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आपके EPFO के पैसों को लेकर किन पर क्रिमिनल एक्शन की बात हो रही है और क्यों?

EPFO को लेकर खबरों का फ़्लो रुकने का नाम ही नहीं ले रहा. कभी ब्याज़ दर 7 साल में सबसे कम होने की ख़बर आती है, कभी ख़बर आती है कि ब्याज़ दो किस्तों में दिया जाएगा. अब ख़बर आ रही है कि EPFO कुछ कंपनियों पर क्रिमिनल एक्शन ले सकता है.

क्या है ये ख़बर, इसे जानने से पहले, EPFO समझ लिया जाए.

# क्या होता है ईपीएफओ

कर्मचारी भविष्य निधि संगठन यानी ईपीएफओ साल 1951 में बना. कर्मचारियों के लिए. इसके ऑफिस में ऐसी सभी कंपनियों को अपना रजिस्ट्रेशन कराना होता है, जहां 20 से ज्यादा कर्मचारी काम करते हैं. हर कंपनी के लिए ये ज़रूरी होता है कि वो कर्मचारियों का एक पीएफ खाता खुलवाए. और फिर उसमें कुछ पैसा जमा कराए. इसका मकसद निजी कंपनियों में काम करने वाले कर्मचारियों को एक सामाजिक सुरक्षा देना है. मतलब ये कि इस पैसे से कर्मचारियों के भविष्य की जरूरतों के लिए कुछ पैसों की बचत हो जाती है.

# कैसे जमा होता है पैसा

किसी भी कंपनी में काम करने वाले कर्मचारी का हर महीने कुछ पैसा काटा जाता है. ये बेसिक सैलरी का 12 फीसदी होता है. इसमें इतना ही योगदान यानी 12 फीसदी पैसा कंपनी की तरफ से दिया जाता है. कर्मचारी के हिस्से की 12 फीसदी रकम उसके ईपीएफ खाते में जमा हो जाती है. जबकि कंपनी के हिस्से में से केवल 3.67 फीसदी ही कर्मचारी के ईपीएफ खाते में जमा होता है. बाकी 8.33 परसेंट रकम कर्मचारी पेंशन योजना यानी ईपीएस में जमा हो जाती है. कर्मचारी अपनी बेसिक सैलरी में से 12 फीसदी से ज्यादा रकम भी कटा सकता है. इस पर भी टैक्स छूट मिलती है. मगर कंपनी केवल 12 फीसदी का ही योगदान करती है. ईपीएफ में बैंक की तरह नामांकन की भी सहूलियत होती है. कर्मचारी के साथ कैजुअल्टी की दशा में नॉमिनी को सारा पैसा मिल जाता है.

# कितनी पेंशन मिलती है

जैसा पहले बताया कि कंपनी के हिस्से की 8.33 फीसदी रकम पेंशन स्कीम में जाती है. कर्मचारी को 58 साल के उम्र के बाद पेंशन मिलती है. इसके लिए 10 साल नौकरी ज़रूरी है. पेंशन 1000 रुपए से 3250 रुपए महीने तक हो सकती है. ये पेंशन खाताधारक को आजीवन मिलती है.

रिटायरमेंट के बाद, जब कइयों के पास कोई आय का स्रोत न रहेगा, तब शायद EPF वाली पेंशन ही डूबते को तिनके का सहारा हो.
रिटायरमेंट के बाद, जब कइयों के पास कोई आय का स्रोत न रहेगा, तब शायद EPF वाली पेंशन ही डूबते को तिनके का सहारा हो.

# एडवांस पैसा निकालने का क्या तरीका है

पीएफ खाते से पैसा निकाला भी जा सकता है. कर्मचारी खुद की या परिवार में किसी की बीमारी पर सैलरी का छह गुना पैसा निकाल सकते हैं. कर्मचारी अपनी शादी में या परिवार में किसी की शादी या पढ़ाई के लिए जमा रकम का 50 फीसदी निकाल सकता है. होम लोन चुकाने के लिए सैलरी का 36 गुना पैसा पीएफ से मिल जाता है. घर की मरम्मत के लिए सैलरी का 12 गुना और घर खरीदने के लिए भी पैसा निकाल सकते हैं.

# कैसे देता है EPFO कर्मचारियों को ब्याज़

EPFO में पैसे जमा करने पर आपको कुछ ब्याज़ भी मिलता है. वर्तमान में ये 8.5% है.

दुनिया की कोई भी स्कीम, बैंक या इन्वेस्टमेंट संस्था, जो लोगों को उनके इन्वेस्टमेंट पर ब्याज़ देती है, वो ऐसा अपनी जेब से नहीं करती.

तो ये क्या करती हैं? वो करती हैं लोगों के इन्वेस्टेड पैसों का फरदर इन्वेस्टमेंट. कुछ स्कीम सरकारी बॉन्ड में पैसा लगाती हैं, कुछ शेयर मार्केट में, कुछ दूसरों को और अधिक ब्याज़ पर पैसा उधार देती हैं, कुछ फ़िक्स डिपॉज़िट करती हैं, कुछ डेट फंड में पैसा लगाती हैं. और कुछ इन सभी जगहों या इनमें से एकाधिक जगहों में पैसा लगाती हैं.

इन पैसों से जो रिटर्न मिलता है, उसे EPFO जैसी नॉन प्रॉफ़िटेबल संस्थाएं पूरा इंवेस्टर्स को पास-ऑन कर देती हैं. बाक़ी, बैंक या AMC जैसी संस्थाएं, अपना प्रॉफ़िट या ब्रोकरेज निकालकर बाक़ी का पैसा इंवेस्टर्स को पास-ऑन कर देती हैं.

तो EPFO ने अपने इंवेस्टर्स, यानी कर्मचारियों का पैसा आगे कई फाइनेंशियल इंस्ट्रमेंट्स में इन्वेस्ट कर रखा था. इनमें से एक है डिबेंचर या कहें डेट फंड. इसी को लेकर सारी भसड़ हुई है. क्या भसड़ हुई है, वो जानने से पहले जानना होगा कि डिबेंचर आख़िर होते क्या हैं?

# डिबेंचर आख़िर होते क्या हैं

एक उदाहरण से समझिए-

आपकी एक छोटी सी कंपनी है. जिसको अचानक करोड़ों का कॉन्ट्रैक्ट मिलता है. एक ऐसा कॉन्ट्रैक्ट, जिसके पूरे पैसे काम ख़त्म होने या माल की डिलीवर हो चुकने के बाद ही मिलेंगे.

अब कॉन्ट्रैक्ट साइन करते वक्त आपको लगता है कि कहीं आपने उससे ज़्यादा तो नहीं काटकर मुंह में भर लिया, जितना आप चबा सकते हैं? आपका तो छोटा सा बिज़नेस है, इस काम के पैसे तो आपको बाद में मिलेंगे. लेकिन उससे काफ़ी पहले तो आपको करोड़ों रुपए जुटाने पड़ेंगे. कच्चे माल के लिए, मज़दूरों के लिए.

लेकिन चिंता मत कीजिए. आप तीन तरह से पैसे जुटा सकते हैं. एक तो उधार लेकर. दूसरा अपनी कंपनी में पैसा देने वालों को हिस्सेदारी देकर. और तीसरा, ‘पैसे दे दो, वापस नहीं करूंगा’ कहकर.

अगर कंपनियां उधार लेकर पैसा जुटा रही हैं तो कहते हैं, ‘कंपनी ने अपने डिबेंचर इश्यू किए हैं.’ डिबेंचर. डेट या ऋण, शब्द से बना है. और डिबेंचर इश्यू करने का मतलब ऐसे लीगल पेपर, जो वो आपको देगी, अगर आप उनको उधार देंगे. उन लीगल पेपर्स के दम पर आप उनसे समय-समय पर अपना ब्याज या मूलधन ले सकते हो. जैसा भी डिबेंचर में वर्णित है.

बाक़ी पैसे जुटाने के दो तरीक़े- इक्विटी और चैरिटी हैं, जिसके बारे में आप यहां पर क्लिक करके विस्तार से जान सकते हैं. अभी फ़ोकस केवल डिबेंचर्स पर रखते हैं.

तो EPFO ने भी कई कंपनियों के डिबेंचर्स लिए हुए हैं. यानी, अगर ऊपर की परिभाषा से समझें, तो EPFO ने उन कंपनियों को एक तरह से उधार दिया है, जिन पर EPFO को कूपन मिले होंगे. कूपन एक टेक्निकल टर्म है, जिसका मतलब है, उसे तय समय पर डिबेंचर्स इश्यू करने वाली कंपनी से ब्याज़ मिलता होगा. और कूपन यानी ब्याज़ के अलावा डिबेंचर्स की एक निश्चित समय सीमा समाप्त हो जाने पर उसे इन्वेस्ट किए हुए सारे पैसे (प्लस अगर डिबेंचर में वर्णित है तो ब्याज़ भी) वापस मिल जाएंगे.

हालांकि डिबेंचर्स तुलनात्मक रूप से एक सेफ़ इन्वेस्टमेंट है. क्योंकि डिबेंचर्स इश्यू करने वाली कंपनी को चाहे फ़ायदा हो या नुक़सान, उसे वर्णित किए हुए कूपन, ब्याज़ और मूलधन को समय-समय पर इंवेस्टर्स को देना ही देना है.

अगर कंपनी ही डूब जाए तो? या फिर उसे इतना बड़ा नुक़सान हो कि भुगतान करने में ना-नुकुर करने लगे तो?

इसके लिए बनी है क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां. जो हर कंपनी के डिबेंचर को रेटिंग देती हैं, उनके इतिहास से लेकर उनकी बैलेन्स शीट के आधार पर. यूं इंवेस्टर्स जान सकते हैं कि किस डेट इन्स्ट्रूमेंट या डिबेंचर में इन्वेस्ट करना सेफ़ रहेगा.

क्रिसिल (Credit Rating Information Services of India Limited) भारत की कुछ बेहतरीन रेटिंग एजेंसीज़ में से है. ये अमेरिका की 'एसएनपी ग्लोबल' कंपनी की सब्सिडरी है.
क्रिसिल (Credit Rating Information Services of India Limited) भारत की कुछ बेहतरीन रेटिंग एजेंसीज़ में से है. ये अमेरिका की ‘एसएनपी ग्लोबल’ कंपनी की सब्सिडरी है.

अच्छा एक बात और. EPFO या कोई भी संस्था या व्यक्ति, जिसने डिबेंचर्स लिए हैं, वो उसे सेकेंड्री मार्केट में बेच भी सकता है.

# सेकेंड्री मार्केट- देखिए अगर डिबेंचर की समय सीमा समाप्त हो जाती, तो डिबेंचर्स लेने वाले को वो कंपनी पूरे पैसे लौटा देती, जिस कंपनी ने डिबेंचर इश्यू किए हैं. लेकिन अगर डिबेंचर्स लेने वाले को पैसों की उससे पहले ही ज़रूरत है, तो वो उसे किसी और को बेच सकता है. जहां पर डिबेंचर की समय सीमा समाप्त होने से पहले ही डिबेंचर्स की ख़रीद-फ़रोख़्त होती है, उस मार्केट को सेकेंड्री मार्केट कहा जाता है.

लेकिन सेकेंड्री मार्केट में भी डिबेंचर्स के रेट तय करने में सबसे महत्वपूर्ण कारक होता है ‘क्रेडिट रेटिंग’. जिस डेट सिक्योरिटी (डिबेंचर) की जितनी अच्छी रेटिंग, उसका सेकेंड्री मार्केट में उतना अच्छा रिटर्न.

# ये सारे कॉन्सेप्ट समझने के बाद आते हैं ख़बर पर

दरअसल EPFO ने भी उन डिबेंचर्स में इन्वेस्ट किया हुआ था, जिन्हें AAA रेटिंग मिली हुई थीं. मतलब सबसे टॉप की रेटिंग.

लेकिन समय के साथ-साथ न केवल इनमें से कई डिबेंचर्स की रेटिंग कम हुई, बल्कि इनको इश्यू करने वाली कंपनियां अपना पैसा देने में भी डिफ़ॉल्ट करने लगीं. ज़ाहिर है कि जो कंपनी पैसे वापस देने में आनाकानी कर रही है, उसकी रेटिंग भी डाउनग्रेड होनी है. और रेटिंग कम होने का मतलब करेला और वो भी नीम चढ़ा. क्योंकि फिर इन डेट सिक्योरिटीज़ को सेकेंड्री मार्केट में भी बेचना मुश्किल. और बेच भी दो तो औने पौने दाम मिलने हैं.

इंडियन एक्सप्रेस की एक ख़बर के अनुसार EPFO ने कुल 12 हज़ार करोड़ से ज़्यादा रुपये ऐसी कंपनियों के डेट सिक्योरिटी में लगाए हुए हैं, जहां उसके पैसे फंस गए हैं. साथ ही इन डेट सिक्योरिटी की पिछले कुछ महीनों में रेटिंग डाउनग्रेड भी हुई है. इस 12 हज़ार करोड़ के लगभग की राशि में कुछ बड़ी कंपनियों का हिस्सा कुछ यूं है-

न जाने कितने लोग और संस्थाएं, यस बैंक की नाव के साथ डूब चुके हैं, डूब रहे हैं. (Photo: PTI)
न जाने कितने लोग और संस्थाएं, यस बैंक की नाव के साथ डूब चुके हैं, डूब रहे हैं. (Photo: PTI)

# रिलायंस कैपिटल – लगभग 2,500 करोड़
# यस बैंक – लगभग 4,300 करोड़
# इंडिया बुल्स – लगभग 2,500 करोड़
# आईडीएफसी – लगभग 1,700 करोड़
# डीएचएफएल – लगभग 1,300 करोड़
# आईएलएंडएफएस – लगभग 574 करोड़

# इन 12 हज़ार करोड़ रुपयों के अलावा

EPFO में कुछ ऐसी कंपनियों के कर्मचारियों के अकाउंट भी हैं, जो अपने कर्मचारियों का पैसा, किस स्कीम, किस फंड में लगाना है, ख़ुद सेलेक्ट करती हैं. तो इन कंपनियों में से कुछ ऐसी भी होंगी, जिन्होंने ऊपर बताए गए डिबेंचर्स में पैसे लगाए होंगे. अगर उन्हें भी जोड़ दिया जाए, तो 12 हज़ार करोड़ रुपये का आंकड़ा और बढ़ जाता है.

# तो, अब?

EPFO इन पैसों की उगाही के लिए, उपलब्ध सभी विकल्पों को जांच रहा है. क्योंंकि जब EPFO को पैसा मिलेगा, तभी वो उन कर्मचारियों को पैसे और ब्याज़ दे पाएगा, जिन्होंने इन्वेस्टमेंट किया है.

तो इन्हीं विकल्पों में से एक है उन कंपनियों के ख़िलाफ़ आपराधिक कार्रवाई, जिनके डिबेंचर्स भुनाने में दिक़्क़तें आ रही हैं. हालांकि EPFO के Central Board of Trustees (CBT) ने पिछले हफ़्ते हुई मीटिंग के दौरान निर्णय लिया कि सभी धान पसेरी नहीं तुलेंगे. हर केस, हर कंपनी, हर डिबेंचर इंडिविजुअल कंसिडर किया जाएगा. ऐसा नहीं सभी के ख़िलाफ़ आपराधिक कार्रवाई कर दी जाए. हो सकता है, कुछ कंपनियों की जेन्युइन दिक़्क़तें हों. उन्हें समय दिया जाएगा. लेकिन ये भी देखा जाएगा कि कहीं कोई ऐसी संस्था तो नहीं है, जो EPFO को तो पैसे देने में ना-नुकुर कर रही है, लेकिन बाक़ियों को पैसे का लगातार भुगतान कर रही है.

CBT के एक मेंबर ने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ को बताया कि उन कंपनियों के ख़िलाफ़ आपराधिक कार्रवाई होने की संभावना है, जो प्रथम दृष्टया, जान-बूझकर डिफ़ॉल्ट करती हुई पाई जाएंगी.

# अंततः

दिक्कत ये भी है कि एक तरफ़ तो सरकार पारदर्शिता को बढ़ावा देने की बात कहती है, दूसरी तरफ़ EPFO कहां, कितना, कब और कैसे इन्वेस्टमेंट करता है, इस पर चीज़ें बहुत धुंधली हैं. और इसी के चलते इतनी अनियमितताएं होती हैं और आए दिन इतनी ख़बरें बनती हैं. None of them for good reason.


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