड़ दें, जंच जाए तो बिरानी रेत को चंदन बना के माथे से लगा लें और फिर उसमें से चंदन पैदा कर के दिखा दें. वैसे यह उनकी सतत और वाजिब चिंता, दुख और गुस्साड है कि इस इलाके के दो बहुत काबिल जाट नेताओं चौधरी देवीलाल और चौधरी बलराम जाखड़ को देश प्रधानमंत्री नहीं बनाया गया, नहीं बनने दिया गया.

महेंद्र के ननिहाल वाले पंजाब में फाजिल्काे के पास किन्नू के बाग वाले किसान रहे हैं, उस वक्त फाजिल्का ऊन की मंडी के रूप में जानी जाती थी, जब एक दिन महेंद्र ने सुमन को बताया कि ऊन की मंडी में नाचने गाने वालियों के कोठे थे और पुराने लोग कहते हैं कि बड़े गुलाम अली खां साहब भी कभी वहां गाया करते थे – सुमन ने छेड़ा था, फिर तो आपके नाना भी जाया ही करते होंगे, दोनों हाथों की कलाइयों में मोगरे के फूल की वेणी लपेट के, थोड़ी थोड़ी देर में अपने दाएं हाथ की कलाई सूंघकर वाहवाही करते होंगे, कोठे की मालकिन से कहते होंगे कि देख अनारा या सुल्ताना बेगम या जो भी नाम रहा होगा, आज चौधरी आया है, नाच गाकर के खुश कर दो, तो चौधरी दो चार किल्ले जमीन भी तोहफे में देकर जा सकता है. महेंद्र ने पलटकर कहा, रजवाड़ों में तो होता है ऐसा, फिर सुमन बोली कि बस बस रहने दो, देखे हुए हैं रजवाड़े. बात हंसी के ठहाकों में घुलमिल के फिजां में फैल गई थी.

अब जाट की अणख का मामला तो ऐसे ही होता है, (सांकेतिक चित्र)
सांकेतिक चित्र

वैसे महेंद्र के नाना की गिनती अविभाजित पंजाब की हरित क्रांति के पायनियर किसानों में होती है. पता नहीं, ये कितना सच है मगर, इलाके में मौजिज लोग चर्चा करते हैं कि महेंद्र के पड़नाना से तो अंग्रेज अफसर भी इंग्लैंड में अपनी खेती को लेकर सलाह लेते थे. उनके नाम से एक कोट यानी अनमोल वचन इलाके में मशहूर है कि- जाट का मंदिर तो खेत ही होता है. 

दादी भी बताती है कि एक बार दादा कई दिन बाद घर लौटे, लोगों से सुना कि अंग्रेज उनको अपने साथ इंग्लैंड लेकर गए थे, तो जब उस अज्ञातवास से वापिस आए तो दादी कई दिन मुंह फुलाए रही थी, ‘क्या पता कोई अंग्रेजणी साथ ले आते, किसी का जी आ जाता आप पर तो मेरा क्या होता!’ हालांकि इसमें असुरक्षा से ज़्यादा छेड़छाड़ का भाव था. दादी कहती थी– ‘मैं उन्हें छेड़ती रहती थी, कहीं बीज तो नहीं डाल आए? किसान को तो भीगी जमीन मिली, और हल चला के बीज बो दिया. उस बीजाई के चक्कइर में, कहीं बाद में किसी दिन पता चले कि हमारी पुश्तैनी जमीन का एक हिस्साे किसी अंग्रेजणी की औलाद को जा रहा है. दादी कहती कि लोग तो अफवाह फैलाते थे या मुझे छेड़ते कि दादी, दादा कुछ तो करके आया है. थमज्याद कुछ साल बाद बेरा पड़ेगा. मैं जवाब देती,’ भई, अबके तेरे दादा के बीज कंडम रह गए लागै. अर, जाट के बीज जिस धरती में निपजै, उस धरती में भी दम होणा चहिए भई.’ उल्लेखनीय है कि महेंद्र के लगभग जवान होने पर ही स्याणी दादी ने यह एडल्टी किस्म का कंटेट सुनाना शुरू किया था.

हाल ही, महेंद्र के अकेले मामा के दोनों बेटों के ऑस्ट्रेलिया में बसने के बाद पूरा ननिहाल यहां की जमीन बेचकर अगली पीढ़ी के पास वहीं जाकर जमीन खरीद कर खेती करने लगा है. यानी, अंग्रेजों को अच्छी खेती की सलाह देने वाले का परिवार तीन पीढ़ी बाद अंग्रेजों के ही एक दूसरे देश में खेती करने पहुंच गया है. मामा कहते हैं कि उनके परिवार ने पंजाब के दो विभाजन देखे, पहला जब पाकिस्तान बना, दूसरा जब हरियाणा बना, फिर उस जमीन को छोड़कर यह चुना हुआ विस्थापन, इसमें जान माल नहीं गए, पर बेटों के आगे विवश होकर जैसे जमीन नहीं, अपनी जड़, अपनी रूह बेचकर वे विदेश में बस रहे हों.

सुमन के पिता सोहनलाल गोदारा जी दसवीं तक पढ़े हैं, पढ़ाई की अहमियत जानते समझते हैं, छोटे किसान हैं क्योंकि उनके पास कम जमीन है, वो भी थोड़ी नहरी, थोड़ी बिरानी है, उन्हेंर इस कमतरी का अहसास बराबर है, कभी वे खुद भूलने भी लगे तो बिरादरी के ही लोग याद दिलाते रहते हैं पर अकेली लाडेसर बेटी को खूब मन से पढ़ाया है. सुमन की मां चंदा उर्फ चंदो भी बस पांचवीं पास हैं, पर परिवार में सुलझी हुई मानी जाती है, सुलझी हुई का मतलब यहां एडजस्टिंग होता है, बिना तर्क के बात माननेवाली, आज्ञाकारी, किसी की बात न काटने वाली. सुमन के लिए उसके पिता के इस अतिरिक्त लाड प्यार को ताने के भाव से तो कभी आशंका और कभी गर्व के भाव से देखती है, रिएक्टव करती है.

जाट का मंदिर तो खेत ही होता है. (सांकेतिक चित्र)
सांकेतिक चित्र

एक भैंस है घर में. कई साल पहले गाय थी, मर गई, तो बहुत जी दुखा, तो तय किया कि अब भैंस ही रखनी है, उस मरी गाय का बछड़ा अब खेत में बैल है, इस भैंस के एक कट्टी है. दोनों चंदो की लाडेसर है, सुमन तो छेड़ती हुई कहती है कि मां, मुझसे ज्यादा तो आप इन मां-बेटी को प्यार करती हो, मां का जवाब होता है कि तेरे पापा इत्ता प्यार करते हैं तुझे, इससे ज्यादा की जरूरत ही कहां है, मां बाप दोनों का ही तो दे देते हैं. सुनकर पिता-बेटी आंखों के इशारों में परस्पर मुस्कुरा देते हैं.

सुमन के ननिहाल वालों की सुमन के पिता से ज्यादा नहीं बनती. वजह कोई खास नहीं है, एक दूसरे की भैंस तो किसी ने खोली नहीं, बस ये मान लो कि ग्रह ही नहीं मिलते आपस में. यूं वे दुख, सुख, मरणे, परणे एक टांग पर हाजिर हैं, पर वे अपनी भांजी को बहुत प्रेम करते हैं. मामा विजय सिंह हिसार में किसान हैं, साथ में रियल एस्टेट का काम करते हैं. जमीन के रेटों में उछाल की आंधी सी आई तो पांच सात ढंग के सौदे करवाए, उनसे खरीदे शहर में अपने तीन प्लॉटों का उल्ट पुल्टण कर दिया तो अच्छी कमाई कर ली है, हरियाणा की नई बनी प्रादेशिक पार्टी में किसान मोर्चे के प्रदेशाध्यक्ष हो गए हैं. हालांकि मजेदार बात ये भी है कि प्रादेशिक पार्टियों में भी राष्ट्रीय अध्यक्ष होते हैं. खैर, गांव में घुसने से पहले बस अड्डा है जिसे मंजूर करके पक्के हवादार कमरे यानी वेटिंग हॉल को भी चौधरी देवीलाल ने पहली बार मुख्यमंत्री बनते ही बनवाया था, यह दरअसल प्रार्थना बस स्टेंड का फुल बस स्टेंड में कन्वरर्जन था.

इससे पहले कंडक्टर की दया से हरियाणा रोडवेज की बस रुकती तो रुकती, नहीं रुकती तो नहीं रुकती. यह घटना गांव की चिरस्मृति में है, हो तो यह भी सकता था कि इस घटना यानी चमत्कार पर चौधरी देवीलाल को लोदेवता मानकर मंदिर बनवाकर पूजना शुरू कर दिया जाता. हर मेहमान को गांव वाला चौधरी देवीलाल के अहसान और इस निर्माण के बारे में जरूर बताता है, उसी बस अड्डे पर सड़क किनारे सुमन के मामा चौधरी विजय सिंह जी ने खेती के प्रतीक हरे रंग की पृष्ठभूमि वाला बोर्ड लगवा दिया है, जिसके एक तरफ गेहूं की पीली हरी बालियों का गुच्छा स्वागतातुर मेजबान की ओर से पुष्प गुच्छ का आभास देता है. यह बोर्ड जो गांव में आने वाले हर आमो-खास को उनके नाम और इस नवीन गौरवपूर्ण पद का सामान्य ज्ञान करवाकर ही गांव में प्रवेश करने देता है.

नाम के आगे चौधरी लगाना भी इस इलाके में खास है, पीछे जाटों वाला गोत्र लगाया जाता है, लोग मजाक में अपने राजस्थान वाले जाट रिश्तेदारों को छेड़ते हैं कि नाम के पीछे चौधरी तो कच्चे जाट लगाते हैं, पक्केा जाट तो नाम से पहले चौ. और नाम के पीछे अपनी गोत्र लगाते हैं. जिसे वे जात कहते हैं, इसलिए मामा का पूरा नाम बोर्ड पर दर्ज था चौ. विजयसिंह कासनिया. सुमन और महेंद्र इस पर बात कर चुके थे, पर निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाए कि जात अगर गोत्र ही है तो जाट होना क्या है, महेंद्र ने यह कहकर मजाक में बात खत्म की थी –‘जाट एक जाति नहीं, संस्कृति है!’ महेंद्र के मुंह से मजाक में निकली बात में कुछ तो सच्चाई थी ही!

बहरहाल, वापिस मामा पर आते हैं, मामा ने गांव में आने वाले हर आमो-खास मेहमानों के लिए यह भी गांव में कह रखा है कि उनके घर जरूर लाएं, उनसे मिलवाएं, वे हर आगतुंक को चाय नाश्ता करवा के ही भिजवाते हैं, खाने का वक्त हो तो खाना भी मनुहार करके खिलाते हैं, वे पूरे दिल से उस मेहमान के परिवार, गांव के हाल पूछते हैं, यानी गांव के हर मेहमान को अपना मे‍हमान मानते हैं और अपने गांव वाले भी मेहमानों को गर्व से विजय सिंह जी से मिलवाने लाते हैं.

मेहमान अगर गांव का दामाद हो तो वे उसे अपने दामाद की तरह व्यवहार करते हैं. नाती, भांजा, भांजी हो तो तो भी उसी लाड दुलार के साथ मिलते हैं, मेहमान को जाते हुए कहते हैं कि कोई भी काम हो तो आधी रात याद करना, जैसा हूं, हाजिर मिलूंगा और यह केवल कहने की बात नहीं थी, जिसने याद किया, उसके लिए खड़े रहते हैं, उनके काम आते हैं, अपनी सामर्थ्य भर उनके काम करवाते हैं. करवाने में अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ते. कुल मिलाकर, लंबी बात का छोटा मतलब ये कि गांव का मेहमान गांव का ही नहीं, मामा जी के दिल का भी मेहमान होता है.

बारहवीं पास मामी सुलोचना ने दो साल पहले ही गांव में पांचवीं तक का स्कूल खोला है- चौधरी छोटूराम मॉडर्न पब्लिक स्कूल, मामी मामा से इस मायने में तंग है, जब देखो मामा किसी न किसी की फीस माफी के लिए सिफारिश करते रहते है. पर दिल से इस बात पर उन्हेंह मामा पर प्यार ही आता है, इसलिए गुस्सा नहीं करतीं. मामा के घर पर कुल उन्नीस मेम्बर हैं, चाहे सबके नाम राशन कार्ड में न भी लिखे हों, पांच भैंसे, तीन काली, दो भूरी, तीन गाएं, तीनों अमेरिकन हैं, और सात उनकी संतानें, एक भैंस ब्याने वाली है. मामा मामी के दो प्यारे बच्चे और भी हैं, राघव और कल्पना. राघव दसवीं में हिसार लगाया है अबके साल, कल्प‍ना गांव के ही दूसरे स्कूल में छठी में है, अगले साल मामा राघव को कोटा भेजना चाहते हैं, वहीं ग्यारवीं, बारहवीं के साथ आगे की तैयारी कर लेगा. अगर कोटा नहीं भेजा तो, जैसा कि मामी का मां वाला मन है, कल्पना को भी हिसार के बोर्डिंग में डालेंगे. मामा राघव को पहलवान भी बनाना चाहते रहे हैं, दबाव नहीं डालते, बस मन ही है उनका, पर राघव का मन क्रिकेट में लगता है. मामा उसे अखाड़े में छोड़ के आते हैं और वह गांव के पास वाले किसी के सूने खलिहान की पिच पर बैटिंग करता हुआ पाया जाता है.

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