Submit your post

Follow Us

शांति के लिए नोबेल पाने वाला अपने देशवासियों के लिए काल क्यों बन गया?

एक बड़ी समझदार लोकोक्ति है-

सब दिन होत न एक समाना.

समय एक सा नहीं रहता. ना सुख, ना दुख, कुछ स्थायी नहीं होता. मैं भी आपको समय के इसी हेरफ़ेर का क़िस्सा बता रही हूं. ये क़िस्सा ट्रांसफॉर्मेशन का है. आम आदमी से बाग़ी बनने की यात्रा. बाग़ी से शासक बनने का सफ़र. और फिर शासक से दोबारा बाग़ी बन जाने की जर्नी. इस सफ़र के चलते एक देश में ऐसी तबाही आई कि पूछिए मत. सामूहिक हत्याएं, सामूहिक रेप हुए. आठ महीनों के भीतर करीब 20 लाख लोग बेघर हो गए. 70 हज़ार से ज़्यादा लोगों को देश छोड़कर भागना पड़ा.

ये ऐसी लड़ाई थी, जहां जीतने के लिए अनाज को हथियार बना लिया गया. देश की सेना ने अपने ही नागरिकों का खाना छीनना शुरू कर दिया. उनके खेत जला दिए. अनाज के गोदाम, दुकानें लूट लीं. गरीब किसानों के मवेशियों को मार डाला. ताकि लोग ना केवल आज भूखे रहें. बल्कि भविष्य में भी पेट भरने की कोई आस न बचे उनके लिए. और ये सब उस सरकार ने किया, जिसका मुखिया शांतिदूत होने का सर्वश्रेष्ठ वैश्विक सम्मान पा चुका है. ये पूरा मामला क्या है, विस्तार से बताते हैं.

ईश्वर का चुना गया राजा

एक प्राचीन साम्राज्य का 225वां राजा. वो मानता था कि वो ‘इलेक्ट ऑफ़ गॉड’ है. उसे ख़ुद ईश्वर ने चुना है. दर्जनों अंगरक्षकों के अलावा कई शेर और चीते चौबीसों घंटे उसकी हिफ़ाजत में तैनात रहते. मगर फिर वक़्त बदला. ख़बर आई कि सेना ने राजा का तख़्तापलट कर दिया है. करीब एक बरस बाद फिर से ख़बर आई कि 82 साल के राजा नींद में चल बसे. बाद में पता चला कि तकिये से दम घोंटकर उन्हें मारा गया था.

कौन था वो राजा? उनका नाम था, हाइली सलासी. कहां के शासक थे वो? पूर्वी अफ्रीका में एक देश है, इथियोपिया. बहुत पहले इसका एक नाम एबिसिनिया भी हुआ करता था. मैप पर इथियोपिया की लोकेशन देखिए. इसके उत्तर में है एरट्रिया. पूरब में हैं जिबूती और सोमालिया. पश्चिम की दिशा में बसा है सूडान, साउथ सूडान. और इसके दक्षिण में पड़ता है केन्या.

Untitled Design (3)
इथियोपिया के उत्तर में एरट्रिया, पूरब में सोमालिया, पश्चिम में सूडान, और दक्षिण में केन्या पड़ता है.

कहते हैं कि इथियोपिया का इतिहास मानव सभ्यता का दस्तावेज़ है. ये अफ्रीका का वही हिस्सा है, जहां से निकलकर इंसानों के पूर्वज दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में पहुंचे. ख़ैर, तो इसी इथियोपिया में एक प्राचीन साम्राज्य था- हाउस ऑफ़ सोलोमोन. मान्यता है कि इनका संबंध बाइबिल में वर्णित इज़रायल के किंग सोलोमन से है.

कहते हैं कि इथियोपिया की एक रानी थीं, क्वीन माकेदा. उनका किंग सोलोमन के साथ एक बच्चा हुआ. नाम रखा गया- मेनेलिक प्रथम. हाउस ऑफ़ सोलोमोन ख़ुद को इन्हीं मेनेलिक प्रथम का वंशज मानता है. 13वीं सदी में शुरू हुए इस साम्राज्य ने 1974 तक इथियोपिया पर शासन किया. 1974 वही साल है, जब हाइली सलासी की गद्दी छिन गई. उनके साथ ही उनका वो साम्राज्य भी ख़त्म हो गया.

सलासी को अपदस्थ किया था मार्कसिस्ट विचारधारा वाले कुछ आर्मी अफ़सरों ने. तख़्तापलट के सहारे वो सत्ता में आ गए. उन्होंने ख़ुद को नाम दिया- प्रॉविज़नल मिलिटरी गवर्नमेंट ऑफ़ सोशलिस्ट इथियोपिया. शॉर्ट में लोग इसे बुलाते थे- दी डर्ग. अपने 17 साल के शासन में इस सैन्य शासन ने कई नरसंहार करवाए.

अनुमान के मुताबिक, इन्होंने सात लाख से ज़्यादा लोगों को मरवाया. इस क्रूर सत्ता के विरोध में कई बाग़ी गुट आगे आए. इनमें से ही एक गुट था- टिग्रे पीपल्स लिबरेशन फ्रंट. शॉर्ट में, TPLF. इथियोपिया का सबसे सुदूर उत्तरी प्रांत है, टिग्रे. ये इथियोपिया के 10 प्रांतों में से एक है. यहां तीन मुख्य जनजातियों की बसाहट है- टिगरायन, इरोब, और कुनामा.

टिग्रे विरोध की कहानी

70 के दशक में इसी टिग्रे प्रांत के भीतर TPLF का गठन हुआ. TPLF शुरुआत में ये एक छोटा सा गिरोह था. मगर इन्हें इतना जनसमर्थन मिला कि जल्द ही वो बड़ी गुरिल्ला आर्मी बन गया. क्या चाहता था TPLF? इस सवाल का जवाब जानने के लिए आपको टिग्रे का थोड़ा अतीत जानना होगा. टिग्रे को बहुत लंबे समय से इथियोपियन सरकार और हुकूमत करने के उनके सेंट्रलाइज़्ड तरीके से दिक्कत रही है. सेंट्रलाइज़्ड तरीका मतलब जहां पावर एक जगह पर सिमटी हो.

इसके खिलाफ़ टिग्रे का पहला विरोध भड़का 19वीं सदी के आख़िर में. ये प्रकरण 1896 का है. तब इथियोपिया में राजा मेनेलिक का शासन था. इटली इथियोपिया में अपने पांव पसारना चाहता था. उसने इथियोपिया पर हमला किया. किंग मेनेलिक ने युद्ध लड़ने के लिए अपने करीब 80 हज़ार सैनिकों को रवाना किया. युद्ध का मैदान था, टिग्रे स्थित अडवा शहर. इस युद्ध में इटली हार गया.

Tigray People's Liberation Front
सरकार के विरोध के चलते बना संगठन TPLF आज दोबारा बाग़ी तेवर दिखा रहा है.

मगर इस जंग के चलते टिग्रे के लोग अपने राजा से बहुत नाराज़ हो गए. टिग्रेवासियों का कहना था कि किंग मेनेलिक ने सेना तो भेजी, मगर उन्हें पर्याप्त राशन नहीं दिया. इसके चलते इथियोपियन सैनिक टिग्रेवासियों के संसाधन लेने लगे. लोगों ने विरोध किया, तो उन्हें मार डाला गया. टिग्रेवासियों के मुताबिक, युद्ध में दुश्मन के जितने सैनिक मारे गए, उससे ज़्यादा तो टिग्रे के लोग मारे गए. अपने ही राजा की सेना के हाथों. तब से ही यहां लोगों के मन में राजशाही के प्रति असंतोष पलने लगा.

वर्ल्ड वॉर के समय भी ऐसी ही घटना की पुनरावृत्ति हुई. इस वक़्त इटली और इथियोपिया में फिर युद्ध हुआ. इसका बैटल ग्राउंड भी टिग्रे ही बना. इस दफ़ा भी यहां के लोगों को जान-माल का बहुत नुकसान हुआ. इस युद्ध में इटली की जीत हुई. इथियोपिया के राजा को देश से भागना पड़ा था.

विश्व युद्ध में इटली की हार के बाद 1943 में इथियोपियन किंग शासन करने वापस अपने देश पहुंचे. टिग्रे को लगा, इस राजशाही से मुक्त होना का यही मौका है. उन्होंने विद्रोह कर दिया. राजा ने इस विद्रोह को बड़ी क्रूरता से दबा दिया. टिग्रे को राजा के साथ शांति समझौता करना पड़ा. मगर टिग्रेवासियों के जेहन में ये यादें एक टीस की तरह ज़िंदा रहीं.

ये बैकग्राउंड बताने के बाद वापस लौटते हैं TPLF पर. उसने टिग्रे के लोगों को 1943 के नाकाम सशस्त्र विद्रोह की याद दिलाई. कहा, जो तब नहीं हुआ, वो अब होगा. हम जीतकर रहेंगे. लोग उन्हें सपोर्ट करने लगे. शुरुआत में एक छोटा सा गिरोह रहा TPLF 70 का दशक ख़त्म होते-होते वो एक बड़ी गुरिल्ला आर्मी बन गया.

इस वक़्त इथियोपिया में सोवियत के समर्थन वाली सैन्य सरकार थी. उसने इनसर्जेंसी दबाने के लिए हाथ खोलकर हिंसा की. इस काउंटर-इनसर्जेंसी के चलते सबसे ज़्यादा नुकसान हुआ टिग्रे को. वहां हज़ारों लोगों की जान तो गई है. साथ ही, भीषण अकाल भी आ गया. इन यातनाओं ने TPLF को मिलने वाला जन समर्थन और बढ़ा दिया. 80 का दशक ख़त्म होते-होते TPLF इथियोपिया में सक्रिय सबसे मज़बूत बाग़ी गुट बन गया.

EPRDF का गठन और ज़ेनावी की सरकार

शुरुआत के कई साल इथियोपिया के बाग़ी गुट अलग-अलग लड़ते रहे. फिर इन्होंने सोचा, हमारा दुश्मन एक है. तो क्यों न संगठित होकर उससे लड़ा जाए. इसी विचार के चलते 1988 में विद्रोही गुटों ने मिलकर एक संगठन बनाया. इसका नाम रखा गया- इथियोपियन पीपल्स रेवॉल्यूशनरी डेमोक्रैटिक फ्रंट. शॉर्ट में इसे EPRDF कहते हैं.

इस EPRDF का लीडर था TPLF. उसके नेतृत्व में विद्रोहियों ने मिलकर सरकार के खिलाफ़ मोर्चा खोल दिया. ख़ूब लड़ाई हुई. इस लड़ाई में विद्रोही जीत गए. 28 मई, 1991 को TPLF के नेतृत्व में बाग़ियों ने इथियोपिया की राजधानी आदिस अबाबा को जीत लिया.

अब TPLF के नेतृत्व में गठबंधन सरकार बनी. ये सरकार अलग-अलग क्षेत्रीय ताकतों का गठबंधन थी. मगर इस सरकार में भी TPLF का ओहदा सबसे ऊपर था. इसीलिए TPLF के लीडर मेलेस ज़ेनावी राष्ट्रपति बनाए गए. इस नई सरकार में टिग्रे के लोगों का बोलबाला था. सेना से लेकर खुफ़िया एजेंसियों तक, हर जगह टिग्रे डॉमिनेटिंग फोर्स बन गया.

Meles Zenawi
मेलेस ज़ेनावी ऐथनिक फ़ेडेरेलिज़्म के जनक माने जाते हैं.

ज़ेनावी 1991 से 1994 तक राष्ट्रपति रहे. 1994 में इथियोपिया का नया संविधान लागू हुआ. इसमें शासन का सबसे पावरफुल पद था, प्रधानमंत्री. सो 1995 में मेलेस ज़ेनावी देश के प्रधानमंत्री बन गए. 2012 में अपनी मौत तक ज़ेनावी इथियोपियन पॉलिटिक्स को डॉमिनेट करते रहे. सरकारी कामकाज के हर छोटे-से-छोटे पक्ष पर उनकी पकड़ थी. वो बहुत मेहनती थे. जनता कहती थी कि वो कभी आराम नहीं करते. ज़ेनावी की सरकार को ईमानदार माना जाता था. वो ख़ुद भी बहुत सादगी से रहते थे.

उनके नेतृत्व ने इथियोपिया को कई अच्छी चीजें दीं. एक समय बेहद सीक्रेटिव माना जाने वाला इथियोपिया बाहरी दुनिया के लिए खुलने लगा. बड़ी विदेशी कंपनियां वहां निवेश करने लगीं. वो आतंकवाद के मसले पर भी पश्चिमी देशों के साथ थे. इंटरनैशनल कम्युनिटी उन्हें नए अफ्रीका का चेहरा कहती थी.

तो क्या ज़ेनावी में कोई कमी नहीं थी? बिल्कुल थी. वो आलोचकों और विरोधियों के प्रति बेहद असहिष्णु थे. विपक्ष को टारगेट करना. पत्रकारों को चुप कराने के लिए उनपर आतंकवाद जैसे भीषण आरोप लगा देना. ये सब ज़ेनावी के कामकाज का हिस्सा था. मगर तमाम आलोचनाओं के बावजूद ज़ेनावी को टक्कर देने वाली कोई हस्ती नहीं थी इथियोपिया में. इसीलिए उनके रहने तक चीजें TPLF के कंट्रोल में रहीं.

प्रधानमंत्री जिसे नोबेल मिला

2012 में ज़ेनावी की मौत हुई. उनके बाद प्रधानमंत्री बने उनके उत्तराधिकारी हेलेमरियम डेसाले. डेसाले डेप्युटी तो बढ़िया थे, मगर उनमें लीडरशिप क्वॉलिटी नहीं थी. उनके कमज़ोर नेतृत्व के चलते TPLF की ताकत घटने लगी. अब तक वो गठबंधन का सर्वेसर्वा था. मगर अब डेसाले की कमज़ोर लीडरशिप के चलते बाकी क्षेत्रीय शक्तियां सिर उठाने लगीं. PM डेसाले इस बग़ावत को संभाल नहीं पाए. उनकी छुट्टी हो गई. TPLF के हाथ से प्रधानमंत्री पद निकल गया. 2018 में डेसाले की जगह नए प्रधानमंत्री बनाए गए ऐबी अहमद. ऐबी ओरमो समुदाय से आते हैं.

टिग्रे और TPLF इस राजनैतिक बदलाव को बर्दाश्त नहीं कर पाया. उन्हें इतने सालों बाद अपने हाथ से पावर छिनना बहुत अखरा. इसीलिए ऐबी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही टिग्रे में नाराज़गी थी. ऐबी सरकार और TPLF के बीच महीनों तक तनाव बढ़ा रहा. दोनों एक-दूसरे पर आरोप लगाते रहे.

Abiy Ahmed
नोबेल प्राइज़ जीतने वाले पहले इथियोपिन है ऐबी अहमद.

महीनों की तनातनी के बीच आया अगस्त 2020. इस महीने इथियोपिया में चुनाव होने थे. ऐबी सरकार ने कोरोना का नाम लेकर चुनाव टाल दिया. कहा, 2021 में करवाएंगे. टिग्रे और TPLF ने इसका विरोध किया. सितंबर 2020 में सरकार के खिलाफ़ जाकर टिग्रे ने प्रांतीय चुनाव करवाया. इसमें TPLF को बहुमत मिला. इसके बाद से दोनों पक्षों के बीच पसरा तनाव और बढ़ गया. ऐबी सरकार ने टिग्रे की फंडिंग पर कैंची चला दी.

इस तनाव में तीली लगाई नवंबर 2020 की एक घटना ने. क्या घटना थी ये? टिग्रे की राजधानी है, मैकेल. यहां इथियोपियन सेना के नॉदर्न कमांड का मुख्यालय है. 3 और 4 नवंबर, 2020 की दरमियानी रात TPLF ने यहां सेना के एक ठिकाने पर हमला किया. TPLF ने यहां रखे हथियार चुराने की कोशिश की. बाग़ी से शासक बना TPLF दोबारा अपनी जड़ों की तरफ लौट गया था. वो दोबारा एक विद्रोही गुट बन गया था.

आर्मी के ठिकाने पर हुए हमले के जवाब में सरकार ने क्या किया? उसने टिग्रे पर धावा बोल दिया. सरकार ने कहा कि लड़ाई कुछ हफ़्तों में निपट जाएगी. मगर ये लड़ाई पिछले आठ महीने से जारी है. इसकी एक बड़ी वजह है, सेना का ढांचा. TPLF बरसों तक पावर में रहा था. उस दौर से ही इथियोपियन आर्मी में टिग्रे का वर्चस्व है. जब आर्मी ने टिग्रे पर चढ़ाई की, तो ये अधिकारी बंट गए. इसके चलते सेना में एक आंतरिक कलह शुरू हो गया.

ऐबी गवर्नमेंट ने इसका क्या हल खोजा? वो अमहारा प्रांत से मिलिशिया लड़ाकों को लड़ने के लिए टिग्रे ले आए. पड़ोसी देश एरट्रिया ने भी ऐबी की मदद के लिए अपनी सेना भेजी. इथियोपियन आर्मी ने टिग्रे की राजधानी मैकेल समेत यहां के कई शहरों पर कब्ज़ा कर लिया. लड़ाई में पीछे होने पर TPLF और उसके साथी लड़ाके पहाड़ों में जाकर छुप गए. यहीं से वो समय-समय पर हमला करते रहते.

आज क्यों बता रहे हैं ये इतिहास

इसलिए कि इथियोपिया में छिड़े इस गृह युद्ध से जुड़ा एक बड़ा अपडेट आया है. बीते दिन, यानी 28 जून को इथियोपियन सेना टिग्रे की राजधानी मैकेल से रीट्रीट कर गई. यानी, उसने यहां से अपने पांव पीछे खींच लिए. इसके बाद TPLF और बाकी टिग्रे विद्रोहियों ने मैकेल पहुंचकर यहां कब्ज़ा कर लिया. इस घटनाक्रम के बाद ख़बर आई कि इथियोपियन सरकार ने तत्काल प्रभाव से संघर्षविराम की घोषणा कर दी है.

इस सीज़फायर के चलते इस गृह युद्ध के शांत होने की उम्मीद जगी है. ये ऐलान एक और बड़ी उम्मीद लेकर आया है. पिछले आठ महीनों से चल रही इस जंग के दौरान टिग्रे में बड़ा सूखा पड़ा है. UN ने इसे दुनिया का सबसे गंभीर सूखा करार दिया है. वहां भीषण भुखमरी की हालत है. लाखों लोग भूखों मरने की स्थिति में हैं. UN के मुताबिक, टिग्रे में करीब 91 पर्सेंट आबादी को इमरजेंसी में खाद्य सहायता की ज़रूरत है.

Untitled Design (4)
अकाल के कारण मरने वालों में दो तिहाई से ज़्यादा बच्चे हैं.

एक तरफ जंग और सूखे के चलते हाहाकार था. युद्ध और भूख, दोनों के चलते हज़ारों लोग मारे जा रहे थे. और इनके बीच इथियोपियन आर्मी लोगों से अनाज का हर कतरा छीन लेने पर आमादा थी. इल्ज़ाम है कि ऐबी सरकार ने इस युद्ध को जीतने के लिए लोगों की भूख को हथियार बनाया. लोग TPLF को सपोर्ट करना बंद कर दें, ये सोचकर जनता को यातनाएं दी गईं. दुकानें, अनाज के गोदाम लूट लिए गए. अनाज की सप्लाई रुकवा दी गई. खेतों में खड़ी फसल तबाह कर दी गई. किसानों के मवेशी मार डाले गए.

इनके अलावा भी कई स्तरों पर मानवाधिकार उल्लंघन और युद्ध अपराध हुए. इंटरनैशनल मीडिया ने बताया कि इन आठ महीनों के भीतर इथियोपिया में मास मर्डर और मास रेप की कई वारदातें हुई हैं.

इसीलिए ज़रूरी था कि टिग्रे में चल रही जंग जल्द-से-जल्द ख़त्म हो. इथियोपियन सरकार से बार-बार संघर्षविराम की अपील की जा रही थी. महीनों की अपीलों के बाद अब जाकर इथियोपियन सरकार संघर्षविराम के लिए राज़ी हुई है. सीज़फायर का मतलब ये नहीं कि टिग्रे और सरकार के बीच का तनाव ख़त्म हो गया है. भविष्य में फिर से लड़ाई छिड़ने की आशंका है.

इसके पीछे सबसे बड़ी वजह है, इथियोपिया का सामाजिक और राष्ट्रीय ढांचा. यहां कई सारे एथनिक ग्रुप्स रहते हैं. सबके अपने-अपने इलाके हैं. कबीलाई पहचान इतनी मज़बूत है कि उसके चलते राष्ट्रीय एकता नहीं बन पाई. वो विविधता में एकता का गुण नहीं सीख पाया.

वापस लौटते हैं टिग्रे परपता है, वहां चल रहे युद्ध से जुड़ी सबसे बड़ी विडंबना क्या है? इस आयरनी का नाम है, ऐबी अहमद. इथियोपिया के मौजूदा प्रधानमंत्री. उन्हें 2019 में नोबेल शांति पुरस्कार मिला था. इसकी वजह ये है कि उन्होंने पड़ोसी देश ऐरट्रिया के साथ चला आ रहा दशकों पुराना सीमा विवाद ख़त्म किया था. हथियार की जगह बातचीत से मसला सुलझाने में आस्था दिखाई थी.

वही शांतिप्रिय ऐबी अहमद टिग्रे में युद्ध जीतने के लिए किसी भी हद तक जाते दिखे. ऐसा नहीं कि TPLF दोषमुक्त हो. मगर एक सरकार और विद्रोहियों के बीच का सवाल हो, तो सरकार से अधिक मानवीय होने की उम्मीद होती है. अपने नागरिकों के मुंह से निवाला छीनना, उन्हें भूखा मारना, युद्ध की आड़ में आम आबादी पर बम गिराना, नाबालिगों और औरतों को टॉर्चर करना…ऐसे घृणित काम किसी नैतिक सरकार के नहीं होते.


वीडियो देखें: तालिबान अफगानिस्तान पर पूरा कब्जा करने से पहले किस बात का इंतज़ार कर रहा है?

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

कौन हो तुम

'तड़प-तड़प के' जैसा प्रेमियों का ब्रेकअप एंथम देने वाले सिंगर के के आजकल कहां हैं?

'तड़प-तड़प के' जैसा प्रेमियों का ब्रेकअप एंथम देने वाले सिंगर के के आजकल कहां हैं?

उनके गाए 'पल' गाने के बगैर आज भी किसी कॉलेज का फेयरवेल पूरा नहीं होता.

कर लिया योगा? अब क्विज खेलने से होगा

कर लिया योगा? अब क्विज खेलने से होगा

आन्हां, ऐसे नहीं कि योग बस किए, दिखाना पड़ेगा कि बुद्धिबल कित्ता बढ़ा.

तमिल जनता आखिर क्यों कर रही है 'फैमिली मैन-2' का विरोध, क्या है LTTE की पूरी कहानी?

तमिल जनता आखिर क्यों कर रही है 'फैमिली मैन-2' का विरोध, क्या है LTTE की पूरी कहानी?

जब ट्रेलर आया था, तबसे लगातार विरोध जारी है.

माधुरी से डायरेक्ट बोलो 'हम आपके हैं फैन'

माधुरी से डायरेक्ट बोलो 'हम आपके हैं फैन'

आज जानते हो किसका हैप्पी बड्डे है? माधुरी दीक्षित का. अपन आपका फैन मीटर जांचेंगे. ये क्विज खेलो.

जिन मीम्स को सोशल मीडिया पर शेयर कर चौड़े होते हैं, उनका इतिहास तो जान लीजिए

जिन मीम्स को सोशल मीडिया पर शेयर कर चौड़े होते हैं, उनका इतिहास तो जान लीजिए

कौन सा था वो पहला मीम जो इत्तेफाक से दुनिया में आया?

पार्टियों को चुनाव निशान के आधार पर पहचानते हैं आप?

पार्टियों को चुनाव निशान के आधार पर पहचानते हैं आप?

चुनावी माहौल में क्विज़ खेलिए और बताइए कितना स्कोर हुआ.

लगातार दो फिफ्टी मारने वाले कोहली ने अब कहां झंडे गाड़ दिए?

लगातार दो फिफ्टी मारने वाले कोहली ने अब कहां झंडे गाड़ दिए?

राहुल के साथ यहां भी गड़बड़ हो गई.

रोहित शेट्टी के ऊपर ऐसी कड़क Quiz और कहां पाओगे?

रोहित शेट्टी के ऊपर ऐसी कड़क Quiz और कहां पाओगे?

14 मार्च को बड्डे होता है. ये तो सब जानते हैं, और क्या जानते हो आके बताओ. अरे आओ तो.

आमिर पर अगर ये क्विज़ नहीं खेला तो दोगुना लगान देना पड़ेगा

आमिर पर अगर ये क्विज़ नहीं खेला तो दोगुना लगान देना पड़ेगा

म्हारा आमिर, सारुक-सलमान से कम है के?

परफेक्शनिस्ट आमिर पर क्विज़ खेलो और साबित करो कितने जाबड़ फैन हो

परफेक्शनिस्ट आमिर पर क्विज़ खेलो और साबित करो कितने जाबड़ फैन हो

आज आमिर खान का हैप्पी बड्डे है. कित्ता मालूम है उनके बारे में?