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इस शख्स की बात मान लेते तो समाज से जाति-व्यवस्था ख़त्म हो जाती

आज से करीब 193 साल पहले महात्मा ज्योतिबा फुले का जन्म हुआ. एक ऐसा शख्स, जिसने अपनी पत्नी के साथ मिलकर तालीम और समानता के अधिकार के लिए एक महान जंग लड़ी. वो एक महान विचारक, निस्वार्थ समाजसेवी तथा क्रांतिकारी कार्यकर्ता थे. उन्होंने भारतीय सामाजिक संरचना की जड़ता को ध्वस्त करने का काम किया. महिलाओं और दलितों की अपमानभरी ज़िंदगी में बदलाव लाने के लिए वे हमेशा लड़ते रहे.  उस दौर में ब्राह्मणवाद पूरे भारतीय समाज पर हावी था. दलितों की ज़िंदगी आजीवन ग़ुलामी का दस्तावेज थी. लेकिन इस ग़ुलामी की पृष्ठभूमि तब दरकने लगी, जब महात्मा ज्योतिराव फुले और उनकी पत्नी सावित्रीबाई ने 1 जनवरी 1848 को पुणे के बुधवार पेठ के भिड़े वाड़ा में लड़कियों के पहले स्कूल की शुरुआत की. ब्राह्मणवाद की वैसी मुखरमुखालफ़त करने की उस ज़माने में कोई सोच भी नहीं सकता था. यह भारत के ज्ञात इतिहास में अपनी तरह का पहला स्‍कूल था. उस स्कूल में पढ़ाने के लिए कोई शिक्षक न मिलने पर ज्योतिबा फुले की पत्नी सावित्रीबाई आगे आईं. अपने इन क्रांतिकारी कार्यों की वजह से फुले और उनके सहयोगियों को तरह-तरह के कष्ट उठाने पड़े. उन्हें बार-बार घर बदलना पड़ा. फुले की हत्या करने की भी कोशिश की गई. पर वे अपनी राह पर डटे रहे. अगर उनकी बात मान ली जाए तो समाज से दलित-सवर्ण की बुराई ही ख़त्म हो जाए. उन्होंने बहुत सी किताबें लिखकर जनजागरण का काम किया. प्रस्तुत लेख उनकी किताब ‘ग़ुलामगिरी’ का एक अंश है.


सैकड़ों साल से आज तक दलित समाज, जब से इस देश में ब्राह्मणों की सत्ता कायम हुई तब से, लगातार ज़़ुल्म और शोषण का शिकार है. ये तरह-तरह की यातनाओं और कठिनाइयों में अपने दिन ग़ुज़ार रहे हैं. ये अपने आपको ब्राह्मण-पंडा-पुरोहितों की ज़ुल्म-ज़्यादतियों से कैसे मुक्त कर सकते हैं, यही आज हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल है. यही इस ग्रंथ का उद्देश्य है. यह कहा जाता है कि इस देश में ब्राह्मण-पुरोहितों की सत्ता क़ायम हुए लगभग तीन हज़ार साल से भी ज्यादा समय बीत गया. वे लोग परदेस से यहां आए. उन्होंने इस देश के मूल निवासियों पर बर्बर हमले करके इन लोगों को अपने घर-बार से, ज़मीन-ज़ायदाद से वंचित करके अपना ग़ुलाम बना लिया. उन्होंने इनके साथ बड़ा अमानवीय रवैया अपनाया. सैकड़ों साल बीत जाने के बाद भी दलितों में बीती घटनाओं की स्मृतियां ताजा देखकर ब्राह्मणों ने अपनी क्रूरता के प्रमाणों को नष्ट कर दिया.

इन ब्राह्मणों ने अपना प्रभाव, अपना वर्चस्व इन लोगों के दिलो-दिमाग़ पर क़ायम रखने के लिए, ताकि उनकी स्वार्थपूर्ति होती रहे, कई तरह के हथकंडे अपनाए. और वे इसमें कामयाब भी होते रहे. उस समय ये लोग सत्ता की दृष्टि से पहले ही पराधीन थे. बाद में ब्राह्मण-पंडा-पुरोहितों ने उन्हें ज्ञानहीन और बुद्धिहीन बना दिया. जिसका परिणाम यह हुआ कि ब्राह्मण-पंडा-पुरोहितों के दांव-पेंच, उनकी जालसाजी इनमें से किसी के भी ध्यान में नहीं आ सकी.

ब्राह्मण-पुरोहितों ने इन पर अपना वर्चस्व क़ायम करने के लिए, इन्हें हमेशा-हमेशा के लिए अपना ग़ुलाम बनाकर रखने के लिए, सिर्फ अपने निज़ी हितों को ही मद्देनज़र रखकर, एक से अधिक बनावटी ग्रंथों की रचना करके कामयाबी हासिल की. उन नकली ग्रंथों में उन्होंने ये दिखाने की पूरी कोशिश की, कि उन्हें जो विशेष अधिकार प्राप्त हैं, वे सब ईश्वर ने दिए हैं. इस तरह का झूठा प्रचार उस समय के अनपढ़ लोगों में किया गया और उस समय के दलित समाज में मानसिक ग़ुलामी के बीज बोए गए. उन ग्रंथो में ये भी लिखा गया कि शूद्रों को ब्रह्मा के ज़रिए पैदा करने का उद्देश्य ब्राह्मण-पुरोहितों की सेवा करना भर था. उन्हें ब्राह्मण-पुरोहितों की मर्ज़ी के खिलाफ कुछ भी नहीं करना चाहिए. तभी इन्हें ईश्वर प्राप्त होंगे और उनका जीवन सार्थक होगा.

लेकिन आज अगर कोई इन ग्रंथो के बारे में कोई मामूली ढंग से भी सोचे तो उन्हें इसकी सच्चाई तुरंत समझ में आ जाएगी. इन ग्रंथो में हर तरह से ब्राह्मण-पुरोहितों को ही महत्वपूर्ण बताया गया है. ब्राह्मण-पुरोहितों का दलितों के दिलो-दिमाग पर हमेशा-हमेशा के लिए वर्चस्व बना रहे, इसलिए उन्हें ईश्वर से भी श्रेष्ठ बताया गया है. जिस ईश्वर ने सभी मनुष्यों को अपने द्वारा निर्मित इस सृष्टि की सभी वस्तुओं को समान रूप से उपभोग करने की पूरी आजादी दी है, उस ईश्वर के नाम पर ब्राह्मण-पंडा-पुरोहितों ने एकदम झूठ-मूठ ग्रंथों की रचना की है.  और दूसरों के मानवीय हक़ों को नकारते हुए स्वयं मालिक हो गए.

इस बात पर हमारे कुछ ब्राह्मण भाई यह सवाल उठा सकते हैं कि यदि ये तमाम ग्रंथ झूठ- मूठ के हैं, तो इन पर दलितों के पूर्वजों ने आस्था क्यों रखी थी? और आज भी क्यों रखे हुए हैं? इसका जवाब ये है कि कोई धूर्त आदमी किसी बड़े व्यक्ति के नाम से झूठा पत्र लिखकर लाए, तो कुछ समय के लिए उस पर भरोसा करना ही पड़ता है. बाद में समय के अनुसार वह झूठ उजागर हो ही जाता है. किसी समय ब्राह्मण-पंडा-पुरोहितों के ज़ुल्म-ज़्यादतियों का शिकार होने और दलितों को अनपढ़-गंवार बनाकर रखने की साजिश की वजह से उनका पतन हुआ.

ब्राह्मण-पंडा-पुरोहित लोग अपना पेट पालने के लिए, अपने पाखंडी ग्रंथों के माध्यम से, जगह-जगह बार-बार अज्ञानी शूद्रों को उपदेश देते रहे, जिसकी वजह से उनके दिलो-दिमाग़ में ब्राह्मणों के प्रति पूज्यबुद्धि उत्पन्न होती रही. इन लोगों को ब्राह्मणों ने, उनके मन में ईश्वर के प्रति जो भावना थी, वही भावना अपने लिए समर्पित करने के लिए मजबूर किया. यह कोई मामूली अन्याय नहीं है. इसके लिए उन्हें ईश्वर को जवाब देना होगा.


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