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चंचल मन 4: प्राग के बाद वियना हैंगओवर उतरने जैसा है

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avinash chanchal profile picअविनाश चंचल इन दिनों यूरोप में हैं. चेक रिपब्लिक के शहर प्राग की गलियों में पैदल फिरने के बाद उनका इस शहर से प्रेम फिर जवान हो गया है. उनकी यूरोप डायरी की यह तीसरी किस्त है.

पढ़ें यूरोप डायरी की पहली किस्त
पढ़ें यूरोप डायरी की दूसरी किस्त
पढ़ें यूरोप डायरी की तीसरी किस्त


सुबह के 6 बजे हैं. धुंधलका है. दिन यहां साढ़े सात से पहले नहीं चढ़ता. हम प्राग बस स्टेशन पर हैं. कुछ देर में चेस्की जाने वाली बस में होंगे. हम प्राग से चेस्की जा रहे हैं. घने जंगलों के बीच से रास्ता है. बीच-बीच में गांव भी दिख रहे हैं- कंट्रीसाइड. लाल टीन के छत वाले घर. किसी पेंटिंग जैसा. हमारे यहां दीवालों पर जो कैलेंडर टंगे होते हैं वैसे ही. मुझे सतपुड़ा के जंगल याद आ रहे हैं. सिंगरौली से भोपाल-जबलपुर जाते हुए यहां से भी सुंदर दृश्य बिखरे होते हैं. अलग बात है कि हम उन्हें घर का कैलेंडर नहीं बनाते.

प्राग से चेस्की के बीच दूर तलक हरे घास का मैदान है जिस पर सर्दियों की धूप बिखरी है. हाल ही में जोती गई मिट्टी है एकदम काली. कहीं-कहीं बर्फ में जमी नदी है. घरों की बनावट वैसी ही है जैसे हमारे यहां बड़े लोग पहाड़ों पर अपना फ़ार्म हाउस बनाते हैं. उठक-बैठक से करते पहाड़ हैं. छोटे-छोटे गांव हैं. बहुत सारी नदियां हैं. चीड़ और देवदार के पेड़ हैं. खूब सुंदर-सुंदर घर हैं. लग रहा है घरों पर लोगों ने रंगों की बाल्टियां उड़ेल दी है. रंगों का इतना सुंदर प्रयोग बहुत कम ही दिखता है.

अपने देश के उन आदिवासी गांवों को याद करता हूं जहां पहली बार दिवाल पर रंगों का खूब सारा प्रयोग देखकर मन खुशी से भर गया था. मध्य यूरोप के कंट्रीसाइड दिल के बेहद करीब लगे. गांव, पहाड़, जंगल, नदी और सर्दियों को खुद में समेटे.

चेस्की बहुत बच्चे सा शहर है. वल्तावा नदी के किनारे, पहाड़ों की उबड़खाबड़ ऊंचाई में बसा एक कस्बा. देखने के लिहाज से यहां एक बहुत पुराना कैसल है. महसूस करने के लिये खूब सारा इत्मीनान, शांति और तसल्ली से भरी छोटी सी जिन्दगी. यहां लोगों ने घर को खूब सजा रखा है. पेड़-फूल-वुडेन हाउस लुभाते हैं. चेस्की दुनिया का एकमात्र ऐसा शहर है जहां बोर्क्यू थियेटर है. इस थियेटर में 16वीं सदी के साजो-सम्मान और सेट अभी भी उपयोग में लाए जाते हैं.

सेस्की में हमने करीब 10 किलोमीटर की चढ़ाई उतराई वाले रस्ते तय कर लिए हैं लेकिन कोई थका नहीं है. यहां चाइनीज रेस्तरां तीन हैं. कई सारे वियतनाम और चीन के लोग दुकानदार हैं.

पिछले पांच दिनों से यूरोपीय ब्रेड खा-खा कर हम लगभग उकता चुके हैं. चाइनीज फूड खाते हुए लगा- अपने देश का खाना मिल गया. बहुत दिनों बाद भरपेट खा पा रहे हैं- मन हिन्दी-चीनी भाई-भाई का नारा लगा रहा है. चेस्की हम सबको अच्छा लग रहा है. चेस्की को विदा करते हुए साथ गई दोस्त कहती है- इट इज लाइक अ फैयरलैंड.

दूसरे दिन हम वियना के लिये रवाना हो गए हैं. चेक रिपब्लिक से आस्ट्रिया. एक देश से दूसरे देश में प्रवेश करना यहां शहर बदलने जितना ही सहज है जबकि हमारे जैसे सख्त सरहदों में रहने वाले देश के लिये लगभग एक दुनिया से दूसरी दुनिया में प्रवेश करने जैसा.

वियना का मुख्य रेलवे स्टेशन किसी शॉपिंग सेन्टर जैसा है. बाकी रेलवे स्टेशन हमारे देश सा ही दिख रहा है. प्लेटफॉर्म पर कोई दुकान नहीं है. ट्रेन में रेस्तरां है. एक लड़की सामान बेचने वाली ट्रॉली लाई है. मैंने कॉफी का ऑर्डर दिया है, एक दोस्त ने अपने लिये बियर. दोनों की कीमत एक ही- दो यूरो. इन देशों में बियर के प्रति लोगों का मोह देखने लायक है. खाते-बतियाते-चलते हुए हर दूसरा बियर पी रहा है. हमारे यहां जैसे चाय पीते हैं, ठीक-ठीक उतनी ही लोकप्रियता यहां बियर की है. वियना में हमारे मेजबान मैक बताते हैं- यूरोप के लगभग देशों का अपना बियर स्टाइल अलग है. इनके लिये बियर राष्ट्रीय गर्व है. सिर्फ इटली है, जहां वाइन पी जाती है.

वियना में दो चीजें शानदार हैं. एक यहां के चौक-चौराहे पर यूज़्ड किताबों की आलमारी. इस आलमारी में लोग अपनी पुरानी किताबें रख जाते हैं और इसे कोई भी मुफ़्त में पढ़ने के लिए ले जा सकता है. दूसरा साइकिल के लिए अलग से ट्रैक.

सड़कों पर साइकिल के लिए अलग से ट्रैक बने हैं. जगह जगह साइकिल स्टैंड है जहां किराए पर साइकिल ली जा सकती है. लोग भी खूब साइकिल की सवारी करते दिखते हैं. ट्रेनों में साईकिल के लिये अलग से डब्बे बने हैं. चौराहे पर साइकिल वाले आदमी की मूर्ती लगी है. प्रेमी जोड़े साईकिल पर जाते हुए एक-दूसरे को चूम रहे हैं. पूरब के देशों में साइकिल को लेकर जो वर्गीय अभिजात्यपन है, वो यहां झटके से टूट जाता है.

खूब सारे अनजान लोगों से बात करने का मौका मिला. एक ऐसी ही अनजान लड़की मिली ऑस्ट्रेलिया की ओल्गा. जर्मनी के किसी बड़े बैंक में अधिकारी है. भारत आना चाहती है. मुझसे बनारस के बारे में पूछा. मैंने उसे बिहार आने का न्योता दे डाला. वो भारतीय योग और ध्यान की संस्कृति को लेकर उत्सुक थी. उसको लगता है भारत में जिन्दगी सुकून भरी है. मैंने उसे बताया हम फिलहाल अमरीकी अर्थव्यवस्था की चक्की में पिस रहे हैं. बारह घंटे की नौकरी और मुनाफाखोर संस्कृति ने भारतीय जिन्दगी की स्पीड को काफी तेज कर रखा है.

वियना सूखा शहर है. अगर यहां की ऐतिहासिक इमारतों और संगीत के इतिहास को छोड़ दिया जाए तो ये दिल्ली जैसा ही है. एक कॉस्मोपोलिटन सिटी. पता नहीं पर लोगों का चेहरा लगभग किसी अनजाने दुख में लटका पड़ा है.

प्राग में क्रोएशिया की दोस्त ने ठीक ही कहा था, प्राग के बाद वियना हैंगओवर उतरने जैसा है. वियना इज वैरी कंजर्वेटिव सिटी. ऑस्ट्रिया में हमारी मेजबान ईना बताती है कि यहां बेरोजगारी भत्ता 700 यूरो है. अगर आपके पास नौकरी है तो आपसे वेलफेयर टैक्स लिया जाता है और नौकरी खत्म होने पर आपको फिर से वो टैक्स बेरोजगारी भत्ता के रूप में लौटा दिया जाता है. वियना में इन दिनों मिडल ईस्ट से आए शरणार्थी दिख रहे हैं. सड़कों के किनारे दयनीय हालत में.

ऑस्ट्रिया और यूरोप के ज्यादातर देशों में इस बात को लेकर खूब बहस छिड़ी हुई है कि इन्हें अपनाया जाए या नहीं. युद्ध पूरी मानव सभ्यता के लिये खतरनाक है. सत्ता हासिल करने के कुछ मुट्ठी भर लोगों की लड़ाई में लाखों लोगों को अपना घर छोड़ कर भागना पड़ रहा है और एक शरणार्थी का जीवन व्यतीत करना पड़ रहा है. कम जनसंख्या वाले देश ऑस्ट्रिया में इस समस्या को एक अवसर के रूप में भी देखा जा रहा है. यहां युवाओं की संख्या काफी कम है, ज्यादातर बूढ़े हैं. शरणार्थियों की बड़ी संख्या को कामगार बनाए जाने की संभावना है, जो अर्थव्यवस्था को गति दे सकते हैं. लेकिन दक्षिणपंथी समूह इसे अपनी संस्कृति पर खतरा मान रहे हैं और इन शरणार्थियों का कड़ा विरोध भी कर रहे हैं.

वियना के बाद सल्जबर्ग हमारा आखिरी पड़ाव है. ऐल्प्स की सुंदर बर्फीली पहाड़ियों के निकट बसा शहर. मोजार्ट का शहर. म्यूजिम और संगीत का खूब सुंदर मेल हुआ है इस शहर में. फिर हम लौट आते हैं.

मोजार्ट के घर के बाहर संगीत #salzburg #Mozart

A video posted by Avinash Chanchal (@lonesome__traveler) on

इस बीच जितनी यात्राएं करता हूं. सुन्दर-सुन्दर जगहों पर जाता हूं. मन होता है यहीं बस जाया जाए- प्राग के किसी होस्पोदा में वेटर बनकर, चेस्की में कोई कमरा किराया लेकर, शिमला और नौनीताल में कोई कैफे या किताबों की दुकान खोलकर, दूर सतपुड़ा के जंगलों में कोई झोपड़ी बनाकर. हजारों बार मन ने ऐसी योजनाएं बनाई हैं.

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लेकिन लौटना पड़ा है. अपनी जिन्दगी में. रोजमर्रा के कामों में. उस जीवन में जो सचमुच का अपना है, जिसे हम देखते नहीं जीते हैं. खुद से गढ़ते हैं. फिर लगता है जो जी जा रही जिन्दगी है, उसे ही सुंदर बनाया जाये. खूबसूरत और बेहतर.

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