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कोविड के डेल्टा वेरिएंट से इंग्लैंड का बुरा हाल, वैक्सीन कितनी असरदार?

कोरोना वायरस की शुरुआत हुए डेढ़ साल हो चुके हैं. एक तरफ़ जहां हम इंसान वायरस को हराने की कोशिश में जुटे हैं. वहीं वायरस भी ख़ुद को और मज़बूत बनाने में लगा है. अब सिर्फ़ कोरोना हमारी सबसे बड़ी चुनौती नहीं रहा. इसके नए-नए रूप, पहले से ज़्यादा ताकतवर वैरिएंट्स हमें तंग कर रहे हैं. दिक़्कत सिर्फ़ उन देशों को नहीं, जिनके पास वैक्सीन नहीं है. या, जिनके यहां वैक्सीनेशन कम हुआ है. एक बड़ी आबादी को वैक्सीन लगा चुके देश भी परेशान हैं.

ऐसा ही एक देश है ब्रिटेन. सबसे पहले ब्रिटेन में ही कोविड-19 का वैक्सीनेशन प्रोग्राम शुरू हुआ. अब तक इसके 46 पर्सेंट से ज़्यादा लोगों को वैक्सीन की दोनों डोज़ लग चुकी है. मगर इसके बावजूद ब्रिटेन बेहाल है. पिछले कुछ दिनों से एक बार फिर वहां कोविड के नए मामलों में तेज़ी आई है. इसकी वजह है, डेल्टा. कोविड के इस वैरिएंट की शुरुआत भारत में हुई थी.

चीन के वुहान से कोरोना वायरस का पहला केस सामने आया था. (गूगल मैप्स)
चीन के वुहान से कोरोना वायरस का पहला केस सामने आया था. (गूगल मैप्स)

आपको ब्रिटेन से शुरू हुआ अल्फ़ा वैरिएंट याद है?

वो वुहान में शुरू हुए ऑरिजनल कोरोना से करीब 50 पर्सेंट ज़्यादा संक्रामक था. और ये डेल्टा वैरिएंट अल्फ़ा से भी कम-से-कम 40 फ़ीसदी ज़्यादा संक्रामक है. अकेला ब्रिटेन ही इससे नहीं जूझ रहा है. रूस और इंडोनेशिया का भी यही हाल है. एक्सपर्ट्स के मुताबिक, आने वाले महीनों में अमेरिका समेत कई देशों की यही स्थिति हो सकती है. क्या है डेल्टा वैरिएंट? क्या ख़तरे हैं इसके? क्या मौजूदा वैक्सीन्स इसपर असरदार हैं?

सबसे पहले बेसिक्स से शुरू करते हैं. दुनिया में एक बड़े प्रकृति वैज्ञानिक हुए, चार्ल्स डार्विन. 1859 में उनकी एक क़िताब छपी. नाम था, ऑन दी ऑरिजिन ऑफ़ स्पीशेज़. इसमें डार्विन ने सिद्धांत दिया नैचुरल सिलेक्शन का. क्या होता है ये? ये एक लंबी प्रक्रिया है. इसको समझिए अपने आस-पास के वातवरण में होने वाले बदलावों को महसूस करना. और, उनके साथ बेहतर अजस्टमेंट के लिए ख़ुद में भी बदलाव लाना. ख़ुद को अनुकूलित करना.

चार्ल्स डार्विन ने नैचुरल सिलेक्शन का सिद्धांत दिया था. (तस्वीर:एएफपी)
चार्ल्स डार्विन ने नैचुरल सिलेक्शन का सिद्धांत दिया था. (तस्वीर:एएफपी)

ये प्रक्रिया सभी जीवों में एक सी नहीं होती है. कुछ जीव रेस में आगे निकल जाते हैं. उनका अनुभव, उनका सीखा ज्ञान उनके वंशजों में भी ट्रांसफ़र होता है. उनकी आने वाली पीढ़ियों को समायोजन का गुण विरासत में मिल जाता है. वो ज़्यादा फलते-फूलते हैं. और जो अपने माहौल के साथ नहीं बदलते, वो मिट जाते हैं. इसी प्रक्रिया को कहते हैं नैचुरल सिलेक्शन.

यही प्रक्रिया एक और प्रक्रिया को जन्म देती है. इसे कहते हैं- स्पीसिएशन. हिंदी में कहिए, तो प्रजातिकरण. ये क्या होता है? इसके तहत, वातावरण के साथ बेहतर संयोजन करने वाले कुछ जीव अलग और अलहदा प्रजाति को जन्म देते हैं. वो जेनेटिक रूप से इतने अलग होते हैं कि नई ही प्रजाति बन जाते हैं. इसी से राह निकलती है इवॉल्यूशन की. इवॉल्यूशन माने, जीवों और पौधों की उन्नति यात्रा. जब लाखों साल के क्रम में वो विकसित होते चले जाते हैं. अपने पूर्वज़ों की तुलना में अडवांस्ड होते जाते हैं.

अब इस जानकारी को वायरस से जोड़कर देखिए. हम सुन रहे हैं कि कोरोना वायरस ख़ुद को म्यूटेट कर रहा है. ये जो म्यूटेशन है, वो भी एक तरह का इवॉल्यूशन ही है. इसको आसान भाषा में समझिए, एक बदलाव. किसके भीतर? DNA का जो क्रम होता है न, उसके भीतर. यानी DNA के सिक्वेंस में होने वाला बदलाव म्यूटेशन कहलाता है. ये म्यूटेशन जीवों के इवॉल्व होने की प्रक्रिया में कच्चे माल की तरह काम करता है. इसी के चलते नैचुरल सिलेक्शन की प्रक्रिया में जीवों के वातावरण के साथ बेहतर अनुकूलित होने वाले गुण बढ़ते हैं. एम्प्लिफ़ाई होते हैं. ये उस जीव को फलने-फूलने में मदद करते हैं.

आपने कछुए का खोल देखा है?

जब कछुए को कोई ख़तरा महसूस होता है, तो वो अपने इसी कवच के भीतर छुप जाता है. अब साही को याद करिए. एकदम निरीह सा प्राणी होता है. मगर उसके शरीर पर कंटीली नोकें निकली होती हैं. वो क्यों हैं? ताकि वो शिकार से बच सके. आपको कैटरपिलर याद है? वो पिलपिला सा कीड़ा, जो योग जैसे पोज़ में शरीर को मोड़-तोड़कर पत्तियों पर चिपका रहता है. पता है, कैटरपिलर ख़ुद को चिड़िया से बचाने के लिए क्या करता है? वो अपने शरीर का रंग चिड़िया के मल जैसा कर लेता है. वैसे ही, जैसे पत्थर पर बैठा गिरगिट अपना रंग भी पत्थर जैसा कर लेता है. कछुए को उसका खोल. साही को उसके कांटे. गिरगिट को रंग बदलने का हुनर. ये सब म्यूटेशन्स के ही चलते मुमकिन हो पाया.

कैटरपिलर खुद को मोड़-तोड़कर पत्तियों पर चिपका रहता है. (तस्वीर:एएफपी)
कैटरपिलर खुद को मोड़-तोड़कर पत्तियों पर चिपका रहता है. (तस्वीर:एएफपी)

पता है, म्यूटेशन होता क्यों है? ये होता है ग़लती के चलते. ये ग़लती DNA रेप्लिकेशन के दौरान होती है. DNA रेप्लिकेशन माने, वो प्रक्रिया जब एक कोशिका विभाजित होने से पहले अपने जीन की कॉपी बनाती है. कॉपी करने की ये प्रक्रिया परफ़ेक्ट नहीं होती. इसमें रेंडमली छोटी-छोटी ग़लतियां हो जाती हैं. ये ऐसा ही है, मानो आपको किसी लेख का एक पन्ना देकर उसे टाइप करने को कहा जाए. टाइपिंग करते हुए आप किसी शब्द में टाइपो कर दें. कोशिका और DNA के मामले में देखिए, तो ऐसे ही टाइपो म्यूटेशन कहलाते हैं.

इस ग़लती के चलते DNA के जीन में यूं बदलाव होता है कि उस जीन के भीतर मौजूद जेनेटिक मेसेज में चेंज आ जाता है. ये चेंज न हो, तो जीवों की आबादी में विविधता नहीं होगी. फूलों को अलग-अलग रंग नहीं मिलेंगे. इवॉल्यूशन की प्रक्रिया चल नहीं पाएगी.

क्या वायरस भी जीव है?

उत्तर है, नहीं. वायरस बहुत विस्मय की चीज हैं. वो न सजीव हैं, न निर्जीव. उनमें जीवन नहीं होता. न कोशिका होती है, न वो अपने-आप बढ़ सकते हैं, न अपने लिए ऊर्जा पैदा कर सकते हैं. हां, मगर यही वायरस जब किसी जीव की कोशिका में घुसता है, तो उसका गुण बदल जाता है. वो सक्रिय हो जाता है और अपने जैसे और विषाणु बनाने लगता है. वो जिस जीव में घुसता है, उसकी कोशिकाओं की मशीनरी में बदलाव कर देता है. इसीलिए कई वैज्ञानिक मानते हैं कि रसायन और जीवन के बीच की जो बॉर्डरलाइन है, वहां फिट होते हैं वायरस.

दुनिया में कितने तरह के वायरस हैं, इसकी कोई गिनती ही नहीं. अकेले स्तनधारी जीवों के भीतर ही तीन लाख से ज़्यादा तरह के वायरस हैं. अब इसमें बाकी जीवों और पौधों को जोड़ दीजिए. सोचिए, कितनी विशाल संख्या होगी विषाणुओं की.

कई विषाणु तो धरती पर पल रहे जीवन के लिए ज़रूरी हैं. ये जीवन को फ़ायदा पहुंचाते हैं. हम इंसानों का तो करीबी रिश्ता है विषाणुओं के साथ. हमारे DNA का करीब आठ पर्सेंट हिस्सा इनसे जुड़ा है. ये उन विषाणुओं के प्रिंट हैं, जिन्होंने हज़ारों साल पहले हमारे पूर्वज़ों को संक्रमित किया होगा. उन संक्रमणों की निशानी अब भी हमारे जीनोम्स में ज़िंदा है. वो इंसानी भ्रूण को विकसित होने में बेहद अहम भूमिका निभाते हैं.

विषाणु, इंसानी कोशिकाओं से चिपककर उस इंसान की कोशिकीय प्रक्रिया को हाइज़ैक कर लेते हैं. (तस्वीर:एएफपी)
विषाणु, इंसानी कोशिकाओं से चिपककर उस इंसान की कोशिकीय प्रक्रिया को हाइज़ैक कर लेते हैं. (तस्वीर:एएफपी)

अब बात इंसानों को बीमार करने वाले विषाणुओं की

क्या इनकी संख्या बहुत ज़्यादा है? उत्तर है, नहीं. विषाणुओं की भारी-भरकम आबादी में से कुछ ही वायरस हैं, जो इंसानों को संक्रमित कर पाते हैं. बहुत कम विषाणु हैं, जो एक अलग होस्ट जीव से जंप करके इंसानों के भीतर पहुंच पाते हैं.

जो विषाणु हम तक पहुंचने में सफल रहते हैं, वो इंसानी कोशिकाओं से चिपककर उस इंसान की कोशिकीय प्रक्रिया को हाइज़ैक कर लेते हैं. वहां अपनी जुड़वां कॉपीज़ बनाने लगते हैं. प्रतिकृतियां बनाते वक़्त ज़रूरी नहीं कि वायरस की सारी कॉपीज़ एकदम एक जैसी हों. वो अलग-अलग भी होते हैं. इस तरह एक ही वायरस के कई रूप बन जाते हैं. इनमें से कुछ ताकतवर होते हैं और कुछ कमज़ोर. जो कमज़ोर होते हैं, वो ख़त्म हो जाते हैं. लेकिन जो मज़बूत होते हैं, वो ज़्यादा फैलते हैं. ज़्यादा सर्वाइव करते हैं. वायरस के इस अलग-अलग रूप को कहते हैं, स्ट्रेन्स.

ये तो हुई ओवरऑल प्रक्रिया. अब इस जानकारी को कोविड-19 के प्रसंग में समझते हैं. इसकी शुरुआत चीन से हुई. ये ऑरिजनल स्ट्रेन कहलाया L टाइप. वो वायरस चीन से निकलकर दुनियाभर में फैला. इस डेढ़ साल के दौरान कोरोना वायरस में कई म्यूटेशन्स हुए. कुछ कामयाब म्यूटेशन्स के चलते वायरस की नई स्ट्रेन बनी. इन्हीं नए स्ट्रेन्स में से एक है- B.1.617.2. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे नाम दिया है, डेल्टा.

फिलहाल क्या कुछ पता है इस डेल्टा वैरिएंट के बारे में?

वैज्ञानिकों को सबसे पहले डेल्टा वैरिएंट की जानकारी मिली अक्टूबर 2020 में. कहां मिले इसके शुरुआती मामले? जानकारी के मुताबिक, इसका शुरुआती ज्ञात केस भारत के महाराष्ट्र राज्य में मिला. इसके बाद ये भारत भर में फैला. अप्रैल और मई 2021 में पीक पर पहुंची भारत की दूसरी कोरोना लहर का संबंध इसी डेल्टा वैरिएंट से होने की आशंका है. हालांकि इसे एस्टैबलिश करने के लिए अभी और डेटा की दरकार है.

डेल्टा का लेटेस्ट स्टेटस क्या है?

11 मई को WHO ने इसे ‘वैरिएंट ऑफ़ कन्सर्न’ की कैटगरी में डाल दिया. मतलब, इस वैरिएंट से बेहद सचेत रहने की ज़रूरत है. इसके बाद 16 जून को WHO ने डेल्टा स्प्रेड से जुड़े कुछ ताज़ा आंकड़े जारी किए. इसके मुताबिक, डेल्टा वैरिएंट अब तक 80 से ज़्यादा देशों में फैल चुका है. सबसे ज़्यादा प्रभावित है ब्रिटेन. पिछले कुछ दिनों से वहां कोरोना मामलों में उछाल आया है.

इस बढ़ोत्तरी को आंकड़ों से समझिए. ब्रिटेन में कोरोना का पहला पीक आया 12 नवंबर, 2020 को. इस रोज़ वहां करीब साढ़े 33 हज़ार नए केस सामने आए. ये ब्रिटेन के पहले कोरोना लहर का चरम था. इसके बाद संक्रमण के केस कम होने लगे. दिसंबर के पहले हफ़्ते में लगा कि अब संक्रमण ढलान पर है. मगर फिर दिसंबर के दूसरे हफ़्ते से दोबारा संक्रमण की संख्या बढ़ने लगी. इसे ब्रिटेन की दूसरी लहर कहा गया. इस सेकेंड वेव का पीक आया 8 जनवरी, 2021 को. इस रोज़ वहां करीब 68 हज़ार मामले सामने आए. इस पीक के बाद केसेज़ की संख्या घटने लगी. ये गिरावट धीमी, मगर कमोबेश कन्सिस्टेंट थी.

ब्रिटेन की इस दूसरी लहर के पीछे जिम्मेदार था- B.1.1.7. उर्फ़, अल्फ़ा वैरिएंट. ये कोविड के करीब आधे दर्ज़न वैरिएंट्स में सबसे संक्रामक था. मगर राहत की बात ये रही कि ब्रिटेन ने बहुत जल्द वैक्सीनेशन प्रोग्राम शुरू कर दिया. वो कोरोना वैक्सीन को अप्रूवल देने वाला पहला देश था. ब्रिटेन ने बहुत तेज़ी से अपनी आबादी का टीकाकरण किया. उम्मीद थी कि अब हालात सामान्य हो जाएंगे.

 कोरोना की नई स्ट्रेन B.1.1.7 को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अल्फ़ा नाम दिया है. (तस्वीर: एएफपी)
कोरोना की नई स्ट्रेन B.1.1.7 को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अल्फ़ा नाम दिया है. (तस्वीर: एएफपी)

स्थितियां बेहतर होने भी लगीं. अप्रैल 2021 से वहां मामले घटने लगे. डेली केसेज़ की संख्या औसतन डेढ़ से दो हज़ार तक सिमट गई. मगर मई का आख़िरी हफ़्ता आते-आते संक्रमण में मामूली बढ़त आने लगी. मई के आख़िरी दिन करीब तीन हज़ार नए केस सामने आए. इसके बाद से केसेज़ लगातार जंप करते गए. 17 जून को सबसे ज़्यादा 11 हज़ार नए केस सामने आए. 20 जून को इसमें मामूली गिरावट आई, मगर जानकारों का कहना है कि इस गिरावट से बहुत उम्मीद नहीं लगाई जानी चाहिए.

इस नए जंप का कारण क्या है?

इसका कारण है, डेल्टा वैरिएंट. हेल्थ एक्सपर्ट्स के मुताबिक, डेल्टा वैरिएंट कोरोना के ज्ञात स्ट्रेन्स में सबसे ज़्यादा संक्रामक है. हमने आपको ब्रिटेन वाले अल्फ़ा वैरिएंट के बारे में बताया था न. अल्फ़ा वैरिएंट ऑरिजनल कोरोना वैरिएंट के मुकाबले 50 पर्सेंट तक ज़्यादा संक्रामक था. और ये डेल्टा वैरिएंट अल्फ़ा से भी ज़्यादा संक्रामक है. कितना संक्रामक? उपलब्ध डेटा बताते हैं कि डेल्टा, अल्फ़ा से भी करीब 40 से 80 पर्सेंट ज़्यादा संक्रामक है.

इस पर्सेंटेज़ को संख्या में समझिए. किसी भी वायरस के फैलने की क्षमता आंकी जाती है उसकी R नोट वैल्यू से. इसका मतलब होता है, वायरस का बुनियादी रीप्रॉडक्शन नंबर. मतलब, उस वायरस से इनफ़ेक्ट होने वाले लोग औसतन कितने और लोगों को संक्रमित कर सकते हैं. वुहान में कोरोना की जो ऑरिजनल स्ट्रेन शुरू हुई, उसकी आर नोट वैल्यू थी 2.5. अल्फ़ा वैरिएंट की वैल्यू थी, 4 से 5. और डेल्टा वैरिएंट की वैल्यू है आठ तक. यानी ऑरिजनल स्ट्रेन के मुकाबले तीन गुना से भी ज़्यादा संक्रामक.

कोरोना वायरस का डेल्टा वैरिएंट ऑरिजनल स्ट्रेन के मुकाबले तीन गुना से भी ज़्यादा संक्रामक है. (तस्वीर: एएफपी)
कोरोना वायरस का डेल्टा वैरिएंट ऑरिजनल स्ट्रेन के मुकाबले तीन गुना से भी ज़्यादा संक्रामक है. (तस्वीर: एएफपी)

डेल्टा वैरिएंट ज़्यादा संक्रामक क्यों है?

आपने वायरस की फ़ोटो देखी है. उसमें वायरस के ऊपर की तरफ सींग से निकले होते हैं. उसको कहते हैं, स्पाइक प्रोटीन. डेल्टा वैरिएंट के स्पाइक प्रोटीन में चेंज है. इसी स्पाइक प्रोटीन की मदद से वायरस इंसानी कोशिकाओं में घुसता है. इस वैरिएंट में इन्फ़ेक्टेड इंसान की श्वासनली ज़्यादा आसानी से प्रभावित होती है. यानी, संक्रमित इंसान सांस लेने या खांसते-छींकते समय ज़्यादा संख्या में वायरस बाहर छोड़ता है. इसीलिए दूसरा इंसान बेहद कम समय के लिए संपर्क में आकर भी संक्रमित हो सकता है.

संक्रमण की इसी तेज़ रफ़्तार के चलते डेल्टा वैरिएंट कम समय में ज़्यादा आबादी को शिकार बना रहा है. ये ब्रिटेन का सबसे डॉमिनेटिंग वैरिएंट बन गया है. डॉमिनेटिंग मतलब, कोरोना के जितने मामले आ रहे हैं, उनमें सबसे ज़्यादा संख्या डेल्टा वैरिएंट से संक्रमित लोगों की है. जानकारों के मुताबिक, ये ब्रिटेन की तीसरी लहर की शुरुआत है. संक्रमण में आई इस नई तेज़ी के चलते वहां कोविड से जुड़े प्रतिबंधों की मियाद भी बढ़ा दी गई है. पहले ये प्रतिबंध 21 जून को ख़त्म होने थे. अब इसे 20 जुलाई तक बढ़ा दिया गया है.

एक तरफ़ जहां ब्रिटेन में तीसरी वेव का ऐलान हो गया है. वहीं वैक्सीनेशन के उसके आंकड़े बहुत प्रभावी हैं. उसकी कुल आबादी करीब साढ़े छह करोड़ है. पर्सेंटेज़ में देखिए, तो उसकी वयस्क आबादी के करीब 80 पर्सेंट लोगों को वैक्सीन की पहली डोज़ लग चुकी है. तीन करोड़ से ज़्यादा लोगों को वैक्सीन की दोनों डोज़ मिल चुकी है. यानी, करीब 46 पर्सेंट जनता फुली वैक्सिनेटेड है. इसके बावजूद संक्रमण में दिख रही तेज़ी निराश करने वाली है.

संक्रमण क्यों बढ़ रहा है?

क्यों? क्योंकि न केवल संक्रमण बढ़ रहा है. बल्कि देश के कई हिस्सों में हॉस्पिटलाइज़ हो रहे मरीज़ों की संख्या भी बढ़ रही है. फिलहाल डेल्टा वैरिएंट से होने वाली मौतों की संख्या बहुत कम है. केवल 0.1 पर्सेंट. मगर PHE, यानी पब्लिक हेल्थ इंग्लैंड ने इसपर भी आगाह किया है. PHE के मुताबिक, अभी डेल्टा स्प्रेड का शुरुआती दौर है. मुमकिन है कि मॉरटैलिटी रेट में आगे इज़ाफा हो. PHE ने ये भी कहा कि अभी डेल्टा से जुड़े डेटा को और सावधानी से मॉनिटर किए जाने की ज़रूरत है.

ब्रिटेन जैसी ही ख़बरें रूस से भी आ रही हैं. वहां भी संक्रमण के मामलों में उछाल आया है. सबसे ज़्यादा प्रभावित है राजधानी मॉस्को. पिछले दो हफ़्तों के भीतर मॉस्को में कोरोना के मामलों में तीन गुना वृद्धि हुई है. इनमें सबसे ज़्यादा केसेज़ डेल्टा वैरिएंट के ही हैं. मॉस्को के मेयर हैं, सेरगी सोबेनिन.

18 जून को उन्होंने इस विषय पर मीडिया को ब्रीफ़ किया. मेयर ने बताया कि मॉस्को के तकरीबन 90 पर्सेंट कोविड केसेज़ डेल्टा वैरिएंट के हैं. मॉस्को के अलावा कुछ और शहरों में भी ये इज़ाफा देखा जा रहा है. रूस के पास बहुत बड़ा इलाका है. अगर ये वैरिएंट और भी इलाकों में फैलता है, तो काफी मुश्किल हो सकती है. चुनौती इसलिए भी ज़्यादा है कि रूस अब तक केवल 9 पर्सेंट आबादी को ही फुली वैक्सीनेट कर सका है.

मॉस्को के मेयर सेरगी सोबेनिन. (तस्वीर: एएफपी)
मॉस्को के मेयर सेरगी सोबेनिन. (तस्वीर: एएफपी)

ब्रिटेन और रूस के अलावा इंडोनेशिया से भी परेशान करने वाली ख़बरें आ रही हैं

वहां जर्काता, जावा और बंगकालान में संक्रमण तेज़ी से बढ़ा है. ये सभी घनी आबादी वाले इलाके हैं. इस हालिया तेज़ी के पीछे भी डेल्टा वैरिएंट को ही वजह बताया जा रहा है. जानकारों का कहना है कि यही हाल रहा, तो इंडोनेशिया में कोविड की सुनामी आ सकती है. परेशानी की बात ये भी है कि वहां कोविड जांच की संख्या भी बहुत कम है. दूर-दराज़ के इलाकों में टेस्टिंग फैसिलिटी ना के बराबर है.

डेल्टा वैरिएंट से अमेरिका को भी ख़तरा है. वहां भी इसके मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं. ये रफ़्तार इतनी तेज़ है कि एक हफ़्ते पहले कोरोना के समूचे नए मामलों में डेल्टा की हिस्सेदारी 6 पर्सेंट थी. एक हफ़्ते के भीतर ये बढ़कर 10 पर्सेंट हो गई.

अब सारे ज़रूरी डेटा और ब्योरे बताने के बाद कुछ अहम पक्षों को भी जान लेते हैं. क्या डेल्टा वैरिएंट ज़्यादा संक्रामक होने के अलावा अधिक ख़तरनाक भी है? क्या इससे ज़्यादा लोगों की जान जा सकती है? इस सवाल का ठीक-ठीक जवाब अभी मालूम नहीं. क्योंकि इससे जुड़ा बहुत ज़्यादा डेटा उपलब्ध नहीं है.

अगर ब्रिटेन का उदाहरण लें, तो 1 फरवरी से 7 जून के बीच वहां डेल्टा वैरिएंट के चलते 42 मौतें हुई हैं. इनमें से 23 को वैक्सीन नहीं लगी थी. बाकी सात मृतक ऐसे थे, जिन्हें वैक्सीन की पहली डोज़ लगे 21 दिन से ज़्यादा का समय हो गया था. चिंता की बात ये है कि मृतकों में करीब 12 लोग ऐसे भी थे, जो सेकेंड डोज़ लेने के दो हफ़्ते से ज़्यादा वक़्त बाद मरे.

इंडोनेशिया में पांच फीसद लोग भी पूरी तरह से वैक्सीनेटेड नहीं हैं. (तस्वीर: एएफपी)
इंडोनेशिया में पांच फीसद लोग भी पूरी तरह से वैक्सीनेटेड नहीं हैं. (तस्वीर: एएफपी)

क्या डेल्टा वैरिएंट से संक्रमित लोगों में हॉस्पीटलाइज़ेशन की आशंका ज़्यादा है?

जानकारों का कहना है, शायद हां. ब्रिटेन के आंकड़े फिलहाल यही संकेत कर रहे हैं. वहां 7 जून से 13 जून के बीच 1,300 से ज़्यादा कोविड मरीज़ अस्पताल में भर्ती कराए गए. एक हफ़्ते पहले ये संख्या 43 फीसदी कम थी. जानकारों का मानना है कि हॉस्पिटलाइज़ेशन में आई ये बढ़ोत्तरी डेल्टा के ही चलते है. जानकारों का मानना है कि अभी तक उपलब्ध जानकारियों के मुताबिक ये लगता है कि इस वैरिएंट में ज़्यादा लोगों को अस्पताल में भर्ती कराने की नौबत आती है.

क्या मौजूदा वैक्सीन डेल्टा वैरिएंट पर असरदार हैं?

इससे जुड़ी सही तस्वीर विस्तृत डेटा के बाद स्पष्ट हो सकेगी. मगर फिलहाल मौजूद जानकारियों के मुताबिक, कुछ वैक्सीन्स अल्फ़ा वैरिएंट के मुकाबले डेल्टा वैरिएंट पर कम प्रभावी हैं. मसलन, फ़ाइजर वैक्सीन. इसकी दो डोज़ लगती है. पहली डोज़ के बाद फ़ाइजर वैक्सीन पहले के वैरिएंट्स के खिलाफ़ 94 पर्सेंट सुरक्षा देती थी. दूसरा डोज़ लगने के बाद प्रॉटेक्शन 96 पर्सेंट तक पाया गया था. मगर अब तक की जांच के मुताबिक, डेल्टा वैरिएंट पर इसका प्रॉटेक्शन लेवल कम है. वैक्सीन की पहली डोज़ के बाद 36 पर्सेंट प्रॉटेक्शन और दूसरी डोज़ के बाद 88 पर्सेंट तक प्रॉटेक्शन नोट किया गया.

ऐसी कमी एस्ट्राज़ेनेका उर्फ़ कोविशील्ड में पाई गई. एस्ट्राज़ेनेका वैक्सीन की भी दो डोज़ लगती हैं. पहले के वैरिएंट्स में एस्ट्राज़ेनका की पहली डोज़ लगने के बाद 71 पर्सेंट तक सुरक्षा मिलती थी. दूसरी डोज़ लगने के बाद ये बढ़कर 92 पर्सेंट तक इफ़ेक्टिव रहता था. मगर डेल्टा वैरिएंट ने इसका भी असर घटाया है. डेल्टा वैरिएंट में पहले डोज़ के बाद 30 पर्सेंट और दूसरे डोज़ के बाद 67 पर्सेंट तक प्रॉटेक्शन पाया गया. यानी ऐसा नहीं कि डेल्टा के आगे वैक्सीन्स बिल्कुल ही फेल हों. प्रॉटेक्शन कम है, मगर है. ये प्रॉटेक्शन संक्रमण की तीव्रता को कम कर सकता है. जान बचा सकता है. इसीलिए ज़रूरी है कि तेज़ी से वैक्सीनेशन हो.

क्या कोरोना के और भी वैरिएंट्स आ सकते हैं?

जवाब है, हां. कोरोना वायरस इंसानों में नहीं पाया जाता था. इसका होस्ट जीव चमगादड़ था. वहां से शायद किसी और जानवर के रास्ते ये हम इंसानों तक पहुंचा. ये जंप कब हुआ, कैसे हुआ, ये अभी जांच का विषय है. लेकिन आम राय यही है कि नवंबर-दिसंबर 2019 के करीब ये वुहान से फैलना शुरू हुआ.

यानी इंसानों के भीतर संक्रमण फैलाने की इसकी यात्रा कमोबेश बस डेढ़ साल पुरानी है. इतने ही समय में इसके कई म्यूटेशन आ चुके हैं. इसकी नई पीढ़ी ऑरिजनल पीढ़ी से कई गुना ज़्यादा ताकतवर है. एक्सपर्ट्स के मुताबिक, अभी इसमें और भी पावरफुल होने का स्कोप है. मगर स्ट्रॉन्गर होने की उसकी क्षमता असीमित नहीं है. और सबसे ज़रूरी बात. इंसान भी हाथ-पर-हाथ रखकर नहीं बैठा है. हमने रेकॉर्ड तेज़ी से वैक्सीन बनाया है. सेकेंड जनरेशन वैक्सीन्स पर भी काम चालू है. वायरस भले पावरफुल हो रहा हो, लेकिन हम भी अपनी हिफ़ाजत बढ़ाने में मुस्तैद हैं.


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