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म्यांमार में सैन्य तख्तापलट के ठीक पहले राष्ट्रपति के दफ़्तर में हुआ क्या था?

1100 से अधिक हत्याएं.हज़ारों गिरफ़्तारियां. लाखों लोगों का पलायन. इसके अलावा, महिलाओं के साथ बलात्कार, गांवों में हिंसक छापेमारियां, धार्मिक स्थलों पर हमले और विरोधियों को गायब करने जैसी घटनाएं दिनचर्या का हिस्सा बन चुकी हैं. ये म्यांमार में हुए तख़्तापलट का अब तक का हासिल है. एक फ़रवरी 2021 को सेना ने लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार को कुर्सी से उतार कर जेल में बंद कर दिया था. ये सब किसलिए किया गया? जैसा कि हर तानाशाह कहता है, उसने भी वही बात दोहराई थी. क्या? ये पूरा ताम-झाम डेमोक्रेसी को बचाने के लिए किया जा रहा है.

डेमोक्रेसी को बचाने का सबसे आसान उपाय यही है कि उसे उठाकर पिंजड़े में बंद कर दो. तानाशाही शासक यही झुनझुना दिखाकर अपनी निरंकुशता को जायज ठहराते रहे हैं. म्यांमार में उसी परंपरा का पालन हुआ है, तख़्तापलट के आठ महीने बाद म्यांमार के हालात और बिगड़े ही हैं. सैन्य सरकार का दमन जारी है. उन्होंने बाहर इतना ख़तरा पैदा कर दिया है कि डेमोक्रेसी को धूप दिखाने की कोई जहमत नहीं उठाई जा रही.

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फरवरी 2021 में सेना ने म्यांमार की सत्ता हथिया ली थी.

आपातकाल लगाते समय कहा गया था कि अगले एक बरस में फिर से चुनाव कराए जाएंगे. अगस्त 2021 में सेना अपने वादे से पलट गई. उसने कहा कि 2023 तक कोई चुनाव नहीं होगा. 2023 तक वे अपनी ज़ुबान पर कायम रहेंगे, कहा नहीं जा सकता.

आज बताएंगे, म्यांमार में इस समय के हालात क्या हैं? सेना चर्च और पादरियों को निशाना क्यों बना रही है? क्या म्यांमार में सिविल वॉर शुरू होने वाला है? और, तख़्तापलट से ठीक पहले राष्ट्रपति को किसने धमकी दी थी?

दुनिया कोरोना से जूझ रही थी, म्यांमार में तख्तापलट हो गया था

2021 की शुरुआत में दुनिया कोरोना महामारी को हराने की तैयारी कर रही थी. कोरोना की वैक्सीन्स को अप्रूवल मिल रहे थे. कई देशों ने वैक्सिनेशन प्रोग्राम भी शुरू कर दिया था. उसी समय म्यांमार में कुछ और ही खेल चल रहा था. एक फ़रवरी की सुबह अचानक से एक ख़बर फ़्लैश हुई –

म्यांमार में तख़्तापलट, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री गिरफ़्तार

ये ख़बर अप्रत्याशित थी भी और नहीं भी थी. ऐसा क्यों? इसकी वजह जान लीजिए. नवंबर 2020 में म्यांमार में आम चुनाव हुए. इसमें आंग सान सू ची की पार्टी नेशनल लीग फ़ॉर डेमोक्रेसी (NLD) ने भारी बहुमत के साथ जीत दर्ज़ की. सबसे बड़ी विपक्षी यूनियन सॉलिडेरिटी एंड डेवलपमेंट पार्टी (USDP) को ये नतीजा मंज़ूर नहीं था. उसने आरोप लगाया कि चुनावों में धांधली हुई है. USDP ने दोबारा चुनाव कराने की मांग भी कर दी. हालांकि, ये मांग मानी नहीं गई.

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नवंबर 2020 में म्यांमार में आम चुनाव हुए. इसमें आंग सान सू ची की पार्टी नेशनल लीग फ़ॉर डेमोक्रेसी (NLD) ने भारी बहुमत के साथ जीत दर्ज़ की.लेकिन चुनाव में धांधली के आरोप लगे.

चुनावी नतीजों के बाद सरकार बनाने की बारी आई. एक फ़रवरी 2021 का दिन तय किया गया. इस दिन नई संसद की बैठक होने वाली थी. संसद का दरवाज़ा खुलने से ठीक पहले ही खेल पलट गया. सेना ने राजधानी की मुख्य सड़कों को बंद कर दिया. टीवी चैनलों का प्रसारण रोक दिया गया. इंटरनेट पर रोक लगा दी गई. बाज़ारों और बैंकों पर ताला लगा दिया गया. राष्ट्रपति और स्टेट काउंसलर को अरेस्ट कर अज्ञात जगह पर ले जाया गया. कुछ समय बाद नेशनल टीवी पर ऐलान हुआ कि देश में आपातकाल लगा दिया गया है. सत्ता की बागडोर सेना प्रमुख मिन आंग लाइंग को सौंप दी गई है.

2015 में हुआ था फ्री इलेक्शन

म्यांमार में सैन्य शासन का लंबा इतिहास रहा है. वहां 1962 से 2011 तक मिलिटरी का शासन रहा है. 1991 में विरोध के बाद सेना ने चुनाव कराया था. वो चुनाव भी NLD ने जीता था. सेना ने नतीज़ों को रद्द कर दिया. आंग सान सू ची को नज़रबंद कर दिया गया. इसी दौरान उन्हें शांति का नोबेल प्राइज़ भी मिला था. लेकिन वो समारोह में हिस्सा लेने नहीं जा सकीं थी. म्यांमार में पहली बार फ़्री इलेक्शन 2015 में हुए. इसमें फिर से NLD की जीत हुई. पार्टी ने पांच सालों तक सुकून से शासन भी चलाया. आंग सान सू ची इस सरकार में स्टेट काउंसलर की भूमिका में थीं. ये पद उन्हीं के लिए बनाया गया था. आसान भाषा में कहें तो स्टेट काउंसलर के पास प्रधानमंत्री के स्तर की शक्तियां थी.

नवंबर 2020 के इलेक्शन में NLD का दोबारा जीतना सेना को रास नहीं आया. उसने लोकतांत्रिक सरकार के प्रतिनिधियों को जेल में बंद कर दिया. उनके ऊपर गंभीर मुकदमे लाद दिए गए. एक विशेष सैन्य अदालत इस मामले में सुनवाई कर रही है. 12 अक्टूबर को ऐसी ही एक सुनवाई में पूर्व राष्ट्रपति ‘ऊ विन मिंट’ की पेशी हुई. इस पेशी के दौरान उन्होंने बताया कि तख़्तापलट से ठीक पहले क्या हुआ था?

31 जनवरी 2021 को दो सीनियर आर्मी अफ़सर विन मिंट के दफ़्तर में घुसे. उनके पास एक चिट्ठीनुमा काग़ज़ था. उस पर पहले से ही बहुत कुछ टाइप किया हुआ था. अफ़सरों ने राष्ट्रपति से कुछ मिनट बात की. फिर बोले,

‘राष्ट्रपति महोदय! आपकी तबीयत ठीक नहीं लग रही है. आप बीमार हो चुके हैं. ऐसे में देश चलाना आपके बस की बात नहीं है. ये रही इस्तीफ़े की चिट्ठी. इस पर दस्तख़त करिए और घर जाकर आराम करिए.’

विन मिंट ये सुनकर चौंक गए. उन्होंने कहा,

‘मुझे क्या हुआ है? मैं पूरी तरह स्वस्थ हूं.’

उन्होंने इस्तीफ़े वाली चिट्ठी पर साइन करने से मना कर दिया. उन्होंने कहा कि मैं इस पर साइन करने से पहले मरना पसंद करूंगा. इस पर अफ़सरों ने उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी. इस घटना के कुछ घंटे बाद ही विन मिंट सेना की हिरासत में थे. उनकी जगह पर उप-राष्ट्रपति मिंट स्वे को राष्ट्रपति बना दिया गया था. जिन्होंने आपातकाल लगाकर सैन्य तख़्तापलट का रास्ता साफ़ कर दिया.

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पूर्व राष्ट्रपति ‘ऊ विन मिंट’

विरोधी नेताओं के ऊपर चल रही सुनवाई में प्रेस या आम जनता को जाने की इजाज़त नहीं है. जो कुछ अंदर घट रहा है, वो वकीलों के जरिए बाहर आ रहा है. विन मिंट और आंग सान सू ची पर जनता को हिंसा के लिए भड़काने का आरोप भी लगा है. इस पर उन्होंने कहा कि जब पार्टी के फ़ेसबुक पेज से प्रोटेस्ट के लिए कहा जा रहा था, उस समय वे हिरासत में थे. उन्हें इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है. इसलिए, उकसावे का आरोप उन पर फ़िट नहीं बैठता. इसी मामले में आंग सान सू ची भी पहली बार अपना बयान दर्ज़ कराएंगी.

अदालत में आंग सान सू ची पर वॉकी-टॉकी की अवैध खरीदारी और इलेक्शन कैंपेन के दौरान कोरोना प्रोटोकॉल्स का पालन न करने को लेकर भी मुकदमा चलेगा. भ्रष्टाचार के मामले में आरोप साबित होने पर उन्हें 15 बरस की सज़ा हो सकती है. इसके अलावा, उनके ऊपर ऑफ़िशियल सीक्रेट्स ऐक्ट के उल्लंघन का आरोप भी है. इस मामले में 14 बरस तक की क़ैद का प्रावधान है.

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विन मिंट और आंग सान सू ची पर जनता को हिंसा के लिए भड़काने का आरोप भी लगा है

म्यांमार में और क्या चल रहा है?

चिन ह्यूमन राइट्स ऑर्गेनाइज़ेशन (CHRO) म्यांमार के चिन लोगों और हाशिये पर रह रहे दूसरे लोगों के मानवाधिकारों की रक्षा के लिए काम करती है. ये संस्था 1995 में स्थापित हुई थी. CHRO ने तख़्तापलट के बाद की 20 घटनाएं दर्ज़ की हैं, जिसमें सेना ने अल्पसंख्यक ईसाईयों को अपना निशाना बनाया. ईसाई म्यांमार की आबादी में छह प्रतिशत की हिस्सेदारी रखते हैं. म्यांमार में बौद्ध बहुसंख्यक हैं. सेना और सरकार में बौद्ध लोगों का एकाधिकार है.

चिन स्टेट में पांच लाख की आबादी रहती है. इनमें से 85 फीसदी ईसाई हैं. 19 सितंबर को सेना ने चिन स्टेट के एक गांव में आग लगा दी. आग बुझाने आए एक पादरी को गोली मार दी गई. हत्या के बाद सैनिकों ने उसकी ऊंगली काटकर अंगूठी निकाल ली. ये इकलौती बर्बरता नहीं है. अल जज़ीरा की रिपोर्ट के अनुसार, एक फ़रवरी के बाद से सेना ने कई चर्चों को तबाह कर दिया. बड़ी संख्या में पादरियों को अरेस्ट किया गया है. कई ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जिसमें चर्च को मिलिटरी बेस में बदल दिया गया.

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एक फ़रवरी के बाद से सेना ने कई चर्चों को तबाह कर दिया. बड़ी संख्या में पादरियों को अरेस्ट किया गया है

अब लोग चर्च में जाने से डरने लगे हैं. क्योंकि वहां कब हमला हो जाए या कोई बम गिराकर चला जाए, कहना मुश्किल है. सेना चर्चों पर हमले के फ़ैसले का बचाव करती रही है. उसका कहना है कि वहां विद्रोही छिपे होते हैं, इसलिए हमला करना ज़रूरी हो जाता है. चिन के अलावा काया प्रांत में 46 फीसदी लोग ईसाई हैं. जबकि कचिन प्रांत में 34 फीसदी ईसाई धर्म को मानते हैं. काया में अभी तक पांच बड़े चर्च सेना के हमले में बर्बाद हो चुके हैं. अल जज़ीरा की रिपोर्ट में मई 2021 की एक घटना का ज़िक्र है.

22 मई को पड़ोस के शहर से तीन सौ से अधिक लोग एक ईसाई गांव में शरण लेने आए. उन्हें चर्च और पादरियों के घर पर जगह दी गई. गांववालों ने घर में रखे चाकू तक फेंक दिए. उन्होंने कंपाउंड में सफ़ेद झंडा लगा दिया. ताकि सेना उन पर हमला न करे. अगले दिन सैनिक वहां पहुंचे. उन्होंने कहा कि अगर कोई चर्च से बाहर निकला तो उसे गोली मार दी जाएगी. गांववालों ने उनकी बात मान ली. लेकिन रात होते-होते गोलीबारी शुरू हो गई. दो घंटे तक चली गोलीबारी में तीन लोगों की मौत हो चुकी थी, जबकि आठ लोग घायल थे. अगले दिन तक पूरे चर्च को लूटा जा चुका था. उसके बाद से सैनिक जब भी उस गांव में आते, वे उसी चर्च में ठहरने लगे.

विद्रोही गुट क्या कर रहे हैं?

ऐसा ही वाकया कई और जगहों पर हुआ. सेना धार्मिक किताबों को जलाने और पादरियों को गिरफ़्तार करने से भी बाज नहीं आती. उन्हें शक रहता है कि ये लोग विद्रोही गुट का साथ दे रहे हैं. विद्रोही गुट क्या कर रहे हैं? उन्होंने सेना के ख़िलाफ़ छापामार लड़ाई जारी रखी है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अभी तक 15 सौ से अधिक सैनिकों को मारा गया है. इन हमलों का बदला लेने के लिए सेना आम लोगों की जान लेती है. सैनिक गांवों को जलाकर चले जाते हैं. लंबे समय से इसी तरह बदले की लड़ाई चल रही थी. अब सेना आर-पार के मूड में आ गई है. म्यांमार नाउ की रिपोर्ट के अनुसार, सैन्य सरकार निर्णायक लड़ाई की तैयारी कर रही है. अपर म्यांमार में तीन हज़ार सैनिकों को तैनात किया गया है. सैन्य अधिकारियों के परिवारों को उन इलाकों से शिफ़्ट किया जा रहा है.

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15 सौ से अधिक सैनिकों भी मारे गए हैं.

दावा किया जा रहा है कि आने वाले कुछ समय में सेना और विद्रोही गुटों के बीच ज़बरदस्त लड़ाई छिड़ने वाली है. सेना विद्रोहियों के मनोबल को तोड़ने के इरादे से ऑपरेशन प्लान कर रही है. अगर वो इसमें सफ़ल रहे तो म्यांमार में लोकतंत्र का ख़्वाब और दूर हो जाएगा.

अंतरराष्ट्रीय मंच पर म्यांमार को लेकर क्या चल रहा?

ये तो हुई म्यांमार की स्थानीय नीति. अंतरराष्ट्रीय मंच पर म्यांमार को लेकर क्या चल रहा है? 24 अप्रैल 2021 को आसियान के नेताओं की बैठक हुई. म्यांमार भी इस संगठन का सदस्य है. अप्रैल में हुई बैठक में म्यांमार के हालात पर भी चर्चा हुई. इसमें नेताओं के बीच पांच बिंदुओं पर सहमति बनी थी. हिंसा रोकने, बैठकर बात करने, मानवीय मदद शुरू करने के अलावा इसमें एक और बिंदु पर सहमति बनी थी. कहा गया था कि आसियान के विशेष दूत और एक डेलिगेशन म्यांमार जाकर हालात का जायजा लेगी और वहां सभी पक्षों से मुलाक़ात करेगी.

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मिलिटरी हुंटा ने कहा है कि डेलिगेशन को म्यांमार में आने से नहीं रोका जाएगा. लेकिन उन्हें आंग सान सू ची से मिलने नहीं दिया जाएगा.

14 अक्टूबर को इस संबंध में बड़ा अपडेट आया है. मिलिटरी हुंटा ने कहा है कि डेलिगेशन को म्यांमार में आने से नहीं रोका जाएगा. लेकिन उन्हें आंग सान सू ची से मिलने नहीं दिया जाएगा. हुंटा का कहना है कि सू ची पर अभी मुकदमा चल रहा है. इसलिए, उन्हें किसी से मिलने की इजाज़त नहीं दी जा सकती. 26 अक्टूबर को आसियान की बैठक शुरू होने वाली है. इस बैठक से पहले आसियान का एक डेलिगेशन म्यांमार की यात्रा करने वाला था. म्यांमार सरकार अप्रैल में किए गए वादों पर अमल करने में नाकाम रही है. इससे आसियान के सदस्य देश नाराज़ चल रहे हैं. मलेशिया और फ़िलीपींस ने म्यांमार को बैठक से बाहर करने की मांग की है. इस संबंध में अंतिम फ़ैसला क्या आता है, ये देखना दिलचस्प होगा.


दुनियादारी: म्यांमार में तख़्तापलट से पहले राष्ट्रपति को किसने धमकाया था?

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