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माया ने घुमायो: बच्चों को न सुनाने लायक बालकथाएं

लेखक मृणाल पांडेय की किताब माया ने घुमायो’ उन कहानियों की समसामयिक प्रस्तुति है जो हमें वाचिक परंपरा से मिली हैं. ये कहानियां अपनी कल्पनाओंअतिरंजनाओं और अपने पात्रों के साथ सुदूर अतीत से हमारे साथ हैं और मानव समाजउसके मन-मस्तिष्क के साथ मनुष्य की महानताओं-निर्बलताओं का गहरा तथा सटीक अध्ययन करती रही हैं.

यह पुस्तक हाल ही में  राधाकृष्ण प्रकाशन के 55 वर्ष के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में राज्यसभा सदस्य मनोज कुमार झा की उपस्थिति मे इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में लोकार्पित हुई.

पढ़िए किताब ‘माया ने घुमायो’ के कुछ अंश.


एक गांव में एक गरीब विधवा बुढ़ि‍या और उसका इकलौता बेटा रहते थे. बुढ़ि‍या कुछ घरों में कूटना-पीसना करती, बेटा खेतों में मजूरी. किसी तरह चल रहा था. फिर अचानक गाँव में महामारी फैल गई और लोग तिलचट्टों की तरह मरने लगे. बुढ़ि‍या ने रातोरात घर में जितना आटा, तेल और गुड़ था, उससे सात पुए बनाए. फिर एक पुराना लोटा-डोर और पुओं की थैली बेटे को देकर उससे कहा, “तू रात के रात बाहर गाँव कहीं चला जा. बीमारी से बच जाएगा. मेरी फिकर मत करना, मेरे तो दिन अब वैसे भी कट ही गए हैं. महामारी मिटने तक कुछ कमा-धमाकर वापिस लौटा, तो फिर मिलेंगे वरना तेरा राम राखा.”

बेटा थैली लेकर पूरब की तरफ निकल गया. रात भर चलते-चलते सुबह हुई तो उसने सामने एक साफ-सुथरा गाँव देखा. गांव के बाहर कांटों की बाड़ थी और एक तख्ती पर लिखा था, ‘महामारीमुक्त क्षेत्र किरपया भित्तर ना आएं. यहां खुले में शौच जाना या थूकना मना है. बहुक्म ग्राम मुखिया.’

गांव बाहर फारिग होकर भूखा-प्यासा लड़का जब बाड़ के पास फिर पहुंचा तो क्या देखता है कि मुँह पर गमछा बांधे कुछ लाठीधारी बाहर आते हैं. ऊंची आवाज में उनका मुखिया बोला, “तू हो न हो, किसी महामारी वाले गांव से भाग के इधर आया है. हम अब तक महामारी से बचे हुए हैं, सो हम किसी भी बाहरिये को अपने गांव में घुसने नहीं देंगे.”

लड़के का मुँह लटक गया. लोटा-डोर दिखा के बोला, “कम से कम लोटा भर पानी ही अपने कुएं से भर लेने दो भले लोगो! पल दो पल बाहर ही खा-सुस्ता कर कहीं और को निकल जाऊँगा.

“नहीं,” लाठीवालों ने कहा, “हम अपने कुएँ में तुम्हारी छूत नहीं लगने देंगे। उधर गाँव से बाहर दाहिनी तरफ दस-बीस कदम पर तुमको एक भुतहा कुआँ दिखेगा उससे पानी-वानी ले लो या डूब मरो, पर यहाँ से चलते बनो, बस.”

लड़का मुंह लटकाए चला. कुछ ही कदम चलने पर उसको एक उजाड़ इलाके में एक कुआँ दिखा. उसने लोटा भर पानी खींचा और कुएँ की जगत पर बैठकर थैली में हाथ डालकर खुद से बुदबुदाने लगा : “इतनी जोर की भूख लगी है, पर ये तो सात ही हैं. एक-दो खाऊँ कि चार-पांच? कि सबको एक साथ खा जाऊँ?”

अब अचानक कुएं से सात मीठी जनानी आवाजें आईं, “ऐ लड़के हमको मती खाइयो, तुम जो मांगोगे हम तुमको दे देंगी”

लड़का चक्कर में, कि भैया ये क्या माया हैगी? पर चतुर था. अपनी घबराहट छिपाकर नरमाई से बोला, “अरी मैं तो बस एक भूखा-प्यासा महामारी से पनाह खोजता इनसान हूँ. तुम जनी हो कौन?”

देखता क्या है उसके सामने हाथ जोड़े सात सतरंगी परियां एक-एक कर कुएं से बाहर निकल रही हैं. उसको देखकर परियां पहले एक आंख से हंसी, फिर दूसरी से रोईं. पूछने पर उनकी मुखिया लाल परी कहने लगी कि हम यह देखकर हंसीं, कि महामारी के बीच भी कुछ इनसान बचे हुए हैं.

रोईं इसलिए कि बाहर से साफ-सुथरा ये गांव जालिम डकैतों का बासा है. घर-परिवार और खेती के हजार झंझटों को निबटाने को यहां के लोग बस फसल कटाई के समय आते-जाते गरीब परदेसियों से जमकर बेगारी लेते हैं, और काम निबटा नहीं, कि झोली भर अनाज देकर उनको विदा कर देते हैं. बसने नहीं देते. अमीरों को आते देखा, तो उनको बातों में बरगलाकर लूट लेते हैं, फिर उनकी देही गन्नों के खेत में. इस महामारी के जमाने में तो वे किसी परदेसी को घुसने नहीं देंगे.

ये लोग खूब पैसेवाले हैं जरूर, और लठैती में भी अव्वल हैं, लेकिन सब अपने-अपने बच्चों और अक्सर कड़वा बोलनेवाली घर की औरतों से परेशान हैं और जब-तब उनको पीटते भी हैं. हम परियाँ आजाद हैं. हवा हमारा घर है, अम्बर हमारा बिछौना. मनभाया अच्छा पहिरती-ओढ़ती हैं, मन न हो तो किसी के हाथ नहीं आतीं. इसलिए हम किसी को फूटी आंखों नहीं भातीं.

अपने सर के बहुत ऊपर उजले खुले आकाश में हमें डैने फैलाए उड़ता देखकर इस गांव के मरदुए खूब चिल्ला-चिल्लाकर हमारी तरफ ताने फेंकते हैं कि अभी हमसे बहुत उड़ी-उड़ी फिरती हो, पर हम भी मरद बच्चे हैं, जिस दिन नीचे उतरीं तुमको…,” फिर वे हाथ से इशारे करते हैं.

घरों-दालानों में चावल या जुएँ बीनती, या खेतों में निराई-गुड़ाई करती इनकी औरतें भी अपने मरदों को वाही-तबाही बोलते सुनकर मुंह बिचकाकर आपस में हमको कुटनी, मर्दखोर और जाने क्या कुछ नहीं कहतीं. बच्चे भी ताली पीटकर हमको बाँझ, निरबंसिया, जादूगरनियाँ कहकर हमारे नीचे दूर तक भागते आते हैं.”

हरी परी ने बताया कि परियों के कुएँ में छुपे रहने का राज ये था कि हर सौ बरसों में उनके पुराने पंख झड़ जाते और उनकी जगह नए वाले निकल आते थे. उनके दोबारा उगने के इन्तजार में वे इस कुएँ में छुपा करती थीं. उनको पता था इधर गाँव के लाठीवाले लोग भी भुतहा कुएँ से डरते हैं.

यह सब सुनकर लड़का हँस पड़ा. बोला, “चलो जो हुआ सो हुआ. लो मेरी माँ के पकाए पुए खाओ और मुझे कुछ ऐसा हुनर बताओ कि इस गाँव में बसना मिल जाए ताकि मेरी गरीबी मिटे और महामारी का असर मुझ पर ना होवे.”

लाल परी लड़के से बोली, “हम परियाँ हैं. हम हवा खाती हैं और प्यार पर जिन्दा रहती हैं. तुमसे चार मीठी बातें सुन के जी जुड़ा गया. सो चलो हम तुमको ये दो जुड़वाँ शंख देती हैं. एक करामाती शंख है जो कि मालिक को मनचाही चीजें देता है. दूसरा ढपोरशंख है, जो बहुत लच्छेदार बोली बोलता है, बहुत देने का शोर मचाता है पर वादे कभी पूरा नहीं करता. तुम इनके बूते गाँव में घुसने का जुगाड़ कर लो. हाँ, अभी भोले हो. सो यह बता दें कि देर-सबेर इस गाँव के लोग तुम्हारा करामाती शंख तुमसे छीनने की कोशिश जरूर करेंगे.

इसलिए जब कभी सोओ या बाहर जाओ, तो करामाती शंख को तो छुपा के साथ रखना. बस ढपोरशंख को बाहर रख देना ताकि चोर लें तो उसी को ले भागें. उनके वास्ते यह रही जादुई रस्सी और डंडा. इनको हुकुम देते ही वे चोर को बाँधकर उसकी अच्छे से कुटम्मस कर तुम्हारा माल तुमको वापिस दिला देंगे. पर ये रस्सी-डंडा एक ही बार कारगर होंगे। काम हो गया तो गायब हो जाएँगे। हम तो कल भोर भये उड़ जाएँगी. तुम अपना खयाल रखना.”

इतना कहकर परियाँ गायब हो गईं.

लड़के ने पहले जमकर पुए खाए, पानी पिया फिर सोच-विचार कर करामाती शंख से कहा, “यार, मुझे किसी संन्यासी का बाना दिला दे।” उसका कहना था कि तुरत भगवा कपड़े, रुद्राक्ष की माला, रोली और भभूति का दोना हाजिर. अब लड़के ने क्या किया? उसने संन्यासी का भेस धरा, तिलक-तिरपुंड लगाया, फिर झोले में सब सामान छिपाकर, ‘अलख निरंजन बम शंकर’ कहता हुआ गाँव की तरफ वापिस चला.

संन्यासी को आता देखकर लाठी लहराते मुँह पर गमछा बाँधे लोग फिर बाहर आए. पर बाबा जी को देखकर ठिठके फिर मुखिया जी से पूछा कि “इसे आने दें कि नहीं?”

स्याणे कहते हैं ‘राजा जोगी अगिन जल इनकी टेढ़ी रीत.’ उनको उकसाओ मती. क्या पता शाप-ऊप न दे दें?” हाथ जोड़कर मुखिया बोला, “बाबा हम गरीब इनसान हैं. फिर भी आपको दच्छिना में खाय भरे को चावल-नून-तेल तो दे देंगे. पर आप उसे बाहर ही पका-खा लीजिए. महामारी के डर से हमने गाँव का रास्ता जो है सो बन्द कर रखा है.”

बाबा बने लड़के ने सोचा कुछ करामात दिखानी ही होगी ताकि गाँव में ठिकाना मिल जाए. उसने झोले में हाथ डालकर करामाती शंख निकाला और उससे कहा, “ला रे एक बोरी चावल और सौ सोने के सिक्के.”

तुरत-फुरत सब हाजिर! गाँव वालों की आँखें फटी की फटी!

मुस्कुराकर बाबा बोले, “मुखिया जी, ये रहा तुम्हारा किराया. रमता जोगी और बारिश का पानी तुम्हारे राजा के लम्बरदार की तरह लगान वसूली करने नहीं आता. दान के एवज में भी कुछ देकर ही जाता है.”

अब कहो!

मोटा असामी देखकर मुखिया जी ने तुरत पैंतरा बदला और बाबा के चरण छूकर वे सिक्के तो सीधे अपनी ‘ग्राम परवाह गुल्लक’ के हवाले किए, फिर चावल की बोरी अपने साथियों को सारे गाँव में बाँटने और बाबा की जयकार के नारे लगवाने का हुकुम देकर बड़े आदर से बाबा को गाँव के भीतर ले चले.

गाँव की तरफ से मुखिया जी ने खुद अपने घर के एक कमरे में बाबाजी को रखा और उनको भरपेट भोजन कराने और उनसे करामाती शंख के किस्से सुनकर वाह-वाह करते हुए सब सोने चले गए. बाबा ने करामाती शंख तो झोले में छुपा दिया और ढपोरशंख को बगल में रखकर लेट गए. जैसी कि उनको उम्मीद थी, जल्द ही अँधेरे में उनको बगल की कोठरी से मुखिया और उसके बेटों की फुसफुसाहट सुनाई देने लगी. मुखिया के घरवाले उसके सोते हुए उसका वह करामाती शंख उड़ा लेने का प्लान बना रहे थे. बाबा ने मुस्कुरा के चादर ओढ़ ली और जोर-जोर से नकली खर्राटे निकालने लगे.

“सो गया साला,” मुखिया ने बाबा को सोया जानकर बेटों से कहा, “महामारी के कारण सौदागरों का आना-जाना ही नहीं बाहर गाँव जाकर डाका डालना भी बन्द है. पर हरामजादे राजा के कारिंदों ने फिर भी नाक में दम कर रखा है कि राजाजी की ‘स्वस्थ ग्राम योजना’ के नाम पर नया लगान दो. इसीलिए हम लोगों ने अपनी अलग ‘ग्राम परवाह गुल्लक’ बना ली है. बाबा को लूटने के बाद इसे हम लोग ठिकाने लगा देंगे. फिर महामारी के खतम होते ही जादुई शंख से भरपूर दान-दहेज निकलवाकर सबसे पहले कोई भी बढ़ि‍या लड़का मिले तो तुम्हारी भेंगी बहन का ब्याह कर दूँगा, फिर आगे सोचेंगे. क्यों बहुरिया?”

“राजा की सुन्दर जिद्दी लड़की की तरह हमारी बेटी नांय है जो किसी पंडित दूल्हे के इन्तजार में कुँआरी बैठी रहेगी,” मुखिया की बीवी बोली. इसके कुछ देर बाद लड़के बाबा के कमरे में चोर कदमों से घुसे। कुछ देर वे पास खड़े होकर थाह लेते रहे कि बाबा सोया है कि जागता है. पर बाबा ने और जोर से खर्राटे मारने चालू कर दिए तो वे उनके पास रखा ढपोरशंख लेकर चल दिए. उनका जाना था, कि बाबाजी ने करामाती रस्सी और डंडे को कहा, “लगा कुदक्का रस्सी-डंडा, फोड़ दे इन सालों का मुंडा.”

फिर क्या था? मुखिया के सारे परिवार को रस्सी ने जा बाँधा और डंडा उनका भुरकुस बनाने लगा. ‘हाय-हाय दुहाई’ मची तो बाबा बोले, “भला चाहते हो, तो चुपचाप मेरा शंख वापिस करो और अपनी ग्राम परवाह योजना का गुल्लक फोड़कर पैसा सबको लौटा दो. वरना अभी तो मुंडा ही फोड़ा अब राजदरबार जाके तुम सबका भंडा फोड़ देता हूँ.”

मुखिया ने पगड़ी लड़के के पैर पर रखी और बेटों से कहा कि सब माल लौटा दें और गुल्लक भी फोड़कर सबका दिया वापिस कर दें. भांडा फूट गया तो उनकी भेंगी बहन को कोई लड़का न देगा.

इस प्रकार शंख वापिस मिल गया तो अपनी रस्सी-डंडा-झोली समेटकर बाबाजी चलते बने.

गाँव के ओझल होते ही लड़के ने इस बार करामाती शंख से ज्योतिषी पंडित का भेस माँगा और एक ठो बैलगाड़ी भी. दोनों हाजिर! गाड़ी में बैठकर बढ़ि‍या धोती-कुर्ता पहिने पगड़ी-तिलक लगाए लड़का अब चला राजा के महलों को. दरबान ने लड़के से परिचय पूछा तो उसने कहा, हम बहुत ऊँची जात के पंडित हैं. हमारी क्वालिफिकेशन तो बस राजा साहब और उनके दरबारी विद्वान् ही समझ सकेंगे. हमको उधर ले चलो.

भीतर से आज्ञा हुई कि पंडित है तो उसे भीतर भेज दिया जाए. राजदरबार में राजा सहित सब मुँह लटकाए बैठे थे तुनकमिजाज राजकुमारी से शास्त्रार्थ में देश के सारे विद्वान् हार चुके थे जो नए पंडित की परीक्षा लेने को राजा की गोद में बैठी हुई थी.

राजपंडित ने कहा कि पहले कुल, गोत्र, प्रवर बताओ. लड़का बोला वह सब तो मेरा शंख भी बता देगा. झोली से उसने ढपोरशंख को निकालकर कहा : “बता दे इनको कि मैं कौन हूँ.” यह सुनना था, कि उसका ढपोरशंख चालू हो गया. लड़के के सम्पूर्ण ज्ञान-विज्ञान की मानद पदवी प्राप्त शास्त्रज्ञ होने की बाबत ऐसे-ऐसे करामाती ब्योरे दिए उसने, कि राजा और राजकुमारी लहालोट. अहा, ज्ञानी हो तो ऐसा!

“कुल?” लड़के से पहले ढपोरशंख बोल पड़ा, “अहो इनका कुल तो उच्चतम पंडितों का है, जो सुदामा की तरह धन-सम्पत्ति के लोभ से दूर रहे. माता-पिता की अकाल मृत्यु के बाद इनको ही पुरखों की स्मृति में बनवाए प्याऊ में पथिकों को पानी पिलाने का काम दिया गया. इनकी बुद्धि तथा सेवाभाव से प्रभावित होकर इनको बचपन में कुछ रमते जोगी हिमालय उठा ले गए और वहाँ केदारखंड में इनको नाना निगमागमों, शास्त्रों, मीमांसा सबकी शिक्षा दी. कुलीन तथा विनम्र होने के कारण अपने श्रीमुख से अपनी तारीफ नहीं करते हमारे श्रीमन्.”

बस फिर क्या था, शहनाइयाँ बजीं, ब्याह हुआ और उसको गद्दी देकर महाराजा तथा रानी वन को चले गए. ढपोरशंख की महिमा से ही जब सब कुछ मिल गया तो लड़के ने, जो कि अब राजा था, अपने करामाती शंख को तो किसी ताख पर रख दिया और बस ढपोरशंख को सीने से लगा लिया.

राजकाज चलाने के हजार टंटे. लोग बार-बार फरियादी घंटा बजाने आ जाते. कहते, डाकू बनकर आपके कारिंदे हमको लूट रहे हैं. कोई कहता उधर किसी दूर गाँव में खेती सूख रही है. सबको डपटकर या पुचकार कर ढपोरशंख हर बार सफाई से चुप करा देता. किसी बड़ी लड़ाई या चढ़ाई की खबर आती तो बस ढपोरशंख से राजा कह देता, कि भरपूर प्रचार कर दुश्मनों के मुख पर कालिख मल दे! और ढपोरशंख ऐसी खूबी से यह कर देता कि दुश्मनों की हिम्मत टूट जाती और परजा उनके भेदियों को घुसने ही नहीं देती. दिन आनन्द से कटने लगे. दो बेटे भी हो गए. ढपोरशंख को प्रधान खबरी और सभाप्रमुख घोषित कर दिया गया. राजा के बेटे उसको कहते ढपोरी चाचा.

पर होनी को कौन टाले?

एक दिन खेलते-खेलते पुराने महल जा पहुँचे राजा के बच्चों को ताख पर रखा करामाती शंख दिख गया. बच्चे तो बच्चे, बोले ये तो बिलकुल गोलमटोल ढपोरी चाचा की तरह दिखता है. फिर तुरत झगड़ पड़े कि यह वाला कौन लेगा. आख‍िर दोनों भाई राजा के पास पहुँचे जो उस समय गाना-वाना सुनने में लगे थे. कुछ पिनक में भी थे. उन्होंने इशारे से बच्चों को झगड़ा निपटाने ढपोरशंख के पास भेज दिया. यह किसी को पता न था कि ढपोरशंख को करामाती शंख से पुरानी जलन थी. उसने बच्चों से कहा, “ये शंख बड़ा करामाती है. जो माँगोगे वह मिलेगा.” बच्चे एक-दूसरे का चेहरा ताकने लगे.

राजकुँवर थे, उनको क्या कमी? उनको खामोश देखकर ढपोरी चाचा ने कहा, “तुम दोनों जिसका जितना भला या बुरा चाहो, यह कर देगा.” यह सुनते ही शंख को हथियाने के लिए दोनों बच्चे एक साथ एक-दूसरे से बोल पड़े, “तू मर जा!” करामाती शंख बोला तथास्तु. और दोनों राजकुँवर मर गए.

जब रानी को खबर मिली तो वह रोती-बिलखती आई और उसने ढपोरशंख से पूछा कि क्या हुआ? वह बोला, “मैं क्या करता. मैं तो राजाजी का चाकर हूँ. कुँवरों ने मुझसे कहा, चाचा, झगड़ा सलटा दें, तो मैंने करामाती से कहा, भैये तू ही सलटा. सारा किया-धरा इस करामाती का है मेरा नहीं.” आगबबूला रानी ने करामाती शंख का चूरा-चूरा करवाकर उसको नदी में बहवा दिया फिर राजाजी को जगाया गया. राजा बिगड़ खड़े हुए. पर पहला सवाल था कि बच्चे जो मर चुके थे, उनको कैसे जिलाएँ? राजा जी ने पूछा तो ढपोरशंख बोला, “मैं तो हुजूर, बस ढपोरशंख हूँ. मुझसे जितना लम्बी-चौड़ी लच्छेदार बातें बुलवाना चाहो बुलवा लो. बाकी काम-धाम मुझसे नहीं होगा.”

करामाती शंख तो पहले ही कूट-पीटकर बहाया जा चुका था, राजा ने ढपोरशंख को भी चूरा-चूरा करके नाली में बहा दिया. रोती-कलपती रानी से छुटकारा पाना आसान होता है. उसको, जैसा दस्तूर था, एक कौवा हँकनी बनाकर जंगल भेज दिया गया। उसके बाद राजा अपने गाँव पहुँचा तो पता चला कि उसके जाने के बाद महामारी में उसकी माँ तो कब की मर-खप गई थी. झोंपड़ी का बस खँडहर बचा था.

काफी दिन तक रोता हुआ राजा पैदल-पैदल उस गाँव को खोजता फिरा, जहाँ गाँव के बाहर भुतहा कुआँ होता था, जिसमें सात सतरंगी परियाँ रहती थीं. लोगों ने कहा, महाराज कहाँ का गाँव. वह गाँव तो तभी का उजाड़ हो गया जब ढपोरशंख की मदद से राजकाज चल रहा था. वे डकैत सब तभी आपकी सभा में सांसद बन गए और जाते-जाते अपनी ग्राम सुरक्षा निधि से मुखिया जी सारे कुएँ भी पटवा गए.

राजा हताश। पर वापिस लौटता तब तक उसके भरोसे के गाड़ीवान ने खबर दी, कि अब तक दोनों शंखों के फेंक दिए जाने से नि:शंक होकर डकैत उसकी गद्दी हथिया चुके थे और मुखिया जी राजा बन बैठे थे. गाड़ीवान दयालु था उसने कहा, हुजूर भला चाहते हैं तो यहीं से जंगल को कट लें. सुनते हैं मुखिया जी ने गद्दी पर बैठते ही आपको रस्सी से बाँधकर कोड़ों से पीटने का हुकुम जारी कर दिया है. हम उनसे जा के कह देंगे कि आपको जंगल में शिकार करते समय बाघ उठा ले गया. एक शोकसभा भी कर देंगे. बात खतम.

इसके बाद राजा को जंगल में अकेला छोड़कर सब वापिस चले गए. वह बेचारा अधपगला होकर फिरने लगा. जहाँ कोई कुआँ देखा तो उसकी मुँडेर पर झुककर सात परियों को पुकारता, “अरी परियो, कहाँ हो?” परियाँ तो परियाँ मन चाहे तभी मिलती हैं, ऐसे ही किसी राजा जी की पुकार सुनकर थोड़ी भागी आती हैं, किसी रानी की तरह. सुनते हैं कि उनको पुकारता-पुकारता राजा आखिरकार एक दिन खुद भी किसी गहरे गढ़े में गिरकर मर गया.

ढपोरशंख पर बहुत भरोसा करनेवालों की यही गति होती है.

  • पुस्तक – माया ने घुमायो
  • लेखक – मृणाल पांडेय
  • प्रकाशक – राधाकृष्ण प्रकाशन
  • भाषा ‏ -‎ हिंदी
  • पेपरबैक ‏ – 216 पेज
  • आईएसबीएन -10 ‏ : ‎ 9391950213
  • आईएसबीएन -13 ‏ : ‎ 978-9391950217
  • मूल्य – 225

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