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बिजली की कीमत को लेकर बनने वाले कानून का विरोध क्यों हो रहा है?

देश की राजधानी में बहुत कुछ हो रहा है. संसद में एक ऐसा बिल आ रहा है, जिसका सीधा असर हमारे अन्नदाता पर पड़ेगा. बिजली की कीमत को लेकर कानून बनना है, माने आपके लिए उपजने वाले अन्न की लागत पर असर होगा. जिस संसद में इस बिल पर चर्चा होनी है, उसी में 75 साल पहले हमारे देश की किस्मत लिख दी गई थी – हमारा संविधान.

कई सालों से केंद्र की मोदी सरकार बिजली पर एक कानून लाने की कोशिश में है. जब सरकार ड्राफ्ट को बिल के रूप में संसद में पेश करने की बात करती है तो हल्ला मच जाता है. विरोध किसान संगठनों की तरफ से भी होता है, और विरोध कई राज्य सरकारों की तरफ से भी होता है. कई बार ड्राफ्ट बदला गया है.

पिछले साल बिल को संसद में पेश करने की तैयारी थी. लेकिन विरोध ज्यादा बढ़ा तो सरकार ने पैर पीछे खींच लिए. अब फिर सरकार संसद में बिजली विधेयक पेश करने की तैयारी में है. मॉनसून सत्र के लिए ही ये बिल लिस्टेड है. संभव है कि इस हफ्ते सरकार ये बिल संसद में लाए.

बिजली की मौजूदा व्यवस्था

सबसे पहले तो किसानों के लिए बिजली की मौजूदा व्यवस्था समझते हैं. खेती की लागत का एक बड़ा हिस्सा होता है बिजली. जुताई, बुआई या बीज का खर्चा एक सीज़न में एक ही बार लगता है. लेकिन सिंचाई के लिए बिजली का खर्च किसान को हर महीने पूरे साल देना पड़ता है. अब ये खर्चा कितना होता है. ये राज्यवार अलग अलग होता है. मसलन अगर कोई आंध्र प्रदेश का किसान है तो उसे सिंचाई की बिजली के लिए एक रुपया नहीं देना पड़ेगा. आंध्र प्रदेश में किसानों को फ्री बिजली दी जाती है. इसके लिए करीब 7 हजार करोड़ रुपये सब्सिडी पर सरकार खर्च करती है.

आंध्र प्रदेश की तरह तमिलनाडु जैसे कुछ और राज्यों में किसानों के लिए बिजली फ्री है. फिर वो राज्य आते हैं जहां किसानों के लिए बिजली फ्री तो नहीं है, लेकिन सरकार कुछ सब्सिडी देती है. और इसमें भी दो तरह से सिस्टम हैं. एक तरीका तो ये है कि किसान के कुएं या पंप के लिए जो भी बिजली इस्तेमाल होती है, उसका एक फिक्स चार्ज लिया जाता है. यानी मीटर सिस्टम नहीं होता. जितने बीएचपी या ब्रेक हॉर्स पावर का पंप होता है, उसके हिसाब से डिस्कॉम कंपनी एक फिक्स चार्ज का बिल किसान को भेज देती है.

जैसे उत्तर प्रदेश में 170 प्रति बीएचपी पंप चार्ज किया जाता है. अगर 10 बीएचपी का पंप है तो चार्ज हो जाएगा 1700 रुपये. हालांकि ये बिजली भी सब्सिडाइज़्ड होती है. और इसमें किसान के हिस्से की सब्सिडी सीधे डिस्कॉम कंपनी को भेज दी जाती है. ताकि किसान को सस्ता चार्ज पड़े. दूसरा तरीका मीटर वाला है. इसमें किसान से बिजली का पैसा प्रति यूनिट के हिसाब से ही वसूल जाता है. लेकिन रिहायशी इलाकों के मुकाबले ये बिजली सस्ती होती है. यानी सब्सिडाइज़्ड होती है. जैसे यूपी में करीब करीब 2 रुपये प्रति यूनिट ये बिजली पड़ती है.

अगर हम राजस्थान की बात करें तो वहां 10 बीएचपी पंप के लिए दो महीने का चार्ज आता है करीब 2000 हजार रुपये. करीब 6 घंटे किसानों को रोज़ाना बिजली दी जाती है, और उस आधार पर महीने के हजार रुपये डिस्कॉम कंपनियां किसानों से चार्ज करती हैं. बाकी सब्सिडी राज्य सरकार देती है.

विद्युत वितरण कंपनी

बिजली की सप्लाई करने वाली कंपनियों को कहते हैं पावर डिस्कॉम. हिंदी में कहते हैं विद्युत वितरण कंपनी. देश के ज्यादातर राज्यों में डिस्कॉम कंपनियां सरकारी हैं. सिर्फ दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद जैसे गिने चुने शहरों में ही प्राइवेट कंपनियां बिजली सप्लाई के सेक्टर में हैं. देश में पब्लिक सेक्टर की 41 डिस्कॉम कंपनियां हैं.

किसानों को सस्ती बिजली देने के लिए डिस्कॉम कंपनियां दो काम करती हैं. एक तो सरकार से सब्सिडी लेती ही हैं. दूसरा क्रॉस सब्सिडी करती हैं. यानी उद्योग या शहरी क्षेत्रों को जो बिजली दी जाती है, वो महंगी दी जाती है, और उधर से जो कमाई होती है वो किसानों को सस्ती बिजली देने के काम में ली जाती है.

लेकिन डिस्कॉम को ज्यादा राज्यों से मिलने वाली सब्सिडी पर ही डिपेंड रहना पड़ता है. इसमें होता ये है कि राज्य सरकारें डिस्कॉम का सब्सिडी वाला बिल टाइम पर नहीं देती हैं. टाइम पर पैसा नहीं आता है तो डिस्कॉम कंपनियां घाटे में ही रहती हैं. वित्त वर्ष 2019-20 में सिर्फ एक साल का डिस्कॉम कंपनियों का घाटा 38 हज़ार करोड़ रुपये था. डिस्कॉम घाटे में रहती हैं तो बिजली वितरण का तरीका अपग्रेड नहीं होता, इस वजह से विद्युत की छीजत भी ज्यादा होती है.

बिजली संशोधन विधेयक

तो बिजली सेक्टर में सुधारों के नाम पर केंद्र सरकार बिजली संशोधन विधेयक ला रही है. बिजली कानून 2003 में संशोधन का विधेयक. विद्युत मंत्रालय ने पिछले साल अप्रैल में इस बिल का नया ड्राफ्ट सार्वजनिक किया था. पिछले 6 बरसों में बिल का चार बार सरकार ने ड्राफ्ट तैयार किया और हर बार विरोध का सामना करना पड़ा. पिछले साल जब ये बिल संसद में पेश होने की बात हुई तो कई गैर-एनडीए राज्य सरकारों ने औऱ किसानों ने ज़ोरदार विरोध किया. तो बिल पेश नहीं हुआ. अब फिर मोदी सरकार ये बिल संसद में लाने की तैयारी में है.

अब बात आती है कि बिल में ऐसे क्या प्रोविज़न हैं किसानों और कई राज्य आपत्ति जता रहे हैं. राज्य सरकारें तो इसका विरोध इसलिए कर रही हैं. दो बड़े बिंदु हैं जिनका ज़्यादा विरोध हो रहा है.

पहला – अभी तक किसानों को जो सस्ती बिजली मिलती है उस पर सब्सिडी का भुगतान सरकारें सीधे वितरण कंपनियों यानी DISCOMs को करती हैं. नए बिल के ड्राफ्ट के आधार पर कहा जा रहा है कि अगर ये संसद से पास होकर कानून बन जाता है तो सब्सिडी सीधे ग्राहकों के अकाउंट में आएगी. यानी एक बार ग्राहकों को बिजली की पूरी कीमत चुकानी पड़ेगी.

नियामक संस्थाएं सब्सिडी को बिना कैल्क्यूलेशन में लाए टैरिफ़ या बिजली दर तय करेगी. उसके बाद राज्य सरकार जितनी सब्सिडी देना चाहेगी, वो सीधे ग्राहक के अकाउंट में डायरेक्ट बेनेफिट ट्रांसफर स्कीम से भेज देगी. यानी जैसे LPG सिलेंडर के लिए सब्सिडी सीधे खाते में ट्रांसफर होती है वैसे ही बिजली की सब्सिडी भी सीधे खातों में भेजने का प्लान है.

यानी अभी राज्य सरकार वितरण कंपनियों से मुख़ातिब है और उनसे कहती है कि तुम किसानों को बिजली दो और उनकी बिजली का बिल हमें दो. या फिर उनको घटी हुई दर पर बिजली दो और जितने पैसे का डिस्काउंट उन्हें दे रहे हो वो पैसे हमसे लो.

बिल के पास होने के बाद राज्य सरकार, वितरण कंपनियों से नहीं उपभोक्ताओं से मुख़ातिब होकर बात करेगी. बोलेगी ये वितरक कंपनियां जितना बिल मांग रही हैं, जिस दर से मांग रही हैं दे दो. हम पूरे पैसे या फिर जितना डिस्काउंट बनता है वो पैसे तुम्हें रिफ़ंड कर देंगे. जैसे LPG के केस में करते थे.

दूसरा- बिल के ड्राफ्ट में कुछ और प्रावधान भी थे जिनका विरोध हो रहा है. नए बिल के ज़रिए सरकार विद्युत वितरण में निजी कंपनियों की एंट्री कराना चाहती है. पश्चिम बंगाल जैसे राज्य इसका भी विरोध कर रहे हैं. तर्क ये है कि इससे डिस्कॉम कंपनियों का घाटा और बढ़ जाएगा, क्योंकि निजी कंपनियां चेरी पिकिंग करेंगी. एग्रीकल्चर सेक्टर के बजाय इंडस्ट्रियल या कमर्शियल सेक्टर में बिजली सप्लाई का ठेका लेंगी.

तो कुल मिला कर एक बार फिर बिजली संशोधन विधेयक बिल पर झगड़ा चल ही रहा है. देखना है कि सरकार इस सत्र में बिल लाती है या नहीं.


वीडियो- ग्राउंड रिपोर्ट: बिजली कैसे बनती है और वो एक जगह से दूसरी जगह कैसे पहुंचती है, जानिए

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